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ऐसे हुई योजना आयोग की इतिश्री

अर्थशास्त्री और सरकार इस पर आम सहमति जुटाने में लगे हैं कि 64 साल पुराने अप्रासंगिक हो चुके विशालकाय आयोग की जगह कैसी संस्था स्थापित की जाए.

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जब गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी योजना भवन के टाइल लगे हॉल में आते तो हलचल मच जाती. सचिवों और सलाहकारों का कहना है कि योजना आयोग के सामने उनकी वार्षिक प्रजेंटेशन लाइव परफॉर्मेंस से कम नहीं होती थी लुभावने जुमले और ऑडियो-विजुअल क्लिप्स के जरिए वे बताते कि पिछले साल उनके राज्य ने क्या हासिल किया और अगले साल अपनी उम्मीदें पूरी करने के लिए उन्हें क्या चाहिए. आयोग के एक पूर्व सदस्य का कहना है, ‘‘मोदी बेहद उत्साही और ऊर्जावान हैं, उनके सचिवों को कभी कुछ बोलने की जरूरत नहीं पड़ी. वे बारीक से बारीक नुक्तों को भी खुद ही बताते थे.’’

लेकिन वर्षों से उन्हें वह प्रतिक्रिया नहीं मिली, जिसकी वे अपेक्षा करते थे. आयोग के अधिकारियों के पथराए चेहरे गुजरात के मानव विकास सूचकांक में नीचे रहने के लिए आलोचना किया करते. धीरे-धीरे मोदी की दिलचस्पी योजना आयोग में कम होने लगी और उनके प्रजेंटेशन का स्तर भी घटने लगा. अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक, पहले वे आयोग को विचारों और सुझावों के लिए महत्वपूर्ण मानते थे, लेकिन बाद में वे उसे ऐसी संस्था मानने लगे जो निठल्ले अर्थशास्त्रियों और नौकरशाहों का जमावड़ा है, जिनका न कोई योगदान होता है, न आयोग की उपयोगिता बढ़ाते हैं.

ऐसी ही एक बैठक में मौजूद रहे एक सलाहकार बताते हैं, ‘‘2009 में एक प्रजेंटेशन के दौरान उन्होंने गुजरात पर एक फिल्म दिखाई और कहा कि वे हर प्रश्न का जवाब देंगे. इससे स्पष्ट है कि तब वे आयोग के बारे में क्या राय रखते थे.’’ अंततः 2013 में वे एक वीडियो के साथ योजना भवन आए, जिसमें कहा गया था कि आयोग ‘‘धौंस जमाने वाले’’ की तरह पेश आता है और कुछ राज्यों की खास जरूरतों पर गौर नहीं करता.

अब नई सरकार ने योजना आयोग को मृत्यु शैय्या पर लिटा दिया है, स्वतंत्रता दिवस को प्रधानमंत्री मोदी ने ऐलान किया कि जल्द ही इसका वजूद खत्म हो जाएगा. आयोग के अवसान पर शोक करने की बजाए केंद्रीय मंत्रालयों और राज्य सरकारों के अधिकारी बेहद खुश हैं. पहले तो आयोग का वजूद ही मिटा देने की इस कार्रवाई को राजनैतिक संदर्भ में देखा जाना चाहिए.

एक राज्य का मुख्यमंत्री केंद्र में सत्तासीन होता है और उस संस्था को धराशायी कर देता है जिसने उसके राज्य के विकास मॉडल का समर्थन करने की बजाए राह में रोड़े अटकाए. लेकिन मामला सिर्फ मोदी का नहीं है, आयोग से मोटे तौर पर सभी नेताओं और नीति-नियंताओं का मोहभंग हो चुका था. उसके बारे में यह कहा जाने लगा था कि वह विकास में रोड़े अटकाता है और आधुनिक भारत की जरूरतों से अनजान है.

यही वजह है कि मोदी ने जिस तेजी से आयोग का मर्सिया पढ़ा, इसकी जगह नई संस्था लाने की प्रक्रिया धीमी ही चल रही है. आम जनता और बड़े अर्थशास्त्रियों से इस नए सुपर ‘‘थिंक टैंक’’ के स्वरूप और कामकाज पर विचार आमंत्रित किए जा रहे हैं. बेशक, इससे एक तरह की वैचारिक सौंदर्य प्रतियोगिता शुरू हो गई है, जिसमें अरविंद पानगडिय़ा से लेकर बिबेक देबरॉय, बिमल जालान से लेकर सुरेश प्रभु तक में मोदी को आश्वस्त करने की होड़ मच गई है कि उनका आइडिया ही सर्वाधिक प्रासंगिक है.

लेकिन महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या इस संस्था को खत्म करना ही पर्याप्त है या जिस नौकरशाही की बदौलत यह सफेद हाथी बन गया, उसमें भी सुधार किया जाना चाहिए.

