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नए सेना प्रमुखः नया प्रमुख एजेंडा

जनरल नरवणे का व्यापक दायित्व सेना का प्रशिक्षण, कल्याण और उसका मनोबल ऊंचा बनाए रखना होगा, पर उनकी जिम्मेदारी का बड़ा हिस्सा सीडीएस के साथ मिलकर काम करना भी होगा ताकि थल सेना का भावी बड़ी भूमिका में फिट होना सुनिश्चित किया जा सके.

नई जिम्मेदारी साउथ ब्लॉक में 1 जनवरी को जनरल नरवणे नई जिम्मेदारी साउथ ब्लॉक में 1 जनवरी को जनरल नरवणे

जनरल एम.एम. नरवणे को सेना प्रमुख की कमान ऐसे वक्त में मिली है जब भारत का रक्षा इतिहास एक महत्वपूर्ण मोड़ पर है. उनके पूर्ववर्ती जनरल बिपिन रावत को बीते 30 दिसंबर को भारत के पहले प्रमुख रक्षा अध्यक्ष (सीडीएस) के रूप में नियुक्त करके सरकार संकेत दे चुकी है कि वह रक्षा मंत्रालय का पुनर्गठन शुरू करने और तीनों सशस्त्र बलों को एकीकृत करने के लिए तैयार है. ये सिफारिशें करगिल समीक्षा समिति ने लगभग दो दशक पहले की थीं, लेकिन राजनैतिक सुस्ती से लेकर यथास्थितिवाद और बदलाव-विरोधी तंत्र जैसी वजहों से इन्हें अब तक लागू नहीं किया जा सका था.

सुधार के नजरिए से देखा जाए तो जनरल नरवणे उन बातों को क्रियान्वित करने के लिए सबसे बेहतर स्थिति में हैं जिन पर उनका भरोसा रहा है—दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी सेना को भविष्य के युद्धों के लिए तैयार करना. देश के 28वें सेनाध्यक्ष के रूप में कार्यभार ग्रहण करने के दो दिन बाद साउथ ब्लॉक स्थित अपने कार्यालय में कुछ पत्रकारों से बात करते हुए उन्होंने कहा, ''हम पुराने जमाने के युद्धों के लिए नहीं, बल्कि भविष्य के युद्धों के लिए आधुनिकीकृत हो रहे हैं. भविष्य के युद्ध पहले से ज्यादा प्रौद्योगिकी-आश्रित होंगे, जिनमें रोबोटिक्स और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की अपनी भूमिका होगी... हमारी निगाह इसी पर है.''

रक्षा मंत्रालय में गठित किए जा रहे सैन्य मामलों के विभाग के सचिव के रूप में जनरल रावत के प्रवेश के बाद अब राजनैतिक नेतृत्व तक सेना की सीधी पहुंच होगी. (अब तक, सशस्त्र बल रक्षा मंत्रालय के संलग्न कार्यालयों के रूप में काम करते थे.) उम्मीद है कि अब नागरिक नौकरशाही और राजनैतिक नेतृत्व के बीच सैन्य सुधार प्रस्तावों पर तेजी से काम हो सकेगा.

फिर भी, स्वतंत्रता के बाद से अब तक लगभग अपरिवर्तित रही संस्था में बदलाव लाना कठिन काम होगा. उदाहरण के लिए, भारतीय सेना अब तक दुनिया में खच्चरों और संगीनों की सबसे बड़ी उपयोगकर्ता है. इससे पता चलता है कि उसे अपने संसाधनों और तरीकों को अपग्रेड करने की कितनी जरूरत है.

1982 में कमिशन हासिल करने वाले जनरल नरवणे को तड़क-भड़क से दूर रह कर चुपचाप काम करने वाले, निर्विवाद रूप से प्रतिष्ठित और विभिन्न दायित्वों का सफलतापूर्वक निर्वाह कर चुके अधिकारी के रूप में देखा जाता है. वे कोलकाता केंद्रित पूर्वी कमान और प्रशिक्षण कमान के जनरल अफसर कमांडिंग-इन-चीफ रह चुके हैं.

वे सेना में बहुत ज्यादा समारोह होने को लेकर अपनी अरुचि जता चुके हैं. उनका कहना है, ''यह सब केवल सेना दिवस या अधिष्ठापन समारोहों जैसे महत्वपूर्ण अवसरों पर ही होना चाहिए, न कि फील्ड फायरिंग के दौरान भी अधिकारियों के पहुंचने पर.''

पूर्व थल सेनाध्यक्ष जनरल वी.पी. मलिक कहते हैं, ''जनरल नरवणे का व्यापक दायित्व सेना का प्रशिक्षण, कल्याण और उसका मनोबल ऊंचा बनाए रखना होगा, पर उनकी जिम्मेदारी का बड़ा हिस्सा सीडीएस के साथ मिलकर काम करना भी होगा ताकि थल सेना का भावी बड़ी भूमिका में फिट होना सुनिश्चित किया जा सके.''

जनरल नरवणे ने पुष्टि की है कि वे करीब दो साल पहले जनरल रावत की शुरू की गई सेना की सुधार प्रक्रिया जारी रखेंगे. इनमें दिल्ली स्थित सेना मुख्यालय का पुनर्गठन, इंटीग्रेटेड बैटल ग्रुप्स (आइबीजी) के रूप में पहचाने जाने वाली अपेक्षाकृत कम भारी-भरकम संरचनाओं का विकास तथा अधिकारियों और सैनिकों की पदोन्नतियों को गति देना शामिल है.

सुधारों का मतलब सेना के बजट संकट से निपटना भी है. कुल 1.71 लाख करोड़ रुपए परिव्यय के साथ थल सेना पर कुल रक्षा बजट का 56 फीसद व्यय होता है. पर थलसेना के बजट का 87 फीसद से ज्यादा हिस्सा वेतन आदि समेत राजस्व व्ययों पर खर्च हो जाता है. उदाहरण के लिए, इस साल सेना अपने बजट का सिर्फ 13 फीसद ही नए उपकरणों की खरीद के लिए आरक्षित कर सकी है.

आजादी के बाद से सेना की मूल जिम्मेदारियों—भारत की रक्षा करना और कानून-व्यवस्था बनाए रखने में सरकार की मदद करना—में बहुत कम बदलाव हुआ है. लेकिन हाल के वर्षों में सेना के कार्यों में कई गुना वृद्धि हुई है. उदाहरण के लिए, कुल सेना का करीब एक चौथाई हिस्सा फिलहाल जम्मू-कश्मीर में तैनात है.

यह उग्रवाद को दबाने, सीमा पार से आतंकवादियों का आगमन रोकने और सीमाओं की रक्षा के लिए है. सेना को पाकिस्तान पर अपनी पारंपरिक बढ़त बनाए रखनी होगी ताकि उसे करगिल जैसा दुस्साहस करने से रोका जा सके.

वहीं 4,000 किलोमीटर लंबी विवादित वास्तविक नियंत्रण रेखा पर चीनी सेना को हतोत्साहित रखते हुए उसे यह सुनिश्चित करना है कि सीमा पर होने वाली घटनाएं नियंत्रण से बाहर न निकल जाएं. उसे अपना आधुनिकीकरण अभियान जारी रखते हुए राइफलों और गोला-बारूद से लेकर टैंक और मिसाइलों तक, हर चीज की खरीद का क्रम जारी रखना होगा. तीन साल या इससे भी कम अवधि के कार्यकाल के कारण पिछले कई सेनाध्यक्ष कार्यों की इस लंबी सूची पर ध्यान केंद्रित नहीं कर सके हैं.

पिछले तीन साल में सीमा पर सैन्य समीकरण कुछ हद तक नाटकीय रूप से भारत के पक्ष में बदले हैं. चीन सरकार के साथ कूटनीतिक संवाद बने रहने के कारण चीन सीमा पर काफी हद तक शांति रही है जिससे सेना को रक्षा तैयारियां करने, बुनियादी ढांचे का विकास करने और सीमा पर दृढ़ संकल्पित बने रहने की नीति जारी रखने में मदद मिलती है. जनरल नरवणे कहते हैं, ''आपको अपनी बात दृढ़ता से रखनी चाहिए, न कि आक्रामक होना चाहिए.''

सरकार ने सीमा-पार दो हमले—2016 के उड़ी हमले के बाद कमांडो आक्रमण और 2019 के पुलवामा हमले के बाद हवाई आक्रमण— करके पाकिस्तान को भी संकेत दिया है कि आतंकवादी घटनाओं का जवाब देने के क्रम में भारत को पाकिस्तान के परमाणु हथियारों की चिंता नहीं होगी.

सेना प्रमुख का कहना है, ''हमने देखा है कि परमाणु हथियारों की मौजूदगी की चिंता किए बगैर हम अपनी जरूरत के मुताबिक अभियानों को अंजाम दे सकते हैं.''

वर्तमान में जम्मू और कश्मीर में हिंसक घटनाएं और अशांति सबसे कम है. 5 अगस्त को अनुच्छेद 370 हटाए जाने और इंटरनेट पर अभूतपूर्व प्रतिबंध लगाने के बाद से इस केंद्र शासित क्षेत्र में बहुत कम हिंसक घटनाएं हुई हैं. 2016 में बुरहान वानी के मारे जाने के बाद हिंसा में आए उफान के बाद अब घाटी में आतंकवादी नेटवर्क पंगु हो गया है और आतंकी गुटों में युवाओं की भर्ती की घटनाएं लगभग नहीं हो रही हैं.

फिर भी पाकिस्तान से आतंकवाद का खतरा बना हुआ है. सैन्य सूत्रों का कहना है कि सीमा-पार करीब 20 ठिकानों पर 200 से 250 आतंकवादी सीमा पार करने के मौके का इंतजार कर रहे हैं. पर पूरी ताकत से जवाब देने की सरकार की मंशा जता दिए जाने के बाद सेना का मानना है कि अब वह भारी पड़ेगी. जनरल कहते हैं, ''आतंकवादी शिविरों, उनके बुनियादी ढांचे और लॉन्च पैडों को ध्वस्त किया जा सकता है. वे पहले जैसी हिम्मत नहीं कर सकते.'' उन्हें उम्मीद है कि भारत के सख्त जवाब देने की नीति से पाकिस्तान अपनी कार्रवाइयों पर लगाम लगाएगा. सीमा पर यह शांति चाहे भले अस्थायी हो, पर वर्षों में पहली बार सेना प्रमुख के पास सुधार पर ध्यान केंद्रित करने का मौका होगा.

आधुनिकीकरण एक ऐसा छलावा है जिसके पीछे सेना दो दशक से ज्यादा समय से भागती रही है—1999 के करगिल युद्ध और उसके बाद 2001 में 10 महीने की तैयारी 'ऑपरेशन पराक्रम' के समय से. बहरहाल, हाल के वर्षों में, सेना ने तीन अलग-अलग तरह की हॉवित्जर तोपों को शामिल करके गोलाबारी की ताकत को बढ़ाया, गोला बारूद की कमी को पूरा किया और पैदल सेना के लिए एसॉल्ट राइफलों की खरीद की है.

तीनों सेनाओं के उप-प्रमुखों को वित्तीय अधिकार दिए जाने का मतलब है कि नौकरशाही प्रक्रिया में रेंगती फाइलों का इंतजार किए बिना वे बलों की जरूरत की चीजें खरीद सकते हैं. पर यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि आधुनिकीकरण की इस प्रक्रिया को व्यापक रूप से स्थिर रक्षा बजट के बीच ही आगे बढ़ाया जाना होगा. केंद्र सरकार के व्ययों में ऋणों के भुगतान के बाद दूसरा स्थान रखने वाले रक्षा व्यय में 15 फीसद बढ़ोतरी की संभावना नहीं है. सैन्यबलों की पेंशन शामिल करके, रक्षा व्यय सकल घरेलू उत्पाद का 2.2 फीसद हैं.

इस बात की संभावना नहीं है कि खर्च की सीमा जनरल नरवणे के लिए बाधक बने. उनका कहना है कि ''संसाधन तो हमेशा एक निश्चित मात्रा में ही उपलब्ध होते हैं जिन्हें विभिन्न मंत्रालयों के बीच बांटा जाना होता है. हम कह सकते हैं कि रक्षा मंत्रालय को अपेक्षित आवंटन नहीं मिला तो, यकीनन रेलवे और भूतल परिवहन मंत्रालय भी ऐसी ही बात कहेंगे.'' जाहिर है, उनके कार्यकाल में अधूरी मांगों के लिए सार्वजनिक रूप से हायतौबा नहीं मचाई जाएगी.

उनका कहना है, ''असल बात यह है कि आप मिले बजट में क्या कर सकते हैं. हमें ज्यादा कुशल बनना होगा, तीनों सेवाओं के भीतर की जरूरतों में तालमेल बिठाना होगा और अपने संसाधनों को साझा करना होगा ताकि इस तरह से हम अपने पैसों का बेहतर इस्तेमाल कर सकें.''

जनरल नरवणे की ही निगरानी में सेना औपचारिक रूप से अपनी इकाइयों को आइबीजी में रूपांतरित करने की प्रक्रिया शुरू करेगी. आइबीजी सेना की मूल इकाई—इन्फैंट्री डिविजनों—को छोटे आकार की, ज्यादा संचालनीय ब्रिगेडों में बदलेंगे जिसमें हल्के, टैंक, तोपखाने और वायुशक्ति शामिल होगी. पर इस काम में समय लगेगा, क्योंकि इसके लिए सेना की युद्ध व्यवस्था में बदलाव की जरूरत होगी जिसमें उपकरणों और सैनिकों के स्तर का निर्धारण तथा क्षेत्र परीक्षण शामिल हैं.

ये आइबीजी भावी थिएटर कमान का भी हिस्सा होंगे. सेनाओं के आधुनिकीकरण अभियान के हिस्से के रूप में मौजूदा 17 एकल-सेवा कमानों को बदल कर तीन संयुक्त कमान स्थापित करने की योजना बनाई गई है.

सेना प्रमुख को उम्मीद है कि सेना के पानागढ़ स्थित 17 कोर और योल स्थित 9 कोर को शामिल करते हुए अगले दो-तीन वर्षों में पहला आइबीजी तैयार हो जाएगा.

पहले आइबीजी का क्षेत्र-परीक्षण पिछले नवंबर में हिम विजय अभ्यास के दौरान अरुणाचल प्रदेश में किया गया था. अभ्यास के दौरान नई संरचना में संचार में कुछ दिक्कतों का पता चला था.

कोर मुख्यालय इन संरचनाओं के नियंत्रण के लिए उपयुक्त रूप से तैयार नहीं था क्योंकि यह काम पहले डिविजन मुख्यालय करता था.

फिर भी, सेना का कहना है कि वह नई अवधारणा से खुश है और अभ्यास के नतीजों के बारे में विस्तृत जानकारी का इंतजार कर रही है. जनरल नरवणे बताते हैं, ''अभ्यास में भाग लेने वालों से मिली शुरुआती रिपोर्ट बहुत उत्साहजनक है.

वे अब इसके लिए तैयार हैं.'' उम्मीद है कि बदलाव की तरंगों को महसूस कर रही सेनाओं के लिए यह अच्छा उदाहरण होगा.

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