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कसौटी पर न्यायाधीश

सकारात्मक बदलाव लाने की जल्दी में एनडीए सरकार ने रिकॉर्ड समय में न्यायिक नियुक्ति आयोग बनाने का रास्ता साफ कर दिया.लेकिन क्या सुप्रीम कोर्ट इसे मंजूर करेगा?

तकरीबन छह साल पहले कर्नाटक हाइकोर्ट के एक जज को सुप्रीम कोर्ट में भेजने की तैयारी थी, तब कुछ वरिष्ठ वकीलों ने जजों का पैनल तैयार करने वाले पांच सदस्यीय कॉलेजियम के एक सदस्य से दिल्ली में मुलाकात का समय लिया. वकीलों का इरादा उस न्यायाधीश की नियुक्ति को रोकना था. वे कॉलेजियम के सदस्य को उस न्यायाधीश और उसके परिवार की गैर-कानूनी जमीन के सौदों का ब्यौरा देना चाहते थे. उन्होंने अपनी बात कहनी शुरू की और सदस्य को बताया कि वे उनसे मिलने इसलिए आए हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार कितना गंभीर मुद्दा है. सुप्रीम कोर्ट के जज ने उन्हें बीच में ही रोका, हरेक के चेहरे को घूरा और उनसे कहा, “क्या न्यायपालिका में वाकई भ्रष्टाचार व्याप्त है?” याचिका देने आए वकीलों के लिए वह क्षण था जो उन्हें संकेत दे गया कि वे किस व्यवस्था के खिलाफ खड़े हो रहे हैं.

भारतीय न्यायपालिका ने अपने गिर्द सत्ता, विशेषाधिकार और प्रोटोकॉल का जो प्रभामंडल खड़ा कर लिया है, वह अब खतरे में है. 99वां संविधान संशोधन और राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (एनजेएसी) अधिनियम संसद के दोनों सदनों में सिर्फ तीन दिन में सर्वसम्मति से पास होने के बाद कानून बनने की तैयारी में है. बेशक इससे न्यायपालिका और कार्यपालिका में घमासान मच गया है कि सुप्रीम कोर्ट और देश भर के हाइकोर्ट में जजों की नियुक्ति का अधिकार किसके पास रहे. इस टकराव में एक ओर हैं न्यायाधीश, जो दुनिया के दूसरे देशों के उलट अपने साथियों का चयन खुद ही करते हैं. इससे कथित रूप से चाटुकारिता, भाई-भतीजावाद और अपारदर्शिता को बढ़ावा मिलता है. वहीं, दूसरी ओर है एक मजबूत सरकार जो ‘सुधारों’ का युग शुरू करने का अवसर भांपकर व्यवस्था को अपनी ओर झुकाना चाहती है. यह कार्यपालिका का वर्चस्व स्थापित करने की दिशा में कदम बढ़ाने जैसा है.

ढिठाई भरी टेलीविजन बाइट्स और संसद में ‘संविधान की आत्मा’ जागृत करने वाले उत्तेजक भाषणों के बाद लोकतंत्र के दोनों खंभे इस मुद्दे पर असहमति का सार्वजनिक प्रदर्शन करते रहे हैं. नाराज प्रधान न्यायमूर्ति आर.एम. लोढ़ा ने 11 अगस्त को टिप्पणी की, “यदि कॉलेजियम नाकाम रहा तो इसके प्रोडक्ट (यानी न्यायाधीश) भी नाकाम रहे और देश में न्यायपालिका भी नाकाम रही. जनता का न्यायपालिका में जो विश्वास है, उसे खत्म मत कीजिए.” तीन दिन बाद कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने विजेता की मुद्रा में कहा, “संसद अपने अधिकारों का प्रयोग करने से क्यों डरे? संसद को कानून पारित करने के अधिकार पर पूरा भरोसा होना चाहिए.”

लेकिन वरिष्ठ न्यायविद फली नरीमन से लेकर पूर्व कानून मंत्री कपिल सिब्बल जैसे कानून से जुड़े लोगों ने विधेयक को न्यायपालिका की स्वतंत्रता खत्म करने वाला और संविधान के बुनियादी ढांचे को बदल देने वाला करार दिया. 1973 में सुप्रीम कोर्ट ने केशवानंद भारती केस में फैसला सुनाया था कि संविधान के संशोधन अगर उसके बुनियादी ढांचे का उल्लंघन करते हैं तो वे निरस्त माने जाएंगे. नरीमन भी नए विधेयक को ‘स्वीकार न करने योग्य’ मानते हैं. सिब्बल यह तो मानते हैं कि न्यायिक नियुक्तियों में सुधार की जरूरत है, पर वे कहते हैं, “विधेयक के प्रावधान बताते हैं कि सरकार के इरादे संदिग्ध हैं. अपने लोगों को भर कर सरकार अदालतों पर नियंत्रण करना चाहती है.”

