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प्रदूषण की समस्या, डीजल बना अभिशाप

प्रदूषण की विकराल होती समस्या के मद्देनजर सुप्रीम कोर्ट ने अपने कई आदेशों के जरिए डीजल को दैत्य बना दिया और देश के वाहन उद्योग की रफ्तार में रुकावट पैदा कर दी. क्या नए स्वच्छ ऊर्जा के मानकों को अपनाने से समस्या दूर हो जाएगी?

दिल्ली के टैक्सी चालक 53 वर्षीय जसवंत सिंह को पिछले साल दोहरा झटका लगा. राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (एनजीटी) ने अप्रैल, 2015 में प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए जब दिल्ली में दस साल से ज्यादा पुराने डीजल वाहनों पर बंदिश लगाई, तब जसवंत को अपनी टैक्सी कौड़ियों के भाव बेचनी पड़ी. इसके बाद उन्होंने उधार लेकर पुरानी टाटा इंडिगो डीजल कार खरीदी और एक टैक्सी सेवा के साथ जुड़ गए. बदकिस्मती का हमला एक बार फिर हुआ जब एनजीटी ने राष्ट्रीय राजधानी में सभी डीजल कारों पर रोक लगा दी.

बाद में सुप्रीम कोर्ट ने प्रतिबंध में संशोधन करते हुए इनमें केवल 2,000 सीसी की क्षमता से ज्यादा वाली अधिकतर लग्जरी सेग्मेंट की कारों को शामिल रखा जबकि सभी टैक्सियों को मार्च 2016 तक स्वच्छ ईंधन सीएनजी में परिवर्तित करा लेने का आदेश दिया. एक कार में सीएनजी किट लगाने का खर्चा 65,000 से 70,000 रु. के बीच आता है. जसवंत के लिए यह महंगा सौदा है जिनकी कमाई रोजाना 1,000 रु. से भी कम है.

जसवंत का ऊहापोह बताता है कि प्रदूषण फैलाने वाले डीजल का विकल्प खोजना कितना महंगा सौदा साबित हो सकता है, हालांकि ऐसा करना ही होगा. सुप्रीम कोर्ट के निर्देश को उन महानगरों में डीजल से चलने वाली कारों के अंत के रूप में देखा जा रहा है, जहां फैले धुंए, वायु प्रदूषण और फेफड़े की बीमारियों ने लोगों में डीजल के खिलाफ  एक आक्रोश भर दिया है. गौर तलब है कि अक्तूबर 2015 में भारत में डीजल की खपत 16 फीसदी बढ़कर 6.34 एमटी पर पहुंच गई, जो साल भर पहले 5.45 एमटी हुआ करती थी. यह अगस्त 2005 के बाद का अधिकतम मान है.

 दिल्ली की सड़कों पर रोजाना औसतन 50,000 डीजल टैक्सियां चलती हैं जो 10 लाख लीटर डीजल जलाती हैं.

इन पर प्रतिबंध जसवंत जैसे कई परिवारों की चूलें हिला देगा. इसमें 5.2 लाख निजी डीजल कारों को जोड़ लें तो समस्या की विकरालता का अंदाजा लग जाता है.

वाहन निर्माता कंपनियों की इस निर्देश को दी गई चुनौती पर सुप्रीम कोर्ट ने 5 जनवरी को उन्हें राहत देने से इनकार कर दिया और नई लग्जरी डीजल कारों पर प्रतिबंध को कायम रखा है.

यही नहीं, अदालत ने सरकार की पांच साल से ज्यादा पुरानी डीजल कारों के उपयोग की जरूरत पर सवाल खड़ा कर दिया और उन्हें भी सड़कों से हटाए जाने की जमीन तैयार कर दी.

ये सारे निर्देश हालांकि दिल्ली केंद्रित हैं, लेकिन वह दिन दूर नहीं जब दूसरे राज्य भी डीजल से होने वाले प्रदूषण को रोकने के लिए बड़े उपाए करने को बाध्य होंगे. देश के कुल पेट्रोलियम उपयोग में 2014-15 तक 40 फीसदी (70 एमटी) हिस्सेदारी रखने वाले डीजल का भविष्य आज धुंधलके में है.

