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खास रपटः नाराज दलित

महाराष्ट्र में दलितों के भारी विरोध-प्रदर्शन ने राज्य में बढ़ी जातीय खाई को उजागर किया, राज्य और केंद्र की भाजपा सरकार के लिए भी मुश्किल

मंदार देवधर मंदार देवधर

जनवरी की पहली तारीख को जहां पूरा देश नए साल का जश्न मना रहा था, महाराष्ट्र में एक अलग ही पृष्ठभूमि तैयार की जा रही थी. पुणे के कोरेगांव भिमा में 'शौर्य दिवस' के सालाना आयोजन में शामिल होने जा रहे दलितों पर अचानक कथित तौर पर हमला किया गया. इससे साथ ही कोरेगांव भिमा सुर्खियों में आ गया और देशभर में इस हमले के खिलाफ विरोध-प्रदर्शनों का सिलसिला शुरू हो गया. 1 जनवरी को हर साल हजारों दलित कोरेगांव भिमा में बने स्मारक पर 1818 में पेशवा बाजीराव द्वितीय की सेना पर अंग्रेजी फौज के दलित सैनिकों की जीत को अपने गौरवशाली अतीत की याद के तौर पर मनाने जुटते हैं (देखें बॉक्स). महाराष्ट्र के नागपुर के निवासी और दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के शोध छात्र राहुल सोनपिंपले बताते हैं, ''दरअसल, सामाजिक बुराइयों के खिलाफ अपने पूर्वजों के संघर्ष के तौर पर दलित इस घटना को याद करते हैं कि कैसे उन्होंने अमानवीय पेशवा राज के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी.''

लेकिन इस बार ऐसा क्या हुआ कि इस आयोजन ने ही संघर्ष का रूप ले लिया? एक बड़े पुलिस अफसर का कहना है कि यह टकराव पहले से तैयार स्क्रिप्ट का हिस्सा नजर आता है. दरअसल, कोरेगांव भिमा के चार किमी के दायरे में दो प्रमुख जगहें हैं—तुलापुर और वढू. तुलापुर वह जगह है जहां मुगल बादशाह औरंगजेब ने मराठा नरेश सांभाजी को नौ दिनों तक अमानवीय यातनाएं देकर मार डाला था. दलित मानते हैं कि उनके समुदाय के एक सदस्य गणपत गायकवाड़ ने छत्रपति संभाजी के शव के टुकड़े इकट्ठा किए और पूरे सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया था. 2013 मे कुछ स्थानीय लोगों ने मराठा नरेश की गरिमा की रक्षा के लिए गणपत गायकवाड़ के सम्मान में वधु में गायकवाड़ की समाधि का निर्माण करवा दिया था.

मुसीबत तब शुरू हुई जब कुछ असामाजिक तत्वों ने 30 दिसंबर 2017 को वधु स्थित गायकवाड़ की समाधि की छत को तोड़-फोड़ दिया.

उसके बाद सोशल मीडिया पर संदेश वायरल किए जाने लगे कि समाधि को नुक्सान पहुंचाने के लिए कड़े अत्याचार कानून के तहत सात मराठा युवाओं को गिरफ्तार किया गया है. 1 जनवरी को जब भीमा कोरेगांव में लड़ाई की 200वीं सालगिरह के मौके पर सालाना आयोजन के लिए अब तक की रिकॉर्ड तादाद में करीब 3.5 लाख दलित इकट्ठा हुए, तब कुछ असमाजिक तत्वों ने उनके वाहनों में तोड़-फोड़ की, औरतों पर हमले किए और 150 के आसपास वाहनों में आग लगा दी. इसके कुछ ही समय बाद नजदीक की सनसवाड़ी नाम की जगह पर अज्ञात लोगों ने एक मराठा युवक राहुल फाटनगड़े की पीट-पीटकर हत्या कर दी. नतीजतन दलितों और मराठों के बीच तनाव बढ़ गया.

