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जिसका गांव उसका गुजरात

स्थानीय पंचायत चुनावों में कांग्रेस की बढ़ी और भाजपा की घटी सीटों ने साफ कर दिया है कि इस बार भाजपा के लिए ग्रामीण गुजरात को जीतना आसान नहीं.

गांवों को जीतने की चुनौती गुजरात गौरव महासम्मेलन के दौरान मोदी, शाह और रुपाणी गांवों को जीतने की चुनौती गुजरात गौरव महासम्मेलन के दौरान मोदी, शाह और रुपाणी

वर्ष 2012 के गुजरात विधानसभा चुनाव में भाजपा ने मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के अनवरत चुनाव प्रचार की वजह से जब 115 सीटें जीतीं थीं तब उनके प्रतिद्वंदी और कांग्रेस के नेता शंकर सिंह वाघेला ने अपने एक मित्र से दावे के साथ कहा था, ''भाजपा ने 115 सीटें सिर्फ इस वजह से जीतीं क्योंकि 2007 के चुनाव के बाद गुजरात विधानसभा की 182 सीटों का परिसीमन किया गया, जिसमें ग्रामीण सीटों की कीमत पर शहरी सीटों में बढ़ोतरी की गई.

अगर सीटों की स्थिति 2007 की मानिंद ही होती तो भाजपा 105 सीटें जीतने में भी कामयाब नहीं होती. उस स्थिति में भाजपा और कांग्रेस के बीच कांटे का मुकाबला होता." वाघेला की यह टिप्पणी हकीकत से बहुत दूर भी नहीं थी. उदाहरण के लिए उत्तरी गुजरात के ग्रामीण इलाकों में जहां 2012 में मोदी की रैलियों के दौरान भारी-भरकम भीड़ जमा हुई थी वहां पार्टी ने बेहतर प्रदर्शन नहीं किया. गुजरात में करीब दो साल पहले दिसंबर में हुए जिला पंचायत चुनाव में कांग्रेस ने 31 में से 23 सीटों पर भाजपा को शिकस्त दी.

तालुक चुनाव में भी भाजपा के मुकाबले कांग्रेस को अच्छी खासी सीटें मिलीं. इन दोनों चुनाव के नतीजे ग्रामीण गुजरात के बारे में वाघेला की बात की तस्दीक करते हैं. इस जीत को भाजपा के लिए चुनौती और कांग्रेस के लिए गुजरात में वापसी के मौके के तौर पर देखा जा रहा है. दोनों स्थानीय चुनावों में हुई हार का मतलब साफ है कि गुस्से से सुलग रहे गुजरात के गांव अब उबल पड़े हैं.

भाजपा को ग्रामीण गुजरात में अपनी दरकती जमीन का अंदाजा लग चुका है इसीलिए वह रूठे ग्रामीणों को मनाने में जुट गई है. भाजपा ने दस हजार से अधिक गांवों में नर्मदा यात्रा निकाली. लेकिन महिलाएं, किसान और मजदूर इससे किनारा कर गए तथा गांवों में जगह-जगह इस यात्रा का विरोध भी हुआ. भाजपा ने ग्रामीण गुजरात को लुभाने की एक और कोशिश के तहत यहां की ग्रामीण और कस्बाई 149 विधानसभा सीटों को कवर करते हुए ''गुजरात गौरव" यात्रा निकाली.

लेकिन यह यात्रा भी कुछ खास असर नहीं दिखा पाई, जबकि इसे असरदार बनाने के लिए केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह, विदेश मंत्री सुषमा स्वराज, सूचना एवं प्रसारण मंत्री स्मृति ईरानी और यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को इसका मुख्य हिस्सा बनाया गया. एक और कोशिश सीधे भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने अहमदाबाद में टाउन हॉल कार्यक्रम करके की. इसमें अहमदाबाद के अलावा सौ से अधिक जगहों के सवा लाख युवकों को डीटीएच तकनीक से लाइव जोड़ा गया. लेकिन इन कोशिशों के बीच यह साफ दिख रहा है कि 22 वर्षों से राज्य में सत्तासीन और राज्य का कायापलट करने का दावा करने वाली भाजपा का प्रदेश नेतृत्व ग्रामीण गुजरात से सीधे संवाद करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है.

इस काम के लिए भाजपा पटेल आंदोलन का नेतृत्व कर रहे हार्दिक पटेल के पुराने साथी वरुण पटेल और रेशमा पटेल जैसे लोगों को अपने साथ जोडऩे की जुगत में है. हालांकि नरेंद्र पटेल के साथ दस लाख के ''कैश कांड" ने भाजपा की इस कोशिश को भी धक्का पहुंचाया है. सत्तासीन भाजपा सरकार ने वोटरों को लुभाने के लिए 18 बोर्ड निगम में चैयरमेन और निदेशकों की नियुक्ति की, आंगनवाड़ी, आशावर्करों का वेतन 50 फीसदी बढ़ा दिया, पेट्रोल-डीजल की कीमत 3 से 4 रुपए घटा दिए.

