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बड़ी ई-रिटेल कंपनियों पर लगाम

अमेजन के मालिक जेफ बेजोस की तरफ सरकार का ठंडा रुख बड़ी विदेशी ई-कॉमर्स कंपनियों के प्रति दुविधा और अपने समर्थन आधार के लिए संरक्षणवाद का इशारा.

  फटाफट रवैया दिल्ली में अमेजन के एक कार्यक्रम में जेफ बेजोस फटाफट रवैया दिल्ली में अमेजन के एक कार्यक्रम में जेफ बेजोस

नई दिल्ली में प्रधानमंत्री के सरकारी आवास, 7 लोक कल्याण मार्ग, पर 3 अक्तूबर, 2014 को एक खास मेहमान के स्वागत की तैयारी थी. दुनिया की सबसे बड़ी ऑनलाइन मार्केटप्लेस अमेजन के संस्थापक और सीईओ अरबपति जेफ बेजोस, नरेंद्र मोदी के सत्ता संभालने के कुछ ही महीनों बाद उनसे मिलने आने वाले थे. मुलाकात से पहले बेजोस ने कहा, ''उनकी (मोदी की) अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा शानदार है. मैं उनसे मिलने को बेहद उत्साहित हूं.'' इसके बाद बेजोस की कंपनी ने भारत में 2 अरब डॉलर के निवेश का ऐलान किया, क्योंकि वह भारत में बनी-बढ़ी फ्लिपकार्ट के साथ मुकाबला कर रही थी. फलते-फूलते मध्यम वर्ग के साथ भारत अमेजन के विकास के लिए शानदार नया बाजार था. खुद बेजोस के शब्दों में कहें, तो भारत ''बेहद नया जोश भरने वाला'' देश है.

अब जनवरी 2020 में आइए. 56 वर्षीय बेजोस की भारत यात्रा एक बार फिर राष्ट्रीय सुर्खियों में थी, पर तमाम गलत वजहों से. दुनिया के सबसे अमीर आदमी को न केवल मोदी सरकार के ठंडे रुख का सामना करना पड़ा बल्कि अमेजन को केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल के ''सस्ती कीमतें रखकर दूसरे कारोबार को बर्बाद करने'' के आरोप की बदनामी झेलनी पड़ी.

बेजोस ने, जाहिरा तौर पर छोटे और मध्यम कारोबारों को अपने उत्पाद बेचने में मदद करने के मकसद से भारत में और 1 अरब डॉलर के निवेश का ऐलान अभी किया ही था कि एक दिन बाद, 16 जनवरी को गोयल ने फरमाया कि ई-रिटेल की विशालकाय कंपनी भारत पर कोई एहसान नहीं कर रही है. मंत्री महोदय ने अमेजन पर भारत में अपने घाटे पूरे करने के लिए रकम झोंकने का आरोप लगाया. उन्होंने कहा, ''कोई मार्केटप्लेस बेहद सस्ती कीमतें रखने या किन्हीं अनुचित व्यापार में लिप्त न हो, तो इतने भारी घाटे उसे कैसे हो सकते हैं.'' पिछले कुछ साल के दौरान अमेजन ने मालगोदामों और कुछ दूसरे कामों में रकम निवेश की है, लेकिन अगर वह ई-कॉमर्स मार्केटप्लेस मॉडल में मोटे तौर पर घाटों को पूरा करने के लिए धन ला रहा है, तो यह जरूर सवाल खड़े करता है.

हैरानी नहीं कि बेजोस ने मंत्री महोदय की जबानी हुई लानत-मलामत को अनदेखा करना बेहतर समझा और अगले दिन कहा कि कंपनी अगले पांच साल में भारत में दस लाख नौकरियों का सृजन करेगी. शायद इसी के चलते तनाव कुछ कम हुआ. बाद में गोयल ने सफाई दी कि तमाम निवेशों का स्वागत है जब तक वे भारतीय कानूनों का पालन करते हैं. अलबत्ता तब तक यह साफ हो गया कि सरकार और बड़ी ई-कॉमर्स कंपनियों के बीच सब कुछ ठीक-ठाक नहीं चल रहा है. आलोचकों ने कहा कि मोदी सरकार ने अमेजन के मालिक को इसलिए झिड़का क्योंकि बेजोस की मिल्कियत वाले अमेरिकी अखबार वाशिंगटन पोस्ट में प्रतिकूल खबरें छपी थीं. मगर ईमानदारी से कहें तो गोयल ने 21 जनवरी को डावोस में कार्यक्रमों में टकराव का हवाला देकर वालमार्ट इंटरनेशनल की सीईओ जूडिथ मकेना से भी मिलने से इनकार कर दिया था.

