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खास रपटः विकास योजनाओं में जानवरों का ख्याल

वन्यजीवों की मौत रोकने के लिए भारत को अब कहीं जाकर बिजली के तार जमीन के नीचे बिछाने और पशु ओवरपास बनाने सरीखे उपायों की सुध आई, भले ही इससे सौर ऊर्जा और हाइवे लागतों में इजाफा हो

सुरक्षित रास्ता पेंच में बनाए गए सुरक्षित रास्ते से गुजरता बाघ सुरक्षित रास्ता पेंच में बनाए गए सुरक्षित रास्ते से गुजरता बाघ

साल 2018 में सड़क और रेल दुर्घटनाओं में 161 जंगली पशु मारे गए, तीन दशकों में रेल दुर्घटनाओं में दो सौ हाथी मारे गए, जिनमें 65 की जान बीते तीन साल में गई. बिजली के तारों की चपेट में आकर भारत के सारस पक्षियों की एक फीसद आबादी खत्म हो गई. सीहोर जिले में स्थित रातापानी टाइगर रिजर्व स्टेशन पर बीते पांच सालों में रेलों की पैंट्री कार से फेंकी जूठन के कारण हुई दुर्घटनाओं में 100 से ज्यादा जंगली पशु मारे गए, जिनमें पांच बाघ और सात तेंदुए थे.

ये रूह कंपकंपा देने वाले आंकड़े वाइल्डलाइफ प्रोटेक्शन सोसाइटी ऑफ इंडिया के हैं. इसका संज्ञान लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 21 अप्रैल 2021 को वन्यजीवों और पर्यावरण के लिए संभावित जोखिम पैदा करने वाले सीधे बुनियादी ढांचे के विकास में शमन उपायों को विवेकाधीन के बजाए अनिवार्य बना दिया. तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश एस.ए. बोबडे के साथ न्यायमूर्ति ए.एस. बोपन्ना और वी. रामासुब्रह्मण्यम की तीन जजों की पीठ ने यह आदेश जाने-माने पर्यावरणवादी और पूर्व अफसरशाह एम.के. रणजीतसिंह की दो साल पहले दाखिल जनहित याचिका पर दिया था. जजों ने कहा कि पर्यावरण न्याय तभी हासिल किया जा सकता है ''जब हम इनसानी हित पर जोर देने वाले 'एंथ्रोपोसेंट्रिज्म' (मानवकेंद्रितवाद) के सिद्धांत से हटकर प्रकृति-केंद्रित 'इकोसेंट्रिज्म' (पर्यावरणकेंद्रितवाद) की तरफ जाएं, जिसमें इनसान कुदरत का अंग है और गैर-इनसानों की अंतर्भूत अहमियत है. दूसरे शब्दों में, मानव हित को अपने आप तरजीह नहीं मिल जाती और इनसानों की गैर-इनसानों के प्रति मानव हित से स्वतंत्र जिम्मेदारी है.'' अदालत ने कहा कि राष्ट्रीय वन्यजीव कार्य योजना और केंद्र-प्रायोजित वन्यजीव एकीकृत विकास योजना इकोसेंट्रिज्म के सिद्धांत पर ही आधारित हैं. 

सुरक्षित रास्ते की तलाश
सुरक्षित रास्ते की तलाश

अदालत ने ग्रेट इंडियन बस्टर्ड या सोन चिरैया को बचाने के लिए बिजली के तार जमीन के नीचे बिछाने का आदेश दिया है. इस पर अकेले राजस्थान में 22,000 करोड़ रुपए खर्च होंगे. थार में कई नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं का मंसूबा बनाया गया है, जिनके लिए हाइ-वोल्टेज बिजली के तारों के विशाल नेटवर्क की जरूरत होगी. भारतीय उपमहाद्वीप की मूल प्रजाति सोन चिरैया को बचाने के लिए अब इन्हें जमीन के अंदर बिछाना होगा. वजन में सबसे भारी यह पक्षी भारत में 2011 में करीब 250 थे, जो 2018 में महज 150 रह गए. भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआइआइ) देहरादून के सर्वे के मुताबिक, इन तारों में उलझकर बिजली से उनकी मृत्यु दर 15 फीसद है.

ये अगल-बगल दूर-दूर तक देख पाते हैं, जबकि सामने की नजर तंग होती है. उड़ते वक्त नीचे जमीन पर नजर रखने के चलते तारों के करीब आने पर ये चतुराई से उनसे निकल नहीं पाते और उलझकर मारे जाते हैं. यही नहीं, उनके इलाकों में विशाल भूभागों पर सौर ऊर्जा पैनल लगाए जा रहे हैं, जिन्होंने इनकी अंडे सेने की जगहें छीन ली हैं. रणजीतसिंह कहते हैं, ''सौर ऊर्जा उतनी हरित नहीं है.''

भारत वन्यजीवों की प्रवासी प्रजातियों के संरक्षण (सीएमएस) का मौजूदा अध्यक्ष है. सीएमएस ने फरवरी 2020 में सोन चिरैया के लिए भारत की संगठित कार्य योजना को मंजूरी दी और जैसलमेर में नवोन्मेषी संरक्षण प्रजनन कार्यक्रम चला रहा है. यहां इनसानी देखरेख में 17 चूजे जन्मे हैं, जो अब संस्थापक आबादी का काम करेंगे. बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी के डायरेक्टर डॉ. विभाष पांडव कहते हैं, ''भारत में महज सौ बची रह गई सोन चिरैया की अकेली इंटेंसिव केयर यूनिट थार मरुस्थल है.'' डब्ल्यूआइआइ के डीन वाइ.वी झाला लंबे वक्त से सोन चिरैया के लिए प्राथमिकता क्षेत्रों की हिफाजत की वकालत करते रहे हैं, ताकि देखरेख में जन्मी उनकी आबादी खुले में छोड़ने पर बिजली के तारों या जानवरों के हाथों मारी न जाए. 

जानवरों की सुरक्षा क्यों
जानवरों की सुरक्षा क्यों

पुनर्जीवन का रास्ता

एक और नई बात यह हुई कि भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआइ) राजस्थान में वाहनों के मुकुंदरा टाइगर रिजर्व से होकर गुजरने के लिए दो समानांतर सुरंग बनाएगा, हरेक 3.65 किमी लंबी और चार लेन की होगी. ये सुंरगें 1,350 किमी लंबे आठ लेन के दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे का हिस्सा होंगी. 90,000 करोड़ रुपए की यह परियोजना जनवरी 2023 में पूरी होने की उम्मीद है.

ये सुरंगें वन्यजीवों की बेरोकटोक आवाजाही के लिए एशिया के पहले पशु ओवरपास होंगी. इन पर 741.77 करोड़ रु. की अतिरिक्त लागत आएगी. इनके दोनों सिरों पर 500-500 मीटर की ढलान होगी और नियमित अंतरालों पर उन्हें जोड़ने वाला 30 मीटर लंबा रास्ता होगा, ताकि आपातस्थिति में ट्रैफिक को सबसे दाहिनी लेन की तरफ मोड़ा जा सके. मकुंदरा से गुजरने वाली सड़क को चार-लेन में बदलने का काम पर्यावरण मंजूरियां नहीं मिलने के चलते बरसों से लटका है.

यह हिस्सा कोटा को झालावाड़ और उज्जैन को इंदौर से जोड़ता है. पहले एनएचएआइ ने मुकुंदरा पर दोमंजिले फ्लाइओवर का सुझाव दिया था, पर सौ मीटर के भीतर ही भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का स्मारक होने से यह आगे नहीं बढ़ा. मौजूदा चार-लेन एक्सप्रेसवे अब क्लोवर लीफ के जरिए सुरंगों से जुड़ेगा. शमन के दूसरे उपाय भी किए जाएंगे. मसलन, रणथंभौर टाइगर रिजर्व के पारिस्थितिकी-संवेदनशील क्षेत्र से गुजरने वाली 53.4 किमी लंबी पट्टी पर तीन मीटर ऊंची चारदीवारी और समर्पित ध्वनि तथा चकाचौंध बैरियर लगाना.

अड़चनों से निकलना

ये पहल सराहनीय हैं, पर कई चुनौतियां भी हैं. मसलन, भारतीय सोन चिरैया की हिफाजत के लिए बिजली के तार जमीन के नीचे बिछाने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश की मार सौर ऊर्जा परियोजनाओं पर पड़ेगी. शीर्ष अदालत ने पक्षियों के लिए जो इलाका तय किया है, उसके ज्यादातर हिस्से में 94 गीगावॉट की प्रस्तावित सौर ऊर्जा परियोजनाएं हैं. ये 2030 तक 450 गीगावॉट नवीकरणीय ऊर्जा हासिल करने के भारत के लक्ष्य के लिए बेहद अहम हैं. शीर्ष अदालत ने लागत की भरपाई केंद्र और राज्य सरकारों, कॉर्पोरेट सामाजिक जिम्मेदारी पहल और प्रतिपूरक वनीकरण कोष (सीएएमपीए या कंपेनसेटरी एफॉरेस्टेशन फंड) पर छोड़ दी है.

सौर ऊर्जा निवेशकों का कहना है कि प्रति यूनिट लागत 1.50 रुपए तक बढ़ सकती है. मगर पर्यावरणवादियों का आरोप है कि वे याचिका लंबित रहने के दौरान ही चालाकी से हड़बड़ी में परियोजनाएं ले आए. कॉर्बेट फाउंडेशन के डायरेक्टर केदार गोरे कहते हैं, ''राजस्थान और गुजरात में शीर्ष अदालत की शर्तों का पालन किए बगैर जमीन के ऊपर बिजली के तार लगाने का काम चल रहा है और न ही तारों पर बर्ड डायवर्टर लगाए गए हैं (जिनकी सुप्रीम कोर्ट ने जमीन के नीचे तार बिछाने तक जरूरत बताई है).'' रणजीतसिंह कहते हैं कि अगर निवेशक शमन उपायों की भारी लागत से परेशान हैं तो विकल्पों की तलाश करें, ''इंदिरा गांधी नहर के ऊपर सौर पैनल लगाना कैसा रहेगा?''

वन्यजीवों की हिफाजत की कीमत
वन्यजीवों की हिफाजत की कीमत

बिजली क्षेत्र के अफसर पूछते हैं कि मरुथली नेशनल पार्क में भूमिगत और रेंगने वाली प्रजातियां बड़ी तादाद में रहती हैं, ऐसे में जमीन के नीचे बिजली के तार बिछाने से क्या पारिस्थितिकी तंत्र पर गंभीर असर नहीं पड़ेगा? वे हैरानी जाहिर करते हैं कि क्या 33 केवी से ज्यादा के हाइटेंशन बिजली तारों को भी हटाया जा सकता है. शीर्ष अदालत ने हाइटेंशन तारों को हटाने की संभावना पर विचार के लिए तीन सदस्यीय समिति बनाई है. 33 केवी के तारों को जमीन के ऊपर लगाने की लागत के मुकाबले (जो 6 लाख रुपए हो सकती है) जमीन के नीचे तार लगाने पर 28 लाख रुपए प्रति किमी तक खर्च करने पड़ सकते हैं. 66 केवी के तार बिछाने की लागत और भी ज्यादा है. राजस्थान में नवीकरणीय ऊर्जा के एडिशनल चीफ सेक्रेटरी सुबोध अग्रवाल कहते हैं कि वे प्रभावित होने वाली मौजूदा पाइपलाइन परियोजनाओं का आकलन करवा रहे हैं.

जहां तक एनएचएआइ की परियोजना की बात है, एजेंसी ने पर्यावरण को होने वाले नुक्सान की भरपाई के लिए 80 करोड़ रुपए जमा कर दिए. मगर वन विभाग एक्सप्रेसवे से 30 किमी दूर बसे दो गांवों को दूसरी जगह बसाने के लिए 120 करोड़ रुपए मांग रहा है. एनएचएआइ ने यह कहकर इनकार कर दिया कि उसे सीएसआर के नियमों को मानने के बाध्य नहीं किया जा सकता. अलबत्ता उसने वादा किया है कि अगर मंजूरी देने वाली केंद्र सरकार की संस्थाएं आदेश देंगी तो वह रकम अदा कर देगा.

इकहरी सोच के जोखिम

तो क्या वन्यजीव इलाकों के बीच से गुजरने वाली रैखिक या सीधी इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं में शमन उपाय अब नियम बन जाएंगे? भारत का 21.34 फीसद हिस्सा वनों से ढका है. इसमें 4,89 फीसद संरक्षित वन हैं, जिसमें 103 नेशनल पार्क, 536 वन्यजीव अभयारण्य, 67 कंजर्वेशन रिर्जव और 26 समुदाय रिजर्व हैं. टाइगर रिजर्व घोषित 26 संरक्षित क्षेत्रों से सड़कें गुजरती हैं, जिन्हें पार करना वन्यजीवों के लिए तकरीबन नामुमकिन हो जाता है. यहां तक कि रेंगने वाले जानवर और परिंदे भी कई लेन वाली तेज रक्रतार सड़कों या चौड़ी नहरों को पार नहीं कर पाते.

झाला कहते हैं कि शेर-बाघ और कुछ अन्य प्राणी तो सुरक्षित रास्तों का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन कैरकल, जो केवल रणथंभौर में मिलते हैं, ऐसा नहीं करते. जैसा कि पेंच टाइगर रिजर्व में देखा गया है. एनएचएआइ जयपुर के चीफ जनरल मैनेजर मुकेश कुमार जैन जोर देकर कहते हैं कि रणथंभौर से गुजरने वाले एक्सप्रेसवे की मार्गरेखा में किसी भी बदलाव के लिए आबाद गांवों की जमीन का अधिग्रहण करना होगा, मानव आबादी को हटाना पड़ेगा, मोड़ बनाने होंगे जिनसे वाहनों की रफ्तार कम होगी और भीड़ बढ़ेगी, और इस सबसे एक्सप्रेस गलियारे का राष्ट्रीय और वित्तीय राजधानी के बीच सबसे तेज और छोटा रास्ता होने का उद्देश्य ही मटियामेट हो जाएगा.

केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने जुलाई 2019 में संसद में कहा था कि 'एक गरीब देश' को तय करना ही होगा कि वह विकास की जरूरतों को अनदेखा करके पर्यावरण की रक्षा पर कब तक सार्वजनिक धन खर्च करता रह सकता है. कांग्रेस सांसद के. सुरेश जानना चाहते थे कि क्या मंत्री जी पेंच की तरह, जहां राजमार्ग को चौड़ा करते वक्त शमन उपायों पर 240 करोड़ रुपए खर्च हुए थे, बांदीपुर वन्यजीव अभयारण्य में टाइगरों की रक्षा के लिए मैसूरू और वायनाड के बीच राष्ट्रीय राजमार्ग पर अंडरपास बनाने पर विचार करेंगे. प्रमुख जांचकर्ता बिलाल हबीब की देखरेख में तैयार और पिछले साल जारी डब्ल्यूआइआइ की रिपोर्ट ने पेंच में ऐसे नौ चौराहों की उपयोगिता पर रौशनी डाली थी.

अठहत्तर कैमरों से अंडरपास से गुजरते इनसानों, पालतू जानवरों, वन्य और घरेलू बिल्लियों और कुत्तों की 91,284 तस्वीरें खींची गईं. इनके विश्लेषण से पता चला कि जंगली जानवरों की आठ प्रजातियां कम या ज्यादा इन अंडरपास का इस्तेमाल कर रही थीं. 11 अलग-अलग चीतों को नौ में से छह अंडरपास को कुल 89 बार पार करते देखा गया.

एनएचएआइ का दावा है कि रणथंभौर में वन्यजीव सुरक्षा उपाय पेंच से बेहतर होंगे. 53.5 किमी के गलियारे में 1.5 किमी लंबा पशु अंडरपास, 1.7 किमी की एलिवेटेड गलियारा और 300-300 मी. के पांच पशु अंडरपास होंगे. वातायनों के साथ 3.5 किमी की भूमिगत बॉक्स संरचना और बड़ी तादाद में क्रॉस संरचनाएं, बड़े और छोटे रिज भी बनाए जाएंगे. तीन मी. ऊंची चारदीवारी जंगली जानवरों को मुख्य सड़कमार्ग पर घुसने से रोकेगी.

इसके अलावा, जंगली जानवरों की सुरक्षित आवाजाही और जलनिकासी के लिए टाइगर गलियारे में खुलने वाले अतिरिक्त रास्तों के साथ एक बड़ा पुल, चार छोटे पुल और 13 पुलिया भी प्रस्तावित हैं. ये निर्माण उन जगहों पर किए जाएंगे जहां राज्य वन्यजीव विभाग ने टाइगरों की आवाजाही दर्ज की है. वृक्षारोपण और 41 करोड़ रुपए के शोर अवरोधक से शोर, कंपन और चकाचौंध के निष्प्रभ या न्यूनतम होने की उम्मीद है. इन उपायों से 50 किमी के रास्ते की लागत 22 करोड़ रुपए प्रति किमी बढ़ जाएगी.

सवाल यह है—क्या यह पर्याप्त होगा?

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