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खेल अभी बाकी

मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने पार्टी का साथ हासिल करके फिलहाल भले चुनौती देने वाले सचिन पायलट से पार पा गए हों मगर उनकी सरकार पर से खतरा अभी टला नहीं है

विशाल भारद्वाज/एएपी विशाल भारद्वाज/एएपी

तारीख 14 दिसंबर 2018. वक्त तकरीबन दोपहर 2 बजे. तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी दिल्ली में अपने आवास 12, तुगलक रोड के एक कोने वाले कमरे से राजस्थान में पार्टी के दो दिग्गजों अशोक गहलोत और सचिन पायलट के साथ बाहर आए. फैसला हो चुका था कि अगले मुख्यमंत्री गहलोत और उप-मुख्यमंत्री पायलट होंगे. राजस्थान विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 200 सदस्यीय सदन में 100 सीटें जीती थीं और सरकार बनाने वाली थी. कमरे से बाहर निकलते वक्त राहुल दोनों नेताओं से बोले, ''सत्ता का समान वितरण होना चाहिए. गहलोत जी आप अपने युवा साथी का ख्याल रखेंगे.'' सभी नेताओं ने मुस्कराते हुए फोटो खिंचवाई, जिसे राहुल ने ''राजस्थान का साझा रंग'' कैप्शन के साथ ट्वीट किया.

इसके ठीक 19 महीने बाद, अब राहुल की मां सोनिया गांधी की अध्यक्षता में पायलट को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटा दिया गया और गहलोत ने उन्हें मंत्रिमंडल से बाहर कर दिया. इस तरह उस सत्ता संघर्ष में एक और निर्णायक मोड़ आ गया, जो राहुल के ट्वीट के बाद ही शुरू हो गया था. गहलोत और कांग्रेस के संचार प्रभारी रणदीप सुरजेवाला ने पायलट पर गंभीर आरोप लगाए कि वे कांग्रेस सरकार के तख्तापलट के लिए भाजपा के साथ पींगे बढ़ा रहे थे. पायलट अपने वफादार 18 विधायकों के साथ 13 जुलाई को गहलोत के आवास पर बुलाई विधायक दल की बैठक से गैर-हाजिर रहे. उन्होंने इंडिया टुडे से खास बातचीत में दावा किया, ''सत्ता का समान बंटवारा कभी नहीं हुआ'' और उसकी जगह उन्हें ''अपमानित किया गया और मतदाताओं से किए वादों को पूरा करने नहीं दिया गया.'' हालांकि उन्होंने जोर देकर कहा कि ''मैं भाजपा में नहीं जा रहा हूं.'' पर उनके दावे के उलट, उनके खेमे के विधायकों के ऐसे कई ऑडियो सोशल मीडिया में वायरल हो गए, जिनमें वे कथित रूप से गहलोत सरकार को गिराने की बात कर रहे हैं. इन्हीं में पर्यटन मंत्री (अब बर्खास्त) विश्वेंद्र सिंह, विधायक भंवरलाल शर्मा और कुछ अन्य पैसों के लेनदेन और उन 30 विधायकों की बात करते सुने जा सकते हैं, जो पायलट को समर्थन देंगे. इनमें केंद्रीय जलशक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत और दूसरे भाजपा नेता भी होंगे. कांग्रेस ने तो शेखावत की गिरफ्तारी की मांग की है और पैसों के लेनदेन की जांच के तो आदेश भी दे दिए गए हैं.

पायलट के भाजपा से रिश्ते बनने का संकेत इस तथ्य से भी मिला जब 16 जुलाई को भाजपा के आजमाए हुए दो वकील—मुकुल रोहतगी और हरीश साल्वे—पायलट की ओर से राजस्थान हाइकोर्ट पहुंचे और विधानसभा अध्यक्ष सी.पी. जोशी की ओर से उन्हें और उनके वफादार 18 विधायकों को सदस्यता के अयोग्य ठहराने को जारी कारण बताओ नोटिस को चुनौती दी. फिलहाल भाजपा बाहर से ही पूरे घटनाक्रम को देख-परख रही है. हालांकि 13 जुलाई को गहलोत के करीबी कारोबारियों के जयपुर, कोटा, मुंबई और दिल्ली के 43 ठिकानों पर आयकर छापों से कांग्रेस को फौरन आरोप लगाने का मौका मिल गया कि राजस्थान संकट में भाजपा शासित केंद्र का हाथ है. सुरजेवाला ने कहा, ''आयकर विभाग, प्रवर्तन निदेशालय और सीबीआइ भाजपा के प्रमुख विभाग हैं, लेकिन इन छापों से हमारी सरकार नहीं गिरने वाली है.''

भाजपा के भीतरी सूत्र भी बताते हैं कि पायलट पिछले दिनों पार्टी शामिल हुए दो नेताओं—कांग्रेस से आए ज्योतिरादित्य सिंधिया और बीजू जनता दल (बीजद) से आए जय पांडा—के जरिए पार्टी के संपर्क में थे. अटकल यह भी है कि इस महीने के शुरू में मध्य प्रदेश मंत्रिमंडल विस्तार में सिंधिया के वफादारों को अहम ओहदे दिए गए, ताकि राजस्थान में पायलट खेमे और महाराष्ट्र में शिवसेना-राकांपा-कांग्रेस गठजोड़ की उद्धव ठाकरे सरकार के समर्थक विधायकों को भी लुभाया जा सके.

कांग्रेस नेताओं और भाजपा के सूत्रों का भी दावा है कि पायलट के 18 विधायकों के साथ मानेसर के रिजॉर्ट में ठहरने के लिए कमरे भाजपा शासित हरियाणा सरकार की ओर से ही बुक किए गए. 30 से ज्यादा कमरों की बुकिंग इसी उम्मीद में की गई थी कि पायलट के साथ और विधायक आएंगे. बताते हैं भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा 12 जुलाई को यह जानने को खासे बेचैन थे कि पायलट के साथ कितने विधायक आ रहे हैं, लेकिन संख्या 30 से काफी कम रह जाने पर, फिलहाल के लिए, पार्टी का जोश ठंडा पड़ गया. नड्डा की ओर से भाजपा के तीन नेता राजस्थान से राज्यसभा सदस्य ओम माथुर तथा भूपेंद्र यादव और केंद्रीय मंत्री शेखावत सारे प्रकरण की निगरानी कर रहे हैं.

सो, आश्चर्य नहीं कि गहलोत ने पायलट के खिलाफ सारे घोड़े खोल दिए. उन्होंने दावा किया कि उनके पास विधायकों की खरीद-फरोख्त में उप-मुख्यमंत्री के शामिल रहने के सबूत हैं. गहलोत के एक करीबी बताते हैं, ''गहलोत ने मामले में पायलट के सीधे जुड़े होने के किसी तरह के सबूत के लिए कम से कम छह महीने इंतजार किया. साजिश की जांच कर रहीं एजेंसियों से जब सबूत मिल गया तो उसे उन्होंने कांग्रेस आलाकमान से साझा किया. तब पायलट को एहसास हुआ कि उनका खेल खत्म हुआ.''

खेल खत्म हुआ हो या शुरू, पर आरोप-प्रत्यारोपों के तरीकों में एक खास तरह का पैटर्न दिखता है, जो कांग्रेस में यही कोई एक दशक से जारी है, यानी असंतोष और आपसी कलह पर काबू पाने में पार्टी आलाकमान की नाकामी और उसे ऐसे मुकाम पर जाने देना, जहां से वापसी न हो पाए. चाहे आंध्र प्रदेश में 2010 में जगनमोहन रेड्डी का निकलना हो, या 2015 में असम में हेमंत बिस्व सरमा, या इस साल मार्च में मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया, या फिर पायलट की हालिया बगावत, हर मामले में कांग्रेस की कमान हाथ में रखने वाला गांधी परिवार या तो समस्या से आंखें मूंदे रहा या देर से अलसाते-आंखें मलते उठा. इस तरह पार्टी रसूखदार नेता गंवा बैठी, जिन्होंने अपने-अपने राज्यों में कांग्रेस सरकारें गिराने के लिए अपनी अलग पार्टी बना ली या भाजपा में शामिल हो गए. राजनैतिक जानकारों का मानना है कि राजस्थान के इस संकट में पायलट कांग्रेस से विदा हो जाएंगे. वैसे, 69 वर्षीय गहलोत और 42 वर्षीय पायलट की इस कड़वाहट में एक विडंबना भी छुपी हुई है क्योंकि दोनों ने मिलकर छह साल पहले सही दिशा में राजनैतिक पहल शुरू की थी.

संकट का आगाज

राजस्थान में 2013 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के हाथों कांग्रेस बुरी तरह पराजित हुई और उसके पाले में कुल 200 सीटों में से सिर्फ 21 ही आईं. तब महीने भर बाद जनवरी 2014 में तत्कालीन केंद्रीय मंत्री सचिन पायलट को प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया गया. उन्हें राजस्थान में पार्टी में जान फूंकने का जिम्मा दिया गया. किसी युवा नेता को ऐसी बड़ी जिम्मेदारी देने का राजनीति में यह साहसिक फैसला था.

पायलट की शुरुआत भारी नाकामी के साथ हुई. कुछेक महीने बाद हुए लोकसभा चुनाव में देश भर में नरेंद्र मोदी की लहर में राज्य में कांग्रेस ने सभी 25 सीटें गंवा दीं. पायलट अपनी अजमेर सीट से भी हार गए. हार न मानने वाले पायलट ने अपना ठिकाना जयपुर बना लिया और अगले पांच साल तक समूचे राजस्थान का दौरा किया, भाजपा की वसुंधरा राजे सरकार के खिलाफ लगातार मुद्दे उठाए और धीरे-धीरे प्रदेश कांग्रेस में अपनी स्थिति मजबूत की. गहलोत लो-प्रोफाइल बने रहे लेकिन पार्टी में उनका दबदबा बहुत नहीं घटा. यह 2018 के विधानसभा चुनाव में टिकट बंटवारे से जाहिर होता है. गहलोत पार्टी अलाकमान के जरिए पायलट के कई उम्मीदवारों को बदलवाने में कामयाब हुए और कांग्रेस तथा भाजपा, दोनों के जिताऊ बागियों से संपर्क किया और उनसे एक तरह का चुनाव-पूर्व तालमेल कायम कर लिया.

आलाकमान को पायलट के बड़ी जीत के आश्वासन के उलट गहलोत ने भाजपा के साथ करीबी लड़ाई होने की बात की और सही साबित हुए. चुनाव नतीजों के बाद कांग्रेस बहुमत से बस एक सीट पीछे थी. गहलोत ने फौरन 13 निर्दलीय और दूसरी पार्टियों के 12 विधायकों का समर्थन हासिल किया और सरकार बनाने की स्थिति में आ गए.

तब तक पायलट भी जीत दिलाने के लिए अपना इनाम मांगने लगे. उन्होंने इंडिया टुडे से कहा, ''पार्टी को जीत दिलाने में अगुआई करने के नाते मैंने मुख्यमंत्री पद पर दावा किया था. मेरे पास इसकी वाजिब वजहें थीं. मैंने पार्टी का जिम्मा उस वक्त संभाला था जब हमारी सीटें महज 21 पर पहुंच गई थीं. अगले पांच साल तक गहलोत एक वाक्य भी नहीं बोले, जबकि मैं लोगों के बीच, कार्यकर्ताओं में जोश भरने का काम करता रहा. हमने राजे सरकार के कुशासन को उजागर करने में पुलिस का उत्पीड़न सहा. लेकिन जीत के बाद गहलोत ने अनुभव के आधार पर मुख्यमंत्री पद पर दावा ठोका. पर उनका अनुभव है क्या? 2018 के पहले वे दो बार 1999 और 2009 में मुख्यमंत्री रहे थे. दोनों बार के बाद के 2003 और 2013 के चुनावों में पार्टी को क्रमश: 56 और 21 सीटें ही दिलवा पाए.''

पायलट का दावा राहुल मानने को तैयार थे, लेकिन सोनिया और कांग्रेस के दिग्गजों ने गहलोत पर उंगली रख दी, जिन्हें ज्यादा विधायकों का समर्थन हासिल था. इसे पायलट के अध्यक्ष होने के बावजूद पार्टी में उनकी पकड़ का सबूत माना गया. हालांकि गहलोत भी महज चार महीने बाद 2019 के लोकसभा चुनाव में राज्य से कांग्रेस को अच्छी संख्या में सीटें दिलाने का वादा पूरा नहीं कर पाए. पायलट झुकने को तैयार नहीं थे मगर राहुल ने एक और वादा करके उन्हें मना लिया. राहुल के एक करीबी ने इंडिया टुडे को बताया, ''पायलट से साफ-साफ कहा गया कि उन्हें राजस्थान में सरकार के आखिरी 18 महीनों के लिए मुख्यमंत्री बनाया जाएगा.''

कांग्रेस के एक पुराने दिग्गज के मुताबिक, मौजूदा संकट की जड़ ''वाहियात किस्म का यही सियासी'' वादा है. चतुर सियासतदान गहलोत को इससे अपने उप-मुख्यमंत्री से हमेशा चौकन्ना रहने की वजह मिल गई जबकि इससे पायलट उप-मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि प्रतीक्षारत मुख्यमंत्री जैसे बर्ताव की उम्मीद करने लगे. शपथ ग्रहण समारोह में उन्होंने राज्यपाल और मुख्यमंत्री के साथ मंच पर बैठने पर जोर दिया. उसके बाद उसी कमरे में अपना दफ्तर रखा, जहां 50 साल तक मुख्यमंत्री बैठते रहे थे, और 15 साल पहले नई इमारत बनने के बाद यह बदला था. वे विधानसभा में भी उसी दरवाजे से अंदर गए, जो राज्यपाल, मुख्यमंत्री और विधानसभा अध्यक्ष के लिए होता है. सुरक्षा गार्ड ने उनसे दोबारा ऐसा न करने को कहा.

पायलट गृह और वित्त जैसे अहम मंत्रालय न मिलने से भी ठगा हुआ महसूस करते रहे, लेकिन शुरुआती छह महीने बिना किसी टकराव के गुजर गए क्योंकि गहलोत ने पायलट के विभाग में कोई दखल नहीं दी. हालांकि धीरे-धीरे खटास बढ़ने लगी क्योंकि गहलोत उनके साथ दूसरे वरिष्ठ मंत्रियों जैसा ही बर्ताव करते रहे, न कि प्रतीक्षारत मुख्यमंत्री की तरह, जैसा पायलट खुद को जाहिर करना चाहते थे. गहलोत ने एक आर्थिक अखबार से बातचीत में कहा है, ''पायलट डेढ़ साल तक साथ-साथ उप-मुख्यमंत्री और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रहे. उनके पास लोक निर्माण, ग्रामीण विकास और विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी जैसे अहम महकमें रहे. फिर भी, उन्होंने मौका गंवा दिया क्योंकि वे पूरा समय मुख्यमंत्री बनने का ख्वाब देखने और भाजपा के साथ मिलकर साजिश रचने में ही बिताते रहे.''

तनातनी का पहला संकेत 2019 के लोकसभा चुनावों के बाद उभरा, जब गहलोत के ऊंचे वादों के बावजूद पार्टी राजस्थान में एक सीट न जीत पाई. उनके बेटे वैभव गहलोत भी जोधपुर से 2,60,000 वोटों के भारी अंतर से हार गए. तब पायलट ने दिल्ली में आलाकमान को संदेश भेजा कि गहलोत से मुख्यमंत्री की गद्दी खाली करवा लेनी चाहिए. पायलट कहते हैं, ''गहलोत ने लोकसभा चुनावों में भारी जीत का वादा किया था. कांग्रेस उम्मीदवार गहलोत के अपने बूथ से भी न जीत सका.'' जवाब में गहलोत कहते हैं कि बतौर प्रदेश अध्यक्ष पायलट को हार की जिम्मेदारी लेनी चाहिए और जोधपुर समेत हर क्षेत्र का विस्तृत अध्ययन करना चाहिए, ताकि पता चले कि पार्टी हारी क्यों? बेटे की हार में भी उन्होंने पायलट की भूमिका का इशारा किया.

इस्तीफे का नतीजा

लोकसभा की हार के बाद के घटनाक्रम भी पायलट को राजनैतिक झटके दे गए. राहुल कांग्रेस अध्यक्ष पद से हट गए. सोनिया के हाथ कमान आ गई और गहलोत की पीठ पर हाथ रखने वाले पुराने नेताओं की तूती बोलने लगी. राहुल ने खुद को सीमित कर लिया तो पायलट की बेचैनी बढ़ गई. वे बतौर गृह मंत्री गहलोत के कामकाज पर सवाल उठाने लगे. उन्होंने आलाकमान तक राज्य में राजकाज की खामियों की बातें पहुंचाईं, जिसके बारे में कई बार गहलोत से पूछा भी गया. गहलोत ने उस बातचीत में कहा, ''जबसे सरकार बनी, वे (पायलट) बयानबाजी में लगे रहे, मेरे खिलाफ बोलते रहे, मीडिया में हमारी सरकार में भारी उठापटक की छवि बनाते रहे.''

पायलट इन आरोपों को खारिज करते हैं. उनका दावा है कि राहुल के इस्तीफे के बाद गहलोत ने उन्हें अपमानित करने और किनारे लगाने का कोई मौका हाथ से जाने नहीं दिया. पायलट दावा करते हैं, ''अफसरों से मेरे निर्देश न मानने को कहा गया था. मेरे पास फाइलें नहीं भेजी जाती थीं. कैबिनेट और विधायक दल की बैठकें महीनों नहीं हुईं.'' आरोप यह भी है कि उनके तहत लोक निर्माण विभाग के लिए रकम जारी करने में भी कोताही की गई.

5 दिसंबर, 2019 को जिला कलेक्टरों और पुलिस अफसरों की एक वीडियो कॉन्फ्रेंस में राज्य के मुख्य सचिव ने जब गहलोत से पूछा कि संबोधन के लिए क्या पायलट को भी बुलाएं, तो उनका जवाब था, ''अरे छोड़ो.'' कॉन्फ्रेंस में हिस्सा ले रहे पायलट ने यह सुना. वैसे, उप-मुख्यमंत्री की कोई संवैधानिक मान्यता तो होती नहीं, ऐसे में इस तरह की कॉन्फ्रेंस में पायलट के साथ दूसरे मंत्रियों जैसा ही बर्ताव होता था. एक और विवाद प्रदेश में कांग्रेस सरकार के एक वर्ष पूरे होने पर जारी 25 करोड़ रु. के इश्तहारों को लेकर था, जिसमें सिर्फ गहलोत के चित्र थे.

पायलट की नजर इधर गहलोत की कुर्सी पर थी और उधर गहलोत एक व्यक्ति एक पद के फॉर्मूले के तहत उन्हें प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद से हटवाने की फिराक में थे. कांग्रेस सूत्रों का कहना है कि इसी मकाम पर गहलोत ने पलटवार शुरू किया. पायलट उन्हें नाथने को आलाकमान पर दबाव बनाते रहे और साथ-साथ अपना सियासी करियर सुरक्षित रखने के उपाय भी सोचने लगे.

दिसंबर 2019 में अपनी सरकार के एक साल के जश्न के जलसे में ही उन्होंने अपनी सरकार के तख्तापलट का अंदेशा सार्वजनिक कर दिया था. 27 मार्च को निर्धारित राज्यसभा के चुनाव कोविड से निबटने को राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन के चलते जब टाले गए तो उन्होंने चुनाव आयोग पर आरोप मढ़ा कि राजस्थान और गुजरात में विधायकों की 'खरीद' के वास्ते भाजपा को वक्त देने के लिए उसने ऐसा किया है. इस पर गहलोत की आलोचना के लिए प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाकर पायलट ने यह शुबहा पैदा कर दिया कि वे भाजपा के पाले में कूदने की फिराक में थे. आखिर दो हफ्ते पहले ही तो उनके पुराने साथी ज्योतिरादित्य सिंधिया मध्य प्रदेश में दिग्गज कमल नाथ के हाथों मुख्यमंत्री की कुर्सी गंवा देने के बाद अपने समर्थक विधायकों के साथ भाजपा का पल्लू थाम चुके थे.

19 जून को राज्यसभा चुनावों के दिन गहलोत ने भाजपा पर विधायकों की खरीद-फरोख्त का आरोप लगाया, पायलट ने जिसका खंडन किया. गहलोत ने विधायकों को एक होटल में शिफ्ट किया और पार्टी के दो प्रत्याशियों की जीत पक्की करवाई. गहलोत ने यह कदम राजेश पायलट की पुण्यतिथि के ठीक एक दिन पहले 10 जून को उठाया. सचिन ने पिता को श्रद्धांजलि देने के लिए दौसा में कार्यक्रम रखा था, जिसमें उन्हें 60 विधायकों और 10 मंत्रियों के जुटने की उम्मीद थी. उन्होंने दावा किया कि आलाकमान के सामने अपने साथ ज्यादा विधायक होने की बात साबित करने को गहलोत ने उनके कार्यक्रम पर पानी फेरा.

गहलोत का अब दावा है कि पायलट के महीने भर बाद विधायकों को मानेसर के रेजॉर्ट ले जाने जैसी ही उस चाल को नाकाम करने के लिए वह कदम उठाया था. वे कहते हैं, ''वह न किया होता तो पायलट और भाजपा ने हमारा एक राज्यसभा प्रत्याशी हरा दिया होता और सरकार गिरा दी होती.'' राज्यसभा चुनाव में स्पष्ट जीत ने गहलोत को पायलट से सीधा आमना-सामना करने का भरोसा दे दिया. उन्होंने और कांग्रेस के मुख्य सचेतक महेश जोशी ने मुख्यमंत्री के अधीन ही आने वाले राज्य के भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो और स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप (एसओजी) के पास उनकी सरकार गिराने की साजिश की शिकायत दर्ज करवा दी.

और आखिरकार भिड़ंत

पायलट के लिए आखिरी उकसावा इस कथित साजिश में भाजपा के दो नेताओं की गिरफ्तारी के सिलसिले में बयान दर्ज के लिए जारी हुआ एसओजी का नोटिस था. यह गहलोत और दूसरों को भी भेजे जाने के बावजूद पायलट को लगा कि यह तो उनका सार्वजनिक अपमान और उनकी सियासी हत्या की कोशिश है. 11 जुलाई को दिल्ली के लिए रवाना होते हुए वे सबके संपर्क से दूर हो गए. इंटरव्यू में गहलोत कहते हैं, ''एसओजी ने मुझे बतौर मुख्यमंत्री, उन्हें बतौर (तत्कालीन) प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और उपमुख्यमंत्री, मुख्य सचेतक और चार विधायकों को सबूत पेश करने को कहा. हममें से और किसी को तो कोई दिक्कत नहीं हुई, पायलट ही क्यों फनफना उठे?''

मीडिया ने तो मानेसर के होटल में उनके साथ करीब 30 विधायक बताए पर संख्या आखिरकार 18 निकली. पायलट ने भाजपा में शामिल होने की बात से इनकार किया लेकिन मुख्यमंत्री की बुलाई विधायक दल की बैठक में भी शिरकत से इनकार किया, जो उपमुख्यमंत्री और प्रदेश पार्टी अध्यक्ष पद से उनकी विदाई का सबब बना. पायलट कहते हैं, ''मेरे स्वाभिमान को चोट पहुंची. प्रदेश पुलिस ने मुझे राजद्रोह का नोटिस भेजा. 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के घोषणापत्र में हमने राजद्रोह सरीखे नृशंस कानूनों को खत्म करने की मांग की थी. और यहां कांग्रेस सरकार अपने ही मंत्री के खिलाफ वह कानून आजमा रही थी.''

विधायक दल की दो बैठकों में न आने पर विधानसभा अध्यक्ष सी.पी. जोशी ने 15 जुलाई को पायलट और उनके समर्थक 18 विधायकों को पार्टी ह्विप की अवमानना करने के लिए अयोग्य घोषित करने का नोटिस दिया. पायलट विरोधियों का दावा है कि अयोग्य ठहराए जाने के डर से ही उन्होंने खुलकर भाजपा का साथ लेने या कांग्रेस छोड़ने की मंशा जताने से परहेज किया है. ऐसा कोई भी बयान उनकी विधायकी छीनने के लिए काफी होगा.

भाजपा से पायलट की गलबहियों को लेकर आश्वस्त कांग्रेस ने मध्य प्रदेश के सिंधिया प्रकरण से भी सबक लेते हुए दुतरफा रणनीति अपनाई. पायलट के खिलाफ सख्त कार्रवाई करते हुए गहलोत ने उन पर व्यक्तिगत हमला किया, ''अच्छी अंग्रेजी बोलना, चुटीले बयान देना और सुंदर दिखना ही सब कुछ नहीं होता. मायने यह रखता है कि देश के लिए आपके दिल में क्या है, आपकी विचारधारा, आपकी नीतियां और प्रतिबद्धता क्या है.'' दूसरे बागियों को भी अयोग्य घोषित करने के नोटिस के जरिए डराने और गहलोत के खेमे में लाने की कोशिश हो रही है.

दूसरी ओर, सुरजेवाला पायलट से लगातार सुलह की अपील कर रहे हैं. कांग्रेस जानती है कि गहलोत ने भले अभी सरकार बचा ली हो पर भाजपा का साथ लेकर पायलट के उलटवार का खतरा बरकरार है. वह नहीं चाहती कि पायलट 'शहीद' की मुद्रा में पार्टी से जाएं. सुरजेवाला कहते हैं, ''राहुल गांधी ने उन्हें छह और प्रियंका गांधी ने चार बार कॉल किया. गहलोत और पी. चिदंबरम भी बतियाए. हम उनकी शिकायतें सुनने और समाधान करने को तैयार हैं, पर वे तो आज ही सीएम बनना चाहते हैं.

राजनीति ऐसी भी ले-दे वाली नहीं हो सकती.'' पायलट इन आरोपों को बदनाम करने की चाल बताते हैं, ''कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधीजी और राहुल गांधीजी से मेरी कोई नहीं हुई. प्रियंका गांधीजी से निजी बातें हुईं. उनसे कोई समाधान नहीं हुआ.'' वे बार-बार इसे आहत स्वाभिमान की लड़ाई कहते हैं. पर दूसरी ओर, कर्नाटक और मध्य प्रदेश में अपनी पार्टी के मुख्यमंत्रियों से उलट गहलोत उन्हें हटाने की कथित भगवा साजिश से निबटने में कामयाब रहे हैं. अब उनकी चुनौती इसे तीन साल सुरक्षित रखने की है.

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