यह पहली बार नहीं है जब ई-रिटेल कंपनियां सरकार की छानबीन की जद में आई हैं. दिसंबर 2018 में ई-कॉमर्स क्षेत्र में विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (एफडीआइ) के नए दिशानिर्देशों से भी काफी हो-हल्ला मचा था. औद्योगिक नीति और संवर्धन विभाग (डीआइपीपी) ने एक परिपत्र जारी करके फ्लिपकार्ट और अमेजन सरीखी ऑनलाइन रिटेल कंपनियों (100 फीसद एफडीआइ का लाभ उठाने वाली) को उन कंपनियों के उत्पाद बेचने से, जिनमें उनकी अपनी हिस्सेदारी है, रोक दिया था और साथ ही अपनी साइटों पर उत्पादों के वाणिज्य/बिक्री के लिए एक्सक्लूसिव सौदे करने से भी रोक दिया था. 

इन नियमों से जहां ई-कॉमर्स कंपनियां चिढ़ गईं, वहीं इससे स्थानीय व्यापारी वर्ग खुश था, जो ''प्रतिस्पर्धा में बराबरी के मौकों'' की मांग कर रहा था. आरोप लगाया गया कि कानून मार्केटप्लेस मॉडलों (जिनमें एग्रीगेटर दूसरी कंपनियों के उत्पाद बेचते हैं) में हालांकि 100 फीसद एफडीआइ की इजाजत देता है, मगर बड़ी ई-रिटेल कंपनियों ने लेन-देन का जटिल जाल बिछा लिया है, जिसमें वे 'पसंदीदा कंपनियों' से खरीदारी कर रही थीं और कुछ मामलों में तो इन कंपनियों में उनकी हिस्सेदारी भी थी; इस तरह उन्होंने इसे इनवेंटरी आधारित मॉडल बना दिया था.

बड़ी ई-रिटेल कंपनियों के खिलाफ सरकार के रुख ने उद्योग के जानकारों को हैरत में डाल दिया. कंसल्टेंट और लेखक जसप्रीत बिंद्रा कहते हैं, ''यह कह पाना मुश्किल है कि इसके पीछे वजहें आर्थिक हैं या राजनैतिक. राजनैतिक वजहें भी हो सकती हैं, मसलन व्यापारी समुदाय की सुरक्षा, जो दिल्ली में (जहां हाल के विधानसभा चुनावों में पार्टी की बुरी हार हुई है) भाजपा के सबसे अहम समर्थक हैं.'' जहां तक आर्थिक वजहों की बात है, तो सत्तारूढ़ पार्टी में संरक्षणवादी रास्ते पर चलने का रुझान बढ़ता मालूम देता है. बिंद्रा कहते हैं, ''हो सकता है, उन्हें (सत्तारूढ़ पार्टी को) भी लग रहा हो कि दुनिया बदल रही है. पूरी तरह खुले बाजार की अवधारणा जरूरी नहीं कि सही हो, जैसा चीन ने साबित कर दिया है.'' चीन ने व्यापार, कारोबार और ई-कॉमर्स में भी घरेलू कंपनियों की हिफाजत की है और उसे इसका फायदा मिलता दिखाई देता है. बिंद्रा कहते हैं, ''आर्थिक तौर पर यह चीन में कारगर मालूम देता है. आपको घरेलू कंपनियों को जीतने देना होगा. विडंबना है कि हमारे लिए देर हो चुकी है, क्योंकि ई-कॉमर्स में अब घरेलू खिलाड़ी बचे ही नहीं हैं.''

इंडोनॉमिक्स कंसल्टिंग के संस्थापक रितेश के. सिंह कहते हैं कि सरकार ने विदेशी ई-कॉमर्स कंपनियों को बुरा-भला कहने का कदम ठीक ऐसे समय उठाया जब अरबपति मुकेश अंबानी की अगुआई में देश में ही बनी-बढ़ी कंपनी रिलायंस रिटेल भारी-भरकम योजनाएं बना रही है. रितेश कहते हैं, ''रिलायंस ई-कॉमर्स सेगमेंट में अपना दबदबा कायम करना चाहती है और वॉलमार्ट तथा अमेजन से मुकाबला कर पाना आसान नहीं होगा.''