कैसे हुआ आयोग बेमानी?
योजना आयोग की शुरुआत 1950 में एक गैर- संवैधानिक संस्था के रूप में हुई थी, जिसे भारत के सीमित संसाधनों का बंटवारा हर क्षेत्र और राज्य में करना था. तब इसे पांच महत्वपूर्ण काम सौंपे गए थे. योजना भवन के बगल में राष्ट्रीय सांख्यकी आयोग के प्रमुख प्रणब सेन कभी योजना आयोग के सलाहकार रह चुके हैं. वे आयोग के उन पांच महत्वपूर्ण कार्यों के बारे में बताते हैः

एक, आयोग को पंचवर्षीय योजनाएं तैयार करना था, जो चहुंमुखी विकास की रूपरेखा तय कर सके. दूसरे, यह तय करना था कि सरकार नीतियों और योजनाओं के मामले में किस हद तक हस्तक्षेप कर सकती है और हर योजना के लिए कितने पैसे की जरूरत पड़ेगी. तीसरे, यह आकलन करना था कि क्या हर स्कीम योजना के अनुकूल है और संसाधनों का अधिकतम उपयोग हो सकेगा या नहीं. चौथे, हर स्कीम का मूल्यांकन और सतत निगरानी करना था, ताकि यह देखा जा सके कि उनका सही क्रियान्वयन हो रहा है या नहीं. पांचवें, विभिन्न मंत्रालयों और केंद्र तथा राज्यों के बीच समन्वय स्थापित करना था.

कालांतर में इन सभी कार्यों पर सवाल उठाए जाने लगे. 1991 के आर्थिक सुधारों के बाद संसाधनों का आवंटन करने वाली पंचवर्षीय योजना अप्रासंगिक हो गई, क्योंकि बाकी बचे संसाधन निजी क्षेत्र को दिए जाने लगे. आधुनिक भारत में पांच साल के लिए योजना तैयार करना आदिकालीन कदम ही कहलाएगा. आयोग के एक सलाहकार का कहना है, ‘‘जब फ्लिपकार्ट की वैल्यू एक साल में 1 अरब डॉलर से 7 अरब डॉलर हो सकती है तो पांच साल का आर्थिक लक्ष्य रखने और आकलन का क्या तुक?’’

दूसरी बात यह है कि जब योजना आयोग की स्थापना हुई तब से अब तक सरकारी दखल का तरीका एकदम बदल चुका है. अपने अस्तित्व के पहले 19 साल में योजना आयोग ने देश के विकास का नजरिया बनाया और हर राज्य को अपने विवेक से फंड उपलब्ध करवाए. लेकिन वह दौर एकदम अलग था-लगभग सारे राज्यों में कांग्रेस का ही शासन था और हाल में स्वतंत्र हुए देश को जवाहरलाल नेहरू के विकास नजरिए में भरोसा था. लेकिन 1967 तक यह स्पष्ट हो चुका था कि इसे बंद ही किया जाना चाहिए.

अलग राज्यों में अलग दलों की सरकारें बनीं जिनका केंद्र के साथ अच्छा तालमेल नहीं था. इसके अलावा पक्षपात के आरोप लगने शुरू हो गए. राज्यों को पैसे के बंटवारे के लिए अलग वस्तुनिष्ठ व्यवस्था की जरूरत थी और इसे अंजाम दिया डी.आर. गाडगिल ने. अर्थशास्त्री गाडगिल को इंदिरा गांधी ने आयोग का उपाध्यक्ष नियुक्त किया था.

गाडगिल-मुखर्जी फॉर्मूला 1969 में शुरू किया गया और योजना आयोग के आवंटन की शर्तें तैयार की गईं. इसके तहत राज्य की जनसंख्या, कर वसूली, प्रति व्यक्ति आय और खास जरूरतों को ध्यान में रख कर ही यह फैसला किया जाना था कि किसी राज्य को कितनी मदद चाहिए.

बाद में अधिकतर केंद्रीय सहायता सीधी मदद की बजाए केंद्रीय योजनाओं के जरिए पहुंचने लगी, जिन्हें राज्यों को लागू करना था. इस केंद्रीय योजना के खर्च पर किसी का नियंत्रण जरूरी था. सो, फिर आयोग और राज्यों में टकराव शुरू हो गया. मुख्यमंत्रियों को हर साल योजना आयोग में हाजिरी लगाकर यह बताना नापसंद था कि उन्होंने कितनी प्रगति की और नौकरशाहों से पैसा मांगना हेठी लगती थी. खासकर मोदी और तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जे. जयललिता को तो ऐसे फोटो खिंचवाना कतई पसंद नहीं था जिसमें आयोग के उपाध्यक्ष उन्हें वह देते दिखें जो उनका ही था.

