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भर्तियों में धांधली का पहाड़

उत्तराखंड में विधानसभा के गठन से लेकर हाल तक इसकी भर्तियों में धांधली आखिर कैसे होती रही? सिर्फ यही नहीं, अब यहां दूसरे सरकारी विभागों की भर्तियों में भी गड़बड़ी के मामले सामने आ रहे हैं

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युवा आक्रोश : उत्तराखंड में भर्तियों में हो रही धांधली के खिलाफ 7 सितंबर को देहरादून में युवाओं का प्रदर्शन युवा आक्रोश : उत्तराखंड में भर्तियों में हो रही धांधली के खिलाफ 7 सितंबर को देहरादून में युवाओं का प्रदर्शन

हिमांशु शेखर

''सेवा में, माननीय अध्यक्ष, उत्तराखंड विधानसभा. 

विषय: रक्षक एवं अन्य रिक्त पदों पर नियुक्ति प्रदान किए जाने के संबंध में. 

महोदय, निवेदन इस प्रकार है कि मैं एक गरीब परिवार का बेरोजगार युवक हूं एवं मैंने कंप्यूटर का कोर्स किया है तथा शैक्षिक योग्यता स्नातक है. मुझे विश्वस्त सूत्रों से जानकारी प्राप्त हुई है कि विधानसभा सचिवालय में कुछ पद रिक्त हैं. अत: अनुरोध है कि मेरी पारिवारिक स्थिति को देखते हुए किसी पद पर सेवायोजन प्रदान करने की कृपा करें. मैं आपका आजीवन आभारी रहूंगा.’’ यह पत्र देहरादून के गांव नत्थूवाला के रहने वाले अमित ममगांई का है. विधानसभा अध्यक्ष को भेजे गए इस पत्र में कोई तारीख दर्ज नहीं है, लेकिन इसमें विधानसभा सचिव की टिप्पणी है, 'रक्षक के पद पर तदर्थ नियुक्ति करें.’ इस टिप्पणी के आधार पर अमित को उत्तराखंड विधानसभा में रक्षक के पद पर अस्थायी नियुक्ति मिल गई.

अमित ममगांई का यह पत्र एक बानगी भर है. ऐसे ही पत्रों के आधार पर उत्तराखंड राज्य के गठन से लेकर अब तक विधानसभा में लोगों को अस्थायी  नियुक्तियां मिलती रहीं और बाद में उन्हें नियमित किया जाता रहा. पिछले कुछ दिनों से इस मामले ने तूल पकड़ लिया है. उत्तराखंड विधानसभा अध्यक्ष रितु खंडूरी भूषण ने इन नियुक्तियों के जांच के आदेश दे दिए हैं. उत्तराखंड में सरकारी नौकरियों में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी होने का यही मामला नहीं है. यहां उत्तराखंड अधीनस्थ कर्मचारी चयन आयोग यानी यूकेएसएसएससी की भर्तियों में गलत ढंग से चयन का मामला भी लगातार उठ रहा है. प्रदेश में हुई छह अलग-अलग भर्ती प्रक्रियाएं जांच के घेरे में हैं. लेकिन सबसे अधिक चर्चा में हैं, विधानसभा भर्ती मामला और यूकेएसएसएससी की ग्रेजुएट स्तरीय भर्ती परीक्षा.

उत्तराखंड विधानसभा की भर्तियों में गड़बड़ी की शुरुआत 2000 में इसके अलग राज्य बनने के साथ ही हो गई थी. तब उत्तर प्रदेश से उत्तराखंड विधानसभा के लिए कर्मचारी भेजे गए. कुछ कर्मचारी ऐसे थे, जो उत्तराखंड के ही थे. उत्तर प्रदेश विधानसभा में सत्र के दौरान अध्यक्ष अस्थाई कर्मचारी रखते थे. इनमें से कई को उत्तराखंड भेज दिया गया. तब राज्य में नई भर्तियों की कोई प्रक्रिया नहीं बनी थी, इसलिए इन अस्थायी कर्मचारियों को ही नियमित कर दिया गया. 

