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चारों ओर संदेह का धुआं

कई परियोजनाओं को सिलसिलेवार ऑनलाइन पर्यावरणीय मंजूरी मिलने और दूसरी ओर आकलन के नए प्रस्तावित मापदंडों को लेकर पर्यावरणवादियों की त्यौरियां चढ़ीं. आखिर उनके अंदेशे कितने तर्कसंगत हैं?

पर्यावरण बचे कैसे? आंध्र प्रदेश में कुरनूल जिले के अमराबाद जंगल के बीच स्थित श्रीशैलम बांध पर्यावरण बचे कैसे? आंध्र प्रदेश में कुरनूल जिले के अमराबाद जंगल के बीच स्थित श्रीशैलम बांध

पर्यावरण कार्यकर्ताओं और विशेषज्ञों ने हाल ही में केंद्रीय वन, पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन (एमओईएफसीसी) मंत्रालय के कुछ फैसले लेने की हड़बड़ाहट पर गंभीर चिंताएं व्यक्त की हैं. खनन पट्टों की अवधि स्वत: ही आगे बढ़ाने और पर्यावरणीय प्रभाव के मूल्यांकन के लिए नए दिशानिर्देशों का प्रस्ताव तैयार करने को वर्चुअल मीटिंग से लेकर परियोजनाओं को पर्यावरणीय मंजूरी देने तक, मंत्रालय के काम की तेज गति से कई लोग चौक गए हैं और उन्हें सरकार की मंशा पर संदेह हुआ है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 18 जून को निजी क्षेत्र में कोयला खनन को खोल दिया. रुढि़वादियों का कहना है कि केंद्र सरकार पिछले छह साल से औद्योगिक विकास को गति देने के लिए पर्यावरण की आहुति देने के इसी ढर्रे पर चलती आ रही है. हालांकि उनके दावों में कुछ सचाई है, तो भी उनकी कुछ चिंताएं गलत सूचनाओं पर आधारित हैं.

अप्रैल और मई के बीच जब पूरे देश में कोविड के कारण लॉकडाउन लागू था, इस मंत्रालय ने वर्चुअल मीटिंग के माध्यम से 190 से ज्यादा परियोजनाओं के लिए पर्यावरणीय मंजूरी की जांच की. इनमें से कई परियोजनाएं बाघ अभयारण्य, बड़े उद्यानों, पर्यावरण के प्रति संवेदनशील अधिसूचित क्षेत्रों और निर्धारित वन्यजीव गलियारों से जुड़ी हैं. तेजी से फैसले लेने पर मंत्रालय की प्राथमिकता को देखते हुए बैठकों के इस दौर को वैसे असामान्य नहीं कहा जा सकता. मंत्रालय का दावा है कि 2014 में जहां पर्यावरणीय मंजूरी पर फैसला करने में 640 दिन लगते थे, वह अब घटकर 108 दिन हो गया है.

लक्ष्य इसे और घटाते हुए 70-80 दिन करने का है. जुलाई 2014 से 24 अप्रैल 2020 के बीच वन, पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने पर्यावरणीय मंजूरी के लिए मिले 2,592 प्रस्तावों में से 2,256 को मंजूरी दी है, यानी मंजूरी की दर 87 प्रतिशत रही. इनमें से 270 परियोजनाएं जैव-विविधता वाले हॉटस्पॉट और राष्ट्रीय उद्यानों में और इसके आसपास की हैं.

मंत्रालय की सक्रियता ने पर्यावरणविदों को चिंतित कर दिया है. अधिकांश इसे बेवजह की जल्दबाजी और वास्तविक जांच-पड़ताल न किए जाने के प्रमाण के रूप में देखते हैं जिसके नतीजतन मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, 2015 के बाद से 409 वर्ग किमी का वन क्षेत्र विभिन्न परियोजनाओं के लिए दिया जा चुका है.

