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गफलत के शिकार हुए परवेज मुशर्रफ

अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं के बहकावे में पाकिस्तान लौटने का परवेज मुशर्रफ का दांव उल्टा पड़ गया है. अब उन पर चलेगा बेनजीर भुट्टो की हत्या की साजिश का मुकदमा.

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परवेज मुशर्रफ सोशल मीडिया (फेसबुक 'लाइक्स’ और ट्विटर प्रशंसकों) पर अपनी लोकप्रियता के नशे और अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं के बहकावे में उस देश में लौट आए जहां कभी उनकी हुकूमत थी. कार्यकर्ताओं ने उन्हें गुमराह किया कि जनता उनकी वापसी चाहती है.

इस गलतफहमी ने उन्हें हत्या के मुकदमे में कठघरे में ले जाकर खड़ा कर दिया. 20 अगस्त को रावलपिंडी में आतंकवाद निरोधक अदालत में मुशर्रफ  पर 27 दिसंबर, 2007 को पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो के कत्ल का इल्जाम लगाया गया. सरकारी वकील चौधरी अजहर ने बताया, ''मुशर्रफ पर हत्या, हत्या की अपराधिक साजिश और हत्या में मदद करने के इल्जाम लगाए गए हैं.”

अदालत ने इस्लामाबाद के बाहरी इलाके में चक शहजाद में मुशर्रफ के फार्महाउस को ही जेल बना दिया है. कहते हैं कि वे वहां चैन की जिंदगी बसर कर रहे हैं. वे टेलीविजन देखते हैं, अखबार पढ़ते हैं, सिगार पीते हैं, हर शाम स्कॉच के घूंट भरते हैं और सारी दुनिया से संपर्क में हैं. पाकिस्तान में सियासी कैदियों को इतना ऐशो-आराम कभी नसीब नहीं होता.

जनरल के पास वक्त भी बहुत है. इल्जाम तय होने का मतलब यह है कि अब मुकदमा शुरू होगा. उसे पूरा होने में बरसों लग जाएंगे और देखना यह होगा कि सरकार, अदालतें और फौज इसमें कितनी दिलचस्पी लेती हैं. आम तौर पर ऐसा नहीं होता कि किसी पूर्व राष्ट्रपति और वह भी पुराने फौजी तानाशाह को अपने हुकूमत के दौरान किए गए अपराधों के लिए कटघरे में खड़ा होना पड़े.

मुशर्रफ पर इल्जाम तय होना ठोस कार्रवाई की बजाए दिखावा ज्यादा लगता है. कुछ लोग मानते हैं कि इस दिसंबर में चीफ जस्टिस इफ्तिखार चौधरी के रिटायर होते ही मुशर्रफ का मुकदमा ठंडा हो जाएगा.

बेनजीर की हत्या के मामले में मुशर्रफ को सीधे दोषी साबित करना मुश्किल है. लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि उनकी हिफाजत को लेकर मुशर्रफ ने चूहे-बिल्ली का खेल खेला और ऐसा माहौल बना दिया कि उनकी जैसी खतरों में घिरी शख्सियत पर हमला हो गया.

पाकिस्तान में ह्यूमन राइट्स वॉच के डायरेक्टर अली दायान हसन का कहना है कि 18 अक्तूबर और 27 दिसंबर, 2007 के बीच उनका बेनजीर से लगातार संपर्क था. वे अपनी जान का खतरा जाहिर करती थीं और कहती थीं कि मुशर्रफ   सिक्यूरिटी या उसकी कमी को सियासी ब्लैकमेल के हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं.

मुशर्रफ का मानना था और वे आज भी अपनी पैदा की हुई इस गलतफहमी के शिकार हैं कि सिर्फ वे ही पाकिस्तान को 'बचा’ सकते हैं. कुछ लोग उन्हें भ्रमजाल में फंसा कहते हैं तो कुछ अहं का शिकार बताते हैं. लेकिन वे कितना भी दिखावा कर लें यह सच्चाई नहीं छिपा सकते कि वे मुसीबत में हैं.

इस साल 24 मार्च को जब वे निर्वासन से लौटे तो कुछ सौ लोग ही हवाई अड्डे पर स्वागत करने पहुंचे, जिसमें अधिकतर मीडिया के थे. जानकार बताते हैं कि वे अपनी पार्टी ऑल पाकिस्तान मुस्लिम लीग (एपीएमएल) से इस बात से खफा थे कि वह हजारों की भीड़ नहीं जुटा सकी.

अदालतों ने न सिर्फ 2013 में संसद का चुनाव लडऩे के उनके मंसूबों पर पानी फेरा बल्कि उन पर लगे तीनों इल्जामों में से हरेक के लिए उन्हें उम्र कैद की सजा हो सकती है.

लेकिन मानवाधिकार कार्यकर्ता और राजनैतिक समीक्षक मरवी सरमद मानती हैं कि मुशर्रफ  पर जो कुछ गुजर रही है वह उसके मुकाबले बहुत कम है जो कुछ उन्होंने पाकिस्तान के साथ किया है. दहशतगर्दी से लड़ाई के अपने दोहरे खेल से मुशर्रफ  ने देश को गर्त में धकेल दिया.

सरमद का यह भी कहना है कि उन्होंने एक तरफ आइएसआइ की अफगान विंग को खत्म किया और 2001-02 में सेना से तालिबान समर्थकों का सफाया किया तो दूसरी तरफ अपनी नौ साल की हुकूमत में कट्टर मजहबी ताकतों का समर्थन किया. सरमद का कहना है, ''उनका जवाल (पतन) पाकिस्तानी फौज की एमआइ (मिलिट्री इंटेलिजेंस) और आइएसआइ के बीच रस्साकशी का नतीजा था.”
वकील और मुशर्रफ की सियासी पार्टी के पूर्व सदस्य फवाद चौधरी का मानना है कि मुशर्रफ  पर चलाया गया मुकदमा कानून के सामने नहीं टिकेगा. बेनजीर की हत्या के मुकदमे में फवाद मुशर्रफ के वकील रह चुके हैं और उनके खिलाफ बताए जा रहे सबूत देख चुके हैं.

उनका कहना है, ''सच यह है कि मोहतरमा बेनजीर की हत्या तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) के सरगना बैतुल्ला महसूद के हुक्म पर हुई थी. यही गुट मुशर्रफ पर हमलों में भी शामिल था. इसलिए यह बात नहीं मानी जा सकती कि मुशर्रफ ने उन्हीं लोगों का साथ दिया जो उन्हें मारने की साजिश कर रहे थे.” उनके मुताबिक लोगों को सुरक्षा देना राष्ट्रपति की जिम्मेदारी नहीं है.

जब बेनजीर की पाकिस्तान पीपल्स पार्टी (पीपीपी) के बड़े नेताओं से संपर्क किया गया तो कोई भी रिकॉर्ड पर कुछ भी बताने को तैयार नहीं था. कुछ का कहना था कि पार्टी इस मुकदमे में एक पक्ष है लेकिन इसका उसकी नीति पर कोई असर नहीं पड़ा है.

इसमें कोई शक नहीं कि पीपीपी नेता बेनजीर के कातिलों को सजा मिलते देखना चाहेंगे. लेकिन ऐसा लगता है कि पार्टी चाहती है कि पाकिस्तान मुस्लिम लीग नवाज (पीएमएल-एन) की सरकार इस मुकदमे में कितना जोर लगाती है, अदालतें किस हद तक जाने को तैयार हैं और आखिरकार फौज क्या करती है. दरअसल फौज से कोई टक्कर नहीं लेना चाहता.

पीपीपी के नेता सिर उठाकर कुछ कहने को तैयार नहीं हैं. पार्टी ने अपनी हुकूमत के पांच बरसों में सबूत इकट्ठा करने का काम कर दिया है. इस बात की उम्मीद कम है कि पार्टी नवाज शरीफ  सरकार पर इस मुकदमे को आगे बढ़ाने के लिए कोई दबाव डालेगी क्योंकि अपनी हुकूमत में ही उसने ऐसा कुछ नहीं किया.

चुनाव प्रचार के दौरान शरीफ  ने कहा था कि अगर वे जीत गए तो मुशर्रफ पर अनुच्छेद 6 के तहत गद्दारी का मुकदमा चलाएंगे. अब वे सत्ता में हैं और जनता की नाराजगी के डर से वायदे से मुकर नहीं सकते. लेकिन जानकारों को लगता है कि शरीफ हुकूमत और फौज के रिश्तों में गैर-फौजी हुकूमत का पलड़ा भारी रखने में यकीन रखते हैं फिर भी वे मुशर्रफ के मामले में फौज से भिड़ेंगे तो बेवकूफी होगी.

पीएमएल-एन और पाकिस्तान की अदालतें जानती हैं कि फौज के अड़ जाने का नतीजा क्या हो सकता है. जनरल मुशर्रफ ने 1999 में शरीफ की सरकार का तख्ता पलटा था और 2007 में चीफ  जस्टिस इफ्तिखार चौधरी को बर्खास्त किया था.

बहुत से लोग पसोपेश में हैं कि मुशर्रफ की वापसी और उन पर चल रहे मुकदमों पर फौज का रुख क्या है. अब तक फौज ने चुप्पी साध रखी है लेकिन निजी तौर पर वह खुश नहीं है. मुशर्रफ के शागिर्द और मौजूदा आर्मी चीफ जनरल अशफाक परवेज कयानी ने मुशर्रफ के पाकिस्तान लौटने पर उनकी मां से कहा था कि अपने बेटे को वापस जाने के लिए मनाएं.

मुशर्रफ की जान को तो खतरा था ही साथ ही उनकी वापसी से राजनैतिक प्रक्रिया में दखल न देने की फौज की छवि को भी नुकसान हो सकता था. जनरल कयानी ने आर्मी चीफ बनने के बाद से यह छवि बनाई थी. ऐसी अफवाहें भी हैं कि मुकदमों की पैरवी करने वालों को ताकतवर हलकों से कहलवा दिया है कि वे हद पार न करें.

पीपीपी के अध्यक्ष बिलावल भुट्टो-जरदारी ने 20 अगस्त को ट्वीट किया था: ''मुख्य सरकारी वकील ने अपनी हत्या से पिछली रात बार में किसी से कहा था कि उनके पास मुशर्रफ  को फांसी पर लटकाने लायक पर्याप्त सबूत हैं. अगले दिन केयरटेकर सरकार ने उनकी सिक्यूरिटी वापस ले ली और उनकी हत्या हो गई.”

बिलावल का इशारा संघीय जांच एजेंसी के वकील चौधरी जुल्फिकार अली की तरफ है जिनकी मई, 2013 में हत्या हुई थी. राजनैतिक समीक्षक आयशा सिद्दिका का कहना है कि ईद से कुछ दिन पहले अदालत में आने पर मुशर्रफ पर पत्थर फेंकने वाले कुछ वकीलों को अगवा करके यातना दी गई. जब जजों को इसके बारे में बताया गया तो उन्होंने कुछ नहीं किया.

उनका कहना है, ''शायद फौज यह संदेश दे रही है कि अपनी हद पार मत करना.” सिद्दीका को लगता है कि जब सबूत पेश करने का वक्ïत आएगा तो कोई मुशर्रफ पर उंगली नहीं उठाएगा क्योंकि शायद सरकारी अफसर उनके खिलाफ गवाही न दें.

बहुत से लोगों का मानना है कि मुशर्रफ को पाकिस्तान से जाने दिया जाएगा. लेकिन कोई माफी या लिखित सौदा नहीं होगा. कैसी विडंबना है कि सऊदी अरब के जिस शाही खानदान ने 1999 में शरीफ को आजाद कराने के लिए मुशर्रफ से पैरवी की थी वही अब मुशर्रफ के लिए शरीफ से पैरवी कर रहा है. इसे कहते हैं कभी नाव गाड़ी पर तो कभी गाड़ी नाव पर.

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