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बीमा दावा निबटान का अंतहीन इंतजार

देश के 16 राज्यों में हजारों किसान सालों बाद भी फसल बीमा दावों के निबटान की बाट जोह रहे हैं, दूसरी ओर विभिन्न वजहों से बीमित क्षेत्र और किसानों की संख्या लगतार घटती जा रही है.

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...सब चौपट हो गया पटियाला के एक गांव में धान की बर्बाद फसल का जायजा लेते किसान ...सब चौपट हो गया पटियाला के एक गांव में धान की बर्बाद फसल का जायजा लेते किसान

गंभीर जाट ने साल 2020 के खरीफ सीजन में 7.5 हेक्टेयर जमीन में सोयाबीन की बुआई की थी. उन्हें उम्मीद बंधी कि उत्पादन अच्छा हुआ तो साल 2016 में खेती के लिए जो आठ लाख रु. का कर्ज लिया था, उसका कुछ हिस्सा चुका देंगे. लेकिन मौसम ने साथ नहीं दिया, अत्यधिक बारिश हुई और उनकी उम्मीदों पर पानी फिर गया. 

मध्य प्रदेश के देवास जिले के रिछी गांव के निवासी गंभीर ने फिर से अपने आप को दिलासा दिया कि  प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (पीएमएफबीवाइ) के तहत इसकी भरपाई हो जाएगी. सिर्फ उनकी ही नहीं, उनके पूरे गांव की फसल बर्बाद हो गई थी. गांव के लोगों को एक एक करके बीमा मिलता गया, लेकिन आज भी वे बीमा राशि का इंतजार कर रहे हैं.

वे कहते हैं, ''इसमें करीब 80 हजार रु. की लागत आई थी. लेकिन पूरी फसल बर्बाद हो गई. लागत तो दूर, हमारी खुद की मजदूरी भी नहीं निकल पाई. हमने बीमा कंपनी को 5,400 रु. का प्रीमियम दिया था. लेकिन आज तक एक रुपए का भी बीमा क्लेम नहीं मिला है.’’ उन्होंने बताया कि गांव वालों को करीब 11 हजार रु. प्रति हेक्टेयर की दर से क्लेम मिला है, इस आधार पर उन्हें करीब 80 हजार रु. क्लेम मिलना चाहिए.

यह समस्या किसी एक किसान या किसी एक राज्य की नहीं है. देश के कई किसान समयसीमा बीत जाने के सालों बाद भी फसल बीमा की रकम मिलने का इंतजार कर रहे हैं. खुद सरकारी दस्तावेज इसकी तस्दीक करते हैं. इंडिया टुडे को सूचना का अधिकार (आरटीआइ) कानून, 2005 के तहत प्राप्त दस्तावेजों से पता चलता है कि देश के 16 राज्यों में किसानों को करीब 2,700 करोड़ रु. का बीमा दावा या क्लेम मिलना बाकी है. ये राशि रबी 2019-20 से खरीफ 2021 सीजन यानी पिछले दो साल की है.

यह स्थिति तब है जब प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना की गाइडलाइन में स्पष्ट कहा गया है कि अगर बीमा दावों के भुगतान में देरी होती है तो कंपनियों को किसानों को 12 फीसद ब्याज देना होगा.

खास बात यह है कि इन दो सालों या चार सीजन (रबी 2019-20, खरीफ 2020, रबी 2020-21, खरीफ 2021) में बीमा कंपनियों ने 58,854 करोड़ रु. का प्रीमियम इकट्ठा किया, जिसमें से उन्हें कुल 26,469 करोड़ रु. के दावे का ही भुगतान करना पड़ा है. इन कंपनियों को मिले कुल प्रीमियम में से 7,817.5 करोड़ रु. किसानों ने दिया था. बाकी केंद्र सरकार ने 24,364.62 करोड़ रु. और राज्यों ने 26,672 करोड़ रु. का प्रीमियम दिया था.

इस योजना के तहत बीमित राशि का जितना प्रीमियम बनता है उसमें से किसानों को खरीफ सीजन के लिए 2 फीसद और रबी फसलों के लिए 1.5 फीसद प्रीमियम देना होता है. वाणिज्यिक/बागवानी फसलों के लिए किसानों को पांच फीसद प्रीमियम देना होता है. बाकी का प्रीमियम राशि केंद्र और राज्य सरकारें 50:50 फीसद के अनुपात में सब्सिडी के रूप में देती हैं. पूर्वोत्तर राज्यों के लिए यह अनुपात 90:10 है, यानी केंद्र 90 फीसद और राज्य 10 फीसद राशि देते हैं.

कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय की ओर से 23 मार्च, 2022 को मुहैया कराई गई जानकारी के मुताबिक, पीएमएफबीवाइ के तहत रबी 2019-20 सीजन के लिए 255.93 करोड़ रु. का दावा किसानों को नहीं मिला है. वहीं खरीफ 2020 सीजन का 1024.65 करोड़ रु., रबी 2020-21 सीजन का 605.62 करोड़ रु. और खरीफ 2021 सीजन का 812.44 करोड़ रु. का दावा राशि अभी नहीं मिली है. वैसे, कंपनियों ने 90.74 फीसद दावा राशि का भुगतान कर दिया है.

किस राज्य में कितना बकाया

सबसे ज्यादा मध्य प्रदेश के किसानों का 936.03 करोड़ रु. की दावा राशि लंबित है. फिर राजस्थान (497.64 करोड़ रु.), महाराष्ट्र (445.4 करोड़ रु.), उत्तर प्रदेश (201.17 करोड़ रु.) छत्तीसगढ़ (33.77 करोड़ रु.) और तमिलनाडु (306.16 करोड़ रु.) का नंबर है.

दस्तावेज दर्शाते हैं कि इस बीच बीमा कंपनियों ने रबी 2019-20 सीजन में 8408.18 करोड़ रु., खरीफ 2020 में 20,554.11 करोड़ रु., रबी 2020-21 में 11,123.61 करोड़ रु. और खरीफ 2021 में 18,768.36 करोड़ रु. का प्रीमियम इकट्ठा किया था.

वहीं इस अवधि में कंपनियों ने 5641.60 करोड़ रु., 12858.5 करोड़ रु., 4606.30 करोड़ रु. और 3362.63 करोड़ रु. के फसल बीमा दावों का भुगतान किया है. आरटीआइ के तहत प्राप्त दस्तावेज दर्शाते हैं कि पिछले दो साल में एग्रीकल्चर इंश्योरेंस कंपनी (एआइसी) पर सबसे ज्यादा 1414.72 करोड़ रु. का फसल बीमा दावा बकाया है (देखें: किस कंपनी पर कितना बकाया).

दावा भुगतान देरी की वजह

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में तीन जिम्मेदार स्टेकहोल्डर्स हैं—केंद्र, राज्य और बीमा कंपनियां. इस योजना के तहत तीनों के बीच काफी कशमकश है. केंद्र का कहना है कि राज्य समय पर सब्सिडी जारी नहीं करते, राज्यों का कहना है कि प्रीमियम ज्यादा है और बीमा कंपनियां कहती हैं कि उनके पास प्रीमियम सब्सिडी समय पर नहीं आती, इसलिए वे किसानों को दावे का भुगतान नहीं कर रहे हैं.

केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने 30 नवंबर, 2021 को लोकसभा में एक सवाल के जवाब में कहा था कि फसल कटाई प्रयोग (सीसीई) यानी नुक्सान का सर्वे या कटाई अवधि पूरा होने के दो महीने के भीतर बीमा कंपनियों को दावों का भुगतान करना चाहिए.

फसल नुक्सान का आकलन करने के लिए कटाई से पहले सीसीई कराया जाता है. इसका आंकड़ा मिलने के दो हफ्ते के भीतर बीमा कंपनियों को दावे का निपटारा करना होता है. सीसीई के तहत एक टीम सर्वे करने जाती है, जिसमें सरकारी अधिकारी और बीमा कंपनी के प्रतिनिधि होते हैं. 

सदन में पेश किए गए आंकड़ों में इस बात पर जोर दिया गया था कि राज्यों का प्रीमियम सब्सिडी जारी न करना और पेमेंट फेल होना, दावा भुगतान में देरी की प्रमुख वजह है. कृषि मंत्री के मुताबिक, 2018-19 से 2020-21 के बीच किसानों को 2,565 करोड़ रु. का दावा समय पर इसलिए नहीं दिया जा सका क्योंकि राज्यों की ओर से प्रीमियम सब्सिडी लंबित थी. 

बीमा कवरेज में आ रही कमी

2016 के खरीफ सीजन से प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना की शुरुआत की गई थी. लेकिन बीमा दावों के निपटारे में देरी और दूसरी वजहों से बीमित जमीन का रकबा लगातार घट रहा है.

कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, साल 2018 से 2021 के बीच खरीफ सीजन के लिए किसानों के कवरेज में 30 फीसद से अधिक की कमी आई है. साल 2018 के खरीफ सीजन में 2.16 करोड़ किसान प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत कवर किए गए थे, जो कि साल 2021 में घटकर 1.50 करोड़ हो गए.