जनवरी की 2 और 3 तारीख को जब दलितों ने पूरे महाराष्ट्र में विरोध-प्रदर्शन किए और सरकारी बसों में आग लगा दी और ट्रैफिक को तितर-बितर कर दिया, तब वे न केवल अपने समुदाय के सदस्यों पर हुए हमले के खिलाफ आक्रोश का इजहार कर रहे थे, बल्कि राज्य में जातिगत ध्रुवीकरण की तरफ भी इशारा कर रहे थे. दलितों के मन में जहां दरकिनार किए जाने की भावना घर करती जा रही है, वहीं सियासी मोर्चे पर भी उन्होंने राज्य में खुद को अलग-थलग पाया है.

सियासी जानकार मानते हैं कि यह मामला दलितों के मन में लंबे वक्त से खदबदाते आक्रोश को जाहिर करने की शुरुआत भर है. करीब डेढ़ साल पहले मराठों ने राज्य भर में आक्रामक ढंग से 57 विशाल रैलियां निकालकर अहमदनगर के कोपर्डी में एक मराठा किशोरी के साथ बलात्कार करने वाले तीन दलित युवाओं को फांसी पर चढ़ाने और समुदाय को तालीम के साथ-साथ सरकारी नौकरियों में आरक्षण देने की मांग पर जोर दिया था. उस समय भी दलितों में असंतोष था. कोपर्डी के मामले में विशेष अदालत ने 29 नवंबर को मुजरिमों को मौत की सजा सुनाई थी. दूसरी तरफ, एक अन्य अदालत ने एक दलित युवा नितिन आगे की हत्या के आरोपी आठ मराठा युवकों को बरी कर दिया था. आगे को कथित तौर पर एक मराठा लड़की के साथ प्रेम संबंध रखने की वजह से मार डाला गया था. राज्य भर के दलितों ने अदालत के फैसले के खिलाफ अपनी नाराजगी जाहिर की थी. वे चाहते हैं कि सरकार निचली अदालत के फैसले को चुनौती दे, जिसे सरकार ने मान लिया है, पर अभी तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया है.

वहीं राष्ट्रीय अपराध रिकॉड्र्स ब्यूरो के मुताबिक, राज्य में दलितों के खिलाफ किए अपराध में सजा की दर महज 10.5 फीसदी है. जाने-माने दलित लेखक और दलित पैंथर्स के संस्थापक जे.वी. पवार कहते हैं, ''ताजातरीन विरोध प्रदर्शन दबी हुई भावनाओं का मिला-जुला असर है. दलितों को खैरलांजी की घटना के बाद से ही नजरअंदाज किया जा रहा है. ताजा विरोध-प्रदर्शनों ने उनमें नई जान फूंक दी है.''

हालांकि भारिप बहुजन महासंघ (बीबीएम) के नेता प्रकाश आंबेडकर कहना है कि इस घटना को जातीय दृष्टिकोण से नहीं देखा जाना चाहिए. वे इसके लिए कथित हिंदुत्ववादी संगठनों को जिम्मेदार ठहराते हैं. उन्होंने इस घटना के पीछे शिव प्रतिष्ठान के संस्थापक मनोहर उर्फ संभाजी भिडे और हिंदू एकता अघाड़ी के प्रमुख मिलिंद एकबोटे का हाथ होने का आरोप लगाया है. सोनपिंपले भी भीमा कोरेगांव की घटना को मराठा बनाम दलित नहीं मानते. वे कहते हैं, ''यह घटना अगर मराठा बनाम दलित होता तो अब तक राज्य भर में दंगे हो जाते क्योंकि मराठा वहां बड़ा समुदाय है.

