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लादेन: दाढ़ी में तिनके की तलाश

लादेन को मारने के लिए चलाए गए अमेरिकी अभियान पर पाकिस्तान में हुई गोपनीय जांच की रिपोर्ट खुलकर किसी का नाम तो नहीं लेती, लेकिन बिन लादेन को एबटाबाद में छुपने में मदद करने के मामले में आइएसआइ और पाकिस्तानी फौज की मिलीभगत से भी इनकार नहीं करती है.

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मई, 2011 की एक उजाली रात को अमेरिकी नेवी सील ने पाकिस्तान के एबटाबाद शहर में ओसामा बिन लादेन को उसके ठिकाने में मार गिराया था. इस अभियान की एक गोपनीय जांच पाकिस्तान में हुई थी जो अल जजीरा को हाथ लगी है. इसमें कहा गया है कि भारत के साथ 1971 की जंग के बाद यह अभियान पाकिस्तान के लिए अब तक की 'बड़ी शर्मिंदगी’ है. उसके मुताबिक, अमेरिका ने ''पाकिस्तान के भीतर घुसकर एक विद्वेषपूर्ण सैन्य अभियान” को अंजाम दिया था जिसके बारे में इस्लामाबाद को सूचित नहीं किया गया और पाकिस्तानी सुरक्षा प्रतिष्ठान को इस बात की कोई भनक नहीं थी कि बिन लादेन एबटाबाद में या फिर पाकिस्तान में कहीं छुपा है.

सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व न्यायाधीश की अध्यक्षता में चार सदस्यीय ट्राइब्यूनल की महीनों तक की गई जांच के बाद आई इस रिपोर्ट के नतीजे उम्मीद के मुताबिक और चौंकाने वाले भी हैं. इसमें किसी एक व्यक्ति के ऊपर दोष नहीं मढ़ा गया है. दोषियों के नाम भी इसमें शामिल नहीं हैं. बिन लादेन के परिवार और आइएसआइ के वरिष्ठ गुप्तचर अफसरान समेत दो सौ से ज्यादा लोगों से बातचीत के बाद कमीशन निष्कर्ष के तौर पर कहता है कि मई, 2011 की वह घटना अकेले न तो आइएसआइ, न फौज और न ही सरकार की 'नाकामी’ है. इसकी बजाए यह पूरे समाज और खासकर अभिजात्य वर्ग की ओर संकेत करता है जो निष्क्रिय है और जिसके भीतर अतिवादी जिहादियों की पैठ भी है.
 
बिन लादेन का पता लगाने में नाकामी का दोष सीधे आइएसआइ पर मढ़ा गया है, जिसके बारे में सिर्फ यह कहा गया है कि ऐसा उसकी ''अक्षमता की हद को दर्शाता है, जो अविश्वसनीय नहीं तो हैरतनाक जरूर है” जबकि दोष की अधिकतम सीमा दिखाने के लिए उसकी कमान के उन स्तरों की ''संगीन मिलीभगत” की बात कही गई है जिसकी पहचान कमीशन नहीं कर सका है. एबटाबाद में अमेरिकी इंटेलिजेंस अभियान का पता लगाने की नाकामी या फिर छापा अभियान पूरा हो जाने तक उसकी प्रतिक्रिया देने में नाकामी का दोष सुरक्षा प्रतिष्ठान की नौकरशाही पर मढ़ा गया है, जिसके बारे में कमीशन कहता है कि उसमें बड़े पैमाने पर सिलसिलेवार पुनर्गठन की दरकार है. संक्षेप में, यह रिपोर्ट अपने आप में विनाशकारी है यही वजह है कि इसके पूरा हो जाने के छह माह बाद भी पाकिस्तान अब तक इसे आधिकारिक तौर पर जारी नहीं कर पाया है.


कैसे हुआ अभियान
अमेरिका के सर्वाधिक वांछित लोगों की फेहरिस्त में अव्वल बिन लादेन छह साल से एबटाबाद के विला में अपने परिवार के साथ रह रहा था. उसके साथ उसकी तीनों बीवियां, आठ बच्चे और पांच नाती-पोते भी थे. रिपोर्ट के अनुसार, वह अफगानिस्तान के तोराबोरा से 2001 के अंत में भागा और पेशावर के करीब कोहात शहर पहुंचा जहां अपने परिवार से उसकी मुलाकात हुई. उसका परिवार 9/11 के बाद से कराची में छुपा हुआ था और वहां से स्वात घाटी गया.वहां बिन लादेन की कम से कम एक बार 9/11 के मास्टरमाइंड खालिद शेख मोहम्मद (केएसएम) से मुलाकात हुई थी. केएसएम को 1 मार्च, 2001 को सीआइए ने रावलपिंडी से एक सैन्य क्षेत्र में पकड़ा था, जो फौज के मुख्यालय से बमुश्किल एक मील दूर था. सीआइए ने जब छापा मारा, तो उन्होंने आइएसआइ को नहीं बताया था कि वे केएसएम को खोज रहे हैं. इस गिरफ्तारी के कारण लादेन को दो साल तक हरिपुर जाकर रहना पड़ा.उस दौरान एबटाबाद में उसके लिए एक विशेष ठिकाने की व्यवस्था की जा रही थी. धीरे-धीरे उसके परिवार के दूसरे सदस्य भी उससे जा मिले.

वह अपने नए ठिकाने में अगस्त, 2005 में पहुंचा. एबटाबाद देश की राजधानी इस्लामाबाद और रावलपिंडी के गवर्नमेंट कम्युनिकेशंस हेडक्वार्टर से उत्तर में 30 मील दूर है और मशहूर काराकोरम हाइवे पर है. वहीं पाकिस्तान की काकुल मिलिटरी अकादमी भी है, जो बिन लादेन के ठिकाने से एक मील से भी कम दूरी पर थी. एबटाबाद का नाम अंग्रेज फौजी अफसर और औपनिवेशिक प्रशासक जेम्स एबट के नाम पर पड़ा है, जिसने 1853 में ब्रिटिश सेना की छावनी के तौर पर इस शहर की स्थापना की थी. एबट ने 19वीं सदी के मध्य में सिखों के खिलाफ ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की ओर से जंग लड़ी और उसे अपने इस शहर पर बहुत नाज था.

सीआइए ने बिन लादेन का पता लगाने के लिए उसके पाकिस्तानी संदेशवाहक अबू अहमद अल कुवैती का पीछा किया था. कुवैती 9/11 के हमले की योजना बनाने में लादेन का सहयोगी रहा था और बाहरी दुनिया में उसका संदेश ले जाने और लाने का काम करता था. अल कुवैती पाकिस्तानी पख्तून कबाइली था. उसका पालन-पोषण कुवैत में हुआ. वह अरबी और पश्तो धड़ल्ले से बोलता था. 2010 में अमेरिकी गुप्तचरों को पता चला कि वह एबटाबाद के एक तीन मंजिला मकान में है, जो शहर के दूसरे मकानों से अलग दिखता था. यह मकान 18 फुट ऊंची दीवार से घिरा था, जिस पर तार की बाड़ लगी हुई थी, जहां कोई फोन या इंटरनेट सिग्नल नहीं था और ऐसा लगता था कि वह किसी को छुपाने के लिए ही बनाया गया था. बाहर से इस परिसर के भीतर दीवारों और स्क्रीन के कारण देख पाना मुमकिन नहीं था. पाकिस्तानी कमीशन ने इस मकान को 'अजीब डिजाइन’ का बताया है.


मिलीभगत का कोई साक्ष्य नहीं
पाकिस्तानी कमीशन ने 2003 से इस मकान के निर्माण के हर पहलू को करीब से जांचा है. उसका निष्कर्ष है कि ''फर्जी कागजों और पहचान के आधार पर गैरकानूनी और अनियमित लेनदेन का समूचा सिलसिला” था, जिस ओर स्थानीय प्रशासन और आइएसआइ की नजर जानी चाहिए थी. कमीशन अचरज जाहिर करता है जो सही भी है कि ''लगातार छह साल तक सारे आस-पड़ोस, स्थानीय अफसरों, पुलिस, सुरक्षा और गुप्तचर अधिकारियों की नजर से इसके आकार, अजीब आकृति, तार की बाड़, कारों या किसी आने-जाने वाले के न होने इत्यादि” का बच जाना एक ऐसी अक्षमता है जिस पर 'विश्वास नहीं होता.’ आइएसआइ के कुछ तत्वों की मिलीभगत से रिपोर्ट इनकार नहीं करती लेकिन कमीशन मानता है कि उसे कोई ठोस सबूत नहीं मिले.