समानांतर नौकरशाही
जैसे-जैसे केंद्रीय योजनाओं की तादाद बढऩे लगी (फिलहाल 137) उनकी समीक्षा और निगरानी सबसे ज्यादा समय खाऊ काम बन गया. एक सलाहकार बताते हैं कि यह श्तंत्र जाल्य में फंस गया-क्योंकि आयोग में हर मंत्रालय से जुड़ी एक इकाई होती थी, जिसमें सचिवालय, दफ्तर और निजी स्टाफ होता था, जो प्रायः एकदम अलग नतीजों पर पहुंचते थे.

असल में विचारों के आदान-प्रदान और व्यापक नजरिए का मंच होने की बजाए योजना भवन समांतर विभागों का अड्डा बन गया. मसलन, 2013 में योजना आयोग के चौथे कार्य, प्रोजेक्ट मॉनिटरिंग का जिम्मा एक अलग संस्था को सौंपा गया जिसे इंडिपेंडेंट इवैल्यूएशन ऑफिस (आइईओ) कहा गया.

लेकिन कार्यक्रमों का मूल्यांकन करने की बजाए आइईओ का पहला सुझाव था, योजना आयोग को ही खत्म करना. यह प्रहसन यहीं खत्म नहीं होता. आइईओ के मुखिया अजय छिब्बर को ही हटा दिया गया, जो यह सोचकर गौरवान्वित होंगे कि मोदी ने उनकी सिफारिश पर आयोग को खत्म कर दिया है.

अपने अंतिम दिनों में योजना आयोग में 1,200 से अधिक कर्मचारी थे. इसमें 110 सलाहकार, निदेशक और परामर्शदाता थे. योजना भवन का वार्षिक बजट ही 2013-14 में 67 करोड़ रु. था. इसके दायरे में विभिन्न योजनाओं के चलते कुल संचालन खर्च का अंदाज लगाना कठिन है.

यूपीए सरकार के 10 साल के शासन में योजना आयोग को मोंटेक सिंह आहलूवालिया की अध्यक्षता में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का सहयोग मिला, और वह उन क्षेत्रों में जा कूदा जो इसे दूसरों के लिए छोड़ देने चाहिए थे. उसने इन्फ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र की बड़ी सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) परियोजनाओं के करारों का आकलन शुरू कर दिया. यह परिवहन और ऊर्जा मंत्रालयों के साथ लंबी चली लड़ाई की शुरुआत थी.

इन मंत्रालयों ने आयोग पर कई परियोजनाओं को ठप करने का आरोप लगाया. मसलन, इस साल 3 जनवरी को राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) के अध्यक्ष आर.पी. सिंह ने भूतल परिवहन सचिव को लिखा, ‘‘प्रि-अप्रेजल बैठकें बंद की जानी चाहिए क्योंकि इनसे कोई लाभ नहीं होता और आयोग हर बार वही सुझाव देता है.’’ 2013 में आयोग ने नक्सल प्रभावित इलाकों के लिए नौ बिंदुओं वाली कार्ययोजना तैयार की, जिस पर वह इस तरह अमल कर रहा था मानो कोई मंत्रालय हो. इससे भी विरोध के स्वर उठे.

इन वजहों से आयोग अपना पांचवां कार्य- विभिन्न मंत्रालयों और राज्यों सरकारों के बीच समन्वय नहीं कर पाया, जबकि इतनी सरकारों और विभागों वाले देश में यह बेहद जरूरी था.

अब भी है प्रासंगिक
हालांकि योजना आयोग अब खत्म हो रहा है, लेकिन इस बारे में सब एकमत हैं कि देश के भावी विकास की रूपरेखा तैयार करने वाली एक संस्था की जरूरत है, जो इतनी विशालकाय न हो. अपनी हाल की पुस्तक रिडिजाइनिंग द एयरोप्लेन व्हाइल फ्लाइंगः रिफॉर्मिंग इंस्टीट्यूशंस में पूर्व योजना आयोग सदस्य अरुण मायरा याद करते हैं कि मनमोहन सिंह ने 2009 में ही बताया था कि आयोग को खुद को व्यवस्था सुधार आयोग के रूप में तब्दील कर लेना चाहिए.

मायरा को ‘‘20 प्रतिष्ठित लोगों’’ की सूची भी दी गई, जिसमें पूर्व वरिष्ठ नौकरशाह, आयोग के पूर्व सदस्य और अग्रणी उद्योगपति शामिल थे. इन सबसे योजना आयोग के नए स्वरूप के बारे में बात की जानी थी. मायरा ने जिन लोगों से बात की, वे सभी इस बात पर सहमत थे कि नई दिल्ली में अर्थशास्त्रियों के एक समूह को संसाधनों के आवंटन का अधिकार नहीं दिया जाना चाहिए, खासकर आज के दौर में जब राज्यों का प्रशासन बेहतर ढंग से हो रहा है और उनके पास जमीनी सचाइयों के बारे में अधिक जानकारी है.

