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तेरे बिना जिया जाए ना

कोविड-19 के चलते लॉकडाउन में यातायात बंद होने और फैक्ट्रियों का चक्का थमने से प्रदूषण घटा लेकिन उसी दौरान महामारी की आड़ में प्लास्टिक फिर से हमारी जिंदगी में बुरी तरह से आ घुसी. उसका इस्तेमाल बंद कर प्रदूषण कम करने की पूरी मुहिम ही लडखड़ा गई

चद्रदीप कुमार चद्रदीप कुमार

यह बीते हफ्ते की बात है जब नवकार ग्रुप ऑफ कंपनीज के निदेशक पंकज जैन गाजियाबाद की ट्रॉनिका सिटी में विशेषज्ञों के साथ बैठकर कारोबार को पटरी पर लाने की रणनीति तैयार कर रहे थे. पिछले साल उन्होंने करीब सात करोड़ रुपए का निवेश करके मक्के के स्टार्च से तैयार होने वाले कंपोजिटेबल उत्पाद बाजार में उतारे थे जो सिंगल यूज प्लास्टिक के विकल्प थे. लेकिन अब वे वापस प्लास्टिक के उत्पादों पर शिफ्ट होने की योजना बना रहे हैं. क्यों भला?

दरअसल, इसलिए क्योंकि बाजारों में सिंगल यूज प्लास्टिक फिर से चलन में आ रहा है, जिसे बंद करने का ऐलान खुद प्रधानमंत्री ने पिछले साल 15 अगस्त को लाल किले से किया था.

लॉकडाउन में मिली ढील के बाद जब गाजियाबाद की शिप्रा सन सिटी में रहने वाली 40 वर्षीया पूनम पहली बार राशन और सब्जी लेने बाहर निकलीं तो मास्क वाले चेहरों तथा सोशल डिस्टेंसिंग के बीच एक और बदलाव ने उन्हें चौंका दिया. कोविड-19 से पहले तक जो दुकानदार और रेहड़ी वाले उन्हें घर से थैला लाने की नसीहत देते थे वे अब खुलेआम प्लास्टिक बैग (पॉलीबैग) में सामान पैक करके बेच रहे थे. पूनम ने वजह जाननी चाही तो सब्जी का ठेला लगाने वाली एक महिला से दो-टूक जवाब मिला, ''जब पीछे से ही माल नहीं आ रहा था तो हमारी मजबूरी थी. अब प्लास्टिक के थैले आराम से मिल रहे हैं, तो हम भी दे रहे.''

दरअसल, मामला केवल पॉलीबैग का नहीं है. कोविड-19 की आड़ में प्लास्टिक (मोटे तौर पर एक बार इस्तेमाल के बाद फेंक दिए जाने वाले या 50 माइक्रॉन से कम के) से बने विभिन्न उत्पाद अब बाजार में धड़ल्ले से मिल रहे हैं, जिनके उत्पादन और इस्तेमाल को हतोत्साहित करने के प्रयास बीते दो साल से केंद्र और राज्य सरकारों की ओर से किए जा रहे थे.

जैन कहते हैं, ''देश में जब सिंगल यूज प्लास्टिक पर पाबंदी लगाने के अभियान ने जोर पकड़ा तो हमने भी इसमें सक्रिय भागीदारी निभाते हुए प्लास्टिक के विकल्प खड़े किए.'' लेकिन धीरे-धीरे प्लास्टिक के उत्पाद फिर से बाजार में आ गए. अब इन्हें सरकारी नीतियों की खामी कह लीजिए या उनके क्रियान्वयन में ढिलाई लेकिन हकीकत यही है कि पहले से ज्यादा मात्रा में प्लास्टिक के उत्पाद बाजार में आ गए और हमारा धंधा बैठ गया.'' पिछले साल प्रधानमंत्री ने जब सिंगल यूज प्लास्टिक के उपयोग को खत्म करने का आह्वान किया तो एक-डेढ़ महीने तक सारी फैक्ट्रियां बंद रहीं, बाजार में कैरी बैग के इस्तेमाल पर जुर्माने लगे, लेकिन अब हालात जुदा हैं. ज्यादातर फैक्ट्रियां चालू हैं और हर तरह का माल पहले से ज्यादा बनाया और बेचा जा रहा है.

कोविड-19 ने रही-सही कसर भी पूरी कर दी. महामारी के दौरान प्लास्टिक से बने विभिन्न उत्पाद अब बाजार में धड़ल्ले से मिल रहे हैं. वजहें कई हैं. एक तो पहलू स्वच्छता का है; दूसरे, दो लोगों के बीच संपर्क न हो जिससे संक्रमण की चेन को तोड़ा जा सके इसके चलते कम्युनिटी किचन के भीतर, और फिर जरूरतमंदों को खाना बांटने के लिए डिस्पोजेबल कप प्लेट, गार्बेज बैग, सील बंद पानी की छोटी बोतलें. बदले सामाजिक परिवेश में ऐसे उत्पादों की मांग एकाएक बढ़ गई है. मुख्य तौर पर ये ही वे उत्पाद हैं जिनकी वजह से प्लास्टिक एक बड़ी समस्या में तब्दील होता है. इस्तेमाल किए जाने के बाद इन्हें इकट्ठा करके रिसाइकल करना टेढ़ा काम है. इनसे प्रदूषण भी बढ़ता है और आवारा पशुओं के खाने में आने से यही प्लास्टिक उनके प्राण लेने का सबब भी बनता है.

दिल्ली के नरेला और बवाना औद्योगिक क्षेत्र में चालू प्लास्टिक फैक्ट्रियों से जुड़े कारोबारियों से बात करके पता चलता है कि अप्रैल के दूसरे हक्रते के बाद से मांग तेजी से बढ़ी. कोविड-19 का संकट इतना गहरा था कि बाकी चीजों को पीछे छोड़कर बाजार में सबसे पहले जरूरत ऐसे उत्पादों को उपलब्ध कराने की थी, जिससे हाइजीन और सोशल डिस्टेंसिंग का पालन किया जा सके. इन्हीं परिस्थितियों ने प्लास्टिक की वापसी के लगभग बंद हो चुके रास्ते दोबारा खोल दिए.

ऑल इंडिया प्लास्टिक मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष (एनवायरनमेंट कमेटी) अखिलेश भार्गव कहते हैं, ''प्लास्टिक को बैन करने के लिए हम गलत दिशा में कोशिश कर रहे थे.'' यही कारण है कि कोविड की आपदा के बीच जब करोड़ों प्रवासी मजदूरों को खाना बांटने की नौबत आई तो उन्हें पैक करने के लिए प्लास्टिक के कैरी बैग ही सबसे उपयुक्त विकल्प बनकर उभरे. अपनी बात को विस्तार से समझाते हुए वे कहते हैं, ''समस्या प्लास्टिक नहीं बल्कि उससे होने वाला प्रदूषण है.

उसे कम करने के लिए प्लास्टिक के कलेक्शन और रिसाइक्लिंग पर जोर देने की जरूरत है. इसके लिए प्लास्टिक को बैन कर देना कोई विकल्प नहीं बल्कि सरकार, इंडस्ट्री और जनता को साथ में मिलकर काम करने की जरूरत है.'' पिछले दो साल में प्लास्टिक के उपयोग के प्रति किए गए जागरूकता अभियान का यह असर हुआ था कि लोग अपनी आदतें बदलने लगे थे. लेकिन मौजूदा हालात में प्लास्टिक से सस्ता और बेहतर विकल्प उपलब्ध न होने का ही नतीजा था कि प्लास्टिक के इस्तेमाल पर अंकुश नहीं लगाया जा सका.

एक मसला तकनीकी पहलुओं की अस्पष्टता का भी है. इंडियन पॉल्युशन कंट्रोल एसोसिएशन के संस्थापक निदेशक आशीष जैन कहते हैं, ''प्लास्टिक को बैन करने की बात करना और जमीन पर इसके लिए सार्थक पहल करना, दो अलग-अलग बातें हैं. प्लास्टिक बैन को लेकर दो साल से अभियान चलाए जाने के बावजूद अभी तक यही नहीं स्पष्ट है कि सिंगल यूज प्लास्टिक है क्या? पूरे देश में इसकी एक-सी कोई परिभाषा नहीं.'' आशीष बताते हैं कि कागजों पर तो 21 राज्यों में प्लास्टिक के कैरी बैग पूरी तरह बंद हैं, लेकिन 11-12 राज्यों में अभी भी गैर-कानूनी ढंग से ये बन और बिक रहे हैं. बाकी राज्यों में अब तक कोई कार्रवाई नहीं की गई है. वे कहते हैं, ''प्लास्टिक को लेकर जब तक पूरे देश में एक-सा नियम नहीं होगा, इस पर अंकुश लगा पाना बहुत कठिन है. सरकार अगर वाकई प्लास्टिक से होने वाले प्रदूषण को खत्म करना चाहती है तो एक रणनीति के तहत काम करना होगा. सरकारी नोटिफिकेशन निकालकर, जब-तब छापेमारी करके यह कर पाना मुश्किल है.''

वे एक चूके हुए मौके का भी जिक्र करते हुए कहते हैं, ''प्लास्टिक को बैन करने का एक सुनहरा मौका हमने पिछले साल 2 अक्तूबर को गंवा दिया.'' 15 अगस्त को जब प्रधानमंत्री ने लाल किले से प्लास्टिक के इस्तेमाल को खत्म करने का आह्वान किया तो एक उम्मीद जगी थी कि 2 अक्तूबर को सिंगल यूज प्लास्टिक पर पूरी तरह बैन की घोषणा हो जाएगी. इसे आंदोलन की तरह आगे बढ़ाया जा रहा था और लोग भी जागरूक होकर मानसिक रूप से तैयार हो रहे थे लेकिन 2 अक्तूबर को प्लास्टिक बैन को लेकर कोई घोषणा नहीं हुई. इसके बाद से हम लगातार इस प्रयास को कमजोर पड़ते देख रहे हैं. कोविड-19 ने इस पूरी पहल को ही सिर के बल खड़ा कर दिया.

नवकार ग्रुप के दूसरे निदेशक संजीव जैन भी बातों-बातों में एक गंभीर टिप्पणी करते हैं, ''सारा काम बिना बिल के चल रहा है. आप कहीं ढूंढऩे चले जाइए, आपको कैरी बैग (पॉलीथीन) का एक पक्का बिल नहीं मिलेगा. अगर बिल है ही नहीं तो बाजार में माल आ कहां से रहा है? इससे बेहतर तो यह है कि सरकार बैन हटाकर इस पर टैक्स लगा दे. कम से कम सरकार की कमाई का एक जरिया बढ़ेगा.'' दरअसल, 50 माइक्रॉन से नीचे की प्लास्टिक पर देश के अधिकतर राज्यों में बैन है, इसलिए न तो कोई कारोबारी पक्के बिल पर काम करता है और न ही इस बारे में कुछ खुलकर बताता है.

पंकज जैन एक और महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हैं, ''गुरुग्राम में एक बड़ी कंपनी हमारी ग्राहक थी. हमने उसे प्लास्टिक से अपने उत्पाद पर कन्वर्ट किया था. लेकिन अब वे फिर प्लास्टिक पर वापस लौट गए. दरअसल, प्लास्टिक की तुलना में वैकल्पिक उत्पाद लगभग दोगुनी कीमत पर मिलते हैं.'' काम धंधा मंदा है तो व्यापारी सस्ते विकल्प की ओर बढ़ते हैं.

सेंटर फॉर साइंस ऐंड एनवायरनमेंट के डिप्टी प्रोग्राम मैनेजर दिनेश बंडेला कहते हैं, ''महामारी नहीं भी आती तब भी 2022 तक प्लास्टिक को खत्म करने के लक्ष्य तक पहुंचना असंभव था.'' अपना तर्क पेश करते हुए वे कहते हैं, ''अभी राज्यों ने अपने हिसाब से प्लास्टिक उत्पादों पर पाबंदी लगा रखी है. मसलन, महाराष्ट्र में 16, कर्नाटक में 18, तमिलनाडु में 16 प्लास्टिक उत्पादों को बंद किया गया. राज्य अपने हिसाब से करें, इससे बेहतर यह होता कि सरकार एक मापदंड तैयार करती और सभी राज्य उसे फॉलो करते.

इससे हम यह पता लगा सकते थे कि इस दिशा में हम कहां तक पहुंचे और कितना जाना बाकी है. लेकिन अभी जब हमारे पास न तो सिंगल यूज प्लास्टिक की कोई एक निश्चित परिभाषा है और न ही कोई एक-से नियम तो इनको अमल में लाना तो दूर की कौड़ी है.'' प्लास्टिक के उपयोग को कम करने की दिशा में किए गए प्रयासों के मनचाहे नतीजे मिलें और सिंगल यूज प्लास्टिक का प्रयोग कम से कम किया जा सके, इसके लिए दो काम करने जरूरी हैं. पहला, प्लास्टिक जितना सस्ता और सुलभ विकल्प उपलब्ध करवाया जाए और दूसरा, पूरे देश में एक से नियम बनाकर उसे सख्ती से उनका क्रियान्वयन करवाया जाए. यदि कोई उत्पाद प्रतिबंधित हो तो फिर वह पूरे देश में प्रतिबंधित हो.

दिनेश एक और बात की ओर इशारा करते हैं. वे कहते हैं कि महामारी ने कई तरह से प्लास्टिक के इस्तेमाल को हमारे जीवन में बढ़ा दिया है. मसलन, कोविड-19 से पहले लोग रोजाना मास्क या ग्लव्स नहीं बदलते थे. लेकिन अब मास्क, फेस शील्ड, ग्लव्स, पीपीई, शू कवर जैसे विभिन्न उत्पाद जो कोविड-19 के संक्रमण को रोकने के लिए इस्तेमाल किए जा रहे हैं, इन्हें बनाने में भी पोलीप्रोपेलीन का इस्तेमाल हो रहा, जो प्लास्टिक की ही एक किस्म है. वे कहते हैं इन्हें इस्तेमाल करना हमारी मजबूरी है लेकिन इस कचरे को सही तरह से अलग करके इसका निबटारा कैसे किया जाए, इसके लिए जागरूकता बहुत जरूरी है.

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) ने इस संबंध में अपने नए दिशानिर्देश में कहा है कि इस्तेमाल किए जा चुके मास्क और दस्तानों का निबटारा करने से पहले उन्हें काट कर कम से कम 72 घंटे तक कागज के थैलों में रखा जाना चाहिए. अब तक कोविड-19 से जुड़े बायो-मेडिकल कचरे पर चार बार दिशानिर्देश जारी किए जा चुके हैं. ये नियम सभी के लिए हैं, यह जरूरी नहीं कि मास्क या दस्तानें संक्रमित व्यक्ति ने इस्तेमाल किए हों. सीपीसीबी ने शॉपिंग मॉल जैसे वाणिज्यिक प्रतिष्ठानों और कार्यालयों को भी व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण (पीपीई) के निबटारे के लिए इसी कार्यप्रणाली का पालन करने का निर्देश दिया है. सीपीसीबी ने अपने ताजा दिशानिर्देशों में कहा, ''वाणिज्यिक प्रतिष्ठानों, शॉपिंग मॉल, संस्थानों, कार्यालयों में बेकार पीपीई को अलग कूड़ेदान में तीन दिन तक रखना चाहिए, उनका निबटारा उन्हें काट कर ठोस कचरे की तरह करना चाहिए.'' इसके अलावा संक्रमित रोगियों की ओर से छोड़े गए भोजन या पानी की खाली बोतलों आदि को बायो-मेडिकल कचरे के साथ एकत्र नहीं किया चाहिए.

कोविड-19 के बाद प्लास्टिक कचरे का ढेर कितना बड़ा हो जाएगा इसका अनुमान लगाना मुश्किल है. यह समस्या राष्ट्रीय नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय होगी, यह तय है. प्लास्टिक के खतरे और इसके उपयोग के सही तरीकों के प्रति जागरूकता बढ़ाकर ही इस लड़ाई को जीता जा सकता है. नीतियों में अनिश्चितता से कारोबारियों के बीच असमंजस गहराता है और आंदोलन के उत्साह में भी बल पडऩे लगते हैं.

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