उस समय उत्तराखंड की जो अंतरिम विधानसभा बनी, प्रकाश पंत उसके अध्यक्ष थे. तब उत्तर प्रदेश विधानसभा से आए अस्थाई कर्मचारियों को नियमित किया गया था और शायद यही कवायद प्रकाश पंत के लिए एक नजीर बनी. यहीं से उत्तराखंड विधानसभा की नियुक्तियों में गड़बड़ी का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह अब तक चलता रहा. प्रकाश पंत 2002 में होने वाला विधानसभा चुनाव पिथौरागढ़ से लड़ना चाहते थे. बतौर विधानसभा अध्यक्ष उन्होंने अपने कार्यकाल में 130 लोगों को नौकरी दी. इनमें से ज्यादातर लोग पिथौरागढ़ के थे. पंत ने राज्य के पहले मुख्यमंत्री नित्यानंद स्वामी की बेटी को भी विधानसभा में नौकरी दी. 2019 में कैंसर की वजह से प्रकाश पंत का निधन हो गया.

2002 में उत्तराखंड में पहला विधानसभा चुनाव हुआ. इसमें कांग्रेस को जीत मिली और यशपाल आर्य स्पीकर बने. पहली चुनी हुई विधानसभा में उन्होंने 85 लोगों को नियुक्त किया. इनमें कांग्रेसी नेताओं के परिजनों के अलावा उनके दूसरे जान-पहचान के लोग भी शामिल थे. नियुक्तियों में धांधली के सवाल पर यशपाल आर्य कहते हैं, ''मैं जांच के लिए तैयार हूं. मैंने हर नियुक्ति में पूरी प्रक्रिया का पालन किया है.’’

2007 में प्रदेश की सत्ता में एक बार फिर भाजपा की वापसी हुई और हरबंस कपूर विधानसभा अध्यक्ष बने. हरबंस कपूर के कार्यकाल में तकरीबन तीन दर्जन नियुक्तियां हुईं. इनमें अधिकांश भाजपा के लोग थे. कोरोना की वजह से दिसंबर, 2021 में कपूर का निधन हो गया.

हरबंस कपूर के कार्यकाल तक हुई नियुक्तियों का पैटर्न यह था कि नियुक्तियां एक-एक, दो-दो करके होती थीं. लेकिन 2012 में जब कांग्रेस ने सत्ता में वापसी की और गोविंद सिंह कुंजवाल विधानसभा अध्यक्ष बने तो यह पैटर्न बदल गया. कुंजवाल ने 2016 के आखिर में 158 लोगों को एक साथ नियुक्त किया. कुंजवाल के कार्यकाल में इतनी बड़ी संख्या में नियुक्तियां की गईं, इसलिए इस मामले पर हो-हल्ला मचा. कुंजवाल ने उस समय यह कह कर अपने निर्णय का बचाव किया कि गैरसेण में नई विधानसभा बन गई है, इसलिए उन्होंने नई नियुक्तियां की हैं. 

कुंजवाल के कार्यकाल में भर्ती किए गए लोगों को सिर्फ प्रार्थना पत्र के आधार पर नौकरी दी गई. यह मामला अदालत गया. याचिकाकर्ता राकेश चंदोला ने यह कहते हुए इन नियुक्तियों को चुनौती दी कि जिनकी नियुक्ति हुई है, उनकी योग्यता पर्याप्त नहीं है. चंदोला ने प्रक्रिया पर सवाल नहीं उठाया. मामला सुप्रीम कोर्ट तक गया और अदालत ने योग्यता को लेकर व्यक्त शंकाओं का समाधान करने का निर्देश दिया. गोविंद सिंह कुंजवाल का अपने कार्यकाल में हुई नियुक्तियों के बारे में कहना है, ''विधानसभा में नियुक्तियों के जो नियम हैं, मैंने उनका पालन करते हुए नियुक्तियां की हैं.’’ कुंजवाल ने अपने बेटे और बहू समेत परिवार के आठ लोगों को नौकरी दी थी. अपने कुछ परिजनों को तो उन्होंने ऐसे पदों पर भी नियुक्ति किया, जिन्हें सामान्य तौर पर उत्तराखंड लोक सेवा आयोग के माध्यम से भरा जाता है. 

