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केरलः मंदिर बना मरघट

परंपरा के नाम पर आतिशबाजी से हुए भयावह विस्फोट में 113 जानें चली गईं और रातोरात दक्षिणी केरल का एक मंदिर और उसके रखवाले कानून को धता बताकर सुरक्षा से खिलवाड़ करने की मिसाल बने.

राजधानी तिरुवनंतपुरम से करीब 70 किमी. दूर कोल्लम के पास पारावुर में 500 साल पुराना पुत्तिंगल देवी मंदिर भले केरल के प्रसिद्ध मंदिरों में न गिना जाता हो, लेकिन वहां वार्षिक उत्सव के आखिरी दिन होने वाली आतिशबाजी स्पर्धा की हमेशा से दूर-दूर तक चर्चा होती रही है. स्थानीय लोग और खासकर दक्षिण केरल के उत्सवप्रेमी इसे देखने को उतावले रहते हैं.

लेकिन इस साल 9 अप्रैल को पौ फटने से पहले ही सब कुछ बरबाद हो गया. तड़के 3.11 बजे जब मंदिर प्रांगण में स्पर्धा अंतिम चरण में थी, तभी एक पटाखे से निकली चिनगारियां पटाखों से भरे कमरे में जा गिरीं और देखते-देखते भारी विस्फोट से वह इमारत मलबे में तब्दील हो गई. हादसे में 113 लोगों की जान चली गई और 350 लोग बुरी तरह घायल हो गए. मंदिर की छत के परखचे उड़ गए और आसपास के घर भी क्षतिग्रस्त हो गए.

पुलिस के मुताबिक, पटाखे जलाने की स्पर्धा में जुटीं दो टीमों ने करीब डेढ़ मीट्रिक टन विस्फोटकों का इस्तेमाल किया था. गनीमत यह थी कि करीब 80 प्रतिशत पटाखे हादसा होने से पहले इस्तेमाल किए जा चुके थे. एक टीम के 'उस्ताद पटाखेबाज' पारावूर कृष्णनकुट्टी की इस दुर्घटना में मौत हो गई. एक स्थानीय व्यापारी मोहनन नायर ने इंडिया टुडे को बताया, ''उन्हें पटाखे बनाने और जलाने का करीब 40 वर्ष का अनुभव था. ज्यादातर बड़े मंदिरों में त्यौहारों के समय आतिशबाजी के लिए वे मशहूर थे.''

यहां, जनवरी के अंत से अप्रैल-मई तक चलने वाले त्योहारों के मौसम में करीब 253 मंदिरों के अलावा गिरजाघरों में भी आतिशबाजी के शो होते हैं. त्योहारों के जानकार नंदकुमार मेनन कहते हैं, ''पुत्तिंगल देवी का उत्सव यहां के चार बड़े त्योहारों में माना जाता है. इसके अलावा नेनमारा वेल्लांगी वेला, त्रिशुर पूरम और मराडू मंदिरों के त्योहार भी शानदार आतिशबाजी के लिए मशहूर हैं. पहले भी यहां कई छोटे और बड़े हादसे हो चुके हैं.'' इनसे ''धार्मिक भावनाएं'' जुड़ी होती हैं, इसलिए आयोजकों के खिलाफ कार्रवाई नहीं की जाती है, जबकि सुप्रीम कोर्ट और हाइकोर्ट की ओर से इस बारे में कई बार निर्देश दिए जा चुके हैं.

राज्य की पुलिस के पूर्व डीजीपी जैकब पुन्नूस कहते हैं, ''दुर्भाग्य से हम हादसों को बहुत जल्दी भुला देते हैं और गलतियां दोहराते रहते हैं. आतिशबाजी के शो के लिए विस्फोटकों के इस्तेमाल पर निगरानी रखने की कोई व्यवस्था नहीं है. त्योहारों के समय इस्तेमाल होने वाले विस्फोटकों के ऑडिट की कोई व्यवस्था क्यों नहीं है?''

आतिशबाजी उद्योग की समीक्षा की आखिरी कोशिश पांच साल पहले राजनैतिक दबाव में छोड़ दी गई. इसकी शुरुआत पुलिस की इस आशंका से हुई थी कि पटाखा उद्योग से आसानी से आतंकवादियों को विस्फोटक हासिल हो सकते हैं.

केरल पुलिस ने 2011 में डीजीपी जैकब पुन्नूस के तहत एक विस्फोटक शाखा का गठन किया. अतिरिक्त डीजीपी की अगुआई में 15 सदस्यों की टीम बनाई गई जिसकी पटाखा उद्योग और विस्फोटकों के भंडार का डाटाबेस तैयार करने की जिम्मेदारी थी. उम्मन चांडी की सरकार ने दबाव डालकर इस शाखा को भंग करवा दिया और डाटाबेस नष्ट कर दिया गया. न्यायिक आयोगों की सिफारिशों के मुताबिक, पटाखा उद्योग की निगरानी की कई कोशिशों में यह एक कोशिश थी.