एनजेएसी विधेयक के मुताबिक नियुक्ति आयोग में छह सदस्य होंगे—सुप्रीम कोर्ट के तीन वरिष्ठतम जज, कानून मंत्री और दो ‘गणमान’ व्यक्त्यि जिनका चयन एक समिति करेगी. इसमें देश के मुख्य न्यायाधीश, प्रधानमंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता भी शामिल होंगे. दूसरी खामियों के अलावा विधेयक का विवादास्पद पहलू यह है कि कोई भी दो सदस्य किसी उम्मीदवार के खिलाफ वोट दे देते हैं तो उसे चयन का पात्र नहीं समझ जाएगा. इस तरह किसी भी नियुक्ति की स्वीकृति के लिए 5-1 का फैसला जरूरी है. न्यायविदों का तर्क है कि यह विधेयक 1993 के न्यायमूर्ति जे.एस. वर्मा की अध्यक्षता वाली 9 सदस्यीय खंडपीठ के फैसले के खिलाफ है, जिसमें कहा गया था कि जजों की नियुक्ति सिर्फ न्यायपालिका की सहमति से की जाएगी ताकि उसकी स्वतंत्रता बनी रहे. सिब्बल और नरीमन का तर्क है कि दो सदस्यों वाली वीटो व्यवस्था इस विशेषाधिकार का हनन है, क्योंकि न्यायिक सदस्यों पर वीटो लगाया जा सकता है. सिब्बल और नरीमन के अलावा राम जेठमलानी समेत दूसरे लोगों का कहना है कि वे ‘बुनियादी ढांचे’ के आधार पर इसे चुनौती देंगे. अब लाख टके का सवाल यह है कि सुप्रीम कोर्ट इससे सहमत होता है या नहीं. यहीं मामला एक दिलचस्प मोड़ ले लेता है.

दूसरे देशों के कानूनकई बुनियादी समस्याएं
दिल्ली के नीति बाग इलाके में बने दफ्तर में वरिष्ठ वकील और कांग्रेस पार्टी के प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी एनजेएसी विधेयक के आसानी से पारित होने से उत्साह से लबरेज नजर आते हैं. वे इसे देश के संसदीय इतिहास में एक ‘महत्वपूर्ण अवसर’ करार देते हैं. वे यह बताने से नहीं चूकते कि उनकी पार्टी न्यायिक सुधारों के मामले में अग्रणी है. लेकिन विधेयक में जो प्रावधान गलत हैं, उन्हें बताने से भी नहीं चूकते. वे वह हर चीज बताते हैं जिसकी वजह से संविधान के ‘बुनियादी ढांचे’ में परिवर्तन आ जाएगा और सुप्रीम कोर्ट इसे निरस्त कर सकता है. वे दो सदस्यीय वीटो के प्रावधान के खिलाफ तर्क देते हैं. उनका कहना है कि जजों की नियुक्ति का मामला संविधान संशोधन का हिस्सा होना चाहिए था, इसे नेशनल ज्यूडिशियल कमिशन द्वारा नियमन के लिए नहीं छोड़ा जाना चाहिए था.

उन्हें डर है कि विधेयक के प्रावधान 5 और 6 के अनुसार सबसे वरिष्ठ जज को मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया जाएगा, बशर्ते वे ‘इसके लिए उपयुक्त’ हो. अब यह उपयुक्तता क्या होगी, इसे परिभाषित नहीं किया गया है, इससे मनमानी का अंदेशा बना रहता है. सिंघवी कहते हैं, “जल्दबाजी में न सिर्फ बरबादी होती है बल्कि इससे गंभीर संवैधानिक खामियां भी पैदा होती हैं. बेहतर होता, विधेयक का प्रारूप बनाते समय सावधानी बरती जाती.” विडंबना तो यह है कि बहस का समय अब नहीं रहा. अगर उन्हें इतनी अधिक आपत्तियां थीं तो उनकी पार्टी ने दोनों सदनों में पेश किए जाते समय इसका विरोध क्यों नहीं किया?