2017 में भाजपा फिर से प्रदेश की सत्ता में लौटी और प्रेमचंद अग्रवाल स्पीकर बने. इस पद पर आने के बाद उन्होंने नए पदों के सृजन के लिए कोशिश शुरू की. फाइल दो बार मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के पास पहुंची. मुख्यमंत्री ने फाइल पर नोट किया कि ये नियुक्तियां चयन आयोग के जरिए ही होनी चाहिए. जाहिर है कि मामला तब वहीं थम गया. लेकिन अप्रैल, 2021 में त्रिवेंद्र सिंह रावत मुख्यमंत्री पद से हट गए. नए मुख्यमंत्री बने तीरथ सिंह रावत. इसके बाद अग्रवाल ने नए पदों से संबंधित फाइल तेजी से आगे बढ़ाई. नए पदों के सृजन की मंजूरी मिलने के बाद एक एजेंसी के जरिए 54 पदों के लिए आवेदन मांगे गए और परीक्षा भी हुई.

लेकिन इस परीक्षा का नतीजा आता और चयन प्रक्रिया पूरी होती, इसके पहले ही अग्रवाल ने पुराने ढंग से 74 लोगों की नियुक्ति कर ली. जिन लोगों को अग्रवाल ने नौकरी दी, उनमें भाजपा नेताओं और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पदाधिकारियों के रिश्तेदारों के अलावा सरकारी कर्मचारियों और पत्रकारों के परिजन भी शामिल थे. इन लोगों ने दिसंबर, 2021 में नौकरी ज्वाइन भी कर ली लेकिन उस समय के वित्त सचिव अमित सिंह नेगी ने इसकी वित्तीय मंजूरी नहीं दी. इस वजह से इन लोगों को तनख्वाह नहीं मिल रही थी. 

2022 में नई सरकार बनी और प्रेमचंद अग्रवाल को दो महत्वपूर्ण मंत्रालय मिले. इनमें एक है संसदीय कार्य और दूसरा है वित्त. जिस दिन अग्रवाल ने मंत्री पद का कार्यभार संभाला, उसी दिन उन्होंने संसदीय कार्य मंत्री के तौर पर फाइल आगे बढ़ाई और कहा कि इतने पदों की मंजूरी दे दी गई है और इसे वित्तीय मंजूरी दी जाए. दिलचस्प बात है कि उसी दिन बतौर वित्त मंत्री उन्होंने इन पदों को वित्तीय मंजूरी दे दी और इन लोगों को तनख्वाह मिलने लगी. मतलब विधानसभा अध्यक्ष के तौर पर जो नियुक्तियां प्रेमचंद अग्रवाल ने की थीं, उन्हें जरूरी कानूनी वैधता देने का काम उन्होंने संसदीय कार्य और वित्त मंत्री के तौर पर कर दिया.

हाल के दिनों में जब विधानसभा भर्तियों में गड़बड़ी के मामले ने तूल पकड़ा तो अग्रवाल ने बयान दिया कि यह उनका विशेषाधिकार था. इसके बाद मामले ने और तूल पकड़ लिया. अब जब इन नियुक्तियों पर जांच के आदेश दे दिए गए हैं तो प्रेमचंद अग्रवाल कहते हैं, ''मैंने एक भी नियुक्ति गलत ढंग से नहीं की. जांच से सब कुछ स्पष्ट हो जाएगा.’’

विधानसभा में हुई नियुक्तियों में अभी स्थिति यह है कि 2012 से पहले की सभी नियुक्तियों को नियमित कर दिया गया है. हर विधानसभा अध्यक्ष ने अपनी मनमर्जी से जो नियुक्तियां की हैं, उसका परिणाम यह हुआ कि 403 सदस्यों वाली उत्तर प्रदेश विधानसभा से अधिक कर्मचारी 70 सदस्यों वाली उत्तराखंड विधानसभा में हैं. उत्तर प्रदेश विधानसभा में तकरीबन 500 कर्मचारी हैं, जबकि उत्तराखंड विधानसभा में इनकी संख्या तकरीबन 550 है. 

इस बारे में कांग्रेस नेता मनोज रावत कहते हैं, ''जिस उत्तराखंड विधानसभा के लिए कर्मचारियों की इतनी बड़ी फौज तैयार की गई है, वह साल में बहुत कम दिन चलती है. 2019 में विधानसभा सिर्फ 18 दिन चली. 2020 में 12, 2021 में 11 और 2022 में अब तक 6 दिन ही विधानसभा की कार्यवाही चली. इतने कम दिन चलने वाली विधानसभा में इतनी बड़ी संख्या में कर्मचारियों की नियुक्ति का आखिर क्या मतलब है?’’ उत्तराखंड विधानसभा की भर्तियों पर कांग्रेस काफी आक्रामक है और पार्टी नेता इस मामले में दिल्ली आकर भी एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर चुके हैं.  

