scorecardresearch
 

कोरोना का दीर्घकालिक असर

मरीज के टेस्ट नेगेटिव आने के बाद भी इस बीमारी के लक्षण बने रह सकते हैं, ‌लिहाजा स्ट्रोक, दिल का दौरा और किडनी की क्षति के जोखिम को बचाने के लिए निरंतर सावधानी और देखभाल जरूरी है

पंकज नांगिया पंकज नांगिया

लक्ष्मी जैन के पिता की कहानी कोविड-19 को लेकर हमारी कुछ बदतरीन आशंकाओं की तस्दीक करती है. यह आशंका कि इस वायरल संक्रमण के असर जांच के नतीजे नेगेटिव आने के बाद भी बने रह सकते हैं. 41 वर्षीय जैन के पिता ने मुंबई के अस्पताल में कोविड के तीव्र संक्रमण का इलाज करवाया और ठीक होकर घर लौटे तो परिवार ने चैन की सांस ली. मगर पांच दिन के भीतर उन्हें दौरा पड़ गया जिससे वे उबर नहीं पाए. जैन कहती हैं, ''हमने ऑटोप्सी नहीं करवाई, पर सर्जन ने कहा कि हो सकता है कोविड के दौरान उनके शरीर में खून के थक्के बन गए और दिमाग में पहुंच गए हों.''

डॉक्टरों का भी अब मानना है कि कोविड महज निमोनिया सरीखी तकलीफ नहीं बल्कि उससे कुछ ज्यादा है. लेकिन वे केवल कयास ही लगा सकते हैं कि जो लोग इस संक्रमण से उबर चुके हैं उनमें इसके टिकाऊ असर क्या होंगे. भारत में कोविड के दूरगामी असर पर अभी कोई अध्ययन नहीं हुआ है, पर जर्नल ऑफ द अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन में प्रकाशित एक अध्ययन से पता चला कि इस वायरस का पहला लक्षण प्रकट होने के औसतन 60 दिन बाद 87.4 फीसद मरीजों ने बताया कि कम से कम एक लक्षण अभी भी कायम है. भारत में 22 जुलाई तक कोविड के 7,53,049 मरीज इस बीमारी से उबर चुके हैं.

ऐसे में यह स्वीकार करना जरूरी है कि यह बीमारी कहीं ज्यादा पेचीदा हो सकती है, ताकि इससे बच निकले लोगों के लिए सावधानी जारी रह सके. नवी मुंबई में वाशी के हीरानंदानी अस्पताल में इंटरनल मेडिसिन की डायरेक्टर डॉ. फरह इंगले कहती हैं, ''यह नई बीमारी है और हम नहीं जानते कि इसके लंबे वक्त में या स्थायी नतीजे क्या होंगे. पर हम इतना जानते हैं कि यह ऐसा वायरस है जो सिर से लेकर पैर के अंगूठे तक व्यक्ति पर असर डालता है. इससे उबर चुके लोगों में स्ट्रोक, लकवे, दिल की बीमारियों, फेफड़े, किडनी और यहां तक कि दिमाग को भी छोटे-मोटे नुक्सान की खबरें आ रही हैं.''

डॉक्टरों का कहना है कि चार प्रमुख अंगों—फेफड़े, किडनी, हृदय और मस्तिष्क—को कोविड के संक्रमण से जोखिम ज्यादा है. कोविड फेफड़ों की कोशिकाओं पर सीधा हमला करता है, लिहाजा फेफड़े की बीमारियों के विशेषज्ञों में सांस की बहाली चिंता का प्रमुख विषय है. दिल्ली के अपोलो अस्पताल में पल्मोनोलॉजिस्ट और क्रिटिकल केयर स्पेशलिस्ट डॉ. राजेश चावला कहते हैं, ''मैं चिंतित हूं. कोविड से उबर चुके बहुत सारे मरीजों में लंग फाइब्रोसिस बाकी रह गया है.'' उनका अंदाजा है कि अस्पतालों से छुट्टी पा चुके 10 फीसद लोगों को घर पर ऑक्सीजन सपोर्ट जारी रखने के लिए कहा जा रहा है. एल्वियोली या वायुकोशिका, जिसे श्वसन प्रणाली का सबसे मेहनती हिस्सा भी कहा जाता है, फेफड़ों में हवा की बहुत छोटी थैलियां होती हैं जो सांस में ली गई ऑक्सीजन को ग्रहण करती हैं.