बीजेपी ने कई तकनीकी खामियों सहित विधेयक को पारित करवाने में जल्दबाजी दिखाई है तो कांग्रेस के इसके पूरे समर्थन की वजह समझ में नहीं आती, खासकर तब जब इसके कानूनी विशेषज्ञों के पास विधेयक के निरस्त हो सकने के कारणों की कमी नहीं है. श्सिद्धांत रूप में” विधेयक को समर्थन देने को राजी होकर कांग्रेस ने एक जिम्मेदार विपक्ष होने का अवसर खो दिया है, ऐसा विपक्ष जो संदिग्ध या विवादास्पद विधेयक पर बहस करता है.

इन सवालों के जवाब की हमारी चाहत हमें कपिल सिब्बल के पास ले जाती है. वे कहते हैं, “यह स्पष्ट है कि सरकार अपने लोगों को न्यायपालिका में भरना चाहती है. हमने यूपीए के दूसरे कार्यकाल में जो प्रस्ताव तैयार किया था उसमें दो सदस्यों के वीटो का प्रस्ताव नहीं था. इससे गैर-न्यायिक सदस्यों को नियुक्ति रद्द करने का अधिकार मिल जाता है. और यह 1993 के फैसले के खिलाफ है.”

वामपंथी दलों ने भी संसद में एक संशोधन का प्रस्ताव रखा था जिसमें आयोग में सदस्यों की संख्या 7 रखने को कहा गया था. वह सदस्य बार काउंसिल का होना था. इस तरह कानून बिरादरी को 4-3 का लाभ मिल जाता और साधारण बहुमत से काम बन जाता. सीपीएम पोलितब्यूरो सदस्य सीताराम येचुरी कहते हैं, “इससे व्यवस्था को पारदर्शी बनाने में मदद मिलती और न्यायपालिका का वर्चस्व भी बना रहता. संसद ने इस संशोधन को स्वीकार नहीं किया.”

लेकिन कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद के पास जवाब है, “आयोग के छह में से तीन सदस्य जज ही हैं, इसलिए न्यायपालिका की सर्वोच्चता खत्म करने का सवाल ही नहीं उठता. हम पारदर्शी व्यवस्था चाहते हैं.” आगे बढऩे से पहले जान लें कि वर्तमान व्यवस्था किस तरह विकसित हुई, इसमें खामियां क्या हैं और सुधारों की फौरी जरूरत के लिए न्यायपालिका खुद कहां तक जिम्मेदार है.

कॉलेजियम या क्लब?
संविधान के अनुच्छेद 124 में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट और हाइकोर्ट के जजों से सलाह कर सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीश की नियुक्ति की जाएगी. इसमें यह भी कहा गया है कि देश के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति के अलावा सारी न्यायिक नियुक्तियों से पहले उनकी राय ली जाएगी. अनुच्छेद 217 में हाइकोर्ट के न्यायाधीशों के लिए भी ऐसे ही दिशा-निर्देश दिए गए हैं, सिवाए इसके कि इसमें राज्यों के राज्यपाल और हाइकोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों की भी राय ली जाएगी.

यह व्यवस्था नए आजाद भारत के लिए तो अनुकूल थी, जब मुख्य न्यायाधीश कुछ न्यायाधीशों की सूची राष्ट्रपति के पास मंजूरी के लिए भेज देते थे. टकराव 1960 के दशक में नजर आने लगे जब अदालत ने इंदिरा गांधी सरकार के कई कानूनों को खारिज कर दिया. ये कानून सरकार ने अपने समाजवादी लक्ष्य पूरे करने के लिए बनाए थे. इनमें प्रिवीपर्स को खत्म करना और बैंकों का राष्ट्रीयकरण शामिल था. इन्हें इस आधार पर निरस्त किया गया कि इनसे मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होता था. लेकिन सरकार ने संवैधानिक संशोधन लाकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया. जब इन संशोधन को चुनौती दी गई तो सुप्रीम कोर्ट ने 1973 में वह प्रसिद्ध फैसला सुनाया कि संसद संविधान में संशोधन तो कर सकती है लेकिन इसके ‘बुनियादी ढांचे’ में बदलाव नहीं कर सकती. 

