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प्राचीन चिकित्सा पद्धतियों को फिर से लोकप्रिय बना रहे हैं ये डॉक्टर

मिलिए ऐसे डॉक्टरों से जो दुनिया में विज्ञान का एक नया जज्बा फैलाने और इलाज के प्राकृतिक पद्धतियों से आने वाले समय में मेडिसिन को नया रूप देने में जुटे हैं.

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आपने क्या इस नई लहर का नारा सुना है? लंदन के लाल ईंटों वाले अस्पतालों से बंगलुरू के फूस के कॉटेज तक, सिडनी के धूप में नहाए परिसरों से लेकर न्यूयॉर्क के चमचमाते क्लीनिकों तक हवा में एक नया जुमला तैर रहा हैः ‘‘मरीज की इज्जत करें.’’

आधुनिक मेडिसिन ने कई लाइलाज रोगों पर जीत हासिल की है. हर दिन हो रही खोज मौत को पछाड़ रही है. फिर भी अध्ययन दिखाता है कि 60 फीसदी डॉक्टर रोगियों की बात नहीं सुनते. इलाज में कंधे पर पडऩे वाले खर्च के बोझ ने मेडिकल केयर को आम आदमी की जेब से बाहर कर दिया है. इन्हीं हालात के बीच एक वैश्विक लहर का आगाज हो रहा है, जिसका लक्ष्य आम आदमी को बेहतर जीवन देना, डॉक्टर और रोगी के बीच बेहतर रिश्ते की बुनियाद रखना और कम खर्च में अच्छा इलाज मुहैया कराना है जो मौजूदा मेडिसिन नहीं दे रही है.

रस्साकशी दरअसल एलोपैथिक के पुराने पैरोकारों और विविध प्रकार के प्राकृतिक इलाज की ओर रुख कर रहे नए रुझान के बीच चल रही है, जिन्हें मोटे तौर पर पूरक और वैकल्पिक चिकित्सा (कैम) कहा जाता है या ज्यादा नए रूप में इसे इंटिग्रेटेड मेडिसिन या समन्वयकारी चिकित्सा कहते हैं. इनमें ज्यादातर पारंपरिक चिकित्सा विधियां हैं और सदियों से बीमारियों के इलाज में इस्तेमाल होती रही हैं. चिकित्सा की विभिन्न पद्धतियों-यूनानी, आयुर्वेद, होम्योपैथी, प्राकृतिक चिकित्सा, सिद्ध और बौद्ध मेडिसिन के साथ आज भारत सुर्खियों में है.

लेकिन विभिन्न पद्धतियों को एक साथ मिलाने के विचार को पश्चिमी चिकित्सा की मुख्यधारा के डॉक्टरों ने फर्जी विज्ञान कहकर खारिज कर दिया. चिकित्सा प्रतिष्ठानों ने ऐसे किसी विचार को मानने से इनकार कर दिया, जो प्रयोगशाला में डबल ब्लाइंड और रैंडम क्लीनिकल ट्रायल पर खरा न उतरे. फिर भी विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) की रिपोर्ट बताती है कि कई देशों में आज भी इलाज के लिए पारंपरिक विधियों और दवाओं का ही इस्तेमाल होता हैः अफ्रीका में 80 फीसदी, भारत में 70 और चीन में 50 फीसदी. 2011 में 70 लाख लोगों पर कराया गया अध्ययन बताता है कि ऐसे 25 कारण हैं, जिनसे परेशान होकर लोग डॉक्टरों की मदद लेने दौड़ पड़ते हैः कोलेस्ट्रॉल, हाइ ब्लडप्रेशर, डायबिटीज जैसी पुरानी बीमारियों से लेकर पीठ दर्द और मोटापे से जुड़ी चिंता तक.

ब्रिटेन के भावी राजा प्रिंस चार्ल्स ने 2006 में डब्लूएचओ की असेंबली में कहा था, ‘‘यहीं पर इलाज का पुराना तरीका पूरक तरीके से सीख सकता है और पश्चिम पूरब से सीख सकता है.’’ उन्होंने बंगलुरू के शौक्य इंटरनेशनल होलिस्टिक हीलिंग सेंटर फाउंडेशन की साझेदारी में एक महत्वाकांक्षी परियोजना हाली ही में शुरू की, जो ब्रिटेन के उनके चैरिटी कॉलेज ऑफ मेडिसिन का एक प्रयास है. इसका उद्देश्य एक ऐसा नेटवर्क  तैयार करना है, जो पूरब और पश्चिम के वेलनेस गुरुओं को एकजुट कर आधुनिक अनुसंधान और प्राचीन ज्ञान के इलाज से रोगों की रोकथाम पर ध्यान दे.

नए हीलर्स बीमारियों को जड़ से मिटाने के लिए नए तरीके इजाद कर रहे हैं. ऐसे देश, जहां लंबे समय से पश्चिमी चिकित्सा को ही सबसे अच्छा माना जा रहा है, आज वहां भी वैकल्पिक परंपराओं को अपनाया जा रहा हैः कनाडा में 70 फीसदी, फ्रांस में 75 और ऑस्ट्रेलिया में 48 फीसदी और 10 में से 4 अमेरिकी. अपोलो, फोर्टिस और मेदांता तक भारत के धनी कॉर्पोरेट अस्पतालों में ‘‘एलोपैथिक’’ के पूरक के रूप में कैम आधारित वेलनेस कार्यक्रम अपनाए जा रहे हैं.
यहां हम आपको कुछ लोगों के बारे में बता रहे हैं, जो नए तरीकों की मदद से आपके शरीर और मन को तंदुरुस्ती का अमूल्य कोष थमाने आए हैं.

इसाक मथाई
अग्रदूत
इसाक मथाई, भारत
उनकी ओर से पेश किया गया इलाज का ब्लूप्रिंट आज पूरी दुनिया के लिए मॉडल बन चुका है.

जैसे ही आप बंगलुरू के शौक्य इंटरनेशनल होलिस्टिक हीलिंग सेंटर फाउंडेशन में कदम रखते हैं, आपको महसूस होता है कि यह कोई साधारण क्लीनिक नहीं है. अस्पतालों के पिंजरे जैसे माहौल से अलग यहां की फिजा में रोशनी, हरियाली, हवादार अहाता और फव्वारों का मंद संगीत है, जिनके बीच केरल की नल्लुकेट्टु शैली की आकर्षक फूस की झोंपडिय़ां बनी हुई हैं. 30 एकड़ में फैला यह चिकित्सा केंद्र चिकित्सा जगत में हो रहे रोमांचक बदलावों की ओर हमारा ध्यान खींच रहा है, जिसकी सेवाएं मैडोना, आर्क  बिशप टूटू, इंग्लैंड के प्रिंस चार्ल्स और अभिनेता रजनीकांत जैसी मशहूर हस्तियां लेती आ रही हैं. इन सबके पीछे केरल के वायनाड के रहने वाले डॉ. इसाक मथाई हैं.

उनके पिता गांव के पादरी थे और मां उस छोटे से गांव की अकेली डॉक्टर. कोट्टयम मेडिकल कॉलेज में होम्योपैथी के छात्र के रूप में उन्होंने योग और ट्रांसेंडेंटल मेडिटेशन की चिकित्सा विधियों की भी पढ़ाई की. 1989 में शौक्य की स्थापना के समय तक वे पूरी दुनिया की यात्रा कर चुके थे. उन्होंने लंदन में बतौर डॉक्टर काम किया. बीटल्स, स्टिंग और टीना टर्नर जैसी मशहूर हस्तियों का इलाज किया. लेकिन मशहूर लोगों का इलाज करने के बाद भी उनका बुनियादी विचार नहीं बदलारू होलिस्टिक हेल्थ यानी पूर्ण स्वास्थ्य. वे कहते हैं, ‘‘मेरे मन में एक मॉडल बसा था, जिसमें रोगी सबसे महत्वपूर्ण हो और उसके इलाज के लिए सभी जरूरी चीजें मौजूद हों.’’