विश्व प्रकृति निधि (वर्ल्ड वाइल्डलाइफ फंड—डब्ल्यूडब्ल्यूएफ) की फरवरी 2020 की रिपोर्ट में पर्यावरणीय क्षति के कारण भारत की जीडीपी में 2050 तक 1.5 फीसद से ज्यादा के नुक्सान का अनुमान लगाया गया था. येल सेंटर फॉर एनवायरनमेंटल लॉ ऐंड पॉलिसी के पर्यावरण प्रदर्शन सूचकांक में भारत 2014 में 155वें स्थान पर था, लेकिन 2018 में 180 देशों के बीच इसकी रैंकिंग गिरकर 177वीं हो गई.

केंद्र सरकार के 18 जून को वाणिज्यिक खनन के लिए 41 कोयला खदानों की नीलामी शुरू करने के बाद पर्यावरण कार्यकर्ताओं में अंदेशा बढ़ गया. इन 41 खानों में से कई मध्य भारत के जैव विविधता से भरपूर वन क्षेत्रों में स्थित हैं जिनमें से कुछ हसदेव अरंड में हैं. 1,70,000 हेक्टेयर में फैला हसदेव अरंड सबसे घने और सटे दरख्तों वाले जंगलों में से है.

छत्तीसगढ़ और झारखंड की कुछ परियोजनाओं के लिए तो जरूरी वन मंजूरी भी प्राप्त नहीं हुई है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को 10 जून को भेजी एक चिट्ठी में झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने लिखा, ''कोयला और लौह अयस्क दो सबसे महत्वपूर्ण खनिज हैं जिनकी नीलामी होगी. हालांकि, ये दोनों खनिज जिन जिलों में पाए जाते हैं वे महत्वपूर्ण वन क्षेत्र हैं और इनमें अनुसूचित जनजातियों और पिछड़े समुदायों की एक बड़ी आबादी निवास करती है.’’ हसदेव अरंड में आने वाले छत्तीसगढ़ के सरगुजा क्षेत्र में ग्राम सभाओं ने भी प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर क्षेत्र के पांच कोयला ब्लॉकों में नीलामी रोकने के लिए कहा.

जो बात पर्यावरणवादियों के कान खड़े करती है और चीजों को संदिग्ध बनाती है, वह केंद्रीय खनन मंत्रालय का एक हालिया कैबिनेट नोट है जिसमें खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 2015 में संशोधन करने का इरादा जताया गया है. मंत्रालय पट्टा क्षेत्र के अंतर्गत अवैध खनन से जुड़े प्रावधानों में कुछ संशोधन करना चाहता है जो पर्यावरण और वन मंजूरी तथा पट्टे की शर्तों का उल्लंघन है.

कार्यकर्ताओं को यह डर है कि इससे जंगल के विनाश को और बढ़ावा मिल सकता है. पांडिचेरी विश्वविद्यालय में पारिस्थितिकी और पर्यावरण विज्ञान की सेवानिवृत्त प्रोफेसर डॉ. प्रिया देवीदार कहती हैं, ''सख्ती के साथ संरक्षित क्षेत्र 5 प्रतिशत से भी कम क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं और इन संरक्षित क्षेत्रों का कोर एरिया तो बमुश्किल 1-2 प्रतिशत है. इन क्षेत्रों में वनों के अनुचित दोहन को ज्यादा सुविधाजनक बनाना तर्कसंगत नहीं होगा क्योंकि वे लोगों के लिए जल प्रबंधन का भी काम करते हैं.’’

वर्चुअल हड़बड़ी

बारह मई को 291 वैज्ञानिकों और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े पेशेवरों के एक समूह ने केंद्रीय पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावडेकर को चिट्ठी लिखी, जिसमें लॉकडाउन के दौरान पर्यावरणीय मंजूरी देने के तरीके को लेकर ऐतराज जताया गया था. चिट्ठी में कहा गया कि लॉकडाउन को बहाने के रूप में इस्तेमाल करते हुए परियोजना मूल्यांकन के एक अहम घटक मौका मुआयना के काम से कन्नी काट ली गई. मंत्रालय ने मौका मुआयने की बजाए प्रोजेक्ट के डेवलपर्स की ओर से अपलोड किए गए डिजिटल दस्तावेजों पर भरोसा कर लिया.

लॉकडाउन के दौरान सार्वजनिक सुनवाई संभव न थी. इसलिए प्रोजेक्ट से प्रभावित होने वाले समुदायों को आधिकारिक रूप से इस तरह के फैसलों पर अपनी सहमति देने या इसके खिलाफ कानूनी सहारा लेने का मौका ही न मिला.

गुवाहाटी स्थित एनजीओ आरण्यक के सीईओ और प्रसिद्ध पर्यावरणविद् डॉ. बिभव तालुकदार इस बारे में बताते हैं, ‘‘हम सब जानते हैं कि विकास हर देश के लिए आवश्यक है और भारत इसका अपवाद नहीं. लेकिन मौजूदा सरकार विकास परियोजनाओं को मंजूरी देने के लिए फैसले लेने में जो हड़बड़ी दिखा रही है, यहां तक कि कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान भी, उसमें व्यापक संरक्षण की जरूरतों को अनदेखा किया जा रहा है.

ये फैसले जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण के संरक्षक के रूप में एमओईएफसीसी की वास्तविक छवि को प्रतिबिंबित नहीं करते. पर्यावरण संरक्षण को मजबूत करने के लिए पूरे देश में वन महकमे में हजारों स्वीकृत पद भरने के लिए भी वैसा ही फुर्तीला रवैया क्यों नहीं दिखाया जाता?’’

कई आलोचकों का दावा है कि वन क्षेत्रों से जुड़े कानूनों में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से मंजूरी प्रदान करने का कोई प्रावधान ही नहीं. जो पर्यावरण विशेषज्ञ मंजूरी देने की इस प्रक्रिया में शामिल रहे हैं, उनका कहना है कि इन कानूनों और दिशानिर्देशों को उस समय तैयार किया गया था जब आधुनिक संचार के ऐसे उन्नत साधन विकसित ही नहीं हुए थे और इसलिए यह तकनीक का लाभ लेने के रास्ते में नहीं आ सकता.

राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड (एनबीडब्ल्यूएल) के सदस्य और वन्यजीव तथा जलवायु परिवर्तन विशेषज्ञ आर. सुकुमार कहते हैं, ''किसी को भी ऐसी स्थिति के अनुरूप ढलने से नहीं रोका जाना चाहिए जो अभूतपूर्व है. वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग का सहारा लेने में कोई समस्या नहीं है, खासकर छोटी परियोजनाओं के लिए.’’

वन्यजीव बोर्ड 10 विशेषज्ञ मूल्यांकन समितियों (ईएसी) और वन सलाहकार समिति (एफएसी) के अलावा तीन पैनलों में से एक है जो ऐसी किसी भी परियोजना को हरी झंडी देती है जिसका पर्यावरणीय प्रभाव हो सकता है. 10 ईएसी में से एक के अध्यक्ष जे.पी. गुप्ता का दावा है कि वीडियो कॉन्फ्रेंस से फैसला लेने में कोई जल्दबाजी नहीं दिखाई गई. उनके शब्दों में, ''मंजूरी के लिए ईएसी के पास आने से पहले किसी परियोजना की कई तरह की जांच की जाती है. कार्यकर्ताओं के दावे के विपरीत, हमने कोई भी निर्णय लेने से पहले गहन विचार-विमर्श किया था. उस चर्चा के सभी विवरण ऑनलाइन उपलब्ध हैं.’’

