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हम कभी जान पाएंगे कोविड से कितने मरे?

भारत में कोविड से हुई मौतों पर डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट सरकारी आंकड़े को बहुत कम बताती है, पर दोनों पक्षों की दलीलों के बीच एक सच सामने आ गया कि डेटा में पारदर्शिता और सटीकता की घोर कमी है.

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मौत की लहर: प्रयागराज के पास 20 मई, 2021 को गंगा के किनारे श्मशान घाट पर उथली कब्रें मौत की लहर: प्रयागराज के पास 20 मई, 2021 को गंगा के किनारे श्मशान घाट पर उथली कब्रें

यह शायद सोचा भी नहीं जा सकता कि मौत सरीखी कठोर और अकाट्य सच्चाई को लेकर व्यावहारिक अनुभव में इतनी अनिश्चितता हो सकती है. मगर ठीक ऐसी ही एक चीज को लेकर भारत घनघोर बहस के केंद्र में है, जिसमें विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) भारत में कोविड-19 से हुई मौतों का सरकारी आंकड़े से करीब 10 गुना ज्यादा अनुमान पेश कर रहा है.

बेहतर से बेहतर वक्त में भी सरकारी आंकड़ों में शक-सुबहा होता ही है, पर कोविड तो खास तौर पर संवेदनशील विषय है—मौतों को कम बताने की वैश्विक प्रवृत्ति से भारत भी बचा नहीं है. मगर यहां खींचतान अंतत: आंकड़ों के दो सेट को लेकर है, जिनसे एक बुनियादी सवाल का जवाब नहीं मिलता और वह है—क्या हम कभी जान भी पाएंगे कि महामारी से कितने लोग मारे गए?

मुख्य बहस तरीके को लेकर है. कोविड से हुई मौतों का भारत का आधिकारिक आंकड़ा 2021 के आखिर तक 4,81,000 था. डब्ल्यूएचओ ने 5 मई को आंकड़े जारी किए जिनमें 47.4 लाख मौतें बताईं. पहली कोविड से हुई दर्ज वास्तविक मौतों की गिनती है. दूसरी तरफ डब्ल्यूएचओ 'अतिरिक्त मौतों’ की रूपरेखा के जरिए अपने अनुमान पर पहुंचा.

अतिरिक्त मौतों को औसत 'ऑल कॉज डेथ’(सभी कारणों से हुई मौतें)—यानी एक निश्चित समय में कुल जितनी मौतें होना अपेक्षित है—और महामारी के दौरान हुई मौतों का अंतर बताया गया. यानी वे उलटे सामान्य अनुमान से शुरू करके दूसरे अनुमान पर पहुंचे, जो गलती की संभावना से मुक्त तरीका तो नहीं ही है. लेकिन भारत के जोरदार विरोध के बावजूद अपने सामान्य अनुमान में यह शायद पूरी तरह असंगत भी नहीं है.

डब्ल्यूएचओ ने पाया कि, कोविड की मौतें 2020 के बाद के छह महीनों में तेजी से बढ़नी शुरू हुईं और भारत की आधी से ज्यादा अतिरिक्त मौतें (27,21,643) डेल्टा की मारक लहर के दौरान अप्रैल-जून 2021 में हुईं. सबूत के तौर पर नदी किनारे उपेक्षित लाशों की तस्वीरों को किंवदंती मान भी लें, तो उन्होंने एक अनिवार्य सच्चाई बयान की है. जीते-जागते इतिहास में यह भारत का बदतरीन स्वास्थ्य संकट था और मौतों की सुनामी के तले व्यवस्था लगभग पूरी तरह ध्वस्त हो गई. ऐसे में यह सोचना गलत नहीं है कि आंकड़े भी ऑक्सीजन की कमी से कराह रहे थे.

डब्ल्यूएचओ का आंकड़ा बेशक सभी अतिरिक्त मौतों का है, यानी वे जो सीधे कोविड से हुईं जो कोविड से भड़की दूसरी बीमारियों से हुईं और गैर-कोविड मरीजों की मौतें जिन्होंने इलाज नहीं मिलने से दम तोड़ दिया. दूसरी श्रेणी कुछ ज्यादा पेचीदा है, क्योंकि कहा जाता है कि सरकारें मौत के आंकड़े कम रखने के लिए आम तौर पर उन्हें गैर-कोविड मौतों के तौर पर दर्ज कर रही थीं. सभी कारणों से हुई मौतों पर विचार करते हुए हाथ की सफाई की संभावना खत्म हो जाती है. हालांकि इसे सटीक आंकड़े के तौर पर पेश नहीं किया गया, पर यह महामारी को मापने का पैमाना तो देता ही है.’’

रिपोर्ट दिसंबर 2021 में तैयार हो गई थी, पर भारत की आपत्तियों के कारण रोककर रखी गई. सरकार ने फरवरी 2021 में संयुक्त राष्ट्र सांख्यिकी आयोग से एक बयान में कहा, ''भारत को लगता है कि यह प्रक्रिया न तो सहयोगात्मक है और न ही पर्याप्त प्रातिनिधिक है.’’

रिपोर्ट प्रकाशित करने से पहले ज्यादा विश्लेषण और मॉडल की जांच-पड़ताल की गई. भारत सरकार कतई कायल नहीं थी. एम्स के डायरेक्टर डॉ. रणदीप गुलेरिया कहते हैं, ''डेटा संदिग्ध है और मीडिया रिपोर्टों तथा अपुष्ट स्रोतों पर आधारित है. (वह) वैज्ञानिक रूप से सही नहीं है, खासकर जब आपके पास जोरदार आधिकारिक डेटा है.’’

डेटा का एक सेट जो दांव पर लगा है, वह भारत के महापंजीयक (आरजीआइ) की नागरिक पंजीकरण प्रणाली (सीआरएस) का डेटा है, जो राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की ओर से प्रस्तुत सभी पंजीकृत मौतों की संख्या के आधार पर वार्षिक रिपोर्ट में प्रकाशित किया जाता है. 3 मई को प्रकाशित 2020 की रिपोर्ट में 81 लाख मौतें बताई गईं, जो पिछले साल से छह फीसद ज्यादा और 4,74,806 अतिरिक्त मौतें हैं. मगर डब्ल्यूएचओ इस आंकड़े के 8,20,000 होने का अनुमान जताता है. उस दौरान कोविड से हुई सरकारी मौतें कितनी थीं? महज 1,49,000.
 
भारत में अतिरिक्त मौतों की गिनती के लिए डब्ल्यूएचओ की ओर से प्रयुक्त एक मॉडल में ग्लोबल हेल्थ एस्टीमेट (जीएचई) 2019 (मौत और अक्षमता का क्षेत्रवार और देशवार डेटा) के इस्तेमाल पर भारत को एतराज है. केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के एक सूत्र कहते हैं, ''वैज्ञानिकों और डॉक्टरों को कोविड से होने वाली मौतों की संभावना के बारे में अब भी पता नहीं है.

(ऐसे में) कोई मॉडल इस बीमारी से लोगों के मरने की संभावना के बारे में पूर्वानुमान कैसे लगा सकता है, खासकर जब यह जीएचई सरीखे एक और अनुमान पर आधारित है?’’डब्ल्यूएचओ मौतों का अनुमान लगाने के लिए टेस्ट पॉजिटिव दर का भी इस्तेमाल करता है जो भारत के अनुसार गलतियों की अंतर्निहित संभावना की वजह से पुख्ता आधार नहीं है.

डेटा का अभाव

मगर मौत के हमारे आधिकारिक आंकड़े के साथ एक दिक्कत यह है कि सभी मौतें पंजीकृत नहीं होतीं, जैसे अमेरिका और ब्रिटेन में होती हैं. मंत्रालय 2020 में भारत में 99.9 फीसद मौतों के पंजीकृत होने का दावा करता है (हालांकि न्यूज रिपोर्ट उस साल तेलंगाना, उत्तर प्रदेश, दिल्ली और उत्तराखंड सरीखे राज्यों में पंजीकरण में गिरावट की तरफ इशारा करती हैं).

यह 2019 के 92 फीसद और 2018 के 84.6 फीसद से अहम उछाल है और इस तरह सरकार 2019-20 में 4,75,000 अतिरिक्त मौतों के सीआरएस के आंकड़े को ज्यादा प्रामाणिकता देने की कोशिश कर रही है. नीति आयोग के सदस्य डॉ वी.के. पॉल कहते हैं, ''उससे पिछले साल हमारे यहां 7,00,000 अतिरिक्त मौतें हुई थीं. देश के वास्तविक डेटा पर विचार किए बिना मॉडल के आधार पर की गई कवायदें बेमतलब हैं.’’

डब्ल्यूएचओ की तरफ से जवाब दिए जा रहे हैं, हालांकि अभी ये आधिकारिक नहीं हैं. यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ में बायोस्टेटिस्टिक्स के प्रोफेसर और मौतों के अतिरिक्त आंकड़ों की समीक्षा के लिए डब्ल्यूएचओ में सलाहकार भ्रमर मुखर्जी कहती हैं, ''विज्ञान का जवाब विज्ञान से देना चाहिए. सरकार को अपना पूरा राष्ट्रीय डेटा सार्वजनिक करना चाहिए और अपने वैकल्पिक अनुमान बताने चाहिए.’’