यह स्थिति कैसे आई
पिछले एक दशक से डीजल के उपयोग के खिलाफ एक माहौल बनाया जा रहा था. सुप्रीम कोर्ट का निर्देश उसी की एक परिणति है. विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) से लेकर दिल्ली, कानपुर और मुंबई के भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों समेत कई संस्थाओं के सर्वेक्षणों में यह बात सामने आई है कि दिल्ली दुनिया का सर्वाधिक प्रदूषित शहर है.

दिल्ली का एक निवासी सालाना औसतन 153 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर पीएम 2.5 को अपने भीतर लेता है, जो सभी माप योग्य कणों में सबसे छोटा और सबसे नुक्सानदायक है. यह डब्ल्यूएचओ के औसत मानक का 15 गुना है जिससे कमजोर लोगों में श्वास संबंधी दिक्कतें, खासकर सर्दियों के दौरान, पैदा हो जाती हैं.

अध्ययन कहते हैं कि डीजल से होने वाला उत्सर्जन वाहनों से निकलने वाले प्रदूषक तत्वों में सबसे खराब है. डीजल वाहन बड़े पैमाने पर जानलेवा कण और नाइट्रोजन डाइऑक्साइड छोड़ते हैं जो दमा, ब्रोंकाइटिस, दिल के दौरे और बच्चों में विकास संबंधी विकारों से जुड़ा है. हालिया रिपोर्टें कहती हैं कि पेट्रोल इंजन की तुलना में डीजल चार गुना ज्यादा नाइट्रोजन डाइऑक्साइड और 22 गुना ज्यादा खतरनाक कण उत्सर्जित करता है, हालांकि यह 15 फीसदी कम कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ता है. इसके अलावा, डीजल में मौजूद सल्फर नामक धातु सल्फर डाइऑक्साइड का निर्माण करता है जो नाक, गले और सांस की नली में दिक्कत पैदा करता है जिससे खांसी, छींक और सांस की समस्या पैदा होती है.
 
 राष्ट्रीय राजधानी के कुल 127 प्रवेश बिंदुओं से रोजाना 1,15,945 डीजल चालित व्यावसायिक वाहन दिल्ली आते-जाते हैं.

अपने हाल के ऑर्डर में सुप्रीम कोर्ट ने जब दिल्ली में ट्रकों के अवैध प्रवेश को वर्जित किया, उससे पहले तक इन पर कोई रोक नहीं थी.

डीजल से देश में करीब 60 फीसदी कारें, ट्रक, बस और ट्रैक्टर चलते हैं.

कुल बिकने वाले डीजल का 28 फीसदी अकेले ट्रक खा जाते हैं, इसके बाद कारें और युटिलिटी वाहन मिलकर 21 फीसदी से ज्यादा डीजल का दोहन करते हैं, ट्रैक्टरों की 13 फीसदी हिस्सेदारी है और बसों की 10 फीसदी जबकि तिपहिया वाहन कुल डीजल का 6 फीसदी से कुछ ज्यादा इस्तेमाल करते हैं. खेती, घरों, दफ्तरों और दुकानों में जेनरेटरों के बाद डीजल का सबसे ज्यादा उपयोग रेलवे, विमानन, जहाज और मोबाइल टावरों में होता है. इन सभी से मिलकर होने वाला प्रदूषण जबरदस्त है.

कंपनियों को झटका
मर्सिडीज बेंज इंडिया, टोयोटा किर्लोस्कर और महिंद्रा ऐंड महिंद्रा (एमऐंडएम) जैसी कंपनियों जिनका अधिकांश कारोबार डीजल एसयूवी की बिक्री से आता है, के लिए सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश विनाशकारी झटके की तरह है. मारुति सुजुकी के चेयरमैन आर.सी. भार्गव कहते हैं, “यह ईंधन नीति के अभाव की ओर इशारा करता है. मान लीजिए कि इन्होंने सभी डीजल कारों को प्रतिबंधित करने का फैसला ले लिया, तो यह हम सभी पर भयंकर असर डालेगा.”