कमीशन कहता है कि अल कायदा ने अपने सरगना को छह साल तक छुपाने के लिए अच्छी रणनीति अपनाई थी. लेकिन सिर्फ अल कुवैती और उसके भाई के बूते बिन लादेन नहीं छुपा रह सकता था. इसके लिए और बड़े नेटवर्क की जरूरत होती. सील टीम को मकान में ऐसे फोन नंबर मिले, जिनसे पता चलता है कि अल कुवैती का एक आतंकी संगठन से संपर्क  बना हुआ था. जून, 2011 की न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट में उस संगठन का नाम हरकत उल मुजाहिदीन बताया गया. बिन लादेन नौवें दशक के अंत से उससे जुड़ा हुआ था. आठवें दशक में आइएसआइ ने उसे भारत से लडऩे के लिए बनाया था और यह दशकों से उसके लिए वफादारी के साथ काम करता रहा है. उसका नेता फजुलर्रहमान खलील इस्लामाबाद के बाहरी इलाके में खुलेआम रहता है.

यह रिपोर्ट टाइम्स की रिपोर्ट जैसा विशिष्ट उद्घाटन तो नहीं करती, लेकिन निष्कर्ष के तौर पर कहती है कि अल कुवैती और उसका गिरोह पाकिस्तानी जिहादी समुदाय के एक ''साजगार माहौल में पैबस्त था” जो उसकी गतिविधियों को आसान बनाता था और लादेन के ठिकाने को छुपाए रखने में मदद करता था. कमीशन सिफारिश करता है कि पाकिस्तान सरकार इस बात की जांच 'पूरे सरोकार’ के साथ करे कि क्या उस 'माहौल’ में आइएसआइ के लोग भी थे.

इस सवाल का कोई जवाब नहीं
रिपोर्ट में माहौल पर सही जोर दिया गया है. पाकिस्तान में अल कायदा कोई हवा में काम नहीं करता बल्कि उसे एक दोस्ताना माहौल मिलता है. बिन लादेन के सहयोगियों में लश्कर-ए-तैयबा का सरगना हाफिज सईद और अफगानी तालिबानी नेता मुल्ला उमर थे. दोनों आइएसआइ के भी सहयोगी हैं. रिपोर्ट सही निष्कर्ष देती है कि दरअसल इस समस्या की जड़ इस देश के इतिहास में छुपी है. उसके मुताबिक, ''जनरल जिया-उल-हक का अंधेरा दौर पाकिस्तान के पास आपराधिक, हिंसक, विचारधारात्मक और राष्ट्रविरोधी संरचना की अतिवादी विरासत छोड़ गया है.”

बिल क्लिंटन के बाद से अब तक के सभी अमेरिकी राष्ट्रपति पाकिस्तान को चेताते रहे हैं कि आतंक को पनाह देने या पालने का नतीजा आज नहीं तो कल विनाशकारी ही होगा. अब तो विनाश हो चुका है, बल्कि जनरल जिया ने जो दैत्य पैदा किया था वह रोज किसी न किसी को पाकिस्तान में निगल रहा है. कमीशन कहता है कि चौथे दशक में अपने जन्म के बाद से अमेरिका-पाकिस्तान का रिश्ता ''उतार-चढ़ाव वाला” रहा है लेकिन 2011 में वह अपने निम्नतम स्तर पर पहुंच गया. रिपोर्ट कहती है कि ओबामा प्रशासन ने शुरू से ही आइएसआइ और वहां के सैन्य नेतृत्व पर भरोसा नहीं किया. कमीशन इस लेखक के पाकिस्तान पर किए लेखन से एक पैरा उद्धृत करता है और यहां के जनरलों पर ओबामा को भरोसा न होने के सबूत के तौर पर मेरे उद्धरण को दोहराता है कि पाकिस्तान ''दुनिया का सबसे खतरनाक मुल्क है.”

दोनों देशों के बीच रिश्ते हालांकि 2011 के बाद से कुछ सुधरे हैं, लेकिन यह सिर्फ सतही मामला है. कमीशन की रिपोर्ट हमें आगाह करती है कि हमारे पास अब भी एबटाबाद के सबसे बड़े रहस्य का जवाब नहीं हैं कि इतिहास का मोस्ट वांटेड शख्स आखिर कैसे पाकिस्तानी फौज के आंगन में छह साल तक लगातार बिना किसी भनक के छुपा रहा? रिपोर्ट बुनियादी दोष आइएसआइ की ''भारी अक्षमता” पर डालती है लेकिन मिलीभगत से इनकार नहीं करती. शायद हम कभी न जान पाएं, लेकिन इस सवाल का जवाब तलाशने में कमीशन की रिपोर्ट एक उपयोगी और अहम कड़ी जरूर है.

(लेखक ब्रूकिंग्स इंस्टीट्यूशन में इंटेलिजेंस प्रोजेक्ट के निदेशक हैं. वे व्हाइट हाउस में सलाहकार के रूप में अपनी सेवाएं दे चुके हैं)

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