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खास रपटः देहात में छिपा दानव

ग्रामीण भारत में बेहद अपर्याप्त स्वास्थ्य ढांचे की बात सबको पता है, लेकिन आधिकारिक अनुमान संकट पर पर्दा डालते हैं जिससे महामारी के खिलाफ लड़ाई और मुश्किल हो जाती है.

अपना इंतजाम खुद उत्तर प्रदेश के शामली में खेड़ा गडाई गांव में कोविड मरीज होम आइसोलेशन के दौरान  ऑक्सीजन सपोर्ट पर अपना इंतजाम खुद उत्तर प्रदेश के शामली में खेड़ा गडाई गांव में कोविड मरीज होम आइसोलेशन के दौरान  ऑक्सीजन सपोर्ट पर

ओझौली उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गृह जिले गोरखपुर से 50 किमी दूर गोला तहसील का एक गुमनाम-सा गांव है. बताया जाता है कि करीब 4,500 की आबादी वाले इस गांव ने बीते महीने कोविड सरीखे लक्षणों के बाद 30 लोगों को मरते देखा. गोला स्थित सबसे नजदीकी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) से उन्हें कोई जवाब नहीं मिला.

ओझौली के मूल बांशिदे नीलरंजन ओझा ने 20 मई को गोरखपुर के जिला पंचायती राज अधिकारी हिमांशु ठाकुर की मौत की इत्तेला दी. तब स्वास्थ्य अधिकारियों की एक टीम फौरन गांव आई और आठ लोगों को गोरखपुर के कोविड अस्पताल में भर्ती करवाया गया.

ग्रामीण इलाकों में कोविड के मामलों को लेकर हरकत में आने में महाराष्ट्र के सरकारी अफसर भी इसी तरह ढीले-ढाले और लेत-लतीफ रहे हैं. रोजाना राज्य के करीब 20 फीसद कोविड टेस्ट अकेले मुंबई में किए जा रहे हैं, जिसकी महाराष्ट्र की आबादी में महज 1.5 फीसद हिस्सेदारी है. अहमदनगर, बुलढाणा, सतारा, बीड तथा ऐसे ही कुछ अन्य ग्रामीण जिलों में, जहां पॉजिटिविटी दर 23-30 फीसद है, रोज 5,000 से भी कम टेस्ट किए जा रहे हैं. बीड में मई के दूसरे हफ्ते में विवाद खड़ा हो गया जब जिला प्रशासन कोविड से जुड़ी 240 मौतें राज्य की गिनती में जुड़वाने में नाकाम रहा.

आंकड़े कम बताना भी केवल महाराष्ट्र तक सीमित नहीं है. देश जब दूसरी लहर पर काबू पाने की जद्दोजहद में लगा है, आधे-अधूरे आंकड़ों से हालात और ज्यादा खतरनाक हो जाते हैं. सरकारी आंकड़े बर्बादी का सटीक खाका पेश नहीं करते, जिससे उनका मुकम्मल उपाय भी नहीं हो पाता.

दिल्ली के मेडिकल एपिडीमियोलॉजिस्ट डॉ. चंद्रकांत लहरिया कहते हैं, ''ग्रामीण भारत में कोविड की भरोसेमंद निगरानी और आंकड़े नहीं होने के कारण हम महामारी की वास्तविक हद और (तीव्रता) के बारे में पक्का पता नहीं लगा सकते. देश के कुल आंकड़े शहरी इलाकों में फैलाव घटने का इशारा करते हैं, लेकिन (यह मुमकिन है कि वायरस) ग्रामीण भारत में अब भी फैल रहा हो.’’

ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ता खतरा
ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ता खतरा

एसबीआइ रिसर्च की 7 मई की एक रिपोर्ट का अनुमान है कि करीब 48.5 फीसद नए मामले अब ग्रामीण जिलों में हैं, जो अप्रैल के 45.5 फीसद और मार्च के 37 फीसद से ज्यादा हैं. लेकिन नए मामलों से ज्यादा ये मौतें ही हैं जो भारत के गांवों में कहर बरपा रही हैं. सितंबर 2020 में भारत में कोविड से हुई 11 फीसद मौतें केंद्र के बैकवर्ड रीजन ग्रांट फंड के तहत रकम हासिल करने वाले 243 जिलों में थीं.

अब यह आंकड़ा 16 फीसद है. इनमें ओझौली और बीड सरीखी जगहों के कई मामले तो शामिल ही नहीं हैं क्योंकि ये जगहें नाकाफी मेडिकल इन्फ्रास्टक्चर, टेस्ट करवाने में हिचकिचाहट और प्रशासनिक बेरुखी के कारण रडार से दूर चली गई हैं. मसलन, 1 और 23 मई के बीच महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने राज्य में कोविड के मामलों की समीक्षा के लिए चार बैठकें कीं, लेकिन इनमें से केवल एक 16 मई की बैठक में ग्रामीण इलाकों पर प्राथमिकता से ध्यान दिया गया. ठाकरे ने भी स्थिति का संज्ञान तब लिया जब यह साफ हो गया कि राज्य के करीब 70 फीसद नए मामले 1,00,000 से कम आबादी वाले तालुकाओं में दर्ज किए जा रहे थे. 

किस तरह राज्य कर रहे हैं मुकाबला
किस तरह राज्य कर रहे हैं मुकाबला

उसी दिन केंद्र सरकार ने निर्देश दिया कि राज्य प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (पीएचसी), सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों और उप-जिला अस्पतालों में बिस्तर, ऑक्सीजन, टेस्टिंग किट और एंबुलेंस जैसे संसाधनों की सुलभता बढ़ाएं तथा अस्थायी कोविड देखभाल केंद्र बनाकर ग्रामीण मेडिकल इन्फ्रास्ट्रक्चर में सुधार लाएं.

निर्देशों में यह भी कहा गया कि सभी पीएचसी, उप-केंद्रों (एससी) और स्वास्थ्य तथा आरोग्य केंद्रों पर रैपिड ऐंटीजन टेस्ट (आरएटी) किट मुहैया करवाई जाएं, सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारियों और सहायक नर्स दाई (एएनएम) को रैपिड ऐंटीजन टेस्ट करने का प्रशिक्षण दिया जाए और मान्यता प्राप्त सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं (आशा) को गांवों में सक्रिय निगरानी का काम सौंपा जाए.

राज्यों की तैयारी
ज्यादातर राज्यों ने निर्देशों के मुताबिक कदम उठाना शुरू कर दिया है. कुछ तो निर्देश मिलने से पहले ही ऐसा कर रहे थे. पर यह बहुत भारी-भरकम काम है. महामारी का गैर मामूली काम आने से पहले भी ग्रामीण भारत की स्वास्थ्य सेवाएं दयनीय बुनियादी ढांचे, मानवबल की कमी और नीतिगत उपेक्षा से कृशकाय थीं. देहात में स्वास्थ्य सेवाओं की चरमराती रीढ़ का निर्माण करने वाले एससी, पीएचसी और सीएचसी की जबरदस्त कमी है.

द्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के मुताबिक, देश में एससी 23 फीसद, पीएचसी 28 फीसद और सीएचसी 37 फीसद कम हैं. पिछले साल जारी ग्रामीण स्वास्थ्य सांखियकी रिपोर्ट बताती है कि औसतन हरेक एससी चार गांवों, हरेक पीएचसी 27 गांवों और हरेक सीएचसी 128 गांवों की सेवा करता है. दूसरे ढंग से कहें तो सीएचसी करीब मुंबई के आकार के 596 वर्ग किलोमीटर इलाके के लिए जिम्मेदार हैं.