सरकार ने फिक्स पे पर पढ़ा रहे शिक्षकों को स्थायी करने की घोषणा भी कर दी. किसानों से कपास और मूंगफली न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर खरीदने की घोषणा दिवाली से पहले ही की जा चुकी है. स्थानीय चुनाव में ग्रामीण जनता का जनमत साफ नजर आया और उसे देखकर यह भविष्यवाणीहोने लगी है कि इन नतीजों का असर विधानसभा चुनाव में पड़ेगा. यह कयास जहां कांग्रेस को उम्मीद दे रहा है, वहीं भाजपा के लिए चिंता का सबब है. इसी उम्मीद के साथ कांग्रेस गुजरात में अपनी राजनैतिक जमीन तलाशने में जुट गई है.

उसकी इस उम्मीद को ओबीसी क्षत्रिय नेता अल्पेश ठाकोर के पार्टी में शामिल होने और हार्दिक के समर्थन ने और मजबूत किया. वहीं जिग्नेश मेवाणी का भाजपा से विरोध कांग्रेस के  लिए एक और शुभ संकेत है. कांग्रेस इस बार बड़े पैमाने पर युवा पाटीदार और ओबीसी चेहरों को टिकट देने वाली है. कांग्रेस ने अपने सौ उम्मीदवारों की सूची पर फिर से मंथन करने का मन बनाया है.

  ग्रामीण क्षेत्रों की नाराजगी तो बड़ी चुनौती है ही, साथ ही पिछली बार के मुकाबले इस बार के चुनावों में भाजपा के ज्यादा कमजोर दिखने की दो और अहम वजहें हैं. पहला, दो दशक से सत्ता में होने के कारण सत्ता विरोध रुझान और दूसरा, गांधीनगर में मोदी की गैर मौजूदगी. हालांकि पार्टी के पास पीएम के तौर पर मोदी का करिश्मा मौजूद है, बावजूद इसके सत्ता पर चढ़ाई की भाजपा की डगर कठिन है.

युवा तिकड़ी जिग्नेश मेवाणी, हार्दिक पटेल और अल्पेश ठाकोर भी भाजपा के लिए एक चुनौती बने हुए हैं. ग्रामीण पृष्ठभूमि के इन युवा नेताओं की पकड़ जितनी शहरों में मजबूत है उतनी ही गांवों में भी. मध्य गुजरात, उत्तर गुजरात और सौराष्ट्र में पटेल युवाओं की एक अच्छी खासी तादाद युवा नेता हार्दिक पटेल के साथ है. हार्दिक आरक्षण के लिए आंदोलन चला रहे हार्दिक भाजपा को हराने के लिए कांग्रेस के साथ एक स्पष्ट गठबंधन बना रहे हैं.

सौराष्ट्र में कई जगहों पर भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष जीतू वघानी की गुजरात गौरव यात्रा से ज्यादा लोग हार्दिक की सभाओं में उमड़े. उदाहरण के लिए, राजकोट जिले में उपलेता कस्बे में गुजरात गौरव यात्रा का स्वागत केवल 800 लोगों ने किया जबकि उसी जगह पर हार्दिक की सभा में 4,000 लोग जुटे. हार्दिक इस बात को अच्छी तरह जानते हैं कि जनता के बीच वे बेहद लोकप्रिय हैं. उन्होंने बेबाकी से अपनी राय रखते हुए कहा, ''ग्रामीण जनता का रुख भाजपा के खिलाफ है. वह भाजपा के छल भरे गुजरात मॉडल का सच जान चुकी है.

इन चुनावों में गांववासी एकजुट होकर भाजपा के खिलाफ अपना फैसला सुनाएंगे." ऐसा नहीं है कि यह केवल हार्दिक की बनाई हुई राय हो. इस बात की तस्दीक ग्रामीण क्षेत्रों में होने वाली उनकी रैलियों में जुटी भीड़ भी कर रही है. इस तिकड़ी के दूसरे बड़े नेता हैं ओबीसी क्षत्रिय युवा नेता अल्पेश. वे शराब विरोधी आंदोलन चलाकर अपने समुदाय के नेता बने थे और बीते महीने कांग्रेस में शामिल होने के पहले सभी ओबीसी समूहों के नेता के तौर पर खुद को स्थापित करने की जुगत में थे.