इस बीच उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के आग्रह पर विधानसभा अध्यक्ष रितु खंडूरी भूषण ने मामले की जांच के लिए भारतीय प्रशासनिक सेवा के तीन सेवानिवृत्त अधिकारियों की एक समिति का गठन कर दिया है. समिति के सदस्य एस.एस. रावत बताते हैं, ''हमें महीने भर में रिपोर्ट देनी है. हम पूरी निष्पक्षता से इस मामले की जांच कर रहे हैं और जो भी स्थिति होगी, उसे सामने लाएंगे.’’

देहरादून के मेयर रहे भाजपा विधायक विनोद चमोली विधानसभा की भर्तियों में हुई गड़बड़ी के बारे में कहते हैं, ''उत्तराखंड आंदोलन में स्थानीय लोगों को रोजगार देना एक प्रमुख मुद्दा रहा. प्रदेश के राजनैतिक वर्ग ने नियुक्तियों के मामले में अपनी नैतिकता खो दी.’’
 
विधानसभा में हुई भर्तियों में गड़बड़ी का मामला उठने के पहले से ही उत्तराखंड में कई दूसरी भर्तियों में गड़बड़ी के मामले भी उठ रहे थे. इनमें सबसे नया है यूकेएसएसएससी की ग्रेजुएट स्तरीय भर्ती परीक्षा. यह परीक्षा 4-5 दिसंबर, 2021 को हुई थी. इस साल अप्रैल में इसका परिणाम आया. उत्तराखंड बेरोजगार संघ ने इस मामले को प्रमुखता से उठाना शुरू किया. संघ के प्रवक्ता लूशुन टोडरिया बताते हैं, ''परीक्षा का परिणाम आने के बाद एक सवाल यह उठा कि दूसरी पाली में जो लोग थे, उनके नंबर ज्यादा हैं. व्हाट्सऐप पर 4 दिसंबर को परीक्षा होने से पहले 3:30 बजे सुबह से ही पेपर सर्कुलेट होने लगा था.’’

जब इन आरोपों ने जोर पकड़ा तो आयोग ने टॉप 100 कैंडिडेट्स का पिछला अकादेमिक रिकॉर्ड चेक किया. आम तौर पर देखा जाता है कि जो टॉप रैंकर्स होते हैं, वे दूसरी परीक्षाओं को भी पास करके आते हैं. लेकिन यहां हैरान करने वाली बात यह थी कि इनका रिकॉर्ड अच्छा नहीं था. ग्रेजुएट लेवल परीक्षा के टॉपर नवीन सिंह मेहरा ने 31 अक्तूबर को इंटर लेवल परीक्षा दी थी. उसमें उनके 100 में 32 नंबर आए थे लेकिन ग्रेजुएट लेवल वाली इस परीक्षा में 100 में से सिर्फ 92 नंबर आए. इससे संदेह और गहराया. इसके बाद आयोग ने सामान्य प्रक्रिया के तहत सफल अभ्यर्थियों का डॉक्यूमेंट वेरीफिकेशन शुरू किया. इस प्रक्रिया के दौरान यह संदेह पक्का होता गया कि कुछ गड़बड़ी तो हुई है.

इस मामले को शुरुआत से कवर कर रहे स्थानीय पत्रकार संजीव कंडवाल बताते हैं, ''25 मई को पहली खबर प्रकाशित हुई कि परीक्षा में कम से कम 30 मामलों में गड़बड़ी की आशंका है. इसके बाद आयोग ने साइबर सेल को इसकी जांच के लिए कहा. 21 जुलाई को आयोग और पुलिस जांच के आधार पर यह खबर प्रकाशित हुई कि गड़बड़ी हुई है. फिर मुख्यमंत्री ने 22 जुलाई को मामले की एसआईटी जांच के आदेश दिए.’’