कोविड के हमले के दौरान यही वायुकोशिकाएं क्षतिग्रस्त हो जाती हैं और एक ज्यादा गाढ़ा रेशेदार पदार्थ इनकी जगह ले लेता है, जिससे फेफड़ों की ऑक्सीजन की क्षमता खतरे में पड़ जाती है. बेंगलूरू के मजूमदार शॉ मेडिकल सेंटर में पल्मोनोलॉजिस्ट डॉ. आर. रंगनाथ कहते हैं, ''अगर फेफड़ों को नुक्सान पहुंचता है और फाइब्रोसिस या घाव के निशान बन जाते हैं, तो बाकी फेफड़े अक्सर इन घावों को सिकोडऩे और भरपाई करने की कोशिश करते हैं. नुक्सान कितना हुआ है, यह इससे तय होता है कि रोज की गतिविधियों पर कितना असर पड़ा है.'' जोखिम की मात्रा मुख्यत: इस पर निर्भर करती है कि व्यक्ति में किस प्रकार के लक्षण विकसित होते हैं. डॉ. चावला कहते हैं, ''हल्के कोविड वाले लोग आम तौर पर खुद ही भले-चंगे हो जाते हैं, मध्यम दर्जे के मरीजों को अस्पताल में थोड़ी ऑक्सीजन केयर के बाद छुट्टी दे दी जाती है, पर गंभीर मरीजों में खतरनाक फाइब्रोसिस हो सकता है.'' अमेरिका के शिकागो में दो मरीजों के फेफड़ों को इतना भारी नुक्सान पहुंचा कि उन्हें ठीक करने के लिए फेफड़ों के प्रत्यारोपण के अलावा कोई चारा न था.

खुशकिस्मती से भारत में हल्के मामलों का अनुपात बनिस्बतन ज्यादा (कोविड के कुल मामलों का करीब 70-80 फीसद) बना हुआ है और ये मरीज आम तौर पर खांसी के बने रहने के अलावा ठीक हो जाते हैं. डॉ. रंगनाथ कहते हैं, ''खांसी या बुखार के बाद की सांस की नली की उच्च प्रतिक्रियाशीलता अन्य वायरल संक्रमणों में भी आम है. नुक्सान गंभीर नहीं है तो फेफड़े फिर नए और ताकतवर हो सकते हैं. मध्यम दर्जे के नुक्सान के बाद आप ज्यादातर कामकाज करते रह सकते हैं, पर आपके फेफड़ों की बुनियादी कार्यक्षमता हमेशा के लिए कम हो जाती है.'' फेफड़ों पर कोविड के लंबे वक्त के नतीजों का कोई अध्ययन हमारे यहां नहीं है, पर मेडिकल जर्नल द लांसेट में प्रकाशित और 15 साल की अवधि के दौरान मरीजों पर सार्स के प्रभाव को मापने के लिए हुए एक अध्ययन से पता चला था कि एक-तिहाई से ज्यादा मरीजों के फेफड़ों की क्षमता में आई कमी बरकरार रही. ज्यादा चिंताजनक यह कि अमेरिका स्थित स्क्रिप्स रिसर्च के एक छोटे-से अध्ययन से बगैर लक्षणों वाले आधे मरीजों के फेफड़ों में छोटा-मोटा नुक्सान सामने आया. गनीमत बस इतनी, जैसा कि डॉ. इंगले भरोसा दिलाती हैं, ''छोटा-मोटा नुक्सान आम तौर पर 3-4 महीनों में ठीक हो जाता है.''

कोविड के दौरान किडनी को पहुंचे नुक्सान की भी यही कहानी है. असर आम तौर पर इस अंग की नलियों में देखा गया है, जिसे कभी-कभार डायलिसिस के बगैर और कभी-कभार अस्थायी डायलिसिस से उल्टा जा सकता है. मुंबई के नेफ्रोप्लस के नेफ्रोलॉजिस्ट और मेडिकल डायरेक्टर डॉ. उमेश बी. खन्ना कहते हैं, ''कोविड वाले बहुसंख्यक लोगों में क्रिएटिनिन या यूरिया का उच्च स्तर मिला है जो संक्रमण के इलाज के दौरान ली गई दर्दनिवारक तथा अन्य दवाइयों का नतीजा है.'' मसलन, रेमडेसिविर अणु के तौर पर तो सुरक्षित है लेकिन मरीज को देने से पहले जिस घोल में यह मिलाई जाती है, उसकी सिफारिश कमजोर किडनी वाले लोगों के लिए नहीं की जाती. डॉ. खन्ना कहते हैं, ''जब रक्तचाप गिरता है और खून की सप्लाइ पर असर पड़ता है, तब किडनियां साइटोकाइन स्टॉर्म्स से भी प्रभावित होती हैं. सेप्टीसीमिया सरीखे दूसरे दर्जे के संक्रमण भी किडनियों को नुक्सान पहुंचाते हैं.'' चिंता उन लोगों को लेकर ज्यादा है जिन्हें पहले ही किडनी की हल्की बीमारी है. चीन के वुहान में अस्पताल में भर्ती मरीजों पर किए गए एक अध्ययन से पता चला कि कोविड के उबर चुके मरीज कई सारी जटिलताओं के बाद ठीक हो गए: 42 फीसद को सेप्सिस था, जो किडनी सरीखे कई अहम अंगों पर प्रतिकूल असर डाल सकता है.

अलबत्ता दिल और दिमाग पर कोविड के दूरगामी असर को समझने की अभी शुरुआत ही हुई है. एक्वस, नई दिल्ली में कार्डियोलॉजी विभाग के प्रमुख डॉ. वी.के. बहल कहते हैं, ''दिल के कामकाज पर कोविड के असर के बारे में कोई निर्णायक बात कहना अभी बहुत जल्दबाजी होगी.'' यूनिवर्सिटी ऑफ एडिनबरा के एक अध्ययन से कोविड के 55 फीसद मरीजों में हृदय की असामान्यताओं का पता चला, जबकि यूनिवर्सिटी ऑफ पेंसिलवैनिया का एक अध्ययन बताता है कि कोविड के गंभीर रूप से बीमार मरीजों में हृदय गति रुकने या एरिद्मिया का जोखिम विकसित होने की 10 गुना ज्यादा संभावना होती है. डॉ. बहल कहते हैं, ''ज्यादातर वायरल संक्रमण जब काफी तीव्र होते हैं, शरीर की मांसपेशियों को नुक्सान पहुंचा सकते हैं; हृदय भी मांसपेशी ही है. कुछ नुक्सानों से तो यह उबर सकता है, दूसरे नुक्सान कायम रह सकते हैं.'' वे यह भी कहते हैं कि कोविड के तत्काल बाद हृदय की धमनियों में जलन और खून के थक्कों पर नजर रखने की जरूरत है.

खून के थक्कों का मस्तिष्क में पहुंच जाना कोविड के मरीजों में दर्ज किया गया है, वहीं चिकित्सा बिरादरी को अभी भी पक्के तौर पर नहीं पता कि यह वायरस मस्तिष्क को सीधे संक्रमित करता है या नहीं. कोविड के चीनी मरीजों पर जामा न्यूरोलॉजी का एक अध्ययन बताता है कि करीब 36.4 फीसद के तंत्रिका तंत्र को नुक्सान पहुंचा. बेंगलूरू स्थित निमहंस के डायरेक्टर डॉ. बी.एन. गंगाधर कहते हैं, ''कुछ चिंताओं को हम मॉनिटर कर रहे हैं—फेफड़ों को नुक्सान के नतीजतन ऑक्सीजन की सप्लाइ में कमी या खून के थक्के मस्तिष्क के लिए बेहद खतरनाक हैं.

अन्य संज्ञानात्मक प्रभावों जैसे स्मृति भ्रंश, एकाग्रता की परेशानी, अवसाद की रिपोट्र्स भी आ रही हैं.'' लांसेट साइकियाट्री में प्रकाशित एक छोटे-से ब्रिटिश अध्ययन ने बताया कि 125 में से 77 मरीजों को मस्तिष्क आघात या दौरा पड़ा, जो आम तौर पर खून के थक्कों की वजह से होता है. वहीं 125 में से 39 मरीजों में संभ्रम या मानसिक बदलाव के संकेत सामने आए. इनमें से 9 का मस्तिष्क असामान्य ढंग से काम कर रहा था जिसे एनसिफैलोपैथी कहा जाता है. वहीं सात के दिमाग में सूजन या एनसेफ्लाइटिस थी.

विशेषज्ञों का कहना है कि कोविड दिमाग पर जो निशान या धब्बे छोड़ जाएगा, उन्हें हटाना सबसे मुश्किल होगा. डॉ. गंगाधर बताते हैं, ''ज्यादातर वायरल बीमारियां अवसाद के निशान छोड़ जाती हैं. हम नहीं जानते कि कोविड के मामले में यह कितना अहम होगा. आइसीयू से ठीक होकर निकले लोग याददाश्त के जाने, दुश्चिंता और तनाव से जुड़े विकारों की शिकायत कर रहे हैं. जरूरी है कि ऐसे लोग और उनके परिवार काउंसिलिंग लें.'' इसी से मिलती-जुलती दुश्चिंता उन लोगों में भी देखी जा रही हैं, जिन्हें हल्का कोविड है और जो घर पर अलग-थलग नहीं रह सकते.

छोटे वक्त में थकान कोविड का एक और सामान्य नतीजा है. दिल्ली के 42 वर्षीय इंजीनियर आरुष पटेल कहते हैं, ''मैं मैराथन दौड़ता था. अब मैं एक दिन का पूरा काम भी नहीं कर पाता और लगता है कि मैं गिर पड़ूंगा. मुझे कोविड से उबरे तीन हफ्ते हो चुके हैं. सक्रिय नहीं हो पाना अवसाद पैदा करता है.''

निर्णायक डेटा बहुत कम है और ऐसे में डॉक्टरों का कहना है कि लंबे वक्त में सामने आने वाले नुक्सानों की पहचान का एक तरीका ठीक होने के बाद भी बेहद गंभीर मानदंडों की निगरानी करना है. भारत में एक केंद्रीय समिति कोविड से ठीक हो चुके लोगों को पूरी तरह अच्छा करने के उपाय और दिशानिर्देश तैयार कर रही है. इस वायरस और शरीर पर इसके स्थायी प्रभावों को पूरी तरह समझने के लिए और ज्यादा वक्त, संसाधनों और अनुसंधान की जरूरत है. जाहिर है, कोविड की कहानी अभी खत्म नहीं हुई है.

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें