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खास रपटः चलो फिर स्कूल चलें

देश भर में स्कूल धीरे-धीरे खुलने लगे लेकिन इसके साथ ही अभिभावकों और शिक्षाविदों के मन में उठ रहे बेशुमार प्रश्न

दूर-दूर से ओडिशा में भुवनेश्वर के एक स्कूल में प्रवेश से पहले तापमान की जांच कराते छात्र दूर-दूर से ओडिशा में भुवनेश्वर के एक स्कूल में प्रवेश से पहले तापमान की जांच कराते छात्र

शैली आनंद

मार्च 2020 में स्कूलों में वर्चुअल पढ़ाई शुरू होने के बाद राघव कपूर (आग्रह पर बदला गया नाम) को पहले तो ऑनलाइन क्लास में शामिल होना अच्छा लगता था. लेकिन मुंबई के आठवीं क्लास के इस छात्र को आठ महीने बाद पढ़ाई के इस नए तरीके के नुक्सान महसूस होने लगे. धीरे-धीरे उसकी एकाग्रता कम होने लगी और फिर ऐसी नौबत आ गई कि पढ़ाई से उसकी दिलचस्पी ही खत्म हो गई. यही नहीं, अपने सहपाठियों और दोस्तों से मुलाकात न हो पाने की वजह से उसमें अवसाद के लक्षण दिखने लगे.

राघव जैसे छात्रों की दास्तानों ने शिक्षाविदों, अभिभावकों और सरकारी संस्थाओं को फौरन स्कूल दोबारा खोलने पर विचार करने के लिए प्रेरित किया. महीनों तक अलग-थलग रहने की वजह से यह एहसास गहरा गया है कि स्कूल में दोस्तों और हमउम्र छात्रों के साथ मौज-मस्ती और ‌शिक्षकों के साथ आमने-सामने बातचीत भी कोई चीज होती है. मुंबई के पोद्दार एजुकेशन नेटवर्क और अर्ली चाइल्डहूड एसोसिएशन की प्रेसिडेंट स्वाति पोपट वत्स कहती हैं, ''वर्चुअल लर्निंग से बस इतना ही है कि हां, पढ़ाई हो रही है. लेकिन हमें जल्दी ही स्कूल की कक्षाओं की ओर लौटने की जरूरत है. इसके अलावा, निजी और सरकारी स्कूलों के बीच 'डिजिटल डिवाइड' ने सरकारी स्कूल के बच्चों को भारी नुक्सान पहुंचाया है और जितना जल्द हो सके, इसे दुरुस्त किए जाने की जरूरत है.'' अर्ली चाइल्डहुड एसोसिएशन शिशुओं की शिक्षा के क्षेत्र में प्रोफेशनल्स को एक मंच पर लेकर आता है.

हाल ही में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) ने 10 देशों में 22,996 बच्चों पर किए गए 15 अध्ययनों का मेटा-एनालिसिस किया. इसमें पाया गया कि जिन बच्चों का अध्ययन किया गया उनमें से 79.4 फीसद पर महामारी और उसके बाद क्वारंटीन का नकारात्मक असर हुआ; कम से कम 22.5 फीसद बच्चे कोविड से काफी डरे हुए थे; 35.2 फीसद ने ऊबने की शिकायत की; और 21.3 को ठीक से नींद न आने की समस्या थी. दिल्ली के वसंत वैली स्कूल की प्रिंसिपल रेखा कृष्णन कहती हैं, ''यह स्वीकार करना लगभग नामुमकिन है कि 2020 में दाखिला लेने वाले बच्चे अपने सहपाठियों को स्क्रीन पर एक बॉक्स के रूप में जानते हैं. उन्हें उनके साथ सामाजिक रूप से मिलने-जुलने या खेल के जरिए घुलने-मिलने का मौका ही नहीं मिला. इतने लंबे समय तक स्कूल बंद होने का नतीजा हमारे बच्चों के लिए न तो सकारात्मक है और न ही फायदेमंद. इसे ठीक से समझने और इसके असर को दूर करने में कई साल लग जाएंगे.''

जहां तक स्कूल दोबारा खोलने की बात है तो इसके बारे में अभिभावकों की राय मिली-जुली है. एक ओर जहां कामकाजी अभिभावक अपने बच्चों को फिर से स्कूल भेजने के लिए तैयार हैं, वहीं घर के माहौल में बच्चों को रखने वाले माता-पिता इसे लेकर अनिच्छुक हैं. दिल्ली की उद्यमी और पांच साल तथा उससे कम उम्र की दो बेटियों की मां गुरसिमरन मान जैसी अभिभावकों का मानना है कि बच्चों को दोबारा स्कूल भेजने का फैसला उन्हें स्वास्थ्य संबंधी बुनियादी ढांचे की उपलब्धता पर आधारित होना चाहिए. ''हमारे बच्चों की शिक्षा और जीवन सबसे बड़ी प्राथमिकता है. कई लोगों का मानना है कि अगर मॉल दोबारा खुल सकते हैं तो स्कूल भी खुल सकते हैं. लेकिन सुरक्षा सर्वोपरि है. अगर क्लासरूम से बीमारी फैलने लगे तो क्या हमारे बच्चों के लिए पर्याप्त स्वास्थ्य इन्फ्रास्ट्रक्चर है?''

लगने लगी क्लास
लगने लगी क्लास

दोहरी समस्या

माता-पिता दो तरह की समस्याओं से जूझ रहे हैं—बच्चों की अपनी सुरक्षा और सेहत तथा घर पर रहने वालों की सुरक्षा और सेहत. मेडिकल जर्नल जेएएमए पीडियाट्रिक्स में 18 अगस्त को प्रकाशित एक रिपोर्ट में कोविड मामले वाले 6,280 घरों का अध्ययन किया गया. इसमें पाया गया कि तीन साल तक के बच्चों से घर में कोविड वायरस के संक्रमण का जोखिम 14-17 वर्ष की आयु वाले बच्चों के मुकाबले 43 फीसद ज्यादा है. मैक्स हेल्थकेयर के ग्रुप मेडिकल डायरेक्टर डॉ. संदीप बुद्धिराजा का कहना है, ''कई परिवारों को चिंता है कि उनका बच्चा घर के उन दूसरे सदस्यों को इस वायरस से संक्रमित कर सकता है जो बुजुर्ग या कई बीमारियों वाली बेहद संवेदनशील श्रेणी में हो सकते हैं. वैक्सीन की दो खुराक से यह जोखिम काफी कम हो जाएगा.''

कोविड की वजह से खुद बच्चों की मौत का उतना जोखिम नहीं है. स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक, भारत में कोविड की वजह से मरने वाले सिर्फ एक फीसद व्यक्तियों की उम्र 17 साल से कम थी. इसके मुकाबले अस्पताल में भर्ती सभी कोविड मरीजों में से 88 फीसद की उम्र 45 साल से ज्यादा थी. मरने वाले करीब 40 फीसद बच्चों (नवजात शिशुओं समेत 10 साल से कम उम्र) को दूसरी बीमारियां भी थीं और अस्पताल में भर्ती होने वाले नौ फीसद कोविड-पॉजिटिव बच्चों को पहले से कोई न कोई गंभीर किस्म की बीमारी थी.

दुनियाभर में कोविड-पॉजिटिव बच्चों के अस्पताल में दाखिल होने के मामलों में इजाफा हुआ है, खासकर अमेरिका में यह तेजी से बढ़ा है, जहां डेल्टा वेरिएंट फैल रहा है. भारत में आई दोनों लहरों के दौरान कुल मामलों में करीब तीन फीसद मामले दस साल तक के बच्चों के थे. कुछ जिलों में ज्यादा से ज्यादा वयस्कों को टीका लगाए जाने के साथ ही बच्चों में संक्रमण की दर बढ़ रही है—महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में जुलाई 2021 में 9,000 बच्चे कोविड-पॉजिटिव पाए गए, जो वहां के कुल मामलों का 10 फीसद है. अलबत्ता 95 फीसद मामलों में कोई लक्षण नहीं था और अस्पताल में भर्ती कराने की जरूरत नहीं थी.

बच्चों में कोविड का सबसे सामान्य लक्षण हलका बुखार और खांसी है, और ज्यादातर में कोई लक्षण नहीं दिखता. मेडिकल जर्नल द लांसेट ऐंड एडोलसेंट हेल्थ में ब्रिटेन में 2,50,000 बच्चों पर किया गया अध्ययन अगस्त 2021 में प्रकाशित किया गया. इसमें पाया गया कि लक्षण वाले ज्यादातर बच्चे छह दिन बाद ठीक होने लगे और चार हफ्ते से ज्यादा लक्षण वाले बच्चों की संख्या कम है.

अलबत्ता, असली चिंता यह है कि कोविड के बाद बच्चों में तेजी से बढ़ रही परेशानियों की ओर लोगों का ध्यान कम जा रहा है. मुंबई में फोर्टिस हॉस्पिटल में बालरोग विशेषज्ञ डॉ. जेसल शेठ का कहना है, ''(वयस्कों के मुकाबले बच्चों में) मौत का जोखिम कम है, लेकिन मौजूदा सबूत सुझा रहे हैं कि जिनमें स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतें हैं उनमें रिकवरी के बाद गंभीर लक्षण उभरने या इनफ्लैमेटरी सिंड्रोम के ज्यादा जोखिम हैं.

कोविड-नेगेटिव होने के चार से छह हफ्ते के बाद बच्चों में मल्टीसिस्टम इनफ्लैमेटरी सिंड्रोम (एमआइएस-सी) विकसित होता है. ऐसा बिना लक्षण वाले बच्चों में भी हो सकता है, लिहाजा अभिभावकों में इस बात को लेकर घबराहट है कि जांच में कोविड-निगेटिव होने के बावजूद उनके बच्चे मल्टी-ऑर्गन इनफ्लैमेशन की वजह से अचानक बीमार हो रहे हैं.'' इंडियन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक इंटेंसिव केयर चैप्टर की ओर से जारी आंकड़े दर्शाते हैं कि भारत में 2,000 से ज्यादा एमआइएस-सी के मामले आए हैं. इनमें से करीब 60 फीसद मामलों में इनफ्लैमेशन (सूजन) ने दिल को प्रभावित किया. डॉ. बुद्धिराजा बताते हैं, ''बच्चों में कोविड आम तौर पर खुद तक ही सीमित रहने वाला होता है. लेकिन अभिभावकों को बच्चों की रिकवरी के कुछ समय बाद तक लक्षणों पर नजर रखे रहनी चाहिए.''

जहां तक बच्चों को टीका लगाने का मामला है तो परीक्षण चल रहा है और 21 जुलाई को जायडस के तीन-डोज वाली डीएनए वैक्सीन को 12-18 साल के बच्चों के लिए इमजेंसी इस्तेमाल की मंजूरी दे दी गई. यह सुई मुक्त डोज है, जिसे बच्चों के लिए तैयार किया गया है, और कोविड के खिलाफ इसकी क्षमता 66 फीसद है. इससे स्कूलों में कक्षाएं तेजी से और सुरक्षित ढंग से खोलने की उम्मीद बंधी है.

स्कूल क्या कर सकते हैं?

स्कूल दोबारा खोलने का फैसला कुंठा और बेसब्री के आधार पर नहीं किया जा सकता या दूसरे देशों या राज्यों के मॉडल को अपनाकर इस बारे में निर्णय नहीं किया जा सकता. इसे आस-पड़ोस और शहर के हालात पर सोचे-समझे फैसले पर आधारित होना चाहिए और ऐसा डॉक्टरों, अभिभावकों, शिक्षकों और छात्रों से बातचीत के बाद ही करना चाहिए. वसंत वैली स्कूल की कृष्णन कहती हैं, ''यह नाजुक परिस्थिति से गुजरने जैसा है. सुरक्षित शारीरिक दूरी और सुरक्षा प्रोटोकॉल तैयार करना तो है ही, साथ ही इन जगहों का इस्तेमाल करने वालों को उसके बारे में प्रशिक्षित भी करना होगा. शिक्षक के नाते मुझे लगता है कि हमें पूरे शहर के स्कूल खोलने का फैसला नहीं करना चाहिए, बल्कि इसके बारे में निर्णय हर इलाके के हालत पर आधारित होना चाहिए.''

स्कूलों को अन्य बातों के अलावा, अपने इलाके या जोन में टेस्ट पॉजिटिविटी रेट पर ध्यान देने की जरूरत है. इसके अलावा, उन्हें सामाजिक दूरी के नियम सख्ती से लागू करने चाहिए, स्कूलों में परीक्षण की सुविधा होनी चाहिए, स्कूलों में हाइब्रिड (ऑनलाइन-ऑफलाइन) कक्षाएं चलाने की सुविधा होनी चाहिए और सभी शिक्षकों तथा स्टाफ के सदस्यों का टीकाकरण पक्का किया जाना चाहिए.

बच्चों की मिक्सिंग रोकने और संक्रमण की स्थिति में आसानी से क्वारंटीन के लिए ''बबल'' की अवधारणा को अपनाना चाहिए. वत्स बताती हैं, ''इस सोच के तहत एक बबल में 10 से 12 बच्चे और चार वयस्क होते हैं, सो, अगर एक बबल में कोई संक्रमित होता है तो उस बबल के लोगों को क्वारंटीन में रख दिया जाएगा. बबल का इस्तेमाल स्कूल की विभिन्न जगहों पर अलग-अलग दिनों में टाइमटेबल के मुताबिक किया जाएगा. सभी खिलौनों और उपकरणों को रोजाना सैनिटाइज किया जाएगा और सॉफ्ट टॉय या लाइब्रेरी की किताबें दो बच्चों को शेयर न करना सुरक्षा प्रोटोकॉल का महत्वपूर्ण हिस्सा होगा.'' अर्ली चाइल्डहुड एसोसिएशन और एसोसिएशन फॉर प्राइमरी एजुकेशन ऐंड रिसर्च की ओर से तैयार पोस्ट कोविड गाइडलाइंस फॉर रीओपनिंग ऑफ प्रीस्कूल्स ऐंड डे केयर्स शीर्षक वाले दस्तावेज में ये सुझाव दिए गए हैं.

गुड़गांव का हेरिटेज एक्सपीरिएंशियल लर्निंग स्कूल निश्चित प्रोटोकॉल और मानक संचालन प्रक्रियाओं के साथ जनवरी 2021 से ही दोबारा खुलने को तैयार है. उनके सुरक्षा प्रोटोकॉल में सभी आगंतुकों के तापमान को देखना, स्कूल कैंपस का नियमित सैनिटाइजेशन, सामाजिक दूरी बरतने और हर वक्त मास्क पहने रखने की आवश्यकता शामिल है. सभी छात्रों और शिक्षकों को स्कूल को सूचित करने को कहा गया है और तबीयत खराब होने की स्थिति में स्कूल न आने को कहा गया है. हेरिटेज एक्सपीरिएंशियल लर्निंग स्कूल की प्रिंसिपल नीना कौल का कहना है, ''हम अभिभावकों के साथ निरंतर संपर्क में हैं और छात्रों को स्कूल भेजने के बारे में उनकी दिलचस्पी के ऑनलाइन सर्वेक्षण भी किए गए हैं. उनमें से ज्यादातर ने हमें अपनी सहमति दे दी है.''

वैसे, यह मान लेना गलत होगा कि स्कूल जल्दी ही महामारी पूर्व के मॉडल को अपना लेंगे. उन्हें छोटे-छोटे कदम उठाने होंगे और ऑनलाइन तथा इन-पर्सन स्कूलिंग की व्यवस्था पर एक साथ काम करना होगा. कृष्णन कहती हैं, ''स्कूलों को लर्निंग के हाइफ्लेक्स मॉडल (जिसमें कुछ बच्चे शारीरिक रूप से क्लास में मौजूद होंगे जबकि कुछ वर्चुअली शामिल होंगे) शामिल करने की जरूरत है और सिंक्रोनस (एक साथ होने वाले) और एसिंक्रोनस (अलग-अलग समय होने वाले) मॉडल की जरूरत है.'' इसकी मिसाल के तौर पर पेश किए गए देशों में स्कूल सुरक्षित ढंग से खोले गए हैं. वहां टीकाकरण की अधिक दर, बड़े पैमाने पर परीक्षण, वेंटिलेशन सिस्टम आधुनिक बनाने के लिए मोटा निवेश और सुविचारित कोविड प्रक्रिया जैसी पूर्व शर्तें शामिल हैं. भारत को इन मुद्दों पर भी विचार करना चाहिए.

मान पूछती हैं, ''क्या स्कूल दोबारा खोलने या हमारे बच्चों को लर्निंग के नजरिए से पिछड़ा रखने का विकल्प है? वयस्कों के तौर पर हमारी जिम्मेदारी है कि हम अपने बच्चों को सिखाएं कि वे अपने जीवन में इस अप्रत्याशित समय को किस