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उभरने लगे सांप्रदायिक बुखार बढ़ने के लक्षण

पिछले एक माह में राजस्थान के पांच शहरों में सांप्रदायिक तनाव फैलने और दंगों की बड़ी घटनाएं हुईं और यह सिलसिला अब भी थमता नहीं दिख रहा

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बेकाबू हालात : जोधपुर में सांप्रदायिक झड़पों के बाद लाठी भांजती पुलिस बेकाबू हालात : जोधपुर में सांप्रदायिक झड़पों के बाद लाठी भांजती पुलिस

आनंद चौधरी

राजस्थानी लोक कला को विश्व पटल पर ख्याति दिलाने वाले मारवाड़ रत्न पद्मश्री लाखा खान मांगणियार इन दिनों बेहद आहत और गमजदा हैं. जोधपुर शहर में 2 मई को हुई हिंसा ने 72 साल के लोक  गायक लाखा खान को भीतर तक हिला दिया है. जोधपुर के प्रताप नगर में जगदंबा कॉलोनी में रहने वाले पद्मश्री लाखा खान कहते हैं, ''मुझे 72 साल में कभी यह एहसास नहीं हुआ कि मैं हिंदू हूं या मुसलमान. मैं मीरा और कबीर के भजन भी उसी भाव से गाता हूं जिस भाव से सूफी गीत. दंगा मेरे शहर की विरासत नहीं है.'' 

कुछ ऐसे ही विचार जोधपुर के प्रसिद्ध लंगा कलाकार महबूब खान के हैं. लाखा खान और महबूब खान मुसलमान हैं, लेकिन उनके गीत और भजन जाति, धर्म और संप्रदाय की सीमा से परे हैं. सिंधी सारंगी पर अंगुलियां चलाते हुए लाखा खान जब मीरा का भजन 'पायो जी मैंने राम रतन धन पायो' सुनाते हैं तो श्रोता मंत्रमुग्ध हो जाते हैं. हाथों में लहराती खड़ताल, कोहनियों में दबी भपंग और हारमोनियम पर थिरकती अंगुलियों के साथ जब महबूब अली की टीम कबीर, मीरा और बुल्लेशाह के गीत और भजनों का राग अलापती है तो धर्म और संप्रदाय के भेद अपने आप मिट जाते हैं. 

हिंदी, मारवाड़ी, सिंधी, पंजाबी और मुल्तानी में सूफी गीत और भजन गाने वाले लाखा खान कहते हैं, ''मेरा शहर जोधपुर प्रेम, भाईचारे और अपणायत (अपनापन) के लिए जाना जाता है, लेकिन पता नहीं हमारी साझी विरासत को किसकी नजर लग गई?''

राजस्थान में पिछले एक माह में जिस तरह सांप्रदायिक तनाव और हिंसा की घटनाएं हुई हैं, उसके मद्देनजर लाखा खान का यह अंदेशा गलत भी नहीं है. नवसंवत्सर के दिन करौली हिंसा की लपटों में जला. करौली की लपटें ठंडी होने से पहले ही अजमेर जिले का ब्यावर कस्बा हिंसक हो उठा. इसी दौरान अलवर जिले के रामगढ़ में सड़क चौड़ी करने के लिए धार्मिक स्थल ढहाए जाने को लेकर बवाल हो गया. यह विवाद थमने से पहले ही ईद के दिन जोधपुर सांप्रदायिक तनाव से घिर गया. दूसरे दिन नागौर और फिर उसके अगले दिन भीलवाड़ा में सांप्रदायिक सौहार्द बिगड़ गया. पिछले एक माह में राजस्थान के पांच शहरों में सांप्रदायिक तनाव की घटनाएं हुई हैं.

हालात ये हैं कि पुलिस और प्रशासन सांप्रदायिक हिंसा की एक घटना पर काबू पाता है उससे पहले ही दूसरा शहर भड़क उठता है. इन घटनाओं पर राजस्थान पुलिस की क्राइम ब्रांच के डीआइजी राहुल प्रकाश सफाई देते हुए कहते हैं, ''करौली और जोधपुर में अब शांति स्थापित हो चुकी है. पुलिस इस तरह की घटनाएं रोकने के लिए हर स्तर पर काम कर रही है. ऐसे लोग जिनके खिलाफ पहले से सांप्रदायिक भावनाएं भड़काने के आरोप हैं उनको चिन्हित कर कार्रवाई की जा रही है. सोशल मीडिया पर किसी समुदाय या धर्म के खिलाफ टिप्पणी करने वाले लोगों को भी चिन्हित किया जा रहा है. कहीं भी सांप्रदायिक सौहार्द न बिगड़े इसके लिए पुलिस मित्र, सीएलजी और शांति समूहों की बैठक बुलाई जा रही हैं.''

राजस्थान में हुईं इन सांप्रदायिक हिंसा और तनाव की घटनाओं पर सियासी दल अलग-अलग सुर अलाप रहे हैं. सत्तारूढ़ कांग्रेस जहां दंगों के पीछे आरएसएस और भाजपा का हाथ बता रही है तो वहीं भाजपा इसके लिए राजस्थान सरकार को जिम्मेदार ठहरा रही है. 

राजस्थान में दंगों की इन बढ़ती घटनाओं पर समाजशास्त्री डॉ. राजीव गुप्ता कहते हैं, ''दंगे आज के हिंदुस्तान की सबसे बड़ी त्रासदी हैं. राजनैतिक दलों और कुछ संगठनों ने धार्मिक और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के नाम पर लोगों को सामाजिक तौर पर विभाजित कर दिया है. यह विभाजन 1947 से भी खतरनाक है. लोगों को जाति, धर्म और संस्कृति के गौरव से परिचित कराकर दंगों की पृष्ठभूमि तैयार की जाती है. यह प्रक्रिया धीरे-धीरे हम और वे में विभाजित करती चली जाती है. एक समय ऐसा आता है कि लोगों को लगता है कि उनके रसूख को चुनौती दी जा रही है. यही बात तनाव की वजह बनती है जो बाद में दंगों में बदल जाती है.'' गुप्ता सांप्रदायिक तनाव रोकने के लिए तजवीज देते हुए कहते हैं, ''आलोचनात्मक शिक्षा पद्धति दंगों को रोकने में कारगर हो सकती है, लेकिन दुर्भाग्य यह है कि संवैधानिक मूल्यों को हमने कभी बच्चों के पाठ्यक्रम का हिस्सा नहीं बनाया.''

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