25 जुलाई को एसआइटी ने छह लोगों को गिरफ्तारी की. इसके बाद यह मामला परत दर परत खुलता गया और गिरफ्तारियां होती गईं. इस रिपोर्ट के लिखे जाने तक इस मामले में 34 लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है. इसमें कुछ ऐसे लोग भी गिरफ्तार हुए जो यूकेएसएसएससी की पिछली साल हुई न्यायिक सहायक परीक्षा में पास हुए थे. इससे यह साफ होने लगा कि नकल माफिया का यह इकलौता केस नहीं है बल्कि कई परीक्षाओं में धांधली की गई है. इस बारे में उत्तराखंड के पुलिस महानिदेशक अशोक कुमार बताते हैं, ''40 दिनों में 34 लोगों की गिरफ्तारी कोई छोटी बात नहीं है. हम मामले की तह तक पहुंचेंगे. यूकेएसएसएससी की ग्रेजुएट लेवल भर्ती के अलावा 2016 की वीडीओ/वीपीडीओ भर्ती, सचिवालय रक्षक भर्ती, वन दरोगा भर्ती और कनिष्ठ न्यायिक सहायक भर्ती परीक्षा भी जांच के घेरे में है.’’  

इस मामले में यह बात भी सामने आई कि एनएसई-आइटी एजेंसी मध्य प्रदेश की कुख्यात व्यापम को भी ऑनलाइन परीक्षाओं के लिए तकनीकी सेवाएं देती थी. इस एजेंसी ने यूकेएसएसएससी की परीक्षाओं के लिए भी अपनी सेवाएं दी हैं. जिस परीक्षा को लेकर अभी विवाद चल रहा है, उससे भी एजेंसी जुड़ी थी. 

वन दारोगा भर्ती की परीक्षा 2021 में ऑनलाइन हुई थी. इस बारे में प्रदेश के एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी बताते हैं, ''इसमें धांधली का संदेह तब पैदा हुआ, जब यह बात सामने आई कि परीक्षा केंद्र में कैंडिडेट बैठे तो हैं लेकिन उनके कंप्यूटर का एक्सेस कहीं और है. यह भी देखा गया कि आठ-दस बच्चों ने आखिरी के आधे घंटे में पूरा प्रश्नपत्र हल कर दिया था, शुरुआती डेढ़ घंटे तक ऐसे कैंडिडेट बैठे रहे. इन वजहों से इस परीक्षा में परिणाम निकलने से पहले ही 9 अभ्यर्थियों का आवेदन निरस्त कर दिया गया था.’’

यूकेएसएसएससी की ग्रेजुएट लेवल भर्ती में गड़बड़ी के हालिया मामले का मास्टर माइंड उत्तरकाशी से भाजपा के जिला पंचायत सदस्य रहे हाकम सिंह रावत को माना जा रहा है. हाकम सिंह पर 2019 में भी फॉरेस्ट गार्ड परीक्षा में ब्लूटूथ के जरिए नकल कराने के आरोप में मुकदमा दर्ज हुआ था. उस मामले में हालांकि हाकम सिंह गिरफ्तार नहीं हुए लेकिन 10 से अधिक गिरफ्तारियां हुईं. ग्रेजुएट स्तरीय परीक्षा में गड़बड़ी के हालिया मामले में 13 अगस्त को हाकम सिंह रावत की गिरफ्तारी हुई. इसके बाद हाकम की तस्वीरें प्रदेश के सभी बड़े भाजपा नेताओं के साथ वायरल हो गई. हाकम ने उत्तरकाशी में लग्जरी रिजॉर्ट खोला है. वहां प्रदेश के बड़े नेताओं और रसूखदारों का आना-जाना रहता है.  

यूकेएसएसएसी मामले को बहुत मुखर रूप से उठा रहे कांग्रेस विधायक भुवन कापड़ी कहते हैं, ''इस मामले की सीबीआई जांच होनी चाहिए. हमने उच्च न्यायालय में याचिका दायर करके सीबीआइ जांच की मांग की है. प्रदेश की पुलिस इसलिए इतनी तेजी में है कि मामला सीबीआइ को न चला जाए. बड़ी मछलियों को अब भी नहीं पकड़ा जा रहा है. असली मास्टरमाइंड अब भी बाहर हैं.’’

