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विश्व पर्यावरण दिवसः प्लास्टिक की पहाड़ जैसी चुनौती

इस साल 5 जून को विश्व पर्यावरण की मेजबानी भारत कर रहा है जिसका थीम है 'प्लास्टिक को हराओ.' इसे सरकार, लोगों और एजेंसियों के रिड्यूस, रियूज और रिसाइकल के मंत्र से मिल रही बढ़त.

गाजीपुर लैंडफिल, दिल्ली गाजीपुर लैंडफिल, दिल्ली

वह दूर से पहाड़ जैसा दिखता है. आप चक्कर में पड़ जाते हैं कि शहर से बाहर अभी निकले नहीं और यह पहाड़ कहां से आ गया. धीरे-धीरे आपको एहसास होता है कि अरे, यह तो पूरा कचरे का पहाड़ है! यह दिल्ली के मुहाने पर गाजीपुर लैंडफिल इलाका है, जो 70 एकड़ में फैला है और 50 मीटर ऊंचा है.

आंकड़े हैरान करने वाले हैं. भारत में 10 फीसदी सालाना की बढ़ोतरी के साथ प्लास्टिक बनाया जा रहा है. केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के 2016 के अनुमानों के मुताबिक, रोज 15,000 टन प्लास्टिक का कचरा पैदा होता है, जिसमें से 9,000 टन इकट्ठा करके प्रॉसेस किया जाता है, जबकि बाकी 6,000 टन आम तौर पर नालियों और सड़कों पर गंदगी फैलाने के लिए छोड़ दिया जाता है या लैंडफिल यानी कचरा जमा करने वाले स्थलों पर पाट दिया जाता है.

तकरीबन 80 लाख टन प्लास्टिक हर साल समुद्रों में पहुंच जाता है और समुद्री जीवन के लिए खतरा पैदा कर देता है. कचरे को छांटना एक बड़ी समस्या है. लैंडफिल में जमा प्लास्टिक आसपास की मिट्टी, जमीन और यहां तक कि पानी को भी दूषित करता है.

बढ़ते संकट को देखते हुए इस साल विश्व पर्यावरण दिवस की थीम 'प्लास्टिक को हराओ' तय की गई है. भारत इसका मेजबान है और इसकी अगुआई संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम कर रहा है. कार्यक्रम के मुखिया एरिक सोल्हेम कहते हैं, ''चिंता की बात है कि एक बार इस्तेमाल वाले प्लास्टिक का चलन बढ़ रहा है.

उत्पादन और खपत का पैटर्न आने वाले दशक में या उसके बाद भी दोगुनी बढ़ोतरी दिखा रहा है. तो अभी हम इसमें भले तैर रहे हैं, पर जल्दी ही डूब जाएंगे.''

प्लास्टिक की लत

हम सब सालाना तकरीबन 11 किलो प्लास्टिक का इस्तेमाल करते हैं. भारत में एक बार इस्तेमाल किया जाने वाला प्लास्टिक बढ़ रहा है. इसे रिसाइकल कर पाना तकरीबन नामुमकिन है क्योंकि इसमें से ज्यादातर की मोटाई 50 माइक्रॉन से कम है और इसके गलने-नष्ट होने में 400 साल से ज्यादा लगेंगे.

कैरी बैग, स्ट्रॉ, कॉफी स्टारर, गैस वाले पेयों, पानी की बोतलों और ज्यादातर फूड पैकेजिंग में इस्तेमाल हुए प्लास्टिक में से 50 फीसदी इसी श्रेणी में आते हैं.

चिंतन एनवायर्नमेंटल रिसर्च ऐंड ऐक्शन ग्रुप की प्रोग्राम हेड चित्रा मुखर्जी के मुताबिक, ''कचरा बीनने वाले केवल वही उठाते हैं जिसे रिसाइकल किया जा सकता है.

तो पीईटी बोतलें तो आसानी से रिसाइकल हो जाती हैं, पर टेट्रा पैक, चिप पैक और एक बार इस्तेमाल किए जाने वाले केचप पाउच सरीखे ज्यादातर (90 फीसदी) प्लास्टिक रिसाइकल नहीं होते.''

हिंदुस्तान की दास्तान

जहां 25 राज्यों ने प्लास्टिक पर एक या दूसरे किस्म की (ज्यादातर एक बार इस्तेमाल की जाने वाली प्लास्टिक पर आंशिक या पूरी) पाबंदी लगाई है, वहीं इनके अमल में गंभीर खामियां हैं, क्योंकि इनका इस्तेमाल करने वाले विक्रेताओं को (बनिस्बतन लागत पर) कोई विकल्प मुहैया नहीं करवाया गया है.

मुखर्जी कहती हैं, ''जागरूकता के बगैर पाबंदियां कारगर नहीं होतीं. बदकिस्मती से प्लास्टिक के खतरों के बारे में जानकारी ही नहीं है.''

सरकार जहां प्लास्टिक को कम और रिसाइकल करने पर जोर दे रही है, वहीं पर्यावरण सचिव सी.के. मिश्र कहते हैं, ''सरकार के बनाए प्लास्टिक कचरा प्रबंधन नियम, 2106 पर अमल बेहद खराब रहा है.

हम लोगों को विकल्प नहीं दे पा रहे हैं. हम झुग्गी में रहने वाले उस आदमी की दिक्कतों का ध्यान नहीं रख पा रहे हैं जो प्लास्टिक बैग को काम में लाने से बेहतर कुछ नहीं जानता.''

महाराष्ट्र ने इस साल मार्च में निर्माण से लेकर बिक्री, खुदरा इस्तेमाल और यहां तक कि भंडारण तक तमाम स्तरों पर एक बार इस्तेमाल किए जाने वाले प्लास्टिक पर पाबंदी लगाने का ऐलान किया था.

उद्योगों के संगठन फिक्की ने पिछले साल प्लास्टिक के कारोबार पर एक रिपोर्ट जारी की थी, जिसमें बताया गया था कि अकेले महाराष्ट्र में प्लास्टिक सेक्टर में 4,00,000 लोग रोजगार में लगे हैं और वे 5,000 करोड़ रु. का माल बनाते हैं.

महाराष्ट्र सरकार एक बाइ-बैक यानी वापस खरीद योजना के जरिए लोगों से बोतलों और थैलियों को रिसाइकल करने की और तटों से जहां-तहां फेंके जाने वाले प्लास्टिक को बीनने की गुजारिश कर रही है.

निर्माताओं को लेनी होगी जिम्मेदारी

आम राय है कि इस समस्या से निबटने के लिए ऊपर से नीचे का तरीका अपनाना चाहिए और प्लास्टिक बनाने वाले ही वे लोग हैं जिन्हें आगे आकर यह दुष्चक्र तोडऩा चाहिए. मिश्र कहते हैं, ''एक्सटेंडेड प्रोड्यूसर रिस्पॉन्सिबिलिटी या ईपीआर यानी बनाने वालों पर यह अतिरिक्त जिम्मेदारी डालना अच्छी अवधारणा है, क्योंकि मुश्किल यह है कि हम इससे निबटने के लिए एकजुट नीति आखिर कैसे बनाएं.

जिम्मेदारी मैन्युफैक्चरर पर ही डालनी होगी, क्योंकि जो प्लास्टिक बनाता है, उसे ही इसे रीसाइकल करना या निबटाना होगा.''

सेंटर फॉर साइंस ऐंड एनवॉयर्नमेंट (सीएसई) में पर्यावरण व्यवस्था और कचरा प्रबंधन की प्रमुख स्वाति सिंह सब्याल भी कहती हैं, ''ईपीआर की अवधारणा केवल कागजों पर मौजूद है, पर 2016 के कचरे के नियमों में बाद में बदलाव किए गए और ये मैन्युफैक्चरर्स की जिम्मेदारी तय नहीं करते. फिर समस्या सुलझेगी कैसे?''

दूसरे देशों से सबक

केन्या में पाबंदी आयद करने की कोशिश नाकाम रही तो उन्होंने नागरिकों को बदलाव के लिए छह महीने की कटऑफ मियाद दी थी. वहां कानून बेहद सख्त हैं जिनमें चार साल तक की कैद और भारी जुर्माने के प्रावधान हैं.

हाल ही की रिपोर्ट कहती है कि यह पाबंदी बेहद कामयाब रही है और उनका मॉडल दूसरों के लिए नकल के लायक है. इसी तरह फ्रांस ने 2016 में प्लास्टिक पर पाबंदी का कानून पारित कर देश को 2022 तक प्लास्टिक मुक्त बनाने के लिए चार साल दिए थे.

स्वीडन प्लास्टिक पर पाबंदी लगाने की बजाए उसे रिसाइकल करके दोबारा इस्तेमाल में यकीन करता है. चीन भी 2008 से कचरे के खिलाफ जंग लड़ रहा है और वहां प्लास्टिक बैग का इस्तेमाल करने वालों को इसका दाम चुकाना होता है.

हिंदुस्तान को जमीनी बदलाव लाने में अभी बहुत लंबी दूरी तय करनी है. तमाम प्लास्टिक कचरे को एक कानून के नीचे लाने के मंसूबे बनाए जा रहे हैं, साथ ही प्लास्टिक के निर्माण में मंदी या ठहराव को देखते हुए हम प्लास्टिक को अच्छी तरह निबटाने या रिसाइकल करने के थोड़ा तो करीब आए ही हैं.

आपकी जिम्मेदारी

-घर पर कचरे को अलग-अलग करना शुरू करें ताकि प्लास्टिक लैंडफिल में न फेंका जाए

-पानी के लिए स्टील/तांबे/कांच की बोतलों का इस्तेमाल करें

-गैर-प्लास्टिक की तश्तरियों में खाएं, पुराने स्कूल वाले स्टील के टिफिन में अपना लंच लेकर जाएं

-एक बार इस्तेमाल किए जाने वाले प्लास्टिक के बर्तनों का इस्तेमाल करने में कमी लाएं खरीदारी के लिए जूट या कपड़े के झोले लेकर जाएं

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