इसी तरह प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत भूमि कवरेज में भी कमी आई है. साल 2018 में खरीफ सीजन में जहां 2.77 करोड़ हेक्टेयर भूमि बीमाकृत थी, वहीं साल 2021 में यह घटकर 2.39 करोड़ हेक्टेयर हो गई. यानी कि इन तीन साल में 38.5 लाख हेक्टेयर भूमि पीएमएफबीवाइ के दायरे से बाहर हो गई.

इसी तरह साल 2018 के रबी सीजन में जहां 1.97 करोड़ हेक्टेयर भूमि प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत बीमाकृत थी, वहीं 2021 में घटकर 1.48 करोड़ हेक्टेयर हो गई.

शुरू में जब इस बीमा योजना को लागू किया गया था तो 27 राज्यों ने इसमें भाग लिया था. लेकिन धीरे-धीरे करके सात राज्य—आंध्र प्रदेश, झारखंड, तेलंगाना, बिहार, गुजरात, पंजाब और पश्चिम बंगाल इससे बाहर हो गए. इन प्रदेशों ने अपनी अलग राज्य आधारित बीमा योजना शुरू की है. इनका कहना है कि प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत प्रीमियम काफी ज्यादा लग रहा है, जिसके कारण उनके कृषि बजट का काफी हिस्सा बीमा सब्सिडी भुगतान में ही चला जाता है.

आलम यह है कि 29 राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों में से इस समय चल रहे रबी 2021 सीजन में सिर्फ 19 ने ही भाग लिया है. देश के 700 से अधिक जिलों में से 410 जिलों ने 2021 में इस योजना में भाग लिया था.

साल 2016 में मध्य प्रदेश में फसल बीमा योजना को लॉन्च करने के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि अगर किसी गांव में एक किसान की भी फसल बर्बाद होती है तो उसे बीमा का फायदा मिलेगा. हालांकि इस बीमा योजना के तहत बीमित फसलों की संख्या में भी लगातार गिरावट आ रही है.

खरीफ 2018 में कुल 38 कृषि फसलों को इस योजना के दायरे में रखा गया था. लेकिन 2021 में यह घटकर महज 26 हो गई. इसी तरह बागवानी फसलों की संख्या भी इन तीन साल में 57 से घटकर 47 हो गई हैं. वहीं रबी 2018 में 40 कृषि फसलें इस बीमा योजना के दायरे में थीं, लेकिन 2021 में ये घटकर 38 हो गईं. हालांकि रबी सीजन की बीमित बागवानी फसलों की संख्या 82 से बढ़कर 92 हो गई है.

बजट में कमी
प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना को लेकर एक सवाल यह भी उठता रहा है कि केंद्र सरकार इसका बजट पर्याप्त नहीं रख रही है, जिसके कारण किसानों के नुक्सान का उचित आकलन के लिए अपडेटेड तकनीक नहीं है, नतीजतन सर्वे गलत होता है और किसानों को फसल क्षति की उचित भरपाई नहीं होती.

दस्तावेज भी इसकी पुष्टि करते हैं. केंद्रीय कृषि मंत्रालय ने इस योजना में बेहतर तकनीक लाने के लिए इस बार के बजट 2022-23 में अतिरिक्त राशि की मांग की थी. मौजूदा वित्त वर्ष के लिए जब बजट तैयार किया जा रहा था तो केंद्रीय कृषि मंत्रालय में डिप्टी सचिव (बजट) चंद्रजीत चटर्जी ने 22 अक्तूबर, 2021 को वित्त मंत्रालय को एक प्रस्ताव भेजा था, जिसमें उन्होंने मांग की थी कि प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना का बजट 19,000 करोड़ रु. किया जाना चाहिए. पिछले वित्तीय वर्ष में यह रकम 16,000 करोड़ रु. थी. लेकिन वित्त मंत्रालय ने इसे मंजूरी नहीं दी. इस साल का बजट 15,500 करोड़ रु. है, जो पिछले साल के मुकाबले 500 करोड़ रु. कम है.

कृषि मंत्रालय ने कहा था कि इस योजना का बजट बढ़ाना इसलिए जरूरी है क्योंकि बीमित राशि में बढ़ोतरी हुई है, प्रीमियम रेट भी बढ़ें हैं और इस दिशा में बेहतर तकनीक लाने की जरूरत है. सीमित बजट, उसे जारी करने में देरी और नुक्सान आकलन की पुरानी तकनीकी और सबसे बढ़कर दावे निबटाने में देरी की वजह से किसान अपनी फसल का बीमा कराने से कतरा रहे हैं. इस तरह नेक इरादों वाली एक और योजना सिकुड़ती जा रही है.

—धीरज मिश्रा

 

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