डब्ल्यूएचओ के तकनीकी सलाहकार समूह के सदस्य जॉन वेकफील्ड एक पेपर का अंश सामने रखते हुए इस तथ्य का हवाला देते हैं कि अनुमान ''भारत के आंकड़ों पर आधारित’’ हैं. पेपर कहता है कि डब्ल्यूएचओ को ''36 में से महज 17 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों का डेटा सुलभ’’ था, जो ''या तो आधिकारिक रिपोर्टों के माध्यमों से सीधा राज्यों की तरफ से बताया गया था’’ या उन पत्रकारों की ओर से दिया गया था जिन्होंने आरटीआइ के जरिए आधिकारिक जानकारी हासिल की थी.

खुद सीआरएस का डेटा यह भी बताता है कि मौतों का पंजीकरण विभिन्न राज्यों में भी बमुश्किल ही एकसमान है—तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, हरियाणा, आंध्र प्रदेश, गोवा, ओडिशा और पंजाब में 100 फीसद पंजीकरण है, जबकि मणिपुर में केवल 21 फीसद, नगालैंड में 30 फीसद, उत्तर प्रदेश में 63.3 फीसद और बिहार में 51.6 फीसद है.

यही नहीं, मौतों का 90 फीसद पंजीकरण करने वाले महज 11 राज्य ही यह डेटा मौत के 21 दिनों के भीतर उपलब्ध करवाते हैं. इसलिए कोविड की मौतों के आंकड़े अब भी कई राज्यों में अपडेट किए जा रहे हैं—अकेले केरल ने अप्रैल 2021 के आंकड़ों में 21,000 नई मौतें जोड़ी हैं. 
 
डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट भारत में कोविड से हुई मौतों का पहला स्वतंत्र आकलन नहीं है जो देश के आधिकारिक आंकड़े को कम बताता है. कम से कम पांच मुद्रण-पूर्व और समीक्षा-पूर्व अध्ययन, जिनमें साइंस और प्लोस वन सरीखी पत्रिकाओं में प्रकाशित अध्ययन भी हैं जो 2021 के मध्य तक ऐसी मौतों को 30 लाख से ज्यादा आंकते हैं.

एक अनुमान तो 45 लाख तक पहुंच गया. इन सभी अनुमानों में सीआरएस के डेटा पर भरोसा किया गया. भारत में मौतों की गणना के चार प्रमुख स्रोत हैं—सीआरएस, नमूना पंजीकरण प्रणाली (एसआरएस) और दशकीय जनगणना तथा राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे (एनएफएचएस) के आधार पर प्रत्यक्ष अनुमान.

एसआरएस, जो भारत में जनसांख्यिकी संकेतकों का बड़ा स्रोत है, जन्म और मृत्यु की दोहरी रिकॉ‌र्डिंग की प्रणाली पर आधारित है, जिसमें नमूने के तौर पर कुछ गांवों और शहरी हिस्सों में मैदानी जांच-पड़ताल से आंकड़े जुटाए जाते हैं और फिर उनके आधार पर पूरे देश के आंकड़े निकाले जाते हैं. 2020 के लिए एसआरएस की अगली रिपोर्ट यह पक्का पता लगाने का एक तरीका हो सकती है कि भारत में कोविड की मौतों को कम गिना गया है या नहीं.

जो भी हो, इस बहस से एक चिंता उभरती है और वह है डेटा का अभाव. यह भारत के लिए अहम सबक है—केवल महामारी के ओर-छोर का पता लगाने के लिए ही नहीं बल्कि स्वास्थ्य के सभी संकेतकों और बीमारियों के खिलाफ तैयारी के लिए भी. जाने-माने वायरस वैज्ञानिक टी. जैकब जॉन कहते हैं, ''डेटा सटीक भी होना चाहिए और पारदर्शी भी.’’

यह महामारी भारत के लिए एक ऐसी प्रणाली लाने का संकेत है जिसमें मौतों के आंकड़े संपूर्णता में और कारणों के ब्योरों के साथ जुटाए जाएं. फिलहाल पंजीकरण के दौरान मौत का कारण कभी दर्ज नहीं किया जाता, जो बुनियादी कमजोरी है. ऐसे में एआइडीएएन (ऑल इंडिया ड्रग ऐक्शन नेटवर्क) की सह-संयोजक और जन स्वास्थ्य विशेषज्ञ मालिनी असोला पते की बात कहती हैं, ''अगर हम कमजोरियों से आंख न चुराएं तो स्वास्थ्य प्रणाली में सुधार किया जा सकता है.’’ 

—सोनाली आचार्जी

 

‘‘विज्ञान का जवाब विज्ञान से देना चाहिए. सरकार को अपना पूरा राष्ट्रीय डेटा सार्वजनिक करना चाहिए और अपने वैकल्पिक अनुमान बताने चाहिए ’’
भ्रमर मुखर्जी, प्रोफेसर, बायोस्टेटिस्टिक्स, यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन स्कूल
ऑफ पब्लिक हेल्थ, डब्ल्यूएचओ की सलाहकार.

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