सुकुमार और गुप्ता ने इस दावे को भी खारिज कर दिया कि लॉकडाउन के दौरान परियोजनाओं को बिना मौका मुआयने के मंजूरी दे दी गई. सुकुमार कहते हैं, ‘‘राज्य वन्यजीव बोर्ड से अनुमोदन के बाद ही कोई प्रस्ताव एनबीडब्ल्यूएल को भेजा जाता है, जो साइट का अपने स्तर से भी निरीक्षण कर सकता है. राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण भी अक्सर एनबीडब्ल्यूएल के पास प्रस्ताव आने से पहले एक निरीक्षण करता है. जब पहली बार एनबीडब्ल्यूएल प्रस्ताव पर चर्चा करता है तो यह एक साइट निरीक्षण समिति भेजने का भी फैसला कर सकता है, जो स्थिति पर निर्भर करता है.’’

तालुकदार जोर देकर कहते हैं कि मंत्रालय मानदंडों को दरकिनार कर रहा है. वे कहते हैं, ''पिछले लगभग छह वर्षों में एनबीडब्ल्यूएल की एक भी पूर्ण बैठक नहीं बुलाई गई है. इसकी स्थायी समिति, जिसमें एनबीडब्ल्यूएल के एक-तिहाई से भी कम सदस्य हैं, सभी निर्णय ले रही है.’’

एनबीडब्ल्यूएल के सदस्य सुकुमार कहते हैं कि कोरम को लेकर निर्णय मंत्रालय का होता है, लेकिन पर्यावरण पर प्रभावों की बिना पूरी जांच किए कोई फैसला नहीं लिया जाता है. हालांकि, वे इस बात से सहमत हैं कि सीमित प्रभाव वाली छोटी परियोजनाओं को ऑनलाइन मंजूरी देने में कोई हर्ज नहीं क्योंकि इससे समय और धन की बचत होती है. बड़ी परियोजनाओं की बाद में जांच की जा सकती है.

नियम ताक पर रख दिए गए?

लॉकडाउन के दौरान मंजूर हुई दो बड़ी परियोजनाओं पर ज्यादा सवाल उठ रहे हैं. पहली, कोल इंडिया की एक इकाई नॉर्थ-ईस्टर्न कोल फील्ड (एनईसीएफ) को सलेकी प्रस्तावित आरक्षित वन में खनन की अनुमति, जो असम के देहिंग पतकाई हाथी अभयारण्य का हिस्सा है; और दूसरी अरुणाचल प्रदेश के दिबांग घाटी के वर्षावनों के अंदर 3,097 मेगावाट वाली एटलिन जलविद्युत परियोजना है.

परस्पर विरोधी मीडिया रिपोर्टों में कहा गया कि पर्यावरण मंत्रालय ने दोनों परियोजनाओं को मंजूरी दे दी है जिसके बाद कई विरोध अभियान शुरू हो गए हैं, लेकिन ईएसी और एफएसी की बैठकों के विवरण बताते हैं कि वास्तव में इन्हें अभी तक हरी झंडी नहीं मिली है. इस बारे में सुकुमार कहते हैं, ''हमने एनसीईएफ से साफ कहा कि जब तब हमारे सामने इस साइट की राहत योजना प्रस्तुत नहीं की जाती तब तक तो हम बिना वन मंजूरी के हो चुके खनन को नियमित करने पर विचार करना भी शुरू नहीं करेंगे.’’

स्वतंत्र पर्यावरणविदों ने भी उनके दावे की पुष्टि की. पर्यावरण कार्यकर्ता समूह नेचर्स बेकन के संस्थापक सौम्यदीप दत्ता कहते हैं, ''मुझे नहीं पता कि वे देहिंग पतकाई में कोयला खनन की झूठी खबरें क्यों फैला रहे हैं. राज्य सरकार और केंद्र के पास इसके अंदर कोयला खनन का कार्य करके वन्यजीव अभयारण्य को नष्ट करने की कोई योजना नहीं है.’’ संयोग से यह नेचर बेकन था जिसने 2004 में देहिंग पतकाई को वन्यजीव अभयारण्य घोषित करने का एक अभियान छेड़ा था.

