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कोर्ट की चौखट पर पहुंचता रहा ज्ञानवापी विवाद

याचिका में भारत संघ, उत्तर प्रदेश सरकार, वाराणसी के जिलाधिकारी और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड, अंजुमन इंतजामिया मस्जिद और काशी विश्वनाथ मंदिर ट्रस्ट को प्रतिवादी बनाया गया है. प्रकरण कोर्ट में लंबित है.

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 वाराणसी में ज्ञानवापी परिसर को लेकर सबसे पहला मुकदमा 1936 में दीन मोहम्मद बनाम सेक्रेटरी ऑफ स्टेट का था. अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश बनारस की कोर्ट में याचिका दायर कर दीन मोहम्मद नामक व्यक्ति ने ज्ञानवापी मस्जिद और उसकी आसपास की जमीनों पर अपना हक जताया था. तब अदालत ने इसे मस्जि‍द की जमीन मामने से इनकार कर दिया. इसके बाद दीन मोहम्मद ने इलाहाबाद हाइकोर्ट में अपील की.

1937 में हाइकोर्ट ने मस्जिद के ढांचे को छोड़कर बाकी सभी जमीनों पर वाराणसी के व्यास परिवार का हक बताया और उनके पक्ष में फैसला दिया. बनारस के तत्कालीन कलेक्टर का नक्शा भी इसी फैसले का हिस्सा बना, जिसमें ज्ञानवापी मस्जिद के तहखाने का मालिकाना हक व्यास परिवार को दिया गया. तब से व्यास परिवार ही प्रशासन की अनुमति से तहखाने की देखरेख करता आया है.

 1937 से 1991 तक ज्ञानवापी परिसर को लेकर दोनों पक्षों में कोई विवाद नहीं हुआ. 15 अक्तूबर, 1991 में ज्ञानवापी परिसर में नए मंदिर निर्माण और पूजा पाठ के अधिकार को लेकर पं. सोमनाथ व्यास, डॉ. रामरंग शर्मा और अन्य ने सिविल जज (सीनियर डिविजन) वाराणसी की अदालत में वाद दायर किया. मस्जिद की देखरेख करने वाली अंजुमन इंतजामिया म‌स्जिद को प्रतिवादी बनाया गया.

कोर्ट ने बहस के बाद दावा चलने का आदेश दिया. इसके विरोध में दोनों पक्षों ने सिविल रिवीजन जिला जज, वाराणसी की कोर्ट में दाखिल किया. अदालत ने सिविल जज के निर्णय को निरस्त कर दिया और पूरे परिसर का विस्तृत साक्ष्य जुटाने का आदेश दिया. निर्णय के खिलाफ अंजुमन इंतजामिया मसाजिद और यूपी सुन्नी वक्फ बोर्ड ने हाइकोर्ट में याचिकाएं दायर कीं. 13 अगस्त, 1998 को हाइकोर्ट ने जिला जज के फैसले पर रोक लगा दी. 

 पंडित सोमनाथ व्यास की 7 मार्च, 2000 को मृत्यु हो गई. इसी दौरान सुप्रीम कोर्ट ने एक आदेश में कहा था कि स्थगन आदेश छह माह बाद खुद खारिज हो जाएंगे. अदालत ने 11 अक्तूबर, 2018 को पूर्व जिला शासकीय अधिवक्ता (सिविल) विजय शंकर रस्तोगी को वाद मित्र नियुक्त किया.

रस्तोगी ने सिविल जज (सीनियर डिविजन फास्ट ट्रैक) की अदालत में मूल वाद से अलग प्रार्थनापत्र देकर अयोध्या की भांति ज्ञानवापी परिसर और कथित विवादित स्थल का भारतीय सर्वेक्षण विभाग से रडार तकनीकी से सर्वे कराने की अपील की. 8 अप्रैल, 2021 को सिविल जज (सीनियर डिविजन फास्ट ट्रैक) आशुतोष तिवारी की अदालत ने अपील मंजूर की. आदेश के खिलाफ सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड और अंजुमन इंतजामिया मसाजिद ने हाइकोर्ट में याचिका दायर की. सुनवाई 16 मई को होगी.

 शृंगार गौरी और आदि विश्वेश्वर का वाद मित्र बताते हुए 18 फरवरी, 2021 को रंजना अग्निहोत्री और जितेंद्र सिंह समेत आठ लोगों ने सिविल जज (सीनियर डिविजन) की कोर्ट में याचिका दायर कर अपील की कि आदि विश्वेश्वर पांच कोस के दायरे में अवमुक्त क्षेत्र है. यह भी कहा गया कि काशी विश्वनाथ अधिनियम—1983 पुराने मंदिर में मौजूद ज्योतिर्लिंग और आदि विश्वेश्वर के अस्तित्व को मान्यता देता है.

इसलिए काशी विश्वनाथ मंदिर के न्यासी मंडल को देवी गंगा, हनुमान, गणेश, नंदी और आदि विश्वेश्वर के साथ मां शृंगार गौरी के उपासक देवी-देवताओं की पूजा बहाल करने का निर्देश दिया जाए. याचिका में भारत संघ, उत्तर प्रदेश सरकार, वाराणसी के जिलाधिकारी और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड, अंजुमन इंतजामिया मस्जिद और काशी विश्वनाथ मंदिर ट्रस्ट को प्रतिवादी बनाया गया है. प्रकरण कोर्ट में लंबित है.

 वाराणसी के सिविल जज (सीनियर डिविजन) की अदालत में 19 मार्च, 2021 को एक मुकदमा महाराष्ट्र के सुरेश चह्वाण ने खुद को मां गंगा का वाद मित्र बताते हुए दायर किया है. याचिका में कहा गया है कि आदि विश्वेश्वर मेरे आराध्य देव हैं, उनकी पूजा और जल अर्पित करने का अधिकार दिया जाए जो सदियों से होता आ रहा है. अदालत में यूनियन ऑफ इंडिया, उत्तर प्रदेश सरकार, सेंट्रल सुन्नी वक्फ बोर्ड, अंजुमन इंतजामिया मस्जिद, डीएम वाराणसी और काशी विश्वनाथ ट्रस्ट को पक्षकार बनाया गया है. 

2021 में ही दिल्ली निवासी सत्यम त्रिपाठी की ओर से सिविल जज (सीनियर डिविजन) की अदालत में दाखि‍ल वाद में कहा गया कि बाबा विश्वनाथ का मूल स्थल आदि विश्वेश्वर कथित ज्ञानवापी मस्जिद के परिसर में है. याचिका में मांग की गई कि पूरे ज्ञानवापी परिसर को आदि विश्वेश्वर श्री काशी विश्वनाथ को सौंप देना चाहिए, जिससे भव्य मंदिर का निर्माण सुनिश्चित हो सके. ये सभी प्रकरण कोर्ट में लंबित हैं.

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