हर पार्टी के विधानसभा अध्यक्ष पर लगे आरोप

प्रकाश पंत, भाजपा
12 मार्च, 2001 से 14 मार्च, 2002
उत्तराखंड विधानसभा में नेताओं के परिजनों को नियुक्त करने की नींव डाली. राज्य के पहले मुख्यमंत्री नित्यानंद स्वामी की बेटी को विधानसभा में नियुक्त किया

यशपाल आर्य, कांग्रेस
15 मार्च, 2002 से 
11 मार्च, 2007
विधानसभा में नेताओं के परिजनों की भर्ती का सिलसिला जारी रहा. आर्य ने करीब तीन दर्जन नियुक्तियां कीं

हरबंस कपूर, भाजपा
12 मार्च, 2007 से 13 मार्च, 2012
कांग्रेस के बाद जब एक बार फिर भाजपा की सरकार आई तो हरबंस कपूर स्पीकर बने. कपूर के कार्यकाल में भी तकरीबन तीन दर्जन नियुक्तियां हुईं
 
गोविंद सिंह कुंजवाल, कांग्रेस
26 मार्च, 2012 से 
20 मार्च, 2017
कुंजवाल के कार्यकाल में 154 लोगों को विधानसभा में नियुक्त किया गया. इनमें उनके परिवार के आठ लोग भी शामिल थे 

प्रेमचंद अग्रवाल, भाजपा
23 मार्च, 2017 से 21 मार्च, 2022
प्रेमचंद अग्रवाल के कार्यकाल में 74 नियुक्तियां हुईं. इनमें भाजपा नेताओं के परिजनों के अलावा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पदाधिकारियों और सरकारी अधिकारियों के परिजनों और उत्तराखंड से बाहर के निवासियों की भी नियुक्ति की गई 

रितु खंडूरी भूषण, भाजपा
26 मार्च, 2022 से अब तक
रितु खंडूरी के कार्यकाल में कोई नियुक्ति नहीं हुई. उन्होंने इन मामलों के जांच के लिए एक समिति बनाई है

जांच के घेरे में भर्तियां
1. यूकेएसएसएससी भर्ती परीक्षा, 2021
2. विधानसभा भर्ती
3. वीडीओ/वीपीडीओ भर्ती, 2016
4. सचिवालय रक्षक भर्ती
5. वन दारोगा भर्ती
6. कनिष्ठ न्यायिक सहायक भर्ती

उत्तराखंड के नियुक्ति घोटाले के मास्टरमाइंड

हाकम सिंह
हाकम सिंह प्रदेश की भाजपा के नेता और उत्तरकाशी जिला पंचायत के सदस्य रहे हैं. वे कभी हरिद्वार में एक प्रशासनिक अधिकारी के ड्राइवर हुआ करते थे. यहीं वे नकल कराने वालों के गिरोह में शामिल हुए. हाकम पर आरोप है कि उन्होंने उत्तर प्रदेश के धामपुर में एक फ्लैट किराए पर लिया और यूकेएसएसएससी परीक्षा के एक दिन पहले उन उम्मीदवारों को यहां लेकर आए जिन्होंने कथित तौर पर 15-15 लाख रुपए दिए थे. यहां इन छात्रों को परीक्षा के सवालों के जवाब याद कराए गए

केंद्रपाल
केंद्रपाल का नाम उत्तर प्रदेश में भी कुछ परीक्षाओं के पेपर लीक कराने में आया है. 2011 में हरिद्वार में केंद्रपाल और हाकम की मुलाकात हुई और दोनों ने साझेदारी में उत्तरकाशी में एक लग्जरी रिजॉर्ट बनाया, जहां प्रदेश के बड़े-बड़े लोगों की आवभगत की जाती थी

चंदन मनराल
उत्तराखंड के रामनगर के रहने वाले चंदन मनराल तकरीबन 30 साल पहले बस कंडक्टर का काम करते थे. बाद में कुमाऊं क्षेत्र में ट्रांसपोर्ट एजेंसी की शुरुआत की. केंद्रपाल ने मनराल को इस गिरोह में शामिल किया था
 
जगदीश गोस्वामी
अल्मोड़ा के रहने वाले जगदीश गोस्वामी बागेश्वर जिले के एक सरकारी स्कूल में पढ़ाते थे. उत्तराखंड के एक मंदिर में 2019 में जगदीश की मुलाकात केंद्रपाल से हुई और यहां से वे भी नकल के खेल में शामिल हो गए 

मनोज जोशी
अल्मोड़ा के रहने वाले मनोज जोशी प्रांतीय रक्षा दल के जवान के तौर यूकेएसएससी के देहरादून स्थित कार्यालय में तैनात थे. 2018 में उन्हें जांच के बाद यहां से हटाया गया. एसटीएफ का दावा है कि जोशी ने लखनऊ के उस प्रिंटिंग प्रेस के एक कर्मचारी की मिलीभगत से पेपर लीक कराया, जहां इसकी छपाई हुई थी

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