 उद्योग के जानकारों के मुताबिक, 2,000 सीसी या उससे ज्यादा क्षमता वाले इंजनों के डीजल वाहन देश में सालाना 4 लाख बेचे जाते हैं जिनमें 5 से 8 फीसदी बिक्री एनसीआर में होती है.

जिन मॉडलों पर सबसे ज्यादा मार पड़ेगी, उनमें एमऐंडएम का टीयूवी 300, एक्सयूवी 500 और स्कॉर्पियो, मारुति सुजुकी का एस क्रॉस, हुंडई का क्रेटा, रेनॉ का डस्टर और टोयोटा का इनोवा है.

एमऐंडएम के सारे कामयाब मॉडल डीजल से चलने वाले भारी एसयूवी हैं. जर्मनी की लग्जरी कार निर्माता कंपनी मर्सिडीज बेंज और टाटा मोटर्स के जेएलआर की समूची डीजल मॉडल रेंज ही 2000 सीसी से ज्यादा क्षमता की है.

सुप्रीम कोर्ट के आदेश को लेकर एमऐंडएम के चेयरमैन आनंद महिंद्रा काफी विनम्र दिखे. उन्होंने कहा, “मैं हमेशा से मानता रहा हूं कि सुप्रीम कोर्ट ऐसी संस्था है जो देश में सामाजिक न्याय और लोकतंत्र में हमारी आस्था को टिकाए रखती है. अगर हम यह मानते हैं कि डीजल वाहनों पर आया यह फैसला ठीक नहीं है, तब भी हम इसका सम्मान करेंगे और ऐसे वाहन बनाएंगे जो आदेश का अनुपालन करेंगे.” टोयोटा किर्लोस्कर मोटर के वाइस चेयरमैन विक्रम किर्लोस्कर इस मामले में ज्यादा सशंकित हैं. उनका कहना है कि “अधिकारियों को प्रदूषण फैलाने वाले कारकों का एक समग्र अध्ययन करना चाहिए, बजाए इसके कि अकेले ऑटो सेक्टर को निशाना बनाया जाए.”

क्या डीजल छोड़ सकते हैं?
भारत जैसे उभरते और सबसे तेजी से बढ़ते देश में डीजल के उपयोग में तेजी आनी ही है, क्योंकि यहां लंबी दूरियों के लिए खासकर भारी वाहन बनाए जाने हैं. “मेक इन इंडिया” कार्यक्रम के तहत उत्पादन क्षेत्र में अधिकतर गतिविधियां शहरों से दूर अंजाम दी जानी हैं. यह परिवहन की नई मांग को पैदा करता है जिससे डीजल की मांग अपने आप बढ़ जाती है. इसीलिए आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि सरकार ने यूरो ङ्क के चरण को पूरी तरह लांघते हुए अप्रैल 2020 से यूरो इकट्ठा उत्सर्जन मानक को लागू करने का निर्णय लिया है ताकि भविष्य के विकास को पर्यावरण के सरोकारों के अनुकूल बनाए रखा जा सके.

 जानकार यह भी कहते हैं कि प्रत्येक ईंधन श्रेणी के उत्सर्जन का अपना एक प्रोफाइल होता है जिसके अलग-अलग आयाम होते हैं. हर वाहन अलग-अलग प्रदूषक तत्व छोड़ता है.

पेट्रोल वाले वाहन डीजल के मुकाबले ज्यादा कार्बन मोनोऑक्साइड छोड़ते हैं जबकि डीजल वाहन पेट्रोल के मुकाबले ज्यादा पीएम10 उत्सर्जित करते हैं.

