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खास रपटः दिवालिया पहल से दिवाला

दिवालिया संहिता भारी उम्मीदों के बावजूद वसूली और समाधान की समय सीमा के मामले में खरी नहीं उतरी.

अमल में आने के पांच साल बाद भी ऋणशोधन और दिवालिया संहिता (आइबीसी) उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी. करीब एक दशक के सोच-विचार के बाद उसे 2016 में पारित किया गया और तब जोरदार दावा किया गया कि यह देश की सुस्त दिवालिया समाधान प्रक्रियाओं और कमतर वसूली का एकमुश्त हल है.

इस साल जून में एनसीएलटी (राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण) की एक टिप्पणी इसके नाकाफीपन को उजागर कर दिया. उद्योगपति अनिल अग्रवाल की कंपनी ट्विन स्टार टेक्नोलॉजीज को वीडियोकॉन इंडस्ट्रीज खरीदने की मंजूरी देते हुए पंचाट ने कहा कि इस खरीद के लिए ट्विन स्टार अपनी जेब से 'तकरीबन कुछ भी नहीं’ चुका रहा था, और यह भी कि मौजूदा लेनदारों को अपने दावों पर 99.28 फीसद ‘हेयरकट’ (बैंकिंग शब्दावली में नुक्सान) झेलने के लिए मजबूर किया जा रहा था, जो हेयरकट से कहीं ज्यादा उन्हें 'पूरी तरह मूंड़ना था.

एनसीएलटी ने कहा कि कुल दावे 64,838 करोड़ रुपए के हैं जबकि समाधान से महज 2,962 करोड़ या 4.5 फीसद रुपए ही मिले. मौजूदा लेनदारों में बड़ी तादाद एमएसएमई (लघु, छोटे और मध्यम उद्यम) की है और उनमें से कई के हाथ दावों की महज 0.72 फीसद रकम ही लगेगी.

आइबीसी दिवालिया फर्मों से निपटने के लिए 2016 में पहले के वसूली/समाधान कानूनों की जगह लाया गया, जिनमें बीमार औद्योगिक कंपनी कानून 1985 और बैंक तथा वित्तीय संस्थानों को देय ऋण की वसूली कानून 1993 शामिल थे. इसके दो उद्देश्य बताए गए.

दिवालिया पहल से पहले दिवाला
दिवालिया पहल से पहले दिवाला

एक, दिवालिया प्रक्रिया में तेजी लाना और बैंकों को अपनी बैलेंस शीट साफ करके फिर से कर्ज देने में समर्थ बनाना. दूसरे, उन कानूनी खामियों को दूर करना जिनका दुरुपयोग करके नाकाम कारोबारों के मालिक अपने कर्जों को रफा-दफा करके कंपनियों पर नियंत्रण बनाए रखते हैं.

आइबीसी का एक सबसे अहम पहलू यह था कि यह समाधान प्रक्रिया को तेज करने के लिए लाया गया था, ताकि मामलों को 180 दिनों (जुलाई 2019 में बढ़ाकर 330 दिन) के भीतर बंद किया जा सके. दूसरा पहलू यह था कि दिवालिया मामलों में कर्जदाताओं को होने वाले नुक्सान को कम से कम करने के लिए वसूली का प्रतिशत बढ़ाया जाए. मगर वीडियोकॉन की बिक्री पर एनसीएलटी की टिप्पणी इसकी विडंबना उजागर कर देती है.

यह उन कर्जदाताओं के लिए खासकर अहम है जिनकी उधार देने की क्षमता ऐसे मामलों के चलते घट जाती है. आइबीसी का मसौदा बनाने वाली दिवालिया कानून सुधार समिति ने 2015 में कहा कि 'जब कर्जदाताओं को पता है कि उनके अधिकार कमजोर हैं जिसके कारण वसूली दर कम है, तो वे कर्ज देने से कतराते हैं. इसीलिए देश में कर्ज कुछेक ऐसी बड़ी कंपनियों तक सीमित है जिनके नाकाम होने की संभावना कम है.’

भारतीय दिवाला और ऋणशोधन बोर्ड के पास मौजूदा आंकड़ों (2019 तक) के मुताबिक, आइबीसी से पहले समाधान की कार्यवाहियों के पूरा होने में औसतन छह साल का वक्त लगता था और वसूली दर करीब 22 फीसद थी. सरकार का दावा है कि आइबीसी की बदौलत यह बढ़कर करीब 43 फीसद हो गई है. लेकिन पूर्व वित्त राज्यमंत्री जयंत सिन्हा की अगुआई वाली संसदीय समिति ने अगस्त में संसद में पेश रिपोर्ट में कहा है कि आइबीसी से वसूली में काफी सुधार का लक्ष्य पूरा नहीं हो रहा है और कुछ मामलों में लेनदारों को 95 फीसद तक हेयरकट को मजबूर किया जा रहा है. 

परिसंपत्तियों का मामला
आइबीसी उम्मीदों पर तो खरी नहीं उतरी. इसकी बदौलत बंद मामलों की तादाद बढ़ी है. ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि इसने लेनदारों के सामने कर्ज चुकाने से चूकने वालों के खिलाफ एनसीएलटी में कानूनी कार्यवाही शुरू करने का स्पष्ट ढांचा रखा. आइबीसी के बड़े पैरोकारों में एक, नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष और कोलंबिया यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर अरविंद पानगडिय़ा कहते हैं, ''स्थिति में भारी सुधार आया है.’’

आइबीसी की कामयाबी की बड़ी कहानियों में एक, जेट एयरवेज का मामाला है, जो कर्जों के बोझ से अप्रैल 2019 में बैठ गई थी. इस साल जून में एनसीएलटी ने इस एयरलाइन को दोबारा शुरू करने के लिए ब्रिटेन स्थित कलरॉक कैपिटल और यूएई के कारोबारी मुरारी लाल जालान के कंसोर्शियम की समाधान योजना को मंजूरी दी.

कंसोर्शियम ने अपनी बोली के हिस्से के तौर पर लेनदारों को पांच साल में 1,200 करोड़ रुपए अदा करने की पेशकश की है, पुनर्गठित एयरलाइन में कंसोर्शियम की 89.8 फीसद हिस्सेदारी होगी, बैंकों को 9.5 फीसद और कमर्चारियों को 0.5 फीसद मिलेगा, जबकि आम शेयरधारकों की हिस्सेदारी घटकर 0.2 फीसद रह जाएगी. एयरलाइन के बैठने के बाद एयरपोर्ट पर उसके स्लॉट और एयर ट्रैफिक अधिकार दूसरी विमान सेवा कंपनियों को दे दिए गए थे.

इनको लेकर सरकार और कंसोर्शियम के बीच फिलहाल बातचीत चल रही है. उन्हें बहाल करना कंसोर्शियम की एक प्रमुख मांग है. पानगड़िया कहते हैं, ''जेट एयरवेज का समाधान (आइबीसी की कामयाबी का) अच्छा उदाहरण है. इसके बगैर एयरलाइन की परिसंपत्तियां छिन्न-भिन्न हो जातीं. आइबीसी ने प्रोमोटरों के पेच कसे. कर्जदार अगर ऋण चुकाने की जिम्मेदारी पूरी नहीं करते, तो किसी भी अच्छी व्यवस्था में लेनदारों के पास कानूनी सहारा होना ही चाहिए.’’

आइबीसी की दूसरी कामयाबियां भी हैं. इससे एस्सार स्टील मामले में सबसे बड़ी वसूलियों में एक आसान हुई. भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआइ) की अगुआई में फर्म के वित्तीय कर्जदातों ने दिसंबर 2019 में अपने 49,000 करोड़ रुपए के दावों की करीब 92 फीसद रकम वसूल ली. यह तब हुआ जब लग्जमबर्ग स्थित आर्सेलरमित्तल और जापान के निप्पो स्टील ऐंड सुमितोमो मेटल कॉर्पोरेशन (एनएसएसएमसी) का कंसोर्शियम कंपनी के अधिग्रहण के लिए राजी हो गया.

लेनदारों की समिति ने दिवालिया कार्यवाही के नौ महीनों के दौरान कंपनी को चलाने के लिए पुनर्गठन फर्म अल्वारेज ऐंड मार्सल का चयन किया. हालांकि इसकी बोली सबसे प्रतिस्पर्धी नहीं थी, लेकिन पुनर्गठन का इसको सबसे ज्यादा तजुर्बा था. अल्वारेज ऐंड मार्सल ने एस्सार स्टील में रोल्ड स्टील का उत्पादन वित्त वर्ष 2017 के 55.7 लाख टन से बढ़ाकर वित्त वर्ष 2019 में 67.8 लाख टन कर दिया. फिर क्या था, आर्सेलरमित्तल और एनएसएसएमसी के कंसोर्शियम ने बोली 29,000 करोड़ रुपए से बढ़ाकर 42,000 करोड़ रुपए कर दी. 

अड़चनें
अलबत्ता आइबीसी की कामयाबी पर मामलों के नतीजों पर पहुंचने में देरी, कम वसूली दर और बैंकों को अपने दावों में भारी कटौतियां स्वीकार करने के लिए मजबूर करने के दाग हैं. 
अल्वारेज ऐंड मार्सल इंडिया की एक रिपोर्ट में कहा गया कि वित्त वर्ष 2017 और 2019 के बीच वसूलियां औसतन 43-50 फीसद थीं और समय सीमाएं शुरुआती 180 दिनों (बाद में बढ़ाकर 330 दिन) से बहुत आगे चली गईं.

सितंबर 2020 तक एनसीएलटी में सुलझाए गए 277 मामलों में मुकदमेबाजी में लगा समय मिलाकर समाधान का औसत वक्त 440 दिन रहा. वित्त वर्ष 2020 में हरेक तिमाही में करीब 480 नए मामले दाखिल हुए. रिपोर्ट का अनुमान है कि लंबित मामलों को निपटाने में छह साल जितना लंबा वक्त लग सकता है. आरईडीडी इंटेलिजेंस का एक विश्लेषण कहता है कि जिन 4,300 से ज्यादा कर्जदारों को आइबीसी के तहत दिवालिया कार्यवाहियों से गुजरना पड़ा, उनमें  48 फीसद बंद हो गए और आधे 314 दिनों से कम वक्त में बंद हुए.

जो 13 फीसद बेच दिए गए, उनमें से आधे 425 दिनों से कम वक्त में दिवालिया कार्यवाहियों से बाहर आ गए. फर्म का कहना है कि ये बुरे नतीजे नहीं हैं. अलबत्ता कुछेक मामलों को छोड़कर लेनदारों के लिए वसूली दर निराशाजनक रही है. सरकार के दावों के उलट, निवेश बैंक और वित्तीय सेवा फर्म मैक्वायरी कहती है कि कुल वसूली दर महज 24 फीसद है.

आइबीसी के बचाव में पानगड़िया कहते हैं कि बैंकों को जबरदस्त कटौतियां स्वीकार करनी पड़ी हैं तो इसकी वजह खुद इन बैंकों के कर्ज के खराब फैसले हैं. वे दलील देते हैं कि दिवालिया कार्यवाहियों में नुक्सान का यह मतलब नहीं है कि दोष आइबीसी के मत्थे मढ़ दिया जाए, बल्कि वे कहते हैं कि यह तो इस बात का सबूत है कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को निजी हाथों में सौंपना बेहद जरूरी क्यों है.

खासकर जब अपने मूल उद्देश्यों—दिवालिया कार्यवाहियों को तेज करना और वसूली का प्रतिशत बढ़ाना—में इसके नाकाम रहने के कई उदाहरण हैं, आइबीसी को भारी आलोचना झेलनी पड़ी है. एस्सार स्टील सरीखे मामलों की कामयाबी नियम के बजाय अपवाद ज्यादा है.

अल्वारेज ऐंड मार्सल की रिपोर्ट के मुताबिक, सितंबर 2020 तक एनसीएलटी में दाखिल 4,008 मामलों में से केवल 52 फीसद ही बंद हुए हैं. रिपोर्ट कहती है कि कई मुकदमों ने प्रक्रिया को धीमा किया, तो खुद एनसीएलटी की तरफ से प्रशासनिक देरियों और फैसलों में विसंगतियों ने नतीजों पर शंकाएं पैदा कर दीं. 

आइबीसी के लिए बदनामी वाला रुचि सोया इंडस्ट्रीज का समाधान भी है, जो एसबीआइ की अगुआई वाले कर्जदाताओं के एक समूह को 9,345 करोड़ रुपए की देनदार है. बाबा रामदेव की अगुआई वाली पतंजलि आर्युवेद को करीब 55 फीसद कटौती के साथ 4,350 करोड़ रुपए में रुचि सोया के अधिग्रहण की मंजूरी मिल गई.

पतंजलि ने बोली तब जीती जब अडाणी विल्मर दौड़ से हट गई. सौदे की रकम चुकाने के लिए पतंजलि ने एसबीआइ की अगुआई वाले बैंकों के कंसोर्शियम से 3,200 करोड़ रुपए कर्ज लिए, जबकि रुचि सोया ने करीब 1,800 करोड़ रुपए का कर्ज एसबीआइ से ही ले रखा है.

शिवा इंडस्ट्रीज ऐंड होल्डिंग्स की समाधान योजना भी ऐसा ही एक उदाहरण है. सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक फर्म के प्रोमोटर सी. शिवशंरन के पिता आ.सी.के. वल्लाल से 4,863 करोड़ रुपए के कर्ज के एवज में 323 करोड़ रुपए लेने पर राजी हो गए. यानी करीब 6.5 फीसद की वसूली हुई और मामला भी वापस ले रहे हैं. हालांकि एनसीएलटी की चेन्नै पीठ ने हाल में इसे आइबीसी के प्रवाधानों का उल्लंघन बताकर रद्द कर दिया. 

अंतहीन देरी
अल्वारेज ऐंड मार्सल की रिपोर्ट के मुताबिक, जब दिवालिया मामलों के फटाफट समाधान की बात आती है, तो एनसीएलटी की दिल्ली और मुंबई पीठों में औसत समय 475 दिन है, जबकि राष्ट्रीय औसत 440 दिन है. कोलकाता और बेंगलूरू पीठ बेहतर हैं जिनका औसत समय क्रमश: 339 दिन और 352 दिन है. कटक पीठ का रिकॉर्ड सबसे खराब है—औसतन 613 दिन. जयपुर का सबसे अच्छा—औसतन 288 दिन.

फिर अपीलें एनसीएलटी से आगे राष्ट्रीय कंपनी कानून अपीलीय न्यायाधिकरण (एनसीएलएटी) या सुप्रीम कोर्ट में जाती हैं, तब काफी देर होती है. मसलन, अपील में जाने वाले कुल 1.02 लाख करोड़ रुपए के दावों से जुड़े 23 मामलों में समाधान का औसत समय बढ़कर 751 दिन हो गया. वसूली प्रतिशत भी सितंबर 2020 तक करीब 40 फीसद के औसत के मुकाबले 15-25 फीसद पर आ गया.

इन देरियों की वजह से कंपनियों की कमाई में कमी आई. अल्वारेज ऐंड मार्सल की रिपोर्ट कहती है कि आलोक इंडस्ट्रीज, ऑर्किड फार्मा, रुचि सोया और उत्तम वैल्यू स्टील की कमाई में क्रमश: 64 फीसद, 16 फीसद, 17 फीसद और 23 फीसद की गिरावट आई. तीन कंपनियों—भूषण स्टील, इलेक्ट्रोस्टील स्टील्स और मॉनेट इस्पात—की कमाई क्रमश: 22 फीसद, 55 फीसद और 35 फीसद गिरी.

कॉर्पोरेट वकील रंजना रॉय गवई कहती हैं कि देश भर में एनसीएलटी की करीब 13 पीठ हैं, जिनमें 63 के लक्ष्य के मुकाबले कुल 26 सदस्य हैं. वे कहती हैं, ''हाल में रिटायर हुए कई सदस्य सेवा विस्तार न मिलने से रिटायर हो गए.’’ कई संशोधन भी किए गए हैं. मसलन, कंपनी कानून में कई कृत्यों को अपराध के दायरे से बाहर कर दिया गया और क्षेत्रीय निदेशकों का अधिकार क्षेत्र 5 लाख रु. से बढ़ाकर 25 लाख रु. कर दिया गया, ताकि एनसीएलटी के पास कम मामले पहुंचे. मगर अभी इन उपायों का सुखद नतीजा नहीं निकला.

एक संसदीय समिति ने भी कहा कि एनसीएलटी की पीठों और एनसीएलएटी में 'स्टाफ और धन की गंभीर कमी’ है. नवम कैपिटल के मैनेजिंग डायरेक्टर और नई दिल्ली स्थित थिंक टैंक इंडिया एंटरप्राइज काउंसिल के संस्थापक राजीव मंत्री भी कहते हैं कि जजों को आर्थिक विशेषज्ञता हासिल करने की जरूरत है. वे कहते हैं, ‘‘जजों को कुछ आर्थिक प्रशिक्षण मिलना चाहिए.’’ सुप्रीम कोर्ट के वकील अभिनव मुखर्जी भी विशेषज्ञों की जरूरत पर जोर देते हैं.

आइबीसी ने दिवालिया कार्यवाहियों की दोटूक प्रक्रिया कायम करने और लेनदारों को ज्यादा अधिकार देने के मामले में अच्छी शुरुआत की है. मगर समाधान और वसूली का प्रभावी तंत्र बनने के लिए इसे खाली पद भरने, सरकारी बैंकों में सुधार शुरू करने, फैसलों में एकरूपता लाने और तेज समाधान के लिए राजनैतिक नेतृत्व से और ज्यादा प्रतिबद्धता की जरूरत है. जब तक ऐसा नहीं होता, नई संहिता भी तमाम कमियों और खामियों के साथ पहले के कानूनों का अक्स भर बनकर रह जाएगी. 

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