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उत्तर प्रदेशः क्या चलेगा भाजपा का राजयोग?

हिंदुत्व, पिछड़ों और दलितों को साधने की कोशिश और त्वरित प्रशासनिक सुधारों की मिली-जुली रणनीति के साथ, योगी आदित्यनाथ और भाजपा ने प्रदेश विधानसभा चुनावों के लिए कमर कसी

सुलह की कवायद लखनऊ में 22 जून को उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के घर पर नवदंपति को आशीर्वाद देने पहुंचे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सुलह की कवायद लखनऊ में 22 जून को उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के घर पर नवदंपति को आशीर्वाद देने पहुंचे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ लखनऊ में 22 जून को अपने डिप्टी केशव प्रसाद मौर्य के घर पहुंच गए. एक महीने पहले रायबरेली में मौर्य के बेटे योगेश की शादी हुई थी और उसी का जश्न मनाने के लिए मौर्य ने दावत दी थी. आरएसएस के वरिष्ठ नेतागण जैसे सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबले, सह सरकार्यवाह कृष्ण गोपाल और क्षेत्रीय प्रचारक अनिल कुमार और उत्तर प्रदेश के एक अन्य उपमुख्यमंत्री दिनेश शर्मा भी इस अवसर पर उपस्थित थे. आदित्यनाथ ने नवविवाहित युगल को आशीर्वाद दिया, मौर्य को मिठाई खिलाई और खुद भी खाई.

हालांकि, इस मिलने-मिलाने के पीछे स्पष्ट राजनीतिक कारण थे. उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनावों में नौ महीने से भी कम समय शेष है इसलिए संघ के पदाधिकारी, योगी और मौर्य के बीच तनाव को कम करने के लिए लखनऊ आए थे. मार्च 2017 से ही भाजपा सरकार के पूरे कार्यकाल में दोनों के बीच संबंध तनावपूर्ण रहे हैं. पड़ोसी होने के बावजूद आदित्यनाथ पहली बार मौर्य के आवास पर आए थे. इससे एक हफ्ते पहले ही मौर्य ने एक बयान जारी कर आदित्यनाथ को चुनौती दी थी. उन्होंने कहा था कि आगामी यूपी विधानसभा चुनाव में पार्टी का नेतृत्व कौन करेगा इसका फैसला भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व को अभी करना है. अपने आवास पर लंच मीटिंग के बाद मौर्य का रूख नरम था और वे मेल-मिलाप करते दिखे. उन्होंने कहा, ''योगी जी भविष्य में भी हमारे मुख्यमंत्री बने रहेंगे. इस पर किसी तरह के विवाद की कोई गुंजाइश नहीं है.''
 
छवि सुधार

योगी आदित्यनाथ और मौर्य के बीच चल रहे शीतयुद्ध को शांत कराने की कोशिशें लंबे समय से हो रही हैं. प्रदेश भाजपा के एक वरिष्ठ पदाधिकारी बताते हैं, ''संघ और भाजपा के वरिष्ठ नेता आदित्यनाथ और मौर्य को लगातार सार्वजनिक रूप से एक साथ लाने की कोशिश कर रहे हैं ताकि दोनों नेताओं में घोर मतभेद की जो धारणा पार्टी के पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं के बीच बन गई है, उसे दूर किया जा सके. जातिगत आधार पर सरकार के भीतर कहीं कोई गतिरोध नहीं है.''

एकता का प्रदर्शन भाजपा के लिए समय की मांग थी, जिसने पिछली बार भारी जनादेश के साथ उत्तर प्रदेश में सत्ता में वापसी की थी (अपने दम पर 403 सीटों में से 312 सीटें; सहयोगियों के साथ 325 सीटें) लेकिन 2022 में वह प्रदर्शन दोहराना आसान नहीं होगा. भाजपा और संघ के नेताओं के दौरों से राज्य सरकार को लेकर बनी धारणाओं को बदलने और समस्याओं को दूर करने की गंभीर कवायद शुरू हो गई है. भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव (संगठन) बी.एल. संतोष तीन दिवसीय दौरे पर 31 मई को लखनऊ पहुंचे. पार्टी नेताओं और सरकार के मंत्रियों से फीडबैक लेने और मुख्यमंत्री से मिलने के बाद, उन्होंने दूसरी कोविड लहर से निपटने के प्रयासों और टीकाकरण अभियान के लिए प्रदेश सरकार की काफी प्रशंसा की.

उत्तर प्रदेशः क्या चलेगा भाजपा का राजयोग?
उत्तर प्रदेशः क्या चलेगा भाजपा का राजयोग?

आदित्यनाथ सरकार के लिए जनता की राय को फिलहाल किनारे रख दें, संतोष ने भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा को जो मूल्यांकन रिपोर्ट सौंपी है उसमें पार्टी इकाई में गुटबाजी, पार्टी और सरकार के बीच खराब समन्वय और संगठन में जड़ता जैसी विभिन्न समस्याओं को उठाया गया है. विधानसभा चुनाव की तैयारियों पर चर्चा करने के लिए संतोष 21 जून को फिर लखनऊ आए. उसके बाद से भाजपा, उत्तर प्रदेश में अपनी खामियों को दूर करते हुए संगठन को मजबूत करने में तेजी से जुट गई है. भाजपा ने एमएलसी अरविंद कुमार शर्मा को राज्य इकाई में उपाध्यक्ष बनाया है, जिससे इस पूर्व नौकरशाह के आदित्यनाथ की कैबिनेट में शामिल होने की अटकलों पर विराम लग गया. योगी, शर्मा को किसी कीमत पर मंत्री बनाने को तैयार नहीं थे.

21 जून को बी. एल. संतोष के लखनऊ पहुंचते ही प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह को लिखा शर्मा का एक पत्र वायरल हो गया जिसमें उन्होंने योगी के नेतृत्व में 2022 के विधानसभा चुनाव में वर्ष 2017 से भी अधिक सीटें आने की उम्मीद जताई है. इस तरह योगी भाजपा के बीच एक सर्वमान्य चेहरे के रूप में उभरते दिखाई दे रहे हैं.

प्रदेश के राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि भाजपा ऐसी किसी भी घटना से बचने के लिए ठोस प्रयास कर रही है जो आदित्यनाथ की स्थिति को कमजोर करती हो या जिससे ये संकेत जाते हों कि पार्टी योगी के अलावा किसी अन्य नेता के तहत विधानसभा चुनाव लड़ सकती है. लखनऊ विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के पूर्व प्रमुख प्रो. एस.के. द्विवेदी कहते हैं, ''2017 का चुनाव जीतने के बाद आरएसएस और भाजपा ने योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री नियुक्त करके हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण की कोशिश की थी. आगामी चुनाव में हिंदुत्व कार्ड खेलने के लिए उनसे बेहतर भाजपा को कोई दूसरा नेता नहीं नजर आता, खासकर जब उनके कार्यकाल के दौरान अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण कार्य शुरू हो गया है. इन वजहों से भाजपा को उत्तर प्रदेश में चुनाव में योगी आदित्यनाथ को ही अपने चेहरे के रूप में पेश करना पड़ेगा.''

बताया जाता है कि 21 जून को मुख्यमंत्री आवास पर हुई भाजपा कोर ग्रुप की बैठक में हिंदुत्व के शुभंकर के रूप में आदित्यनाथ की छवि को और मजबूत करने की रणनीति बनाई गई थी. बैठक में संघ के होसबले और कृष्ण गोपाल शामिल हुए. कुछ दिनों के भीतर, राज्य कैबिनेट की बैठक में यह निर्णय लिया गया कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में 200 करोड़ रुपए की लागत से 19 किलोमीटर लंबी चार लेन की बाइपास सड़क का निर्माण किया जाएगा ताकि शाकंभरी देवी मंदिर तक आवागमन बेहतर हो सके.

इस मंदिर के साथ हिंदुओं की श्रद्धा जुड़ी हुई है और आदित्यनाथ ने 2019 के लोकसभा चुनाव अभियान से पहले यहां पूजा-अर्चना की थी. उम्मीद की जा रही है कि वे अपने विधानसभा चुनाव अभियान की शुरुआत भी इसी मंदिर से कर सकते हैं. हिंदुत्व, चुनाव में भाजपा का मुख्य मुद्दा बना रहेगा, इसका एक अन्य संकेत 25 जून की कैबिनेट बैठक के फैसले से मिलता है जिसमें चित्रकूट और मिर्जापुर जिले के एक प्रमुख तीर्थ स्थल विंध्याचल शक्ति पीठ के लिए तीर्थ विकास बोर्ड की स्थापना को मंजूरी दी गई.

कैबिनेट के फैसलों को विपक्ष सांप्रदायिक बताता है. यूपी के प्रमुख विपक्षी दल समाजवादी पार्टी (सपा) के मुख्य प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी कहते हैं, ''सबका साथ सबका विकास'' का नारा देने वाली भाजपा के मुख्यमंत्री विकास कार्यों में भी धार्मिक आधार पर भेदभाव कर रहे हैं. हिंदू तीर्थ स्थलों में भी वे अब तक उतना विकास नहीं करा पाए हैं जितना पूर्ववर्ती मुख्यमंत्री अखि‍लेश यादव ने किया था. हिंदू धार्मिक स्थलों में भाजपा सरकार का एक भी विकास कार्य अब तक पूरा नहीं हो पाया है.

अल्पसंख्यक कल्याण, मुस्लिम वक्फ और हज मंत्री मोहसिन रजा इस आरोप का खंडन करते हैं. रजा ने कहा, ''राज्य सरकार ने मदरसों के आधुनिकीकरण के लिए 200 करोड़ रुपए से अधिक आवंटित किए हैं. मुख्यमंत्री के निर्देश पर तैयार की गई योजना के तहत पहली बार आइआइटी और आइआइएम के विशेषज्ञ मदरसा शिक्षकों को ऑनलाइन शिक्षा का प्रशिक्षण देंगे.''

दलित कार्ड

सितंबर 2020 में हाथरस जिले में एक दलित महिला के साथ बलात्कार और हत्या के मामले को संभालने को लेकर उत्तर प्रदेश के पुलिस प्रशासन की बड़ी किरकिरी हुई थी और मीडिया सरकार पर आक्रामक था. भाजपा उसकी भरपाई में जुट गई है और दलितों को साधने के यत्न किए जा रहे हैं. पूर्ववर्ती बसपा (बहुजन समाज पार्टी) सरकार जिसने लखनऊ में दलित प्रतीकों के स्मारकों का निर्माण किया था, के नक्शेकदम पर चलते हुए आदित्यनाथ सरकार ने 25 जून को राज्य की राजधानी में डॉ. भीमराव आंबेडकर सांस्कृतिक केंद्र के निर्माण की मंजूरी दी. 29 जून को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने ऐशबाग में 1.3 एकड़ में बनने वाली 55 करोड़ रुपए की परियोजना की आधारशिला रखी.

बसपा सुप्रीमो मायावती ने इस प्रोजेक्ट को भाजपा का चुनावी करतब बताया है. उत्तर प्रदेश की 20 करोड़ आबादी में दलितों की संख्या करीब 21 फीसद है. दलित मायावती के पीछे मजबूती से खड़े रहा करते थे, लेकिन पिछले कुछ वर्षों से उनका भाजपा की ओर झुकाव धीरे-धीरे बढ़ रहा है. 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा और उसके सहयोगी अपना दल ने उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित 17 सीटों में से 15 पर जीत हासिल की थी. 2017 में राज्य विधानसभा की 86 आरक्षित सीटों में से भाजपा ने 70 पर जीत हासिल की थी.

राज्य में दलितों में से सबसे अधिक संख्या जाटवों (50 प्रतिशत से अधिक) की है. उन्हें लुभाने के लिए, आदित्यनाथ ने 18 जून को उत्तर प्रदेश एससी-एसटी आयोग को नया रूप दिया और डॉ. रामबाबू हरित को इसका अध्यक्ष नियुक्त किया. यह पद पिछले दो साल से खाली था. डॉ. हरित जाटव हैं और दलितों के गढ़ आगरा से ताल्लुक रखते हैं. उनकी नियुक्ति के साथ, योगी ने जाटव समुदाय पर मायावती की पकड़ को चुनौती देने की कोशिश की है. उत्तर प्रदेश अनुसूचित जाति वित्त और विकास निगम के अध्यक्ष लालजी प्रसाद निर्मल कहते हैं, ''मायावती के नेतृत्व वाली बसपा धीरे-धीरे हाशिए पर जा रही है और पार्टी के दलित समर्थक दुविधा में हैं. योगी आदित्यनाथ ने एससी-एसटी आयोग के अध्यक्ष के रूप में एक जाटव नेता को नियुक्त करके इसे भुनाने का दांव खेला है.''

नियुक्तियों की होड़ में, राज्य सरकार ने उत्तर प्रदेश राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष पद के लिए भाजपा नेता जसवंत सैनी को भी चुना. सैनी सहारनपुर के रहने वाले हैं. मेरठ कॉलेज में अर्थशास्त्र के एसोसिएट प्रोफेसर मनोज सिवाच कहते हैं, ''उत्तर प्रदेश का सबसे पश्चिमी जिला सहारनपुर राजनीतिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण है. 2022 के चुनाव को ध्यान में रखकर, योगी आदित्यनाथ ने रणनीतिक रूप से शाकंभरी देवी मंदिर के लिए चार लेन की सड़क बनाने और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की मुख्य पिछड़ी जाति सैनी समुदाय के एक नेता को ओबीसी आयोग प्रमुख के रूप में नियुक्त करने का फैसला किया है.''
 
पार्टी के दबाव

अपने मंत्रियों और भाजपा नेताओं की तरफ से बी.एल. संतोष से इस शिकायत के बाद कि सरकारी अधिकारी उनकी ओर से उठाए गए मुद्दों को तवज्जो नहीं दे रहे, आदित्यनाथ ने प्रशासन में भी फेरबदल शुरू किया है. हाल ही में वाराणसी में विकास कार्यों की समीक्षा करते हुए मुख्यमंत्री ने पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम के प्रबंध निदेशक सरोज कुमार को निलंबित कर दिया. भाजपा के स्थानीय अधिकारियों का दावा है कि कुमार बिजली संबंधी शिकायतों पर आंख मूंदे रहते थे.

इसके बाद राज्य के मुख्य सचिव आर.के. तिवारी ने सभी जिलाधिकारियों को निर्देश दिया कि निर्वाचित प्रतिनिधियों की ओर से दोषी अधिकारियों के खिलाफ मिलने वाली शिकायतों को प्राथमिकता के आधार पर दूर करें. समाजवादी पार्टी के चौधरी का कहना है कि छवि सुधारने के लिहाज से अब बहुत देर हो चुकी है. उनका दावा है, ''योगी आदित्यनाथ की कार्यशैली को लेकर जनता में भारी असंतोष व्याप्त है. अगर भाजपा उनके नेतृत्व में चुनाव लड़ती है तो इससे हमारी पार्टी को ही फायदा होगा.''

अपनी सरकार और पार्टी के बीच तालमेल सुधारने के लिए आदित्यनाथ कथित तौर पर 500 से अधिक राज्य निगमों, बोर्डों और समितियों में भाजपा कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों को समायोजित करने के इच्छुक हैं. राज्य भाजपा ने 5,000 से अधिक कार्यकर्ताओं की सूची तैयार की है, जिन्हें अगस्त से पहले इन निकायों में नियुक्त किया जाएगा. पिछली सपा और बसपा सरकारों के दौरान भाजपा कार्यकर्ताओं के खिलाफ दर्ज कराए गए राजनीतिक मुकदमों को खत्म करने की भी योजना है.

इस कदम का उद्देश्य भाजपा के कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों को एक ऐसे चुनाव के लिए उत्साहित करना और प्रेरित करना है जो न केवल उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की राजनीतिक नियति लिखेगा बल्कि 2024 में आम चुनावों में भाजपा की संभावनाओं का भी फैसला करेगा. जाहिर है भविष्य की दिशा के लिहाज से भाजपा के लिए यह सबसे बड़ा चुनाव होगा.

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