100 अरब डॉलर वाले टाटा समूह की इकाई टाटा मोटर्स में एडवांस्ड ऐंड प्रोडक्ट इंजीनियरिंग के प्रमुख टिम लेवर्टन कहते हैं, “डीजल से निकलने वाले कणों की पेट्रोल से तुलना ठीक नहीं है और इससे निष्कर्ष निकालना ठीक नहीं है.

इसी से भविष्य के उत्सर्जन संबंधी नियम अब कणों के द्रव्यमान की जगह कणों की संख्या के संदर्भ में तय किए जा रहे हैं.”

ऊर्जा की खपत के मामले में दुनिया में भारत चौथे स्थान पर आता है, लेकिन यहां प्रति व्यक्ति डीजल की खपत अब भी कम है (इसलिए यह ऊपर की ओर ही जा सकती है). देश के दूसरे सबसे बड़े पेट्रोलियम रिटेलर भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड के कार्यकारी निदेशक जॉर्ज पॉल कहते हैं, “भविष्य में डीजल ही राजमार्गों पर परिवहन का प्राथामिक ईंधन रहेगा, लेकिन शहरी ईंधन के बतौर उसकी मांग घटेगी.”

शहरी यातायात में अपनी जगह बनाए रखने का तरीका यही है कि जल्द से जल्द उत्सर्जन के मानकों का अनुपालन कर लिया जाए. इंदिरा गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ  डेवलपमेंट रिसर्च के संस्थापक निदेशक और एमेरिटस प्रोफेसर किरीट पारिख का प्रस्ताव है कि डीजल का दाम पेट्रोल से ज्यादा रखा जाए ताकि लोगों को उसका इस्तेमाल कार में करने की सहूलियत न हो.
 
अतीत का “चमत्कारिक” ईंधन
ईंधन के बतौर डीजल की शुरुआत की कहानी 1892 तक जाती है जब जर्मन वैज्ञानिक और आविष्कारक रूडोल्फ डीजल ने एक इंटर्नल कंबशन इंजन डिजाइन किया था जहां उच्च तापमान पर ईंधन को एक कंबशन चैंबर में जलाया जाता था जिससे इंजन चलता था. जलाने के मामले में आगामी वर्षों में डीजल को दूसरे ईंधनों के मुकाबले ज्यादा सक्षम माना गया जिससे 20 फीसदी बेहतर माइलेज मिलती थी और कार्बन डाइऑक्साइड भी कम निकलती थी जिसे ओजोन परत के क्षरण और जलवायु परिवर्तन का मुख्य खलनायक माना जाता रहा है.

 यूरोप में कठोर उत्सर्जन मानकों के चलते तेल रिफाइनरियों में डीजल के भीतर सल्फर की मात्रा को बहुत कम कर दिया गया है.

यूरोप में बेचे जाने वाली सभी कारों को नाइट्रोजन डाइऑक्साइड और अन्य प्रदूषक तत्वों के मामले में यूरो इकट्ठा मानक का अनुपालन करना होता है.

यह 1992 से वहां लागू उत्सर्जन नियंत्रण मानक में सर्वाधिक प्रगतिशील और हालिया है.

दुनियाभर में बिकने वाली कारों में 20 फीसदी डीजल कारें हैं. यह आंकड़ा दशकभर पहले तक एक अंक में था और लगातार बढ़ता जा रहा है. परिवहन में डीजल के उपयोग के मामले में भारत और यूरोप लगभग बराबरी पर हैं जहां सालभर में बिकने वाली आधी कारें डीजल की होती हैं. चीन, अमेरिका और जापान में हालांकि यह आंकड़ा 2 फीसदी से भी कम है क्योंकि वहां डीजल को गंदा ईंधन माना जाता है.

फॉक्सवैगन के प्रकरण ने डीजल को सरकारों और नियामकों के और कठोर नियंत्रण में ला दिया है. सितंबर 2015 में इस जर्मन कार निर्माता कंपनी ने माना था कि उसने एक करोड़ दस लाख डीजल चालित कारों में एक सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल करके उन्हें अमेरिकी उत्सर्जन मानकों के अनुकूल बनाया था.