उनके अनुसार ऐसी रणनीतिक संस्था की जरूरत है, जिसमें विशेषज्ञ हों और जो विस्तृत ढंग से सोचे, सरकार तथा उद्योगों को इनपुट उपलब्ध करवाए कि देश की अर्थव्यवस्था को क्या आकार लेना चाहिए. यानी एक सुपर थिंक टैंक, जो पांच साल की समयसीमा से न बंधा हो या  विचारकों का ऐसा समूह जो सरकार को बताए कि देश को किस चीज की जरूरत है- एक-दूसरे से जुड़ी नदियां या बुलेट ट्रेन, आइटी हब या चीनी मिलें, 8,000 फलते-फूलते शहर या 100 स्मार्ट सिटी.

एक पूर्व उपाध्यक्ष, जो अब आयोग की जगह दूसरी संस्था के स्वरूप की रूपरेखा तैयार करने वाली बैठकों में शामिल रहते हैं, उनका कहना है कि नई संस्था को विभिन्न मंत्रालयों में समन्वय में मुख्य भूमिका निभानी चाहिए. वे कहते हैं, ‘‘ग्रामीण महिलाओं के लिए शौचालय बनाने वाली योजना तैयार करने के लिए लगभग छह मंत्रालयों को शामिल होना पड़ेगा, जिसमें बहुत समय लगता है. इसके लिए एक अधिकृत संस्था की जरूरत है, जो सारे दृष्टिकोणों को जोड़कर आगे बढ़ाए.’’

अर्थशास्त्री बिबेक देबरॉय भी मानते हैं कि ऐसी संस्था की जरूरत है जो लंबी अवधि के लक्ष्य लाए. वे कहते हैं, ‘‘यदि सरकार फैसला करती है कि 2040 तक शिशु मृत्यु दर इतनी हो जानी चाहिए, तो यह कौन आश्वस्त करेगा कि यह आंकड़ा हासिल करने के लिए सक्रिय एजेंसियां सही दिशा में चल रही हैं.’’ उनका कहना है कि नियोजन जमीनी स्तर से काम करने वाली विकेंद्रीकृत कवायद हो तो बेहतर होता.

2013-14 के आर्थिक सर्वेक्षण में नई सरकार ने जिन ठोस कदमों की बात की है, ये उसके अनुकूल हैं. इसके लिए नए उत्पादकता आयोग की जरूरत होगी जो सरकारी विभागों और मंत्रालयों का रिपोर्ट कार्ड तैयार करे और उन्हें सार्वजनिक करे.

आगे की राह कैसी?
ऐसी संस्था के लिए मार्ग प्रशस्त करने के लिए आरंभिक संकेत ये हैं कि सरकार पुराने आयोग के व्यय विभाग-जो मंत्रालयों को फंड के आवंटन के बारे में फैसला करता था-को वित्त मंत्रालय के अधीन लाने की सोच रही है. कई विशेषज्ञों ने इस बारे में आशंकाएं व्यक्त की हैं. उनका तर्क है कि वित्त मंत्रालय की ताकत पर किसी तरह का नियंत्रण नहीं रह जाएगा.

वही फंड का सृजन करेगा और यह  फैसला भी लेगा कि उसे कहां खर्च किया जाए. देबरॉय बताते हैं, ‘‘वित्त मंत्रालय खर्च कम करने की कोशिश करता है, ऐसे में उसका पहला शिकार सामाजिक क्षेत्र का खर्च हो सकता है.’’ कुछ लोग बताते हैं कि इन कार्यों को दूसरी संस्थाओं को सौंपने से कुछ बदलने वाला नहीं. फर्क बस यह होगा कि इमारत बदल जाएगी.

एक वरिष्ठ सरकारी सचिव कहते हैं, ‘‘योजना आयोग को खत्म करने के लिए जरूरी है कि सरकार इन प्रक्रियाओं से अलग रहे. इसका अर्थ होगा विकेंद्रीकरण की दिशा में बढऩा.’’ इस नई संस्था का स्वरूप संघीय व्यवस्था को समर्पित मोदी सरकार की अग्निपरीक्षा होगा, खासकर  अगर उनकी सरकार केंद्रीय योजनाओं की संख्या कम करती है और एकमुश्त पैसा राज्य सरकारों को भेजती है. हड़बड़ी में शुरू किए गए प्रयास उदारीकरण के बाद सरकार की कार्यप्रणाली में सर्वाधिक क्रांतिकारी बदलाव ला सकते हैं.

बेशक, भारत को योजनाएं तो चाहिए, लेकिन कोई आयोग नहीं. 

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