यहां तक कि जब नए कोविड-समर्थ बुनियादी ढांचे की बात आती है, तब भी स्थिति शहरी इलाकों के हक में बहुत ज्यादा झुकी हुई है. मसलन, मध्य प्रदेश में कोविड के इलाज के लिए 819 चिकित्सा सुविधाएं स्थापित की गईं. इनमें से महज 69 ग्रामीण इलाकों में हैं. केवल 14 फीसद आइसोलेशन बिस्तर, एक फीसद ऑक्सीजन बिस्तर और 0.54 फीसद आइसीयू ग्रामीण इलाकों में हैं.

ज्यादा कोविड केस वाले जिले
ज्यादा कोविड केस वाले जिले

स्वास्थ्य कर्मियों के मामले में भी स्थिति कमोबेश यही है. हालांकि बीते 15 सालों में देश भर के पीएचसी में एलोपैथिक डॉक्टरों की संख्या 40 फीसद बढ़ी है, लेकिन अब भी सात फीसद कम है. ज्यादा अहम यह कि सीएचसी में 76.1 फीसद विशेषज्ञ डॉक्टर कम हैं. जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज के सामाजिक चिकित्सा और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र की प्रोफेसर संघमित्रा शील आचार्य कहती हैं, ''पीएचसी और एससी का सबसे बड़ा नेटवर्क शायद भारत में है. लेकिन इनमें कर्मचारियों और खासकर जमीनी कार्यकर्ताओं की सख्त दरकार है क्योंकि ये ही पहले संपर्क (का बिंदु) हैं.’’

इसके चलते उन्नत बुनियादी ढांचा भी पंगु हो जाता है. मसलन, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देशों के मुताबिक, हर जिले में चार सीएचसी 50 बिस्तरों, एक ऑक्सीजन कंसेंट्रेटर और डॉक्टरों की एक टीम वाले समर्पित कोविड अस्पतालों में बदले जाने हैं. ऐसा ही एक शंभूनाथ सीएचसी आगरा से 70 किमी दूर बाह में है. इसमें 10 ऑक्सीजन बिस्तर तो हैं पर ऑक्सीजन की सप्लाइ संभालने के लिए प्रशिक्षित कर्मी नहीं हैं.

यहां डॉक्टरों के 21 स्वीकृत पद हैं, पर केवल तीन ही पदस्थ हैं. यहां डिजिटल एक्स-रे मशीन है, पर रेडियोलॉजिस्ट नहीं है और पैथोलॉजिस्ट न होने से पैथोलॉजी यूनिट बंद पड़ी है. नतीजा यह कि कोविड मरीजों को यहां भर्ती ही नहीं किया जा रहा है. कमी से निपटने के लिए राज्य सरकार सेवानिवृत्त मेडिकल स्टाफ को तैनात करने पर विचार कर रही है.

खतरे का खाका
खतरे का खाका

मुख्यमंत्री ने डॉक्टरों, नर्सों, पैरामेडिकल स्टाफ और चौथी श्रेणी के कर्मचारियों को कोविड ड्यूटी के लिए बेसिक वेतन पर 25 फीसद अतिरिक्त प्रोत्साहन देने का ऐलान किया. जरूरत के आधार पर मेडिकल इंटर्न, एमएससी नर्सिंग के छात्र, बीएससी नर्सिंग के छात्र, एमबीबीएस अंतिम वर्ष के छात्र और फार्मा छात्रों को भी दैनिक मानदेय पर पदस्थ किया जाएगा. पड़ोसी हरियाणा में भी मानवबल बढ़ाने के लिए रजिस्टर्ड मेडिकल प्रैक्टिशनर (आरएमपी) और दूसरे साल से ऊपर के मेडिकल छात्रों को लाया गया है.

अलबत्ता मानवबल बढ़ाना आसान नहीं है, जैसा कि पश्चिम बंगाल में देखा गया. राज्य सरकार ने हालांकि जिला मजिस्ट्रेटों और चीफ मेडिकल तथा स्वास्थ्य अधिकारियों को मेडिकल स्टाफ की भर्ती का पूरा अधिकार दिया है, पर कम मेहनताने की वजह से यह मुहिम लडख़ड़ा गई. एसोसिएशन ऑफ हेल्थ सर्विस डॉक्टर्स के सेक्रेटरी डॉ. मानस गुमटा कहते हैं, ''निजी अस्पताल डॉक्टरों को 500 रुपए प्रति घंटा अदा करते हैं, वहीं सरकार 40,000 रुपए मासिक तनख्वाह देती है.

अगर हम 50 डॉक्टरों की भर्ती करना चाहें, तो हमें केवल 25 आवेदन मिलते हैं.’’ बिहार में भी यही हालत है. राज्य सरकार ने सितंबर 2020 में जनरल ड्यूटी मेडिकल ऑफिसर के तौर पर 3,186 डॉक्टरों की नियुक्ति की और अगस्त 2020 में 929 विशेषज्ञ डॉक्टर भी बढ़ाए. तिस पर भी विशेषज्ञ डॉक्टरों के 4,149 पद और 3,206 सामान्य पद खाली हैं. लैब तकनीशियनों की भी भारी कमी है (हालांकि स्वास्थ्य विभाग ने पिछले साल एएनएम को कोविड-19 के टेस्ट के लिए प्रशिक्षित करने का गैरपारंपरिक कदम उठाया था.)

राज्य सरकारों ने ग्रामीण इलाकों में निगरानी बढ़ाने के लिए भी कदम उठाए हैं, ताकि वहां शहरी इलाकों सरीखी स्थिति दोहराई न जाए जहां कोविड के तेजी से बढ़ते मामलों तले मेडिकल इन्फ्रास्ट्रक्चर चरमरा गया था. गरीबी और सामाजिक सुरक्षा विशेषज्ञ डॉ. भवानी आर.वी. कहती हैं, ''हमारे कृशकाय ग्रामीण बुनियादी ढांचे में उस किस्म का भार उठाने की क्षमता नहीं है जो हमने कोविड की लहर में शहरी इलाकों में देखा.’’ तकरीबन सभी राज्यों ने निगरानी और टेस्टिंग बढ़ाने के लिए एएनएम, आशा और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को लाया गया है. कुछ राज्यों ने तो ग्रामीण इलाकों में मोबाइल टेस्टिंग इकाइयां भी शुरू की हैं.

उत्तराखंड के ग्रामीण इलाकों में भी कोविड पैर फैला चुका है. पौड़ी और अल्मोड़ा जिलों में पॉजिटिविटी दस प्रतिशत से ऊपर चल रही है. पिथौरागढ़, चमोली जैसे दूरदराज के जिलों में भी कोरोना के मरीज निकल रहे हैं. मैदानी गांवों में कुछेक स्थानों पर टेस्टिंग की सुविधाएं हैं लेकिन पहाड़ी गांवों में स्वास्थ्य सुविधाएं तो दूर मामूली दवाएं लेने के लिए भी काफी मेहनत करनी पड़ती है. देहरादून, नैनीताल जैसे मैदानी जिलों में टेस्टिंग और इलाज की सुविधाएं काफी हद तक हैं.

नदारद आंकड़े
फिर भी मामले नजर से छूट रहे हैं, खासकर इसलिए भी कि ग्रामीण जांच-पड़ताल आरएटी टेस्ट पर बहुत ज्यादा निर्भर है. टेस्ट के नतीजे आसानी से नहीं मिलने के कारण भी मुश्किल बढ़ जाती है. सेंटर फॉर हेल्थ ऐंड सोशल जस्टिस की एक इकाई सहर की डायरेक्टर संध्या गौतम कहती हैं, ''अगर किसी का (टेस्ट) हुआ है, तो उसे टेस्ट रिपोर्ट सुलभ होनी चाहिए.’’ विशेषज्ञ इलाज के जरूरतमंद लोगों की पहचान के लिए टेस्ट के नतीजों पर बहुत ज्यादा निर्भरता के विरुद्ध भी आगाह करते हैं

 पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया के प्रेसिडेंट प्रोफेसर के. श्रीनाथ रेड्डी कहते हैं, ''चूंकि टेस्ट व्यापक रूप से मौजूद नहीं हैं और झूठे नेगेटिव (भी दे सकते हैं), लिहाजा, आइसोलेशन और इलाज का फैसला करते वक्त व्यक्ति के संपर्क में आने के इतिहास और नैदानिक लक्षणों का ध्यान रखने की भी जरूरत है.’’ अनुकरण के मॉडल के तौर पर वे करनाल जिले में चल रही हरियाणा सरकार की संजीवनी योजना का जिक्र करते हैं. इसमें सहायता और निगरानी से लैस होम केयर का समग्र बहुघटकीय कार्यक्रम है और जरूरत पडऩे पर उन्नत देखभाल सुविधाओं तक जाने के लिए निश्चित आपातकालीन ट्रांसपोर्ट भी मुहैया किया जाता है.

जहां तक बात होम आइसोलेशन में मामलों की निगरानी की है, गुजरात और महाराष्ट्र सहित कई राज्यों का प्रदर्शन इसको लेकर बहुत खराब रहा है. फोन कॉल के माध्यम से पूछताछ करने के अलावा, संक्रमण की निगरानी के लिए या यहां तक कि यह सुनिश्चित करने के लिए भी कोई व्यवस्था नहीं है कि रोगियों की ओर से आइसोलेन (पृथकवास) के नियमों का कड़ाई से पालन किया जा रहा है या नहीं.

इस खामी को दूर करने के लिए, बिहार सरकार ने होम आइसोलेशन में संक्रमित रोगियों की ऑनलाइन निगरानी के लिए एक ऐप्लिकेशन लॉन्च किया है जिसका इस्तेमाल एएनएम और आशा कार्यकर्ता करती हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिहार सरकार से केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के साथ ऐप का विवरण साझा करने का अनुरोध किया है ताकि इसे पूरे देश में अपनाया जा सके.

सरकार के प्रयासों को ग्रामीण आबादी के प्रतिरोध का सामना भी करना पड़ रहा है, इसकी मुख्य वजह कोविड के बारे में जागरूकता की कमी और अफवाहों का प्रसार है. अगर कोई व्यन्न्ति जांच में कोरोना संक्रमित पाया जाता है तो उसे सामाजिक कलंक और जबरन अलगाव का डर होता है और बहुत से लोग तो इस डर से रोग के लक्षणों की जानकारी भी नहीं देते कि कहीं उन्हें जबरन अस्पताल में भर्ती न करा दिया जाए.

अस्पतालों से आने वाली डरावनी कहानियों—बिस्तरों और ऑक्सीजन की कमी और अस्पतालों के बहुत खराब रखरखाव की विचलित करने वाली तस्वीरों और मौतों की खबरें—ने इन आशंकाओं को और बढ़ा दिया है. कलकत्ता स्कूल ऑफ ट्रॉपिकल मेडिसिन के पूर्व निदेशक डॉ. पी.के. कुंडू कहते हैं, ''लोग जांच कराने या अस्पताल जाने से घबरा रहे हैं. वे क्वारंटीन किए जाने से डरते हैं.

विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य केंद्रों और चिकित्सा संस्थानों पर लोगों का भरोसा बहुत कम है और यह एक बड़ा मुद्दा है.’’ पश्चिम बंगाल के पश्चिम मिदनापुर जिले के केशियारी ब्लॉक की हीरामनी मंडी जैसी आशा कार्यकर्ताओं का कहना है कि इस भरोसे की कमी ने उन्हें लोगों को अपनी जांच कराने के लिए राजी करने में असमर्थ बना दिया है.

संस्थागत मदद लेने की अनिच्छा के कारण गांवों में मृत्यु दर भी अधिक है. जैसे, पंजाब में ग्रामीण क्षेत्रों में मृत्यु दर 2.3 प्रतिशत है जबकि शहरी क्षेत्रों में यह 0.7 प्रतिशत है. राज्य सरकार के अधिकारियों का कहना है कि ग्रामीण क्षेत्रों में लगभग 83 प्रतिशत मरीज अस्पतालों का रुख तभी करते हैं जब बीमारी बढ़ जाती (एडवांस स्टेज) है, जिससे मृत्यु दर बढ़ जाती है. 

डर और अविश्वास भी ग्रामीण क्षेत्रों में मामलों और मौतों की कम रिपोर्टिंग को बढ़ावा दे रहा है. जहां शहरी क्षेत्रों में मौतों की पुष्टि करने के कई तरीके हैं—जैसे, श्मशान घाटों और कब्रिस्तानों के रिकॉर्ड के आंकड़ों से सही संख्या आंकी जा सकती है—ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसा कोई विकल्प नहीं है. 

गांवों में अविश्वास 

सरकारी अधिकारी कोविड से मरने वालों के परिवारों को जबरन क्वारंटीन कर सकते हैं, इस डर से भी ग्रामीण दाह संस्कार से पहले कोविड के संदिग्ध मामलों की रिपोर्ट नहीं देते हैं. कम रिपोर्टिंग के आरोपों के बीच राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने राज्य में हुई मौतों के ऑडिट के आदेश दिए हैं.

उन्होंने जिला प्रशासन से कहा है कि कोविड के मृत मरीजों के शवों के परिवहन और दाह संस्कार के लिए भुगतान करें. कई विशेषज्ञ कोविड-19 से लड़ने के लिए सरकारी पहल में, ग्रामीण नागरिकों को सक्रिय रूप से भागीदार बनाने के लिए अधिक जागरूकता और भरोसा पैदा करने की जरूरत पर जोर देते हैं.

गौतम कहते हैं कि सूचनाओं के प्रसार और लोगों को संस्थागत मदद लेने के लिए प्रोत्साहित करने में पंचायतों को सक्रिय भूमिका निभानी होगी जैसा कि हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में देखा जाता है. प्रो. रेड्डी कहते हैं, ''कम संसाधनों वाले क्षेत्रों में महामारी का प्रभावी ढंग से मुकाबला करने के लिए एक पूरे समाज की सह-भागीदारी के दृष्टिकोण की आवश्यकता होती है. सामुदायिक जुड़ाव महत्वपूर्ण है. स्थानीय निकाय, महिला स्वयं सहायता समूह और युवा वॉलंटियर्स इसके प्रमुख संसाधन हैं. यह तीसरी लहर के लिए प्रभावी और उचित बहु-क्षेत्रीय प्रतिक्रिया के लिए क्षमता निर्माण में भी मदद करेगा.’’ 

हालांकि, इस तरह के मॉडल के लिए सरकारी मशीनरी की आवश्यकता होती है जो वायरस के प्रसार को रोकने के लिए त्वरित प्रतिक्रिया देती है. ग्रामीण इलाकों में प्रसार को रोकने के लिए राज्यों को दिशानिर्देश जारी करने में केंद्र ने जितना समय लगाया, उससे देश में दूसरी लहर शुरू होने के छह सप्ताह बाद भी जमीन पर स्थिति उत्साहजनक नहीं है. जैसा कि डॉ. लहरिया कहते हैं, इससे थाह लगाई जा सकती है कि महामारी पर प्रतिक्रिया देने में भारत दरअसल कहां खड़ा है. तैयारियां अपर्याप्त और उपाय बहुत धीमे हैं. 


—साथ में रोमिता दत्ता, अमिताभ श्रीवास्तव, राहुल नरोन्हा, किरण डी. तारे, रोहित परिहार और अखिलेश पांडे

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