1975 में जब इंदिरा गांधी सरकार ने इमरजेंसी लागू की तो इसका पहला शिकार न्यायपालिका ही बनी. जो न्यायाधीश सरकार के चहेते नहीं थे, उनका तबादला कर दिया गया. सरकार समर्थक नजर आने वाले और एडहॉक ए.एन. राय को तीन न्यायाधीशों की वरिष्ठता लांघकर मुख्य न्यायाधीश बना दिया गया. 1981 में जजेज1 के नाम से जाने जाने वाले फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 124 और 217 में ‘कंसल्टेशन’ शब्द को शाब्दिक अर्थ में ही लिया जाना चाहिए और न्यायाधीशों के चयन में सरकार के तीनों ही अंगों का समान अधिकार है.

यह व्यवस्था 1993 तक चलती रही जब जजेज-2 फैसले ने अपेक्षाकृत कमजोर पी.वी. नरसिंह राव सरकार के दौरान समीकरणों को बदल दिया. 9 जजों की खंडपीठ का फैसला था कि ‘कंसल्टेशन’ का अर्थ है न्यायाधीशों की नियुक्ति में न्यायपालिका की ‘सहमत’ या मंजूरी और देश के प्रधान न्यायाधीश की मंजूरी के बिना कोई भी नियुक्ति नहीं की जाएगी. 1998 में इसे औपचारिक ढांचा दिया गया जब जजेज-3 केस में न्यायिक कॉलेजियम की संरचना और कार्यप्रणाली स्पष्ट कर दी गई.

इन वर्षों में कई प्रशासनिक सुधारों के सुझाव आए, लेकिन यह व्यवस्था तब से ही वजूद में है. इसका जमीनी असर यह हुआ कि कॉलेजियम खासकर देश के प्रधान न्यायाधीश शेष न्यायिक व्यवस्था के आका बन गए, एक अभिजात-विशिष्ट वर्ग के वरिष्ठ न्यायाधीश कॉलेजियम में ऐसे प्रवेश करते मानो किसी ऊंची कुर्सी पर बैठ रहे हों. उनकी चापलूसी करना जरूरी हो गया, उनकी पसंद पर सवाल उठाना गुनाह. न्यायविदों का कहना है कि निचली अदालतों और हाइकोर्ट के न्यायाधीशों ने तीखी टिप्पणियां देनी शुरू कीं जो सुर्खियां बनतीं या ऐसे फैसले देने शुरू किए जो उन्हें कॉलेजियम सदस्यों के नोटिस में ला देते. कानूनी विशेषज्ञों का तर्क है कि इससे जो व्यवस्था सामने आई, वह न तो पारदर्शी थी, न प्रतिभाशाली उम्मीदवार सामने आ पाते.

जैसा कि सिंघवी कहते हैं, “अब आप होनहार न्यायाधीशों की बात करें तो बी.के. मुकर्जी, एम. पतंजलि शास्त्री, मोहम्मद हिदायतुल्ला और विवियन बोस के नाम सामने आते हैं. ये लोग कार्यपालिका के वर्चस्व वाले दौर की उपज थे लेकिन अच्छे लोग किसी भी व्यवस्था को चलाने में कामयाब रहते हैं.”

सुप्रीम कोर्ट बनाम विकास
इन प्रक्रियागत या व्यवस्थागत समस्याओं के अलावा वर्चस्व का मुद्दा सामने आया है तो उसकी वजह हाल में आए कुछ फैसले हैं, जिससे यह धारणा बनी कि न्यायपालिका हदें लांघ रही है. यह धारणा भी बनी कि वर्तमान न्यायाधीश मामलों पर लगातार मॉनिटरिंग करने के आदी हैं और नए भारत की आर्थिक विकास की भूख से अनजान हैं. गौरतलब है कि ’60 और ’70 के दशक में न्यायपालिका पर ‘पर्याप्त समाजवादी’ न होने का आरोप लगता था तो 2000 और 2010 के दशक में ‘पर्याप्त विकासोन्मुखी’ न होने के आरोप लग रहे हैं.