सरकार अति ज्वलनशील प्रतिबंधित पोटेशियम क्लोरेट की तस्करी पर भी आंख मूंदे रही. जांचकर्ताओं के मुताबिक, कोल्लम के आतिशबाजी उद्योग में इसका इस्तेमाल होता है.  इस सफेद पाउडर की तस्करी चीन से तमिलनाडु के जरिए की जाती है और पटाखा बनाने वाले अधिक शोर और चिनगारियों के लिए इसका इस्तेमाल करते हैं.

जिला मजिस्ट्रेट ने माचिस के कई कारखानों का लाइसेंस कारखानों और इस्तेमाल किए जाने वाले रसायनों की पड़ताल के बिना ही नए सिरे से जारी कर दिया. पटाखा उद्योग जांच से बचने के लिए स्थानीय पुलिस को कथित तौर पर रिश्वत खिलाता है.

राहत कार्य में राज्य मशीनरी सक्रिय थी लेकिन पुत्तिंगल हादसे के बाद कोल्लम में आइएएस और आइपीएस अधिकारियों के बीच जबानी जंग शुरू हो गई. रविवार को, हादसे वाले दिन, दिन में करीब 10 बजे सरकार ने दस्तावेज जारी कर सफाई दी कि स्पर्धा की अनुमति नहीं दी गई थी. मुख्यमंत्री उम्मन चांडी ने मंदिर समिति पर आरोप लगाया कि प्रशासन की मनाही के बावजूद उसने स्पर्धा करवाई. इससे पुलिस अधिकारी बचाव की मुद्रा में आ गए. अगले दिन कोल्लम की जिला कलेक्टर ए. शाइनामोल ने पुलिस को नोटिस भेजकर नगर आयुक्तत पी. प्रकाश से जवाब मांगा कि अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट के आदेश का पालन क्यों नहीं किया गया.

मंदिर के प्रांगण के निकट रहने वाली 80 वर्षीया पंकजाक्षी आनंदन ने इस स्पर्धा को अनुमति दिए जाने के खिलाफ याचिका दाखिल की थी. उन्होंने इंडिया टुडे को बताया, ''मैं 2 अप्रैल को जिला कलेक्टर से मिली थी. हर साल आतिशबाजी के कारण मेरे मकान को नुक्सान पहुंचता है. मैं दिल की मरीज हूं. भारी शोर या धुआं बर्दाश्त नहीं कर पाती.'' उन्होंने यह भी बताया कि मंदिर समिति ने उन्हें धमकाया था कि ''अगर मैंने इस बारे में बात बढ़ाई तो उसका घातक नतीजा होगा...मैं डर गई क्योंकि वे यहां के बहुत प्रभावशाली लोग हैं.''

उत्सव आयोजन समिति ने स्थानीय प्रशासन पर राजनैतिक दबाव भी डलवाया. श्रम मंत्री शिबू बेबी जॉन, जो कोल्लम के रहने वाले हैं, ने भी इस मामले में कलेक्टर से बात की थी. फिर, समिति ने जिला कलेक्टर शाइनामोल और अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट ए. शाहनवाज (दोनों गैर-हिंदू) के खिलाफ जबानी अभियान शुरू किया, जिसका सार यह था कि ये अधिकारी ''मंदिर की परंपरा और रीति-रिवाजों के प्रति संवेदनशील नहीं हैं.''

विपक्ष के नेता वी.एस. अच्युतानंदन ने हादसे के लिए नेताओं को जिम्मेदार ठहराया. उन्होंने कहा, ''यह बिल्कुल साफ है कि अनुमति देने के लिए पुलिस पर दबाव डाला गया.'' पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने इंडिया टुडे से कहा कि ''आखिरी मौके पर इस आयोजन को रोकना नामुमकिन था. वहां करीब 40,000 लोगों की भीड़ जमा थी...कोई कार्रवाई की जाती तो भारी हिंसा हो सकती थी.''

इस बीच कई दिनों तक फरार रहने के बाद मंदिर समिति के सात पदाधिकारियों ने 12 अप्रैल को पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया. एक प्रत्यक्षदर्शी एम. मोहनदास कहते हैं कि इस साल की आतिशबाजी सबसे अच्छी थी. वे बताते हैं, ''हम सभी शो का पूरा आनंद ले रहे थे, लेकिन हमने कभी नहीं सोचा था कि इसमें इतना बड़ा खतरा हो सकता है.'' वे इस बात से खुश हैं कि देवी ने उनकी जिंदगी बख्श दी. लेकिन अहम सवाल यह है कि धर्मस्थलों पर सुरक्षा की जिम्मेदारी गैर-जिम्मेदार लोगों पर कब तक छोड़ी जाती रहेगी?

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