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खास रपटः थम गए पहिये

कोविड-19 ने ओला-उबर कार मालिकों-ड्राइवरों की कमर तोड़ दी. कमाई हो नहीं रही, ईएमआइ न भर पाने से गाडिय़ां भी उठी जा रहीं. हालात जल्द सुधरने के आसार नहीं

कब लौटेंगे अच्छे दिन? महामारी के चलते ओला-उबर टैक्सियों को मिलने वाली सवारियों में भारी कमी आई कब लौटेंगे अच्छे दिन? महामारी के चलते ओला-उबर टैक्सियों को मिलने वाली सवारियों में भारी कमी आई

देश की राजधानी दिल्ली से यही कोई 1,600 किलोमीटर दूर, हैदराबाद के नेरेदमेट इलाके में रहने वाली 38 वर्षीय डंडू लक्ष्मी के परिवार पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा है. कोरोना महामारी ने पहली लहर में पिछले साल उनके पति को निगल लिया था. दो साल पहले तक लक्ष्मी भी अपने पति के साथ चौकीदारी करती थीं. लेकिन बच्चों का भविष्य संवारने और परिवार की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए 2019 में अपनी जमा पूंजी तोड़कर उन्होंने एक टैक्सी खरीदी. देश के मेट्रो शहरों में उस समय ओला-उबर की सफल कहानियां चारों ओर चर्चा का विषय थीं. लक्ष्मी ने भी अपनी महिंद्रा जायलो को उबर के साथ अटैच कर दिया. काम चल निकला और महीने में 10,000 रुपए कमाने वाली लक्ष्मी 2,000 रुपए रोज कमाने लगीं. लेकिन किसे पता था कि उनकी खुशियों की उम्र बहुत कम है. कोरोना के कहर ने सब-कुछ तबाह कर दिया.

लक्ष्मी अपनी आपबीती सुनाती हैं, ''छह महीने ही ठीक से काम चल पाया था कि तब तक कोविड फैलने लगा और लॉकडाउन लग गया. सब-कुछ ठीक हो जाएगा, इस उम्मीद में पति के मरने के बाद गहने तक गिरवी रखकर गाड़ी की किस्तें चुकाईं. लेकिन उम्मीदें लॉकडाउन से छोटी पड़ गईं. आमदनी ठप हुई तो कर्ज की किस्तें टूटने लगीं. अब फाइनेंस कंपनी वाले रोज फोन कर रहे हैं, किसी भी दिन गाड़ी उठाने आ जाएंगे.'' लक्ष्मी फिर वही गुर्बत वाली जिंदगी जीने के लिए मजबूर हैं.

खास रपटः थम गए पहिये
खास रपटः थम गए पहिये

खुद राजधानी दिल्ली का ही हाल कौन-सा बहुत अच्छा है. यहां के कृष्णा नगर में रहने वाले 38 वर्षीय मनीष भल्ला को भी फाइनेंस कंपनी वालों की तरफ से अल्टीमेटम मिल चुका है कि जल्द से जल्द दो किस्तें जमा कर दी जाएं वर्ना अपनी वैगन आर से वे जल्दी ही हाथ धो बैठेंगे. लक्ष्मी और मनीष की ही तरह, ओला-उबर के जरिए अपना जीवनयापन कर रहे देश के हजारों टैक्सी ड्राइवर अब आजीविका के लिए संघर्ष कर रहे हैं.

सबका एक जैसा हाल

कोविड के असर से इन ड्राइवरों की कमाई को तो पलीता लगा ही, जो थोड़ी-बहुत खीसे में थी, उससे घर का खर्च चलाना ही मुश्किल है, किस्त भरने की तो बात ही छोड़िए. हालात जो भी हों, कर्जे की जहां तीन से चार किस्तें टूटीं, बस गाड़ी खिचने-खिचाने की बात शुरू हो जाती है. देशभर में हजारों टैक्सी चालक संक्रमण की चपेट में आए सो अलग. इस तरह के टैक्सी मालिकों, चालकों की बेचारगी का अंदाजा आप तथ्यों से भी लगा सकते हैं. कर्नाटक स्थित ओला-उबर ड्राइवर्स ऐंड ओनर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष तनवीर पाशा की माने तो पिछले साल लॉकडाउन के बाद तकरीबन 16,000 से 18,000 वाहन सीज हुए. लॉकडाउन खुला भी तो कस्टमर उतनी तादाद में सड़कों पर नहीं आए. वापसी अभी पूरी तरह हो भी नहीं पाई थी कि कोरोना की दूसरी लहर ने फिर जैसे अपना रोलर चला दिया. पाशा का अंदाज है कि ''आने वाले कुछ दिनों में देशभर में 25,000 से 30,000 वाहन और सीज होने के लिए तैयार हैं.''

पिछले साल लॉकडाउन में सरकार ने कर्ज की किस्त पर मॉरेटोरियम दिया था, लेकिन इस बार ऐसी कोई राहत नहीं दी गई. एसोसिएशन के आंकड़ों के मुताबिक, बेंगलूरू शहर में कुल 2,75,000 टैक्सियां हैं. इनमें से करीब एक-तिहाई यानी 80,000—90,000 ओला और उबर के साथ अटैच हैं. पाशा को अंदेशा है कि लॉकडाउन पूरा खुलने के बाद भी फ्लीट की संख्या में बड़े पैमाने पर गिरावट आएगी.

इंडियन फेडरेशन ऑफ ऐप बेस्ड ट्रांसपोर्ट वर्कर्स (आइफैट) के जनरल सेक्रेटरी शेख सलाउद्दीन बातचीत में हैदराबाद शहर की नजीर पेश करते हुए कहते हैं, ''रोज 8 से 10 गाड़ियां सीज की जा रही हैं. कोविड से पहले हैदराबाद में 1.25 लाख टैक्सियां चल रही थीं. लॉकडाउन खुलने के बाद भी अभी करीब 37,000 टैक्सियां ही सड़कों पर उतरी हैं.'' कैब चलाने वाले ज्यादातर ड्राइवर किसी शहर के आस-पास के गांव-कस्बों से आते हैं, जो लॉकडाउन में अपने घर लौट गए. आइफैट की ओर से देश के पांच प्रमुख शहरों—दिल्ली, मुंबई, चेन्नै, हैदराबाद और बेंगलूरू—में ड्राइवरों के बीच एक सर्वे जारी है.

18 जून तक सर्वे में हिस्सा लेने वाले करीब 500 ड्राइवरों में से 62 फीसद से ज्यादा ऐसे थे जिनके वाहन बैंक, एनबीएफसी या फाइनेंस कंपनियों की ओर से सीज किए जा चुके हैं. सलाउद्दीन कहते हैं, ''कंपनियां भी किसी ठोस मदद के साथ आगे नहीं आईं. ओला ने तो लीज पर दिए हुए वाहन सैनिटाइजेशन के बहाने मंगवाकर वापस ही नहीं दिए, अब ड्राइवरों से सेटलमेंट करने के लिए कंपनी की ओर से मैसेज आ रहे हैं.''

पिछली बार सरकार की ओर से मोरेटोरियम, कर्ज की रीस्ट्रक्चरिंग जैसे विकल्प दिए गए थे. इस बार ऐसा कुछ नहीं. सलाउद्दीन यहां एक और पहलू जोड़ते हैं, ''ओला ने टैक्स, कमिशन हमसे लिया और ड्राइवरों को उनके हाल पर छोड़कर दान पीएम केयर्स और चीफ मिनिस्टर रिलीफ फंड में दे दिया.'' ओला के जिम्मेदार अधिकारियों ने इस बारे में पूछे गए सवालों के जवाब देने से से मना कर दिया और ई-मेल से भेजे गए सवालों का भी कोई जवाब नहीं दिया.

दिल्ली की सर्वोदय ड्राइवर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष कमलजीत गिल कहते हैं, ''प्रधानमंत्री की अपील पर हमने ताली-थाली सब बजाया, बंदी में टैक्सी भी नहीं चलाई. अब जब कमाई ही नहीं है तो किस्त कहां से दें? लॉकडाउन खुलने के बाद पहले की तुलना में आधा भी काम नहीं मिल रहा. उसमें भी कमिशन, सीएनजी और पेट्रोल का खर्च, मेंटेनेस देना है. इसके बाद ईएमआइ बिना सुचारु कमाई के कैसे चुकाई जाएगी?'' एसोसिएशन की मांग है कि ईएमआइ को कम से कम 12 महीनों के लिए आगे बढ़ा दिया जाए और इस अवधि का ब्याज भी माफ किया जाए. ऐसा नहीं किया गया तो देशभर में हजारों की संख्या में लोग बेरोजगार हो जाएंगे.

दूसरी लहर का कहर

साल 2021 की शुरुआत ओला और उबर जैसी राइड हेलिंग (मोबाइल ऐप्लिकेशन आधारित टैक्सी सेवाएं प्रदान करने वाली) कंपनियों के लिए डूबे हुए व्यापार में वापसी की उम्मीद लेकर आई. कोविड से जुड़े प्रोटोकॉल (सैनिटाइजेशन, टेम्प्रेचर चेक करना, ड्राइवर और सवारी के बीच पार्टिशन आदि) का पालन करते हुए टैक्सी ड्राइवर और कंपनियां फिर से खड़े होने की कोशिश कर ही रहे थे कि दूसरी लहर का ग्रहण लग गया. अप्रैल और मई में पूरी तरह बंद रहने के बाद जून से दिसंबर 2020 के दौरान कंपनियों के कारोबार में कुछ वापसी दिखी थी.

मार्केट रिसर्च फर्म रेडसीर कंसल्टेंसी की ओर से जारी रिपोर्ट के मुताबिक, कोविड से पहले देश में कैब की कुल 6.6 करोड़ राइड्स होती थीं, जो मार्च 2021 में करीब 60 फीसदी वापसी के साथ 4 करोड़ राइड्स तक पहुंच गई थीं (देखें ग्राफिक्स). लेकिन कोविड की दूसरी लहर के कारण लगे लॉकडाउन में इस वापसी को 30 से 40 फीसदी का झटका लगने का अनुमान है.

रेडसीन कंसल्टेंसी के एंगेजमेंट मैनेजर संजय कोठारी कहते हैं, ''दूसरी लहर के थमने के बाद एक बार फिर पिछली बार की तरह वापसी दिखने की पूरी उम्मीद है. तेजी से टीकाकरण होने की स्थिति में वापसी की रफ्तार पिछली बार से तेज हो सकती है. हालांकि कोरोना की तीसरी लहर की आशंका इस वापसी के लिए मुश्किलें पैदा कर सकती है.'' कैब कंपनियों के साथ कितने ड्राइवर रह जाएंगे इसका जवाब देते हुए कोठारी कहते हैं, ''कोविड से पहले हर माह 5 से 8 फीसद ड्राइवर प्लेटफॉर्म छोड़ रहे थे. हालांकि नए ड्राइवरों के जुड़ने की रफ्तार भी लगभग यही थी इसलिए कुल ड्राइवरों की संख्या में कोई कमी नहीं दिखती थी.'' कोविड की बाद स्थिति क्या होगी, इसके लिए अभी के आंकड़ों को देखना जल्दबाजी होगी क्योंकि अभी भी न तो लॉकडाउन पूरी तरह खुला है और न ही लोगों ने कोविड से पहले की तरह यात्राएं शुरू की हैं.

कर्ज डूबने की चिंता

केवल टैक्सी कंपनियां ही नहीं कोविड के असर से तमाम ऐसे कारोबार में कर्ज डूबने की आशंका गहरी है, जिनका व्यापार लॉकडाउन में बुरी तरह प्रभावित हुआ है. आइसीआइसीआइ सिक्योरिटीज की ओर से 11 जून को जारी रिपोर्ट के मुताबिक, सभी तरह के वाहन कर्ज की वापसी (कलेक्शन एफिशिएंसी) में 15 से 25 फीसद की कमी आई है. ये आंकड़े मध्य तिमाही में कुछ फाइनेंसर और बाजार के हितधारकों से मिले फीडबैक पर आधारित हैं.  
बैंक, एनबीएफसी और माइक्रो फाइनेंस कंपनियों के कर्ज डूबने की आशंका उनकी बैलेंसशीट से भी झलकने लगी है. मिसाल के लिए बंधन बैंक को लिया जा सकता है. मार्च में खत्म हुई तिमाही में बैंक का मुनाफा 80 फीसदी गिरकर 103.03 करोड़ रुपए रह गया. इसकी वजह कर्ज डूबने की आशंका के चलते बैंक की ओर से किए गए प्रावधान (प्रोविजनिंग) थे. वित्त वर्ष 2021 की चौथी तिमाही में बैंक का कुल डूबते खाते (एनपीए) का कर्ज 5.33 फीसदी से बढ़कर 6.81 फीसदी हो गया. भारतीय रिजर्व बैंक ने सितंबर 2021 तक सिस्टम में एनपीए बढ़कर 13.5 फीसदी हो जाने की आशंका जाहिर की थी, सितंबर 2020 में यह आंकड़ा 7.5 फीसदी का था.

एस्कॉर्ट सिक्योरिटीज के हेड (रिसर्च) आसिफ इकबाल कहते हैं, ''रिजर्व बैंक की ओर से दिए गए मोरेटोरियम को अगस्त तक बढ़ा दिया गया था. साथ ही लोन रिस्ट्रक्चरिंग के कारण अभी एनपीए की सही तस्वीर बैंकों और एनबीएफसी की बैलेंसशीट में नहीं झलक रही है.'' वित्त वर्ष 2022 में कुल एनपीए 15 फीसद तक पहुंच सकता है. सबसे ज्यादा असर गैर जरूरी वस्तुओं के कारोबार से जुड़े क्षेत्रों में देखने को मिलेगा क्योंकि लॉकडाउन में इन सेक्टर्स पर सबसे ज्यादा प्रतिबंध थे. इनमें होटल, रेस्टोरेंट, टैक्सी, टुरिज्म, कंस्ट्रक्शन, उड्डयन आदि क्षेत्र शामिल हैं.

वे दिन लौटेंगे?

क्या लक्ष्मी जैसे परिवारों के लिए कोविड से पहले जैसे दिन वापस लौटेंगे? क्या देश के बड़े शहरों में आसानी से एक क्लिक पर ओला-उबर की टैक्सी मिलने लगेगी? और क्या फिर से ओला-उबर की सफल कहानियां गांव से शहर आने वाले कामगारों को स्वरोजगार के लिए आकर्षित कर पाएंगी?

मौजूदा समय में मिल रहे संकेत तो फिलहाल ऐसे भविष्य की ओर इशारा नहीं कर रहे हैं. वजह है कोविड का असर लंबे समय तक रहना. तनवीर पाशा कहते हैं, ''ड्राइवरों के लिए उनकी गाड़ी ही रोजी रोटी का साधन है. पुरानी गाड़ी सीज हो जाने की स्थिति में वे पूरी तरह बाहर हो जाएंगे.'' ईएमआइ न देने की स्थिति में अगर गाड़ी सीज होती है तो ड्राइवर और मालिक जिसके नाम पर भी कर्ज है उसका सिबिल स्कोर बुरी तरह खराब होता है. ऐसे में संगठित क्षेत्र से नई गाड़ी के लिए भी कर्ज नहीं मिलेगा.

इसके अलावा ऐसे निवेशक जो गाड़ी खरीदकर ओला-उबर में चलवाते थे वे कोविड की तीसरी लहर के खतरे के चलते नए निवेश से परहेज करेंगे. इस समस्या को कंपनियों के प्रबंधक भी अच्छी तरह पहचान रहे हैं. वित्त वर्ष 2022 की पहली तिमाही में कंपनी के नतीजे जारी करते हुए उबर के सीईओ दारा खुसरोशाही ने कहा था कि भारत में कोविड के मामले तेजी से बढऩे के कारण कारोबार बुरी तरह प्रभावित हुआ है. अब कंपनी की पहली प्राथमिकता उन ड्राइवरों को वापस लाने की होगी जिन्होंने लॉकडाउन या सुरक्षा कारणों से प्लेटफॉर्म को छोड़ा था.

कोविड के बाद तौर-तरीके भी बदल रहे हैं. कैलिबर बिजनेस सपोर्ट सर्विस के चेयरमैन और प्रबंध निदेशक नारायण भार्गव कहते हैं, कोविड के बाद यातायात थम गया. ऐसे में बड़ी संख्या में कैब ड्राइवर बेरोजगार हो गए. कोविड के बाद कुछ नए ट्रेंड सामने आ रहे हैं. मसलन, बड़ी कंपनियां अब बिना थर्ड पार्टी के सीधे ड्राइवरों से प्रति राइड के आधार पर कॉन्ट्रैक्ट कर रही हैं. यह ट्रेंड ड्राइवरों को लंबी शिक्रट और कमिशन से बचाएगा. ऐसे में वे किसी कंपनी के साथ अटैच होने से बेहतर ऐसी संभावनाओं को तलाशेंगे.

एक अनुमान के मुताबिक, बड़े शहरों में ओला-उबर के 40 से 50 फीसद ग्राहक आइटी सेवाएं देने वाली कंपनियों से हैं. लॉकडाउन खुलने के बाद भी इन कंपनियों के लिए वर्क फ्रॉम होम जल्दी खत्म होता नहीं दिखता. ऐसे में दोबारा पहले जैसी रफ्तार पकड़ने में ओला-उबर को लंबा वक्त लग सकता है.

कोविड की पहली लहर थमने के बाद हुई वापसी में कैब की तुलना में आटो और बाइक टैक्सी की रिकवरी की रफ्तार ज्यादा तेजी दिखी (देखें ग्राफिक्स). कोविड के बाद के दिनों में बंद कारों के मुकाबले ज्यादा खुले ऑटो और बाइक्स यात्रियों की पसंद बने. ऐसे में ओला और उबर की तुलना में ड्राइवरों को बाइक टैक्सी वाली कंपनियां मसलन, रैपिडो, यूलू, वोगो और बाउंस ज्यादा आकर्षित कर सकती हैं. यहां निवेश भी ओला-उबर की तुलना में काफी कम है.

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