इससे कंपनी के सीईओ मार्टिन विन्टरकॉर्न को इस्तीफा देना पड़ा था, घोटाला सामने आने के चार दिनों के भीतर कंपनी के शेयर मूल्य में 26 अरब डॉलर का घाटा हुआ और कुल नुक्सान 7.3 अरब डॉलर का हुआ था. इससे मानकों पर खरे उतरने वाले इंजन बनाने में कंपनियों पर संदेह हो गया है.

दूसरे खतरे
डीजल का सबसे ज्यादा इस्तेमाल हालांकि परिवहन में होता है लेकिन डीजल की श्रेणी के ईंधन (डिस्टिलेट क्रयूल ऑयल या गैस ऑयल) का प्रयोग कई कामों में किया जाता है. इनमें आवासीय और व्यावसायिक ऊष्मा, बिजली उत्पादन, खेती और औद्योगिक इस्तेमाल शामिल हैं. कारखानों और दफ्तरों में इस्तेमाल किए जाने वाले जेनरेटरों ने 2014 में 90,000 मेगावाट ऊर्जा पैदा की थी जो देशभर की उस वक्त मौजूद उत्पादन क्षमता का 36 फीसदी थी.

डीजल जेनरेटरों की बिक्री सालाना 10 फीसदी की दर से बढ़ रही है जो फिलहाल कुल 25 लाख हैं और 1.6 करोड़ किलोलीटर तेल सालाना पी रहे हैं. इसका एक बड़ा हिस्सा दिल्ली से आता है. रेलवे में ट्रकों और कारों के मुकाबले डीजल की खपत कम होती है. यह कुल खपत का मात्र 3.8 फीसदी है, लेकिन प्रदूषण के मामले में रेलवे की भूमिका काफी ज्यादा है क्योंकि वहां अब भी उत्सर्जन नियंत्रण मानक नहीं अपनाए जाते.

देश में 35 फीसदी से भी कम रूट बिजली चालित हैं (मार्च 2013 तक), इसलिए रेलवे इस मामले में डीजल की बड़ी खपत करता है.
देश में डीजल कारों की बिक्री में आई उछाल डीजल की कीमतों में सब्सिडी के कारण पैदा हुई जिसका आरंभिक उद्देश्य किसानों और कमजोर तबकों की मदद करना था लेकिन जिसकी परिणति धुंआ उगलने वाले एसयूवी, सेडान और हैचबैक कारों के बाजार में हुई. हर सरकार डीजल की कीमत बढ़ाने को लेकर लगातार सतर्क रही क्योंकि उसे मुद्रास्फीति पर उसके प्रभाव का डर था, जिसके चलते डीजल और पेट्रोल के दाम के बीच का फर्क बढ़ता ही गया.

इसी के चलते आज डीजल वाहनों को लोग तरजीह देने लगे हैं जिसे जानकार निजी मोटर परिवहन के “डिजलीकरण” का नाम देते हैं. मई 2014 के अंत तक दिल्ली में पेट्रोल के मुकाबले डीजल 32 रु. सस्ता था. यह अंतर बाद में कम होता गया जब डीजल की कीमतों को उसी साल अक्तूबर में विनियमित करके अंतरराष्ट्रीय बाजार के उतार-चढ़ाव के जिम्मे छोड़ दिया गया. इसका असर बिक्री पर भी दिखने लगा. कुल सवारी वाहनों में डीजल वाहनों की बिक्री 2014-15 में पिछले साल के मुकाबले 10 फीसदी घटकर 48 फीसदी पर आ गई.