यहां कुछ मराठा संगठन तो इस मसले पर दलितों के साथ हैं.'' इससे पहले राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के अध्यक्ष और महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री शरद पवार ने भी कहा कि इस हमले के पीछे हिंदुत्ववादी संगठनों का हाथ है. शरद पवार तथा कांग्रेस ने इसके लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा को जिम्मेदार ठहराया है. हालांकि मुख्यमंत्री देवेंद्र फडऩवीस ने लोगों से अपील की कि कुछ लोग राज्य में जातीय तनाव निर्मित करने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं महाराष्ट्र में आरएसएस के सभी चार प्रांत संघचालकों ने एक संयुक्त बयान जारी करके समाज से सामाजिक सौहार्द बनाए रखने की अपील की और उन लोगों के प्रचार के बहाकावे में नहीं आने के लिए कहा ''जो समाज में फूट डालने को आमादा'' हैं.

महाराष्ट्र के दलित सामाजिक और सियासी मोर्चों पर ऐतिहासिक तौर पर एकजुट नहीं रहे हैं. राज्य में उनकी खासी बड़ी 12 फीसदी आबादी है. 46 विधानसभा क्षेत्रों और 10 लोकसभा क्षेत्रों में उनका दबदबा है, पर वे कभी किसी एक सियासी पार्टी के पीछे खड़े नहीं हुए. दलितों में भी ज्यादा बड़ा हिस्सा महारों का है और उनके बाद चमार, मातंग, ढोर और वडार आते हैं. हालांकि दलितों के भीतर अलग-अलग धड़ों में कोई आपसी टकराव नहीं है. ज्यादातर महारों ने बौद्ध धर्म अपना लिया है और वे सियासी मोर्चों पर बंटे हुए हैं. कांग्रेस ने हमेशा मातंग नेताओं को महारों से ज्यादा बढ़ावा दिया और इस तरह महारों को दूसरे विकल्पों की तलाश के लिए मजबूर कर दिया.

जमीनी हकीकत पिछले दशक से बदलती आ रही है. पहले दलितों का खिंचाव शिवसेना की तरफ था और उन्हें उसकी लड़ाका फितरत खूब रास आती थी. बीते दो-एक साल में दलितों के कुछ हिस्सों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली भाजपा के प्रति रुख किया. दलित उद्यमियों से प्राथमिकता के आधार पर सामान खरीदने की केंद्र सरकार की योजना ने और 20 फीसदी औद्योगिक जमीनें दलितों के लिए आरक्षित करने की राज्य सरकार की योजना ने समुदाय को भाजपा की तरफ आकर्षित किया. नतीजा यह हुआ कि मराठा जब आरक्षण की मांग को लेकर विशाल रैलियां निकाल रहे थे, दलित मजबूती से भाजपा के पीछे खड़े थे और उन्होंने नगर निकायों के साथ ग्राम पंचायतों के चुनावों में नंबर एक पार्टी के तौर पर उभरने में भाजपा की मदद की थी. शहरी इलाकों तक महदूद भाजपा को बीते दो साल में ग्रामीण इलाकों में अपने पंख फैलाने में दलितों और अन्य पिछड़ा वर्गों (ओबीसी) ने ही मदद की है.

सियासी जानकार मानते हैं कि एनसीपी के अध्यक्ष शरद पवार ने दलितों का मिजाज ज्यादा चतुराई से भांप लिया था. वे उन्हें भाजपा के नजदीक जाने से रोकने के लिए मौके की तलाश में थे. कोरेगांव भिमा की घटना ने उन्हें जरूरी असलहा मुहैया करा दिया. इसलिए उन्होंने फौरन ऐलान किया कि कोरेगांव भिमा में दलितों पर हमले के पीछे हिंदुत्ववादी ताकतें हैं. इस तरह उन्होंने एक ही पत्थर से दो शिकार किए. उन्होंने हमलों की जिम्मेदारी आरएसएसपर डालने की कोशिश की और यह पक्का कर दिया कि दलितों के आक्रोश का रुख मराठों से हटकर भाजपा की तरफ हो जाए.

इस उथलपुथल से भरी सियासी हालत से बेदाग बच निकलने की भाजपा की उम्मीदें राज्य के दलित नेता और केंद्रीय सामाजिक न्याय राज्यमंत्री रामदास अठावले के समर्थन पर टिकी हैं, जिनकी भारतीय रिपब्लिकन पार्टी एनडीए में शामिल है. इससे राज्य में एक दलित चेहरा नहीं जुटा पाने की भाजपा की नाकामी भी सामने आती है. पार्टी ने चार प्रमुख दलितों—पत्रकार सुनील गायकवाड़ और अमर साबले, फिल्मकार शरद बनसोडे और अर्थशास्त्री नरेंद्र जाधव—को जरूर आगे बढ़ाया, पर उनमें से कोई भी पार्टी के दलित चेहरे के तौर पर उभरने में नाकाम रहा. मुख्यमंत्री फडऩवीस मराठों के खिलाफ दलितों और ओबीसी को खड़ा करके उनकी नाराजगी को काबू करने में कामयाब रहे थे. अब जब दलित तोड़-फोड़ पर उतारू हैं, फडऩवीस की सियासी पैंतरेबाजी की एक बार फिर अग्निपरीक्षा होगी.

इस पूरे अफसाने ने प्रकाश आंबेडकर को मजबूत किया है. वे समुदाय की हमदर्दी हासिल करने में कामयाब रहे. इससे पहले दलितों का बड़ा तबका अठावले के पीछे एकजुट होता रहा है. हालांकि आंबेडकर यह भी मानते हैं कि दलितों और मराठों के बीच खाई आने वाले दिनों में और चौड़ी हो सकती है. वैसे आंबेडकर 'गलत' लोगों के साथ हाथ मिलाकर अपनी साख गंवाने के आदी हैं. गुजरात के विधायक जिग्नेश मेवाणी और जवाहरल लाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्र नेता उमर खालिद को साथ लेकर भाजपा-विरोधी मोर्चा बनाने की उनकी मंशा का समुदाय के लोगों में अच्छा असर नहीं हुआ है. प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ता सुनील खोबरागड़े कहते हैं, ''बाहरी नेताओं को अगर हमारे ऊपर थोपा गया, तो हम बर्दाश्त नहीं करेंगे.''

उधर, भाजपा के लिए मुश्किल यह है कि राष्ट्रीय स्तर पर भी दलितों के खिलाफ घटनाओं ने सरकार के खिलाफ दलितों को नाराज किया है. हाल ही में संपन्न हुए गुजरात विधानसभा चुनाव में भी उना कांड के बाद से ही दलितों पर अत्याचार का मसला उठता रहा है और मेवाणी सरीखे भाजपा-विरोध चेहरे उभरे हैं. इससे पहले हैदराबाद विश्वविद्यालय के छात्र रोहित वेमुला और उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में दलितों पर हमले तथा भीम आर्मी के चंद्रशेखर के मसले पर भी केंद्र की भाजपा सरकार को दलितों की ओर से भारी विरोध का सामना करना पड़ा है. कांग्रेस के साथ मिलकर मेवाणी ने जिस तरह भाजपा के खिलाफ मोर्चाबंदी की है, ऐसी कोशिशें अन्य राज्यों में भी हो सकती हैं.

खासकर राजस्थान जैसे उन राज्यों में जहां इस साल विधानसभा चुनाव होने हैं. यह इस वजह से भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि 2019 में लोकसभा चुनाव होंगे तो दलितों को अपने-अपने पाले में करने की कोशिशें तेज हो जाएंगी. आंबेडकर स्टुडेंट्स एसोसिएशन के डोंटा प्रशांत कहते हैं, ''महाराष्ट्र में दलितों के इस आंदोलन का गहरा प्रभाव तो पड़ेगा ही, साथ ही देशभर में इसका असर होगा. इसको लेकर देशभर में हुए विरोध-प्रदर्शन इसका संकेत दे देते हैं. दलितों में इन घटनाओं से राज्य सरकार के अलावा केंद्र की मोदी सरकार से भी नाराजगी है.'' ऐसे में भाजपा के लिए दलितों के आक्रोश पर पानी डालना बेहद जरूरी है.

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