अल्पेश का शराब विरोधी आंदोलन शहर के बाहरी इलाकों और खासकर गांवों में चर्चा में रहा. ऐसे में मौजूदा समय में ठाकोर लोगों के बीच बेहद लोकप्रिय चेहरा हैं. युवा दलित नेता जिग्नेश तीसरी और बड़ी चुनौती हैं. जिग्नेश उस वर्ग के नेता हैं जो गांवों में सबसे हाशिए पर तो पड़ा ही है साथ ही शहरों में भी उसकी स्थिति ठीक नहीं. उना आंदोलन में जिस तरह से जिग्नेश ने भूमिका निभाई उससे वह दलितों के नेता बनकर उभरे. और लोगों ने भी उन्हें जिस तरह से हाथोहाथ लिया उससे कहीं न कहीं अंदाजा होता है कि इस समुदाय को एक नेता की जरूरत थी. जिग्नेश ने इस खालीपन को भर दिया.

हाल ही में गुजरात में एक और घटना सामने आई जिसमें एक दलित युवक को गरबा में शमिल होने पर कुछ लोगों ने पीट-पीटकर मार डाला. इसी तरह की एक और घटना गांधीनगर के लिंबोदरा गांव में हुई. इसमें एक दलित युवा को कथित तौर पर बेरहमी से इसलिए पीटा गाया क्योंकि उसने मूंछ रखी थी. गांवों में तो यह घटनाएं आम हैं लेकिन शहरों में भी ऐसी वारदातें सामने आ रही हैं. ऐसे में जिग्नेश की लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है.

जिग्नेश दलितों ही नहीं बल्कि आदिवासियों के भी नेता हैं. आदिवासियों को फॉरेस्ट ऐक्ट के तहत जमीन देने में असफल रही भाजपा को एक्सपोज करने का अभियान छेड़कर उन्होंने इस समुदाय में भी अपनी पैठ बना ली है. उन्होंने अपनी संस्था राष्ट्रीय दलित अधिकार मंच और आदिवासी किसान संघर्ष मोर्चा का गठजोड़ कर के साफ संदेश दे दिया की वे इन दोनों समुदाय के नेता हैं. गुजरात में उभरे इस युवा नेतृत्व की चुनौती का अंदाजा सत्तासीन दल को है.

इसीलिए सौराष्ट्र, कच्छ और उत्तर गुजरात में इस बार पाटीदार, ओबीसी और आदिवासी वोटरों पर भाजपा काफी फोकस कर रही है. वह इन तीनों नेताओं से जुड़े समुदाय को साधने की कोशिश में साफ दिख रही है. 182 सीट वाले गुजरात में शहरी और अर्ध-शहरी सीटों की संख्या 72 है. इन जगहों पर भाजपा मजबूत स्थिति में है. लेकिन ग्रामीण इलाकों वाले 110 विधानसभा सीटों में भाजपा के अब तक एकजुट रहे वोटरों को अल्पेश, जिग्नेश और हार्दिक पटेल की तिकड़ी ने खंडित कर दिया है.

भाजपा फिलहाल इस कोशिश में है कि ग्रामीण इलाके में उसका वोट बैंक नहीं टूटे, यदि किसी वजह से इन्हें टूटने से नहीं बचाया जा सके तो कम से कम वोटरों को कांग्रेस की तरफ एकजुट होने से तो रोका ही जाए. भाजपा की यह रणनीति बयान कर रही है कि पार्टी रक्षात्मक मुद्रा में है. हालांकि भाजपा महासचिव और गुजरात के प्रभारी भूपेंद्र यादव कहते हैं, ''पार्टी 150 सीट जीतेगी. सत्ता विरोधी रुझान पूरे राज्य में कहीं नहीं है. कांग्रेस का संगठन कहीं खड़ा नहीं दिख रहा है और अंदरूनी लड़ाई चरम पर है."

हालांकि भूपेंद्र के इन दावों को भाजपा के एक सूत्र ही खारिज कर देते हैं. सूत्र के मुताबिक, पार्टी की असली चुनौती टिकट बंटवारे के बाद सामने आएगी. जिन लोगों के टिकट कटेंगे उनके समर्थक निराश होकर घर बैठ जाएंगे. लेकिन जब मोदी थे तब टिकट कटने के बाद भी विधायक या उनके समर्थक निराश नहीं होते थे, बल्कि मोदी के नाम पर सब एकजुट रहते थे.

इस तिकड़ी के साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों के छोटे व्यापारियों, दस्तकारों और कारीगरों के ऊपर अफरा-तफरी में लागू किए गए जीएसटी के कारण उपजे गुस्से ने भाजपा के लिए तस्वीर और सख्त कर दी है. किसानों की आत्महत्या, कर्जमाफी और तिसपर पर नोटबंदी जैसे मुद्दों ने इस तस्वीर को और भी भयावह बना दिया है. हालांकि हाल ही में छोटे व्यापारियों और दस्तकारों को जीएसटी में दी गई राहत ने सत्ताधारी पार्टी के लिए स्थिति को थोड़ा सुधारा है.