एफएसी ने एक अन्य बेहद विवादास्पद परियोजना तेलंगाना के अमराबाद टाइगर रिजर्व के 83 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में यूरेनियम भंडार के लिए सर्वेक्षण और खनन पर निर्णय को भी टाल दिया. हालांकि कार्यकर्ताओं ने एजेंडे में परियोजना को शामिल करने पर बहुत हंगामा खड़ा कर दिया.

वैसे, ईएसी ने दिल्ली में धरोहर वाली एक इमारत के बगल में नए संसद भवन के निर्माण के केंद्र के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है. हालांकि, बैठक के विवरण कहते हैं कि यह अनुमोदन भूमि उपयोग में परिवर्तन के लिए कानूनी चुनौती के परिणाम के अधीन है. सिविल सोसाइटी संगठनों ने इस मंजूरी का विरोध किया है क्योंकि इमारत प्रस्तावित सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट का हिस्सा है, लेकिन ईएसी के समक्ष रखी गई प्रस्तुतियां इसे एक अलग परियोजना के रूप में दर्शाती हैं.

परियोजना के लिए भूमि-उपयोग परिवर्तन से संबंधित एक विशेष अनुमति याचिका सुप्रीम कोर्ट में लंबित है. सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च में पर्यावरण कानून शोधकर्ता कांची कोहली कहती हैं, ''हमारे पास ईएसी की एक अत्यधिक दोषपूर्ण और निष्पन्न सिफारिश है. इसने नए संसद को केंद्रीय विस्टा पुनर्विकास से एक अलग परियोजना के रूप में देखा है और जानबूझकर सामाजिक और पर्यावरणीय प्रभाव को कम कर दिया है.’’ इस नई संसद परियोजना को मंजूरी देने वाली ईएसी के अध्यक्ष, कृषि अर्थशास्त्री प्रोफेसर टी. हक ने इंडिया टुडे के सवालों का जवाब नहीं दिया.

क्या हमें फौरन मंजूरी की जरूरत है?

परियोजनाओं को मंजूरी देने में सरकार की तेजी पर कुछ लोग सवाल खड़े कर सकते हैं लेकिन सभी हितधारक पर्यावरण कानूनों को सरल बनाने, मंजूरी को पारदर्शी बनाने और नौकरशाही के बेवजह के अडंग़ों से मुक्त होने की जरूरत को स्वीकार करते हैं. जटिल कानूनों और नौकरशाही की लगाई पेच की वजह से मंजूरी में 238 दिनों तक की देरी का अनुमान लगाया जाता है.

मध्य प्रदेश के पूर्व प्रधान मुख्य वन संरक्षक आर.एन. सक्सेना कहते हैं, ''एक फाइल 35 जगहों से गुजरती केंद्र सरकार तक पहुंचती है और केंद्र से वापसी में फिर 35 जगहों से गुजरती है.’’ सुकुमार कहते हैं कि वन क्षेत्रों के अनियमित सीमांकन से कई जटिलताएं पैदा होती हैं. वे कहते हैं, ''हमें राष्ट्रीय अभयारण्यों की सीमाओं को युक्तिसंगत बनाना होगा. कुछ क्षेत्रों में लोगों को अपने घरों में शौचालय बनाने के लिए भी सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी की आवश्यकता होती है.’’

पारदर्शिता को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने मूल्यांकन प्रक्रिया को ऑनलाइन कर दिया है और पर्यावरण मंजूरी बैठकों के विवरण को सार्वजनिक कर दिया है. फिर भी हरित कानूनों को कारगर बनाने की इसकी अधिकांश पहल तदर्थ ही रही है. 2011 में शीर्ष अदालत ने फैसला सुनाया था कि मंजूरी प्रक्रिया की निगरानी के लिए एक स्वतंत्र पर्यावरण नियामक बनाया जाए, लेकिन अभी तक कुछ नहीं हुआ है. इसकी बजाए पर्यावरण मंजूरी कानूनों को अधिक उद्योग-अनुकूल बनाने पर ध्यान केंद्रित किया गया है. पर्यावरण प्रभाव आकलन (ईआइए) अधिसूचना, 2020 को इस तरह के कदम के रूप में देखा जा रहा है. इसका मसौदा 23 मार्च को सार्वजनिक परामर्श के लिए रखा गया था.

नए या शून्य आकलन?

सरकार का दावा है कि अधिसूचना लॉकडाउन से दो दिन पहले जारी की गई थी, जिसका उद्देश्य पर्यावरणीय मंजूरी को नियंत्रित करने वाली नियामक प्रक्रियाओं और संस्थागत तंत्र को मजबूत करने के लिए इसके 2006 के संस्करण को दुरुस्त करना है. पर्यावरण कार्यकर्ता सरकार की इस तर्क को नहीं मानते.

उनका कहना है कि अधिसूचना में ऐसे कई अस्पष्ट प्रावधान हैं जो पर्यावरण संबंधी कानूनों को कमजोर करने वाले हैं. मसलन, इसका मसौदा केंद्र सरकार को किसी परियोजना को 'रणनीतिक’ घोषित करने में सक्षम बनाता है. रणनीतिक परियोजना के रूप में वर्गीकृत हो जाने के बाद इसे सार्वजनिक सुनवाई से छूट मिल जाती है और केवल सरकारी एजेंसियां या नियामक प्राधिकरण ही इसे रोक सकते हैं.

एक आरटीआइ पर मिले जवाब में यह खुलासा हुआ है कि जावडेकर ने सार्वजनिक टिप्पणियों और आपत्तियों के लिए समय सीमा बढ़ाने के वरिष्ठ अधिकारियों के प्रस्ताव को खारिज कर दिया था और इससे अधिसूचना पर विवाद खड़ा हुआ. शुरू में टिप्पणी और आपत्तियों के लिए मसौदा अधिसूचना में 60 दिन की-23 मई तक-अवधि निर्धारित की गई थी.

7 मई को अंतिम समय सीमा 38 दिनों के लिए और बढ़ाते हुए इसे 30 जून तक कर दिया गया था, जबकि मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों ने इस पर सार्वजनिक प्रतिक्रिया देने की समय सीमा को जारी होने की मूल तारीख 23 मार्च से 180 दिनों तक रखने का प्रस्ताव दिया था. एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए दिल्ली हाइकोर्ट ने समय सीमा 11 अगस्त तक बढ़ा दी.

आरटीआइ के तहत दस्तावेज हासिल करने वाले दिल्ली के पर्यावरण कार्यकर्ता विक्रांत तोंगड़ कहते हैं, ''अधिसूचना जारी होने के बाद शुरुआती 60 दिनों में देश में लॉकडाउन लागू था. डाक विभाग काम नहीं कर रहा था. हर जगह इंटरनेट कनेक्शन उपलब्ध नहीं. बड़ी फाइलें और दस्तावेज ईमेल पर नहीं भेजे जा सकते.

लोग निहितार्थों पर चर्चा या फिर विरोध भी नहीं कर सकते हैं. ऐसे समय में जब ज्यादातर लोग एक महामारी से लडऩे में उलझे हुए हैं, परामर्श की इतनी जल्दी क्यों दिखाई जा रही है? जावडेकर ने जानबूझकर समय-सीमा को कम किया और यह हमें संदेह करने की हर वजह देता है.’’

उधर जावडेकर यह कहते हुए इन आरोपों का खंडन करते हैं कि ईआइए अधिसूचना एक मसौदा भर है, नीति नहीं है और लोगों को अपनी सिफारिशों भेजने के लिए 60 दिनों का समय दिया गया था (देखें बातचीत). मंत्रालय के अधिकारियों का कहना है कि दिल्ली, कोलकाता, मुंबई, चेन्नै, बेंगलूरू और भुवनेश्वर में राज्य सरकारों समेत विभिन्न हितधारकों के साथ साल भर से ज्यादा समय तक व्यापक परामर्श के बाद मसौदा तैयार किया गया था. एक अधिकारी का कहना है, ''ड्राफ्ट के प्रकाशित होने से पहले ही हमने संबंधित लोगों को 78,000 ईमेल भेजकर इसके बारे में जानकारी दी थी.’’

आलोचक इससे संतुष्ट नहीं हैं. पूर्व पर्यावरण मंत्री और अब पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन पर संसदीय स्थायी समिति के अध्यक्ष जयराम रमेश ने जावडेकर को एक पत्र लिखा जिसमें मसौदे को पहले स्थायी समिति में रखने की मांग की. वे पूछते हैं, ''जब देश एक गंभीर राष्ट्रीय संकट के बीच है, ऐसे में इस अधिसूचना को लेकर इतनी जल्दबाजी की आखिर क्या वजह है?’’

इस मसौदे के कुछ प्रावधान भी शंकाओं को जन्म देते हैं. मसलन, पर्यावरणीय मंजूरी की मांग करने वाली परियोजना के लिए जनता को अपनी प्रतिक्रियाएं प्रस्तुत करने के लिए दिए गए समय को 30 दिनों से घटाकर 20 दिन करने का प्रयास किया गया है. खनन परियोजनाओं के लिए यह प्रक्रिया उस जिले तक सीमित होनी है जहां परियोजना स्थित है भले ही इसका प्रभाव उससे कहीं अधिक क्षेत्र पर पड़ता हो. खनन परियोजनाओं के लिए पर्यावरण स्वीकृति की वैधता को भी मौजूदा 30 वर्षों से बढ़ाकर 50 वर्ष कर दिया गया.

खनन की छूट

ईआइए 2020 के अलावा, पर्यावरण कार्यकर्ता एफएसी की 30 मार्च की उस सिफारिश का विरोध भी कर रहे हैं, जिसने सरकारी स्वामित्व वाली खानों के लिए वन मंजूरी की वैधता स्वत: प्रदान कर दी गई थी, जिनके पट्टों को हाल ही में 20 वर्षों के लिए नवीनीकृत किया गया था.

एक अलग फैसले में एफएसी के दिशानिर्देशों ने व्यवस्था दी कि जिन खानों के पट्टे 31 मार्च को समाप्त हो गए थे, उन खानों के लिए वन मंजूरी को नए पट्टेदारों को स्थानांतरित किया जा सकता है. 31 मार्च को लगभग 40 खानों के पट्टे समाप्त हुए थे. विशेषज्ञ पूछते हैं कि उनके पिछले पर्यावरणीय उल्लंघनों को कैसे माफ किया जा सकता है?

देवीदार कहती हैं, ''यह दावा कि मौजूदा ईआइए कानून परियोजनाओं में देरी कराते हैं, ज्यादातर कुछ उद्योगों के दावे हैं. आज अक्षय ऊर्जा कोयले के साथ प्रतिस्पर्धा कर रही है, और कोयले के उपयोग को आसान बनाने से एक उद्योग को एक ऐसे अन्य उद्योग की कीमत पर लाभ पहुंचाने की कोशिश हो रही है जो पर्यावरण संरक्षण के मामले में बेहतर प्रदर्शन कर सकता है.’’

हालांकि मोदी सरकार की तेजी से फैसले लेने और पर्यावरणीय मंजूरी देने में लगने वाले समय में कटौती को लेकर कोई विवाद नहीं हो सकता, लेकिन हमें न केवल व्यापार को आसान बनाने के लिए बल्कि जलवायु के संरक्षण के लिए भी एक स्थिर और मजबूत तंत्र के लिए भी दीर्घकालिक सुधारों की आवश्यकता है.

जावडेकर कहते हैं, ''पर्यावरण की रक्षा करना हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता है और इस पर कोई समझौता नहीं होगा.’’ (देखें: ''टेक्नोलॉजी ने तीव्रता से फैसले लेने में मदद की है’’) लेकिन ज्यादातर पर्यावरणविदों को इस दावे पर संदेह है.

—साथ में अमिताभ श्रीवास्तव

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