नवंबर 2013 में शौक्य ने ब्रिटेन के कॉलेज ऑफ मेडिसिन के साथ मिलकर एक ग्लोबल नेटवर्क  की शुरुआत की, जिसके तहत बंगलुरू में आयोजित तीन दिवसीय वैश्विक सम्मेलन में दुनिया भर से पूरक और वैकल्पिक मेडिसिन के सैकड़ों डॉक्टरों ने शिरकत की. डॉ. मथाई एक कम लागत वाला ग्रामीण होलिस्टिक हेल्थ केयर भी चला रहे हैं. यह सात गांवों को स्वास्थ्य कार्यक्रमों के जरिए मदद पहुंचा रहा है. वे कहते हैं, ‘‘भारत के पास चिकित्सा, भोजन और आध्यात्मिक परंपरा का समृद्ध कोष है. अगर सरकार इस दिशा में कुछ नहीं कर सकती तो कम से कम मैं तो अपनी तरफ से पूरी कोशिश करूंगा.’’
टिप्स
- 40 साल की उम्र होने के बाद शरीर को विषाक्त तत्वों से मुक्त कराने, तरोताजा होने और पुराने रोगों को दूर भगाने के लिए हर साल दो से तीन सप्ताह का आयुर्वेदिक पंचकर्म कराएं.
-सेहतमंद आहार लेने की आदत डालें. फलों, सब्जियों और उनके रस का सेवन करें. खूब पानी पीएं. उपवास भी करें. मांसाहार से परहेज करें.
-सेहत की चाभी मन में छिपी है. तनाव दूर करने के लिए योग और ध्यान अपनाएं. यह चिरयुवा रहने का मंत्र है.
(डॉ. मथाई होम्योपैथिक और होलिस्टिक फिजिशियन हैं. वे शौक्य के संस्थापक और डायरेक्टर भी हैं)

डीन आर्निश
( माइकल डिक्सन और डीन आर्निश दाएं)
वह शख्स जो आपका दिल बचा सकता है
डीन ऑर्निश, अमेरिका
जीवन शैली से जुड़ी बीमारियों से निबटने के लिए उनके नुस्खे लोगों के बीच तेजी से अपनी जगह बना रहे हैं

उनका सफर 1970 के दशक में शुरू हुआ था, जब कॉलेज के पहले साल के दौरान अमेरिका में उनकी मुलाकात एक भारतीय योगी स्वामी सच्चिदानंद से हुई. स्वामी ने गहरे अवसाद से गुजर रहे ऑर्निश की मदद की और इसी के साथ जीवन और सेहत के बारे में उनका नजरिया बदल गया. 1973 में अपने गुरु के साथ वे भारत आए. डॉ ऑर्निश कहते हैं, ‘‘यह मेरे लिए हीलिंग के अन्य तरीकों को सीखने का एक दरवाजा खोल रहा था.’’

फिर जिंदगी में नए दौर की शुरुआत हुई. डॉ ऑर्निश ने लोगों को सेहतमंद बनाने के लिए समर्पित भाव से काम करना शुरू कर दिया. वे पहले ऐसे शख्स हैं, जिन्होंने साक्ष्य आधारित शोध के जरिए साबित किया कि शाकाहार के साथ शरीर और मन में सकारात्मक भावों को जगाकर दिल की बीमारी, टाइप टू डायबिटीज और कुछ तरह के कैंसर को भी शुरुआती दौर में ही ठीक किया जा सकता है या उन्हें बढऩे से रोका जा सकता है. ऐसा हमेशा नहीं होता कि कोई डॉक्टर कहे कि जीवन शैली में बदलाव करना इलाज का एक तरीका है. इसी नजरिए ने लोगों के सामने इलाज के वैकल्पिक तरीके पेश किए हैं.

इस मशहूर फोर स्टेप प्रोग्राम के चार घटक हैं-व्यक्ति की खुराक, वह कसरत करता है या नहीं, उस पर तनाव का क्या असर होता है और उसे कितना स्नेह और सहयोग मिल रहा है. 72 घंटे की ट्रेनिंग में डॉक्टर रोगी की मर्जी के मुताबिक, सिर्फ उसे गाइड करते हैं कि वह अपनी जिंदगी में कितना बदलाव लाना चाहता है या चाहती है. इसमें फिजियोलॉजिस्ट, योग और मेडिटेशन गुरु, डायटिशियन और क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट एक साथ मिलकर समाधान निकालते हैं.
डॉ ऑर्निश पुराने रोगों के बुनियादी कारणों का इलाज करने में विश्वास रखते हैं. उनका कहना है, ‘‘जो लोग अकेले और उदास हैं, उनके बीमार होने और समय से पहले मरने की संभावना स्नेह और पारिवारिक माहौल में रहने वाले लोगों के मुकाबले तीन से दस गुना ज्यादा होती है.’’ किसी इनसान के स्वास्थ्य के लिए प्रेम और अपनापन उतना ही जरूरी है जितना भोजन-पानी.
नुस्खे
-सेम, फल, सब्जियां और अनाज खाएं. मांस, मछली, अंडा, वसायुक्त डेयरी उत्पाद, कॉफी, मेवे, बीज, तेल और शराब से परहेज करें. अंडे की सफेदी, नॉन-फैट डेयरी या सोया या चीनी और सफेद मैदा थोड़ा-बहुत ले सकते हैं.
- जो आप खाते हैं, उस पर ध्यान दें. अगर आपको वाकई भूख लगी है, तभी खाएं.
-प्यार और अपनापन वह बुनियाद है, जिसकी कमी हमें बीमार बना सकती है और जिसकी छांव हमें सेहतमंद रख सकती है. प्यार में बीमारी को दूर भगाने की शक्ति है. कोई दवा, आहार या व्यायाम उससे ज्यादा असरदार नहीं.
 (डॉ ऑर्निश अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को की कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी में मेडिसिन के प्रोफेसर और प्रिवेंटिव मेडिसिन     रिसर्च इंस्टीट्यूट के संस्थापक हैं.)

स्वास्थ्य के मोर्चे पर एक योद्घा
माइकल डिक्सन, ब्रिटेन
उन्होंने यह कहकर विवाद खड़ा कर दिया था कि डॉक्टर रोगियों को ठीक करने की शक्ति खो चुके हैं

उनके लिए सीधा-सा सच यही है कि एक डॉक्टर के तौर पर अगर आप दस मिनट में रोगी को यह नहीं बता सकते कि उसकी बीमारी क्या है तो संभव है कि आपको खुद ही इस बारे में कुछ नहीं पता. या आप खुद ही नहीं जानते कि आप क्या बात कर रहे हैं. आधुनिक चिकित्सा में पुरानी परेशानियां जैसे पीठ दर्द, सिर दर्द और बार-बार होने वाले संक्रमणों के लिए कोई इलाज मौजूद नहीं है. डॉ. डिक्सन कहते हैं, ‘‘लोग को दूर करने की बजाय डॉक्टर अकसर मरीजों को कुछ गोलियां थमा देते हैं या किसी और डॉक्टर के पास भेज देते हैं.’’ उनका मानना है कि डॉक्टर ‘‘विशुद्घ स्वार्थी’’ कारणों से लोगों के साथ इस तरह का संवेदनहीन व्यवहार करते हैं और डॉक्टरों के इसी व्यवहार से तंग आकर अब लोग वैकल्पिक चिकित्सा को अपनाने लगे हैं.
डॉ. डिक्सन की इसी सोच ने उन्हें डेवोन में ‘‘कॉलेज सर्जरी’’ स्थापित करने के लिए प्रेरित किया. शरीर के रोगों का सोच और मानसिकता से गहरा संबंध होता है. इसलिए यहां लोगों को अपना एक ऐसा नजरिया विकसित करने के लिए प्रेरित किया जाता है, जिससे उनकी तबीयत को बेहतर करने में मदद मिलती है. अगर आपको कोई ऐसी तकलीफ है, जिसमें पारंपरिक मेडिसिन की जरूरत है तो आपको वह दी जाएगी. अगर आप किसी पुराने दर्द, थकान या संक्रमण से परेशान हैं तो डॉ. डिक्सन आपको उसका हर्बल उपचार बता सकते हैं, जिसे आप किसी हेल्थ फूड शॉप से खरीद सकते हैं.

उनका मानना है कि चिकित्सा की विभिन्न पद्धतियों की महत्वपूर्ण बातों को आपस में जोड़कर उनके आपसी मेलजोल से मुहैया कराया जा रहा इलाज का यह नया तरीका बेहद आधुनिक है. फिर भी चंद बड़बोले ब्रिटिश डॉक्टरों ने डॉ. डिक्सन के नजरिए को ‘‘अप्रमाणित इलाज का छलावा’’ कहा है. पर उनकी दलील है कि पूरक इलाज के प्रभाव को प्रयोगशाला में की गई जांच से नहीं मापा जा सकता. ‘‘मरीजों को यह करो या वह करो, जैसी स्थिति के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए.’’
नुस्खे
- हर दिन आधा चम्मच दालचीनी लें. यह डायबिटीज के रोगियों के शरीर में ब्लडशुगर का स्तर कम करती है.
- पेलार्गोनियम और कालोबा हर्बल दवाएं फ्लू ठीक करने में काफी असरदार हैं. 
-ऐंटीबायोटिक दवाओं से अलग दोनों ऐंटी-वायरल और ऐंटी-बैक्टीरियल हैं 
-नियासिन (बी 3) जो विटामिन बी है, फायदेमंद एचडीएल कोलेस्ट्रॉल को बढ़ाने और नुकसानदेह एलडीएल को घटाने में मदद करता है.
(डॉ. डिक्सन ओबीई एनएचएस एलायंस के चेयरमैन और ब्रिटेन के कॉलेज ऑफ मेडिसिन के अध्यक्ष हैं.)
 स्त्रीत्व का ख्याल
माइकल डूले, ब्रिटेन
रजोनिवृत्ति से लेकर संतानोत्पत्ति तक, वे सिर्फ लक्षणों का इलाज नहीं करते

सिर्फ लक्षणों का इलाज करने की बजाय उनकी रुचि संपूर्ण मनुष्य का इलाज करने में है. अपने इस रुझान के कारण महिलाओं की चिकित्सा के क्षेत्र में वे एक नया दर्शन गढऩे वाले व्यक्ति हैं. आइएमटी या इंटीग्रेटेड मीनोपॉज थेरेपी मन और आत्मा के साथ शरीर को गले लगाने वाली महिलाओं के लिए सोच का एक नया तरीका है. डूले प्रजनन से जुड़े रोगों के उपचार में भी कुछ इस तरह की रणनीति का इस्तेमाल करते हैः तनाव प्रबंधन, एक्युपंक्चर, और पारंपरिक किस्म की आइवीएफ के साथ दूसरी वैकल्पिक इलाज.

ब्रिटेन का यह शीर्ष स्त्रीरोग विशेषज्ञ कहता है, ‘‘जीवन एक बड़ी पहेली है.’’ ऐलोपैथिक मेडिसिन में जिन नए क्षेत्रों में लंबे समय से ध्यान नहीं दिया गया, अब उन पर वैज्ञानिक शोध हो रहे हैं. वे कहते हैं, ‘‘विभिन्न चिकित्सा पद्धतियों के एकीकरण के साथ ही चिकित्सा के क्षेत्र में अगले 20 साल वास्तव में दिलचस्प होने वाले हैं.’’
(डॉ. डूले ब्रिटेन के रॉयल कॉलेज ऑफ ऑब्स्टट्रिशियंस  ऐंड गायनेकॉलोजिस्ट्स के फेलो हैं)
 ठंडे पानी से इलाज
विजय कक्कड़
उन्होंने दुनिया को आश्वस्त किया कि ठंडे पानी से नहाना प्रतिरक्षक कोशिकाओं (इम्यून सेल) को पैदा करने में सहायक होता है

वे 15 साल तक दमे से पीड़ित रहे. फिर एक दिन उन्होंने ठंडे पानी से नहाना शुरू कर दिया. वे रोज नहाने लगे और सप्ताह भर के अंदर उनका दमा दूर हो गया. वास्कुलर सर्जन और रॉयल कॉलेज ऑफ सर्जंस के फेलो कक्कड़ पंजाब में पले-बढ़े हैं. वे ठंडे पानी से नहाने के फायदे से अच्छी तरह वाकिफ थे. डॉ. कक्कड़ कहते हैं, ‘‘ठंडे पानी से नहाने के दौरान और उसके बाद शरीर खुद को गर्म करने की कोशिश करता है, जिससे मेटाबोलिक रेट बढ़ जाती है और इम्यून सिस्टम तेजी से काम करने लगता है. खून में ज्यादा व्हाइट ब्लड सेल्स बनने लगते हैं, जो कीटाणुओं का मुकाबला करने में बहुत अहम भूमिका निभाते हैं.’’
थ्रॉम्बोसिस रिसर्च इंस्टीट्यूट के संस्थापक ने थ्राम्बोएम्बोलिक रिसर्च को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई है. यह एक ऐसी स्थिति है, जिसमें रक्त वाहिकाओं में खून के थक्के जम जाते हैं, जो खून के प्रवाह में बाधा पैदा करते हैं. हेपरिन के इस्तेमाल के जरिए किए गए इलाज के उनके तरीके से हर साल 300,000 जिंदगियां बचाई जा रही हैं.
(डॉ. कक्कड़ लंदन और बंगलुरू में थ्रॉम्बोसिस रिसर्च इंस्टीट्यूट के संस्थापक हैं)

समन्वयकारी
जॉर्ज लेवित

वे कई तरह के हुनर जानते हैं और बहु-प्रशिक्षित चिकित्सक हैं

उन्होंने समन्वयकारी चिकित्सा शिक्षा हासिल की है. उन्होंने कैंब्रिज से बायोकेमिस्ट्री और मेडिसिन की डिग्रियां ली हैं. उसके बाद चीन में एक्यूपंक्चर के प्रशिक्षण के साथ-साथ आहार संबंधी और हर्बल दवाओं का भी प्रशिक्षण लिया है. उन्होंने अंततः होम्योपैथी और होमोटॉक्सिकोलॉजी में विशेषज्ञता हासिल की है. असाधारण और विविधतापूर्ण ज्ञान, कौशल और अनुभव ने डॉ. लेविथ को चिकित्सा की मल्टीस्किल तकनीक को विकसित करने में मदद की है. आज वे ब्रिटेन में वैकल्पिक चिकित्सा के सबसे प्रमुख समर्थकों में से एक हैं. डॉ. लेवित बताते हैं कि अपनी लोकप्रियता के बावजूद वैकल्पिक उपचार विवादास्पद बना हुआ है क्योंकि यूरोपीय संघ में उनके नियमन का कोई सर्वसम्मत तरीका नहीं है. स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में और ज्यादा शोध और निवेश की जरूरत बताते हुए वे कहते हैं, ‘‘किसी सर्वसम्मत तरीके का अभाव एक समान इलाज के तरीकों को नियत करने और उच्च गुणवत्ता वाले अनुसंधान के रास्ते में बाधक बन जाता है.’’
(डॉ लेवित साउथैम्प्टन यूनिवर्सिटी, यूके में हेल्थ रिसर्च के प्रोफेसर हैं )
रंजीत रॉयचौधरी
जड़ी-बूटियों से इलाज करने वाले
रंजीत रॉयचौधरी, भारत
जड़ी-बूटियों तथा मसालों के उनके खजाने की बराबरी कम ही लोग कर सकते हैं

वे भारत के पहले रोड्स स्कॉलर और पीजीआइएमईआर, चंडीगढ़ के पूर्व निदेशक हैं. पिछले 40 साल से वे भारत के परंपरागत चिकित्सकों की सदियों तक इस्तेमाल में लाई गई सैकड़ों जड़ी-बूटियों के स्वास्थ्य संबंधी दावों के अध्ययन, पहचान और परीक्षण में केंद्र सरकार की मदद कर रहे हैं. इस औषध विज्ञानी का कहना है, ‘‘तीसरी दुनिया के लाखों लोग हमेशा ही हर्बल दवाओं का उपयोग करेंगे क्योंकि वे उन पर विश्वास करते हैं.’’ वे बताते हैं कि पारंपरिक ज्ञान और चिकित्सा प्रणालियों के विशाल भंडार की आधुनिक चिकित्सा के आने के बाद व्यापक रूप से अनदेखी ही की जाती आ रही है.

मगर डॉ. रॉयचौधरी के लिए खुश होने की वजह है. वे कहते हैं, ‘‘मधुमेह, हृदय रोग, दमा या हेपेटाइटिस जैसी लंबी चलने वाली पुरानी बीमारियों के लिए आधुनिक चिकित्सा के पास जो इलाज है, उसे लेकर दुनिया आज संतुष्ट नहीं.’’ आज जब लोग लंबे समय तक जीवित रहने लगे हैं और जीवनशैली में बदलाव ने लोगों को कम उम्र में ही बीमारियों का निशाना बना दिया है, ऐसे में एलोपैथिक डॉक्टर इन बीमारियों का इलाज नहीं कर पा रहे. डॉक्टर आखिरकार पूछ रहे हैं कि इसके बाद क्या? इसमें मध्य वर्ग में आई एक मूक क्रांति को भी जोड़ लीजिए. यह वर्ग एलोपैथिक चिकित्सा को सर्वश्रेष्ठ मानता आया है. पहली बार वे भी उससे निराश हैं. तीसरी बात यह कि पश्चिम ने भी इसको अपना लिया है. वे कहते हैं, ‘‘भारत में अपनी परंपरा को गंवाने की परंपरा है. इसलिए जब हार्वर्ड और स्टैनफोर्ड के डॉक्टर इनके बारे में बात करना शुरू करते हैं तो हम भी चेत जाते हैं.’’
नुस्खे
- दमे के लिए पांच पौधेः तुलसी और बसाक  की पत्तियां, मुलेठी या लीकोरीस की जड़ें, कंटकारी की सूखी जड़ें और सिरस की छाल.
-अदरक की ताकतः मतली से लेकर पेट की गड़बडिय़ों तक और सर्दी-खांसी से लेकर एयर सिकनेस तक का रामबाण इलाज है.
-मस्तिष्क के लिए ब्राह्मीः स्मृतिह्रास से लेकर भूलने की बीमारी के इलाज के लिए कारगर. सामान्य तंदुरुस्ती के लिए भी उपयोगी.
 (डॉ. रॉय चौधरी नेशनल एकेडमी ऑफ मेडिकल साइंसेज में औषध विज्ञान के नेशनल प्रोफेसर हैं और डब्लूएचओ तथा दिल्ली सरकार के सलाहकार भी हैं)

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