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खास रपटः इलाज की मरीचिका

शुरुआती उम्मीदों के बावजूद विशेषज्ञों का कहना है कि कोविड के गारंटीशुदा इलाज की अपनी खोज हमें धीमी करने की जरूरत.

दिमागी कसरत भी दिल्ली के सरदार पटेल कोविड केयर सेंटर में मरीजों के लिए योगा सेशन आयोजित करता एक स्वास्थ्यकर्मी दिमागी कसरत भी दिल्ली के सरदार पटेल कोविड केयर सेंटर में मरीजों के लिए योगा सेशन आयोजित करता एक स्वास्थ्यकर्मी

सोनाली आचार्जी

दिल्ली के लोकनायक जयप्रकाश नारायण अस्पताल का कोविड वार्ड अपने रजिस्टरों में कई दवाइयां लिखने और फिर हटाने का गवाह रहा है. इन दवाइयों को बाकायदा मंजूरी दी गई थी. मार्च में यहां के डॉक्टर मरीजों को ऐंटी-एचआइवी दवाइयां दे रहे थे. उसके बाद आई बहुचर्चित हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्विन (एचसीक्यू). फिर किस्म-किस्म के स्टेरॉइड और ऐंटी-बायोटिक दिए जाने लगे. आखिर में, कॉन्वलसेंट प्लाज्मा दिया जाने लगा, जिसे प्लाज्मा थेरेपी कहा जा रहा है.

छह महीनों तक तरह-तरह की दवाइयां और इलाज आजमाने के बाद डॉक्टरों का कहना है कि उन्हें उम्मीदें और आशंकाएं, दोनों हैं. इस अस्पताल के डायरेक्टर डॉ. सुरेश कुमार कहते हैं, ''मौतों के मुकाबले स्वस्थ होने वाले मरीजों की संख्या बढ़ रही है और शुरुआत में जितने गंभीर मरीज आ रहे थे, अब नहीं आ रहे. पर अब भी हमारे पास कोविड का कोई गारंटीशुदा इलाज नहीं है. लक्षणों के आधार पर हम मिला-जुलाकर कुछ दवाइयां आजमा रहे हैं.’’
अकेले भारत में कोविड के लिए 477 दवाइयों की जांच की गई है. डॉक्टरों को लगता है कि चमत्कारिक इलाज की खोज को अब धीमा कर देने का वक्त आ गया है. मुंबई के महात्मा गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (एमजीआइएमएस) के डायरेक्टर डॉ. एस.पी. कलंत्री कहते हैं, ''वैज्ञानिक परीक्षणों में वक्त लगता है और संपूर्ण प्रक्रिया पूरी करनी होती है. सैकड़ों छोटे-छोटे परीक्षण किए जा रहे हैं, पर हम हर महीने तरह-तरह के इलाज की झूठी उम्मीदें बंधाते नहीं रह सकते. अभी तक कोई गारंटीशुदा इलाज नहीं है.

दूसरे मकसदों के लिए प्रयोग होने वाली जिन दवाइयों में संभावना दिख रही है, उनके साइड इफेक्ट तो हम जानते हैं, पर कोविड के खिलाफ उनके असर का कोई सबूत हमारे पास नहीं है.’’ वे बताते हैं कि रेक्वडेसिविर और फैविपिराविर जैसी 'लोकप्रिय दवाइयां’, जिनका कोविड के इलाज में असरदार होना अभी साबित नहीं हुआ है, एमजीआइएमएस में प्रयोग नहीं की जातीं. पर विशेषज्ञों की इन चेतावनियों के बावजूद कि इलाज खोजने की जल्दबाजी में वैज्ञानिक गुणवत्ता के साथ समझौता नहीं किया जाना चाहिए, चिकित्सा समुदाय पर इलाज खोजने का बहुत दबाव बना हुआ है.

कोविड का जल्द कोई इलाज मिलने की गारंटी नहीं है, ऐसे में विश्व स्वास्थ्य संगठन के प्रमुख टेडरोस एडनोम गेब्रेयसस ने 22 सितंबर को कहा कि महामारी को संभालने के लिए हमारी बेहतरीन उम्मीदें अन्य बीमारियों के इलाज में काम आने वाली उन दवाओं पर टिकीं हैं जिनका कोविड के लिए प्रयोग किया जा रहा है. ब्रिटिश थिंक-टैंक पॉलिसी क्योर्स रिचर्स के अनुसार, दुनियाभर की सरकारों और बड़े परोपकारियों ने कोविड की दवा विकसित करने के लिए एक अरब डॉलर से ज्यादा का वादा किया है, जिसमें 50 फीसद से ज्यादा अमेरिका, उसके बाद कनाडा और फिर ब्रिटेन का योगदान होगा. सबसे ज्यादा ऐंटीवायरल दवाइयों पर विचार किया जा रहा है.

इस श्रेणी की दवाइयों पर सौ से ज्यादा परीक्षण चल रहे हैं जिनमें से नौ चौथे चरण में हैं. जिन दूसरी श्रेणियों की दवाइयों की पड़ताल चल रही है, उनमें इम्यूनोमॉड्यूलेटर यानी रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाली दवाइयां और ऐंटी-इफ्लामेटरी दवाइयां हैं. दिल्ली के आरएमएल अस्पताल के एक डॉक्टर कहते हैं, ''हर वह चीज आजमाने लायक है जिसमें कोविड मरीज को बचाने की क्षमता हो.’’

भारत में केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय थोड़े-थोड़े वक्त में इलाज के दिशानिर्देश जारी करता है. उनमें कई दवाइयां आती-जाती रही हैं. मार्च की शुरुआत में जब कोविड के शुरुआती मामले सामने आए थे, जयपुर के एसएमएस अस्पताल ने एचआइवी के इलाज में काम आने वाली ऐंटीरेट्रोवायरल दवाइयों, लोपिनाविर और रिटोनाविर को साथ देकर एक मरीज का सफल इलाज किया था.

तीन दिन बाद इन दोनों दवाइयों का जोड़ स्वास्थ्य मंत्रालय के इलाज के नियम-कायदों में शुमार हो गया. उसने 60 साल से ज्यादा उम्र के, कमजोर रोग-प्रतिरोधक क्षमता वाले, डायबिटीज, किडनी की नाकामी और फेफड़ों की गंभीर बीमारी से ग्रस्त मरीजों सहित ऊंचे जोखिम वाले मरीजों के लिए लोपिनाविर-रिटोनाविर की सिफारिश कर दी.

मार्च में पहले रोकथाम करने वाली दवा के तौर पर और फिर गंभीर मरीजों के लिए इलाज के लिए ऐंटीबायोटिक के साथ एचसीक्यू की भी घोषणा की गई. मध्य जून में अगले दिशानिर्देशों तक एचआइवी की दोनों दवाइयों की जगह एचसीक्यू ने ले ली, जब मध्यम से गंभीर मामलों में प्रयोग के लिए इसे अकेले लेने की सिफारिश की गई. साथ ही, ऐंटी-इफ्लामेटरी स्टेरॉइड मीथाइलप्रिडनिसोलोन इस फेहरिस्त में जोड़ दिया गया.

जब डब्ल्यूएचओ ने कोविड के संभावित इलाज के लिए एचसीक्यू के परीक्षणों पर पूरी तरह रोक लगाने का फैसला लिया, तब दिशानिर्देशों के तीसरे और चौथे संस्करणो में मलेरिया-रोधी दवाई एचसीक्यू का इस्तेमाल केवल हल्के और मध्यम लेकिन ज्यादा जोखिम वाले (जहां दूसरी बीमारियों भी हों) मामलों में रोकथाम की दवाई के तौर पर करने के लिए कहा गया. इंडियन फार्मास्यूटिकल एसोसिएशन के प्रेसिडेंट डॉ. टी. नारायण कहते हैं, ''कोविड के खिलाफ एचसीक्यू का ज्यादा फायदेमंद कभी साबित नहीं हुआ. कुछ छोटे-मोटे अध्ययन जरूर हैं जो रोकथाम की दवाई के तौर पर इसका असरदार होना साबित करते हैं.

भारत अब ऐसी स्थिति में आ गया है जहां कोविड के कुछ प्रमुख और खतरनाक पहलुओं—वायरस का अपनी नकलें तैयार करना, साइटोकाइन बहुत ज्यादा बनना और जलन-सूजन—पर नियंत्रण के लिए ज्यादा मिली-जुली दवाइयों का प्रयोग किया जा रहा है. स्टेरॉइड के विवेकपूर्ण इस्तेमाल से भी फर्क पड़ा है. वैसे, ज्यादा या अस्थिर ब्लड शुगर वाले मरीजों को स्टेरॉइड देना मुश्किल बना हुआ है और इसलिए इन मामलों में मृत्यु दर अब भी बहुत ज्यादा है. इसके बाद हमें ज्यादा जोखिम वाले कोविड से निपटने की जरूरत है.’’

रेम्डेसिविर से उम्मीदें
कोविड के बारे में नैदानिक दिशानिर्देशों के हालिया संस्करण से इलाज में आमूलचूल बदलाव आया है. हल्के से मध्यम मामलों में, जो कोविड के कुल मामलों के करीब 85 फीसद हैं, ये दिशानिर्देश खून के थक्के जमने से रोकने के लिए थक्कारोधी दवाइयों और डेक्सामीथैसोन जैसे कोर्टिकोस्टेरॉइड की सिफारिश करते हैं.

यूनिवर्सिटी ऑफ ऑक्सफोर्ड के परीक्षण में डेक्सामीथैसोन से वेंटिलेटर पर रखे गए मरीजों की मृत्यु दर में एक-तिहाई तक कमी आई थी. गंभीर मामलों के लिए इन्हीं दवाइयों के साथ दो खोजपरक दवाइयों—रेम्डेसिविर और टोसिलिजुमाब (जिसके पक्ष या विपक्ष में अमेरिका को पर्याप्त सबूत नहीं मिले)—की सिफारिश की गई. इनमें रेम्डेसिविर भारत में इतनी लोकप्रिय हो गई कि कुछ राज्यों में इसकी खुराक कम पड़ गई और कालाबाजारी होने लगी.

डॉ. नारायण कहते हैं, ''इसकी वजह भारत में लॉन्च करते वक्त इसको मिला प्रचार-प्रसार और इसका दिखाई देना है.’’ रेम्डेसिविर उन दवाइयों में है जिन पर सबसे ज्यादा नजर है. भारत सरकार की एक विशेषज्ञ समिति ने हाल में इसके चौथे चरण के परीक्षणों की मंजूरी दी है. तीन कंपनियों को यह मंजूरी मिली है, वे हैं हेटेरो लैब्स, सिप्ला और मायलान.

फिलहाल सरकारी दिशानिर्देशों में ऐसे मरीजों के लिए, जिनमें जिगर को नुक्सान के संकेत हों, गुर्दे में गंभीर गड़बडिय़ां हों, गर्भवती या दूध पिलाने वाली माताएं हों या 12 साल से छोटे बच्चे हों, रेम्डेसिविर के इस्तेमाल पर रोक लगाई गई है. फिर भी इसकी मांग में लगातार उछाल आ रहा है, खासकर जब मरीजों के खुद ही यह दवाई लेने के उदाहरण सामने आए हैं. महाराष्ट्र के स्वास्थ्य मंत्री राजेश टोपे कहते हैं, ''यह दवाई इस्तेमाल के लिए ही मंजूर की गई है पर इसका इस्तेमाल विवेक के साथ करना चाहिए.’’

राज्य की रिकवरी दर देश में सबसे ज्यादा—29 सितंबर को दस लाख से ज्यादा—है. कई राज्य अब रेम्डेसिविर और कोविड की दूसरी दवाइयों की कालाबाजारी के खिलाफ अभियान चलाने का मंसूबा बना रहे हैं. हाल में गुजरात के राजकोट में इसकी जमाखोरी के लिए छह लोगों को गिरफ्तार किया गया. यही वजह है कि इसकी पेटेंट धारक कंपनी गिलिएड ने सप्लाइ बढ़ा दी है और होम आइसोलेशन में रह रहे मरीजों को नेब्यूलाइजर के जरिए इसे देने की संभावना की छानबीन कर रही है, ताकि इंजेक्शन से दी जाने वाली दवाई अस्पतालों में भर्ती ज्यादा गंभीर मरीजों के लिए अधिक उपलब्ध हो सकें.

एसएमएस अस्पताल के डायरेक्टर डॉ. सुधीर भंडारी कहते हैं, ‘‘इस दवाई ने उम्मीद बंधाई है पर यह अस्पतालों में इलाज के दूसरे तरीकों और नैदानिक कदमों के साथ ही कारगर होती है. आज अस्पतालों में किया जा रहा कोविड का इलाज अब तक का सबसे मजबूत इलाज है. पर लोगों को चाहिए कि वे डॉक्टरों की सलाह लें और घर पर अपनी मर्जी से दवाइयां न लें.’’

कई सारे छोटे-छोटे परीक्षण
भारत के परीक्षणों में इलाज के अन्य विकल्पों पर भी विचार किया गया है. 23 दवाइयों पर आइआइटी दिल्ली के शोध में पाया गया कि 'टेरिकोप्लैनिन’ कोविड के खिलाफ एचसीक्यू के मुकाबले 10 गुना ज्यादा असरदार है. यह एफडीए से स्वीकृत ग्लायकोपेप्टाइड ऐंटीबायोटिक है, जिसका प्रयोग कम विषाक्तता वाले मरीजों में बैक्टीरिया के संक्रमण का इलाज करने के लिए नियमित रूप से किया जाता है. सनोफी और रीजेनेरोन नामक फार्मास्यूटिकल कंपनियों की विकसित की गई ऐंटी-इफ्लामेटरी दवा केवजरा ने भी कोविड के गंभीर मरीजों में फेफड़ों की सूजन रोकने की संभावना दर्शाई है.

अलबत्ता विशेषज्ञों को लगता है कि इनमें से कई परीक्षण नमूने की संख्या के लिहाज से छोटे स्तर के परीक्षण हैं और उनमें एक दूसरे के साथ या प्लेसीबो समूह के साथ उपचारों की तुलना नहीं की जाती. इन्हें तेजी और आसानी से किया जा सकता है पर इनके नतीजे वैज्ञानिक तौर पर उतने पुख्ता नहीं होते जितने अच्छी और पूरी तैयारी के साथ, हालांकि लंबे चलने वाले, अध्ययन में होते हैं. भारत में किए जा रहे 477 में से करीब 193 परीक्षण महज अवलोकन के लिए किए जा रहे अध्ययन हैं और कई चरण वाले बेतरतीब क्लिनिकल परीक्षण नहीं हैं. इसके अलावा, कम से कम 53 परीक्षण पारंपरिक भारतीय उपचारों तथा होम्योपैथी के अध्ययन हैं.

हैदराबाद के राष्ट्रीय औषधीय शिक्षा और अनुसंधान संस्थान में फार्मेकोलॉजी और टॉक्सिकोलॉजी के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. आशुतोष कुमार कहते हैं, ''कुल जमा 50 जितने कम मरीजों पर किए गए परीक्षण हैं जिनमें कोई नियंत्रण समूह या प्लेसीबो समूह भी नहीं है. ऐसी रिसर्च छोटी होती है और ज्यादा से ज्यादा इतना बता सकती है कि दवाई में संभावना है. यह असर की गारंटी नहीं दे सकती.’’ छोटे समूह पर किए गए परीक्षण के उदाहरणों में शामिल हैं बायोकॉन की इटोलिजुमाब के दूसरे चरण के परीक्षण के लिए 30 भागीदार; पतंजलि की कोरोनिल के लिए 100; और ग्लेनमार्क की फैविपिराविर के तीसरे चरण के परीक्षण के लिए 150 भागीदार.

यूरोप में दूसरे चरण का परीक्षण 5,000 और तीसरे चरण का परीक्षण 20,000 से कम भागीदारों पर नहीं किया जाता. यही नहीं, वे बहुत-सी जगहों पर फैले होते हैं. मसलन, ब्रिटेन की रिकवरी ट्रायल में छह जगहों के लोगों के नमूने लिए गए, जबकि डब्ल्यूएचओ की सोलिडेरिटी ट्रायल 21 देशों में किए गए.

स्वास्थ्य पेशेवरों और सिविल सोसाइटी कार्यकर्ताओं के एक समूह ने 5 अगस्त को स्वास्थ्य मंत्रालय को लिखा और भारत में क्लिनिकल परीक्षणों तथा दवा विनियमन में अधिक पारदर्शिता की मांग की. उन्होंने कहा कि क्लिनिकल ट्रायल रजिस्ट्री को ऐसे परीक्षणों की अनुमति देने वाली समितियों की बैठकों के ब्योरे अपलोड करने चाहिए. उन्होंने यह भी कहा कि यह रजिस्ट्री फिलहाल जांचकर्ताओं से यह मांग नहीं करती कि वे प्राइमरी डेटा सेट की जानकारी, फाइल की टिप्पणियां और दवाओं को स्वीकृति या अस्वीकृति के तर्क और कारण प्रकाशित करें.

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि पारंपरिक तौर पर भारत के रिसर्च डेटा की गहरी छानबीन नहीं की जाती. कोविड पर भारत की कोई भी रिसर्च अभी तक पीयर-रिव्यूड जर्नल में स्थान नहीं बना सकी है. डॉ. नारायण कहते हैं, ‘‘ढेर सारा डेटा प्रकाशित कृतियों के जरिए नहीं बल्कि प्रेस विज्ञप्तियों के जरिए बताया जा रहा है.’’ भारत में 67 लाख मामलों (5 अक्तूबर तक) को देखते हुए, कोविड  का इलाज खोज रही दवा कंपनियों के लिए देश के बिक्री का शानदार बाजार बनने की विपुल क्षमता और संभावना है. मगर पर्याप्त डेटा और रिसर्च के बगैर इलाज या वैक्सीन की तमाम उम्मीदें बहुत भरोसा नहीं जगातीं. 

—सोनाली आचार्जी

डब्ल्यूएचओ ने कोविड के संभावित इलाज के लिए एचसीक्यू के परीक्षणों पर रोक लगाने का फैसला लिया तो यह रोकथाम की दवा के तौर पर इस्तेमाल होने लगा


भारत में रेम्डेसिविर की मांग इतनी ज्यादा हो गई कि कुछ राज्यों में इसकी खुराक कम पड़ गई है, और यहां तक कि इसकी कालाबाजारी भी होने लगी

इलाज का सिलसिला
बीते छह महीनों के दौरान स्वास्थ्य मंत्रालय के नैदानिक दिशानिर्देशों में कई दवाइयां शामिल की जाती और हटाई जाती रही हैं, इस आधार पर कि उस वक्त किस दवाई में सबसे ज्यादा संभावना नजर आती थी

भारत में कोविड के लिए दवा
17 मार्च

दवाई: लोपिनाविर और रिटोनाविर
उपयोग: एचआइवी के इलाज के लिए इस्तेमाल ऐंटीवायरल 
मौजूदा स्थिति: अब इलाज में शामिल नहीं

23 मार्च
दवाई: हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन (एचसीक्यू)
उपयोग: मलेरिया-रोधी दवाई; रोकथाम की दवाई के तौर पर सिफारिश की गई
मौजूदा स्थिति: निरोधक उपचार के लिए इस्तेमाल की जा रही है

31 मार्च
दवाई: एचसीक्यू + एजीथ्रोमाइसिन
उपयोग: मलेरिया-रोधी दवाई, ऐंटीबायोटिक के साथ, गंभीर लक्षणों के इलाज के लिए
मौजूदा स्थिति: अब इस्तेमाल नहीं की जा रही है

दवाई: मिथाइल-प्रीडनिसोलोन
उपयोग: जलन-सूजन-रोधी दवाई
मौजूदा स्थिति: दूसरी ज्वलन-रोधी दवाइयों के साथ अब भी इस्तेमाल की जा रही है

27 मार्च
दवाई: एचसीक्यू, हल्के से मध्यम मरीजों के लिए
उपयोग: मलेरिया-रोधी दवाई जो अब उपचार की दवाई के तौर पर इस्तेमाल की जा रही है लेकिन गंभीर मामलों में नहीं

दवाई: रेम्डेसिविर
उपयोग: मध्यम से गंभीर मामलों में आपातकालीन इस्तेमाल के अधिकृत; उनके लिए जो ऑक्सीजन पर हैं लेकिन वेंटीलेटर पर नहीं हैं

दवाई: टोसिलिजुमाब
उपयोग: प्रोटीन निरोधक जो साइटोकाइन स्टॉर्म्स को रोकने में मदद करता है; मध्यम मामलों में या जो वेंटिलेटर पर हैं या जिनकी हालत में स्टेरॉइड से सुधार नहीं आ रहा हो, उनके लिए आपातकालीन इस्तेमाल के लिए अनुशंसित

दवाई: फैविपिराविर
उपयोग: ऐंटी-फ्लू दवाई, हल्के मामलों में अनुशंसित

दवाई: डेक्सामिथैसोन
उपयोग: हल्के मामलों में देने की सलाह; तीन दिन के लिए दी जाए, बेहतर हो कि भर्ती होने के बाद 48  घंटों के भीतर या जब ऑक्सीजन की जरूरत हो या जलन-सूजन के संकेत बढ़ गए हों या बढ़ रहे हों

देशों में चल रहे परीक्षण

केवल एलोपैथिक दवाओं के लिए मध्यम से बड़े स्तर के परीक्षण

कोविड के इलाज जिनकी संभावना बढ़ रही है

स्टेरॉयड
दवाई: हाइड्रोकोर्ट
उपयोग: गंभीर मामलों में; जलन-सूजन और साइटोकाइन के अत्यधिक उत्पादन को कम करती है
किस देश में परीक्षण: ब्रिटेन
ऐंटी-इफ्लामेटरी
दवाई: एडालिमुमाब
उपयोग: मध्यम से गंभीर मामलों में; कोविड मरीजों में सूजन और जलन कम होना दर्शाया है
किस देश में परीक्षण: ब्रिटेन

रिकॉक्मिबनेंट हाइपरइम्यूंस
दवाई: गीगा-2050
उपयोग: सभी मामलों में; रिकॉम्बिटेंट ऐंटीबॉडीज के साथ प्लाज्मा से निकाले गए ऐंटीबॉडीज दोनों के फायदे मिलते हैं
किस देश में परीक्षण: अमेरिका

ऐंटीबायोटिक
दवाई: टेरिकोप्लैनिन
उपयोग: सभी मामलों में; कोविड वायरस को अपनी नकल तैयार करने से रोकती है
किस देश में परीक्षण: भारत

स्रोत: कोविड एनएमए प्रोजेक्ट; स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय; और कोविड19 इंडिया डॉट ओआरजी

महामारी की शुरुआत के बाद पांच सुझाव
मध्यम मामलों में भी ब्लड ऑक्सीजन के स्तर की लगातार निगरानी

अंगों में सूजन और जलन को कम करने के लिए स्टेरॉयड्स और इम्युनो-सप्रेसेंट्स का प्रबंधन

खून के थक्के कम करने के लिए ब्लड थिनर्स और ऐंटी-कोएगुलेंट्स का प्रबंधन

मरीजों की निगरानी के लिए, गंभीर मामलों से मध्यम मामलों को अलग करना और उन्हें घर में भी खुद अपना इलाज करने कहना

एक बार संक्रमण समाप्त हो जाने के बाद भी किसी भी तरह की परेशानी से बचने के लिए रिकवरी के बाद लगातार जांच और देखभाल.
 

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