2 फरवरी, 2012 को सुप्रीम कोर्ट ने 2जी घोटाले में लिप्त होने की वजह से 122 टेलीकॉम लाइसेंसों को रद्द कर दिया. वजह यह बताई गई कि ‘पहले आओ, पहले पाओ’ की नीति गैर-कानूनी और असंवैधानिक थी. न्यायाधीशों का कहना था कि वे “राज्य हैं और घोषणा की कि प्राकृतिक संसाधनों को सिर्फ नीलामी के जरिए आवंटित किया जा सकता है. हालांकि संसाधनों का वितरण कार्यपालिका का विशेषाधिकार है. इसके सिर्फ आठ महीने बाद सुप्रीम कोर्ट ने गोवा में लौह अयस्क के खनन पर प्रतिबंध लगा दिया, इससे पहले 2011 में गैर कानूनी गतिविधियों के चलते कर्नाटक में भी प्रतिबंध लगा था. तत्कालीन वाणिज्य मंत्री आंनद शर्मा ने कहा कि प्रतिबंध से देश को 10 करोड़ टन लौह अयस्क निर्यात न कर पाने का नुकसान झेलना पड़ा है. पिछले अक्तूबर में अदालत ने कहा कि नौकरशाहों को न्यूनतम अवधि का आश्वासन मिलना चाहिए और सारे तबादलों पर एक सिविल सर्विस बोर्ड का नियंत्रण होना चाहिए. एक वरिष्ठ वकील का कहना है, “ये आदेश साबित करते हैं कि अदालत ने उन मामलों में भी दखल देना शुरू कर दिया, जिनसे इसे परे रहना चाहिए था.”

इससे दो महत्वपूर्ण प्रश्न सामने आते हैंरू एक यह कि विधायिका और कार्यपालिका और कुछ न्यायविद इस मामले में एक राय रखते हैं कि वर्तमान व्यवस्था में सुधार की जरूरत है. ऐसे में कार्यपालिका का पलड़ा भारी रखना क्या इसका समाधान है? दूसरा यह कि क्या राज्यों की मंजूरी के बाद संशोधनों को अदालत में चुनौती दी जाती है तो क्या ये वैध रहेंगे?

पूर्व प्रधान न्यायाधीश वी.एन. खरे का मानना है कि ऐसा नहीं होगा. वे कहते हैं, “जहां तक इस मुद्दे का सवाल है तो 1993 का फैसला आज भी मजबूती से चल रहा है. संसद जिस चीज पर गौर कर सकती थी वह थी संविधान का संशोधन करने से पहले इसकी समीक्षा करती. समीक्षा के बिना—बुनियादी ढांचा-जैसी कि अदालत ने व्याख्या की है—वैसा ही है जैसा 1993 के फैसले में कहा गया था.”

न्यायाधीश (रिटा.) कुलदीप सिंह 1993 केस में नौ सदस्यीय खंडपीठ में शामिल थे, वे भी इससे सहमत हैं. उनका तर्क है कि कोलेजियम व्यवस्था सिद्धांत रूप में तो ठीक है, लेकिन आज जिस रूप में काम कर रही है, उससे समस्या पैदा हो रही है. वे कहते हैं, “पूरी व्यवस्था को पारदर्शी और सहज सुलभ होना चाहिए. जनता को पता होना चाहिए कि किसे चुना जा रहा है और उसकी क्या वजह हैं. बुनियादी ढांचे में बदलाव करने वाले संवैधानिक संशोधन पारित करना समस्या का समाधान नहीं है.”

लेकिन हर राजनैतिक दल में बदलाव के पैरोकारों का मानना है कि न्यायिक सुधारों को व्यापक जन समर्थन हासिल है, लिहाजा नया कानून अंततः लागू हो जाएगा. रविशंकर प्रसाद कहते हैं कि कॉलेजियम के खिलाफ सबसे हानिकारक राय उस शख्स की थी जिसे इसे वजूद में लाने का श्रेय है, यानी दिवंगत न्यायमूर्ति जे.एस. वर्मा. 2008 की लॉ कमिशन रिपोर्ट में उनकी टिप्पणी छपी है, “मेरे 1993 के फैसले को गलत समझ गया और उसका गलत प्रयोग किया गया. उस संदर्भ में मैंने कहा कि फैसले के काम करने के तरीके पर गंभीर प्रश्न उठाए जा रहे हैं जिन्हें असंगत नहीं कहा जा सकता. इसलिए एक तरह का पुनर्विचार जरूरी है.”

सरकार नियुक्तियों के मामलों में संशोधन को एक बड़ा सुधारवादी कदम करार देती है और इसे पास कराने में उसने जल्दबाजी दिखाई. इसमें कोई दो राय नहीं कि इस विधेयक पर अदालत में लंबी लड़ाई जारी रहेगी. लेकिन यह प्रश्न अब भी बना हुआ हैः यह खराब विधेयक है, या व्यवस्था को तुरंत सुधारने की दिशा में पहला कदम. इस पर फैसला अभी बाकी है. 
न्यायपालिका में सुधार की राह

 —साथ में जतिन गांधी

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