विनियमन के बावजूद डीजल आज भी पेट्रोल से 14 रु. सस्ता है. दिल्ली और मुंबई में पेट्रोल की कीमत केंद्रीय व राज्य करों के चलते 60 रु. लीटर है. कई कंपनियों ने डीजल वाहनों की देश में मांग के चलते नए मॉडल बाजार में उतारे. भारत की सबसे बड़ी कार निर्माता कंपनी मारुति सुजुकी ने बीते 4-5 साल के दौरान डीजल वाहनों में नए निवेश किए हैं जबकि जापानी होंडा मोटर्स ने पहली बार भारत में अपनी डीजल कार लाने का फैसला किया है.

आगे का रास्ता
वाहनों से होने वाले प्रदूषण को रोकने के लिए भारत स्टेज इकट्ठा तक पहुंचना हालांकि निर्णायक कदम होगा, लेकिन उसके अनुकूल स्वच्छ डीजल की उपलब्धता अब तक नहीं हो सकी है. भार्गव कहते हैं, “हमारी सरकारी रिफाइनरियां अब तक कम सल्फर वाला डीजल पैदा करने के लायक नहीं हुई हैं.” सरकारी तेल रिटेलरों का कहना है कि वे नए मानकों के हिसाब से अपनी तैयारी कर रहे हैं.

सरकार के जनवरी 2016 की शुरुआत में नए मानकों की घोषणा से पहले पॉल ने कहा था, “ईंधन को अपग्रेड करने का काम आगे बढ़ रहा है.” यह काम आसान नहीं है. वे कहते हैं, “सरकार ने हमें लक्ष्य दिया है और हम उसका पालन करेंगे.” सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने कहा कि तेल कंपनियों को यूरो इकट्ठा अनुपालक ईंधन पैदा करने के लिए करीब 30,000 करोड़ रु. का निवेश करना होगा. जानकार कहते हैं कि यह कीमत यूरो इकट्ठा अपनाने के बाद होने वाले आर्थिक लाभ से बहुत कम है और इसीलिए इसके उत्पादन के लिए इतना बड़ा निवेश करना जायज है.

वाहन उद्योग हालांकि उतना आशावादी नहीं है. एमऐंडएम में ऑटो और फार्म सेक्टर के समूह निदेशक पवन गोयनका कहते हैं, “यह तकनीकी तौर पर व्यावहारिक नहीं है क्योंकि ईंधन समय के साथ उपलब्ध होना चाहिए. इसके अलावा वाहनों के पाट्र्स बनाने वाली कंपनियों के जानकारों का कहना है कि ऐसी छलांग (यूरो ङ्कढ्ढ में) वाहनों में सुरक्षा से समझौता साबित होगी.”

कंपनियों ने कसी कमर
दिल्ली में डीजल लग्जरी कारों पर लगे प्रतिबंध से निबटने के लिए कार कंपनियां नई योजनाएं बनाने में जुट गई हैं. एमऐंडएम अपने एसयूवी लाइनअप में ज्यादा पेट्रोल वेरिएंट देने की योजना बना रही है जबकि टाटा मोटर्स पेट्रोल सेग्मेंट में नई गाडिय़ां उतारने जा रही है. राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली में करीब 2,000 टैक्सियों का बेड़ा चलाने वाली फ्लीट टैक्सी ऑपरेटर मेरु कैब्स के सीईओ सिद्धार्थ पाहवा कहते हैं कि उन्होंने दिल्ली और मुंबई की अपनी सारी टैक्सियों को सीएनजी में बदल डाला है जो अन्य इधनों के मुकाबले 20 फीसदी कम नुक्सानदेह उत्सर्जन करता है. अब बेंगलूरू में टैक्सियों को सीएनजी पर लाने के लिए उनकी बात इंद्रप्रस्थ गैस के साथ हो रही है.

अब यह बात साफ  होती जा रही है कि डीजल का इस्तेमाल इस बात पर निर्भर करेगा कि देश कितनी जल्दी स्वच्छ ईंधन मानकों को अपना पाता है. भारत को अगर आर्थिक विकास और टिकाऊ भविष्य के बीच संतुलन साधना है तो वह स्वच्छ और हरित ईंधन मुहैया कराने की जिम्मेदारी से कदम पीछे नहीं हटा सकता.

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