बड़ी ई-रिटेल कंपनियों के खिलाफ गोयल का जबानी हमले उस सिलसिले का ही अगला कदम जान पड़ता है जिसमें उन्हें एफडीआइ नियमों का उल्लंघन करने का दोषी ठहराया गया था. ई-कॉमर्स कंपनियां ऑनलाइन सामान खरीदने की आसानी के साथ-साथ भारी छूट और पेशकश लेकर आती हैं. यह पारंपरिक दुकानदारों को नागवार गुजरता है. असल में बेजोस की यात्रा से ठीक पहले भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (सीसीआइ) ने भारी छूट देने के चलन और पसंदीदा विक्रेताओं के साथ गठजोड़ की शिकायतें मिलने पर अमेजन और फ्लिपकार्ट के खिलाफ जांच के आदेश दिए थे.

खबरों के मुताबिक, सीसीआइ ने दावा किया कि उसे प्रथम दृष्ट्या सबूत मिले हैं, जिनके चलते इन दोनों ऑनलाइन मार्केटप्लेस की तरफ से दी जा रही कथित प्रतिस्पर्धा विरोधी छूटों की जांच जरूरी हो गई है. अमेजन ने दोहराया कि उसका सारा कामकाज भारतीय नियम-कायदों के मुताबिक चल रहा है. उद्योग जगत के पर्यवेक्षकों की राय है कि अगर कोई गड़बड़ी की जा रही होगी, तो वह सीसीआइ की जांच से सामने आ जाएगी, पर महज कुछ निश्चित समर्थकों (खुदरा दुकानदारों) को खुश रखने की खातिर आशंकाएं खड़ी करना समझदारी की बात नहीं है. 

भारत ई-कॉमर्स का फलता-फूलता बाजार है. इंटरनेट ऐंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया की सितंबर 2019 की रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2020 के आखिर में हर माह इंटरनेट इस्तेमाल करने वाले 4.51 करोड़ लोगों के साथ भारत इंटरनेट के इस्तेमाल के लिहाज से चीन के बाद दूसरे नंबर पर था. इंटरनेट की पैठ अलबत्ता अब भी महज 36 फीसद ही है. इसका मतलब है कि विकासशील देशों के मुकाबले, जहां बाजार पूर्णता के मुहाने पर पहुंच गया है, भारत में अभी बहुत क्षमता और संभावनाओं का दोहन बाकी है. जर्मन डेटा रिसर्च फर्म स्टैटिस्टा कहती है कि भारत में मोबाइल ई-कॉमर्स 2016 के मूल्य से चार गुना बढ़कर 2020 में 38 अरब डॉलर के मूल्य को छू लेगा.

सरकार के शीर्ष अफसरों ने इंडिया टुडे को बताया कि जीएसटी और नोटबंदी की मार झेल चुके व्यापारियों को राहत की जरूरत है. अफसरों का कहना है कि संगठित ऑनलाइन खुदरा व्यापार हालांकि पूरे रिटेल सेगमेंट का महज 7 फीसद है, पर वितरण के नेटवर्क पर वे जबरदस्त असर डालते हैं. और ग्रामीण क्षेत्र में डिजिटल पैठ जैसे-जैसे बढ़ रही है, यह असर और ज्यादा मजबूत होता जाएगा.

आर्थिक मुद्दों पर आरएसएस का थिंक-टैंक स्वदेशी जागरण मंच (एसजेएम) मल्टी-ब्रांड रिटेल और ई-कॉमर्स कंपनियों में एफडीआइ का लंबे समय से विरोधी रहा है. एसजेएम ने छूट के तौर-तरीकों, इन प्लेटफॉर्मों पर एक्सक्लूसिव ब्रांड लॉन्च करने और कथित तौर पर कुछ निश्चित मोबाइल फोन विक्रेताओं को तरजीह दिए जाने को लेकर सीसीआइ से जांच करवाने का दबाव डाला.

ऐसा करते हुए सीसीआइ खुद अपने उस रुख से पलट गया, जो उसने बेजोस की यात्रा से एक हफ्ते पहले 9 जनवरी को अपने पर्चे 'भारत में ई-कॉमर्स का बाजार अध्ययन: प्रमुख निष्कर्ष और बातें' में जाहिर किया था.

इस पर्चे में दरअसल ई-कॉमर्स कंपनियों के लिए स्व-विनियमन की सिफारिश की गई थी. एसजेएम के राष्ट्रीय सह-संयोजक अश्वनी महाजन कहते हैं, ''स्व-विनियमन की उम्मीद मजाक है.'' बेजोस के भारत आने से एक दिन पहले सीसीआइ जांच के आदेश दिए गए.

महाजन का कहना है कि देश के रिटेल सेक्टर को विदेशी भीमकाय कंपनियों के आगे निहत्था छोड़ देना अनुचित है. वे कहते हैं, ''इन विशालकाय कंपनियों की जेबें बहुत बड़ी हैं और उन्हें सस्ती पूंजी भी सुलभ है, जबकि भारत के घरेलू व्यापारियों को कर्ज लेने के लिए भी जद्दोजहद करनी पड़ती है.'' 

उधर, सीएआइटी के राष्ट्रीय महासचिव प्रवीण खंडेलवाल कहते हैं कि यह मान लेना गलत होगा कि व्यापारी रिटेल सेक्टर को आधुनिक बनाने या ई-कॉमर्स के खिलाफ हैं. वे कहते हैं, ''ई-कॉमर्स भविष्य के व्यवसाय का मॉडल है जो तेजी से बढ़ रहा है; हम देश के हरेक व्यापारी का अलग ई-स्टोर बनाकर व्यापारिक समुदाय को इसकी सीध में लाना चाहते हैं.'' हालांकि वे यह भी साफ कर देते हैं कि वे ''फायदे के लिए एफडीआइ नीति का उल्लंघन करने और बाजार बिगाडऩे वाली कंपनियों के खिलाफ'' हैं.

उन्होंने 24 जनवरी को प्रधानमंत्री को भी चिट्ठी लिखी और फ्लिपकार्ट, अमेजन, जोमैटो, स्विगी और ओयो रूम्स सहित 15 टेक स्टार्ट-अप और ई-कॉमर्स कंपनियों के बिजनेस मॉडल की जांच की मांग की. वे कहते हैं, ''जीएसटी और दूसरे प्रत्यक्ष कर चुकाने में टालमटोल के साथ-साथ उनके विदेशी फंड और उसके इस्तेमाल की जांच की जरूरत है.'' सीएआइटी मजबूत ई-कॉमर्स नीति चाहती है. वह यह भी चाहती है कि ई-रिटेल कंपनियों के बीच स्वस्थ और प्रतिस्पर्धी कारोबार और ऑनलाइन तथा ऑफलाइन चैनलों के बीच कीमतों की समानता पक्की करने के लिए या तो नियामकीय प्राधिकरण या ई-कॉमर्स लोकपाल की स्थापना की जाए.

रितेश का कहना है कि यह डर और आशंका कि ई-कॉमर्स ऑफलाइन व्यापारी को खा जाएगा, बहुत दूर की कौड़ी है. वे कहते हैं, ''तथाकथित 'मॉम ऐंड पॉप' स्टोर ऑनलाइन हमले के बावजूद अब भी कायम हैं, मुनाफों में कमी भले आई हो. असल में ऐसी कंपनियां बड़े ऑफलाइन रिटेलरों की तरफ से भारी प्रतिस्पर्धा का सामना कर रही हैं.'' यही नहीं, ऑनलाइन बाजार ऑफलाइन रिटेल के मुकाबले अब भी बहुत छोटा है, यह भारत के 12 खरब डॉलर के खुदरा बाजार का महज 7 फीसद है. ई-कॉमर्स कंपनियां उन ऑफलाइन स्टोर को भी प्लेटफॉर्म मुहैया करती हैं जिनके पास अपने बलबूते अपने उत्पादों को ज्यादा बड़े उपभोक्ता वर्ग तक ले जाने के लिए प्रचार-प्रसार की वित्तीय ताकत नहीं है. रितेश कहते हैं कि ऑनलाइन सब कुछ, खासकर गैर-इलेक्ट्रॉनिक सामान, सस्ता नहीं है. ऐसी दुकानें भी हैं जो अब सस्ते उत्पाद बेचती हैं. इसकी अच्छी मिसाल डी-मार्ट शृंखला के स्टोर हैं जिनकी महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और गुजरात में खासी मौजूदगी है.

उद्योग जगत के पर्यवेक्षकों का कहना है कि सरकार के लिए निवेश को लेकर सही संकेत देना बेहद जरूरी है और वह विदेशी कंपनियों के कामकाज में बेवजह फच्चर फंसाती दिखाई न दे. अमेजन और वालमार्ट सरीखी कंपनियों ने भारत में इतना सारा निवेश किया है कि थोड़े-से उकसावे से उनके बोरिया-बिस्तर बांध लेने की कोई संभावना नहीं है. मगर उनके खिलाफ लगातार अभियान नुक्सानदायक हो सकता है. इससे भारत में कारोबार कर रही या भारत में अपना कारोबार स्थापित करने का मंसूबा बना रही विदेश कंपनियों में भ्रम ही फैलेगा. 

7 प्रतिशत

हिस्सेदारी 2021 तक भारत के खुदरा बाजार में ऑनलाइन कारोबार की (कारोबार: 12 खरब डॉलर)

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