हालांकि अभी भी भाजपा ने ग्रामीण गुजरात में सब कुछ नहीं खोया है. कांग्रेस के सामने पारंपरिक रूप से अपनी विरोधी जातियों—पटेलों और ओबीसी क्षत्रियों—को जोड़े रखने की चुनौती है. दरअसल पटेल पारंपरिक रूप से ऐंटी-कांग्रेस जाति है. इतना ही नहीं, पटेल और ओबीसी क्षत्रिय ग्रामीण इलाकों में राजनैतिक रूप से एक-दूसरे के विरोधी हैं. ऐसे में ओबीसी क्षत्रिय समुदाय भाजपा के पक्ष में जा सकता है. राजनीतिक विश्लेषक विद्युत ठक्कर के मुताबिक, ''ग्रामीण क्षेत्रों में पटेलों का भाजपा के खिलाफ होना खुद-ब-खुद ओबीसी समुदाय को विपरीत दिशा में एकजुट कर देगा. आज भी पटेल बनाम ओबीसी का झगड़ा यहां चलता है."

 इसके बाद सौराष्ट्र में कोली फैक्टर मौजूद है जो भाजपा के पक्ष में काम कर सकता है क्योंकि इस समुदाय के सर्वाधिक लोकप्रिय नेता भाजपा के पुरुषोत्तम सोलंकी हैं. लेकिन यहां पार्टी के पक्ष में जो सबसे बड़ा फैक्टर है, वह यह कि सामान्य तौर पर प्रभावशाली पटेल समुदाय का ओबीसी के लोग विरोध करते हैं. अगर पटेल समुदाय खुलकर भाजपा के खिलाफ उतरता है तो ये दोनों समुदाय भाजपा के साथ जा सकते हैं. हालांकि ये दोनों समुदाय तभी एकजुट होते हैं जब हिंदुत्व का मुद्दा हावी हो, लेकिन इस बार ऐसा नहीं है.

हालांकि ''गुजरात गौरव" के रूप में स्थापित नरेंद्र मोदी की छवि अभी भी मजबूत है. गांवो में भी यह छवि बरकरार है. अगर मोदी अपनी इस छवि का फायदा इन चुनावों में उठा पाए और 2019 के चुनावों पर लक्ष्य साधते हुए जनमत संग्रह अपने इर्द-गिर्द ही रख पाने में कामयाब हुए तो भाजपा चुनाव जीत सकती है. भाजपा की प्रचार रणनीति भी इस बात की तस्दीक करती है कि वह मोदी की इसी छवि का फायदा उठाना चाहती है.

यही वजह है कि चुनावों के दस्तक के साथ ही राज्य में मोदी की आवाजाही बढ़ गई. भाजपा ने आगे भी मोदी की 50 से अधिक रैलियां करने की योजना बनाई है. जाहिर है, मोदी की रैलियों में लोगों की खासी शिरकत रहेगी. अगर मोदी का जादू चला तो नतीजे उनके पक्ष में आ सकते हैं.

इसके अलावा, मुख्यमंत्री विजय रूपाणी की सेवा सेतु योजना भी असर कर सकती है. पूरी तरह से ''गुड गवर्नेंस" की यह योजना पहली बार तहसील स्तर पर दस गांवों को लेकर शुरू की गई (एक तहसील में 40 से 70 गांव हो सकते हैं). उप-तहसील के रूप में लाया गया यह नया नवेला कांसेप्ट भी ग्रामीण क्षेत्रों में भाजपा के पक्ष में जा सकता है. पिछले एक साल में इस योजना के तीन चरण के तहत सरकार अब तक एक करोड़ लोगों को कवर कर चुकी है. यह आंकड़ा राज्य की आबादी का करीब छठवां हिस्सा है.

भाजपा ग्रामीण क्षेत्रों के मुकाबले शहरी क्षेत्र में मजबूत स्थिति में है लेकिन देश में सर्वाधिक शहरी आबादी होने के बावजूद गुजरात में 57 फीसदी आबादी अब भी गांव में रहती है. यही आबादी भाजपा की परेशानी की वजह है. 2012 के चुनाव में शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में कमोबेश बराबर प्रदेर्शन करने वाली भाजपा इस बार अगर ग्रामीणों को लुभा पाएगी तभी इसे गुजरात की सत्ता मिलेगी.

—साथ में सुजीत ठाकुर, संध्या द्विवेदी और प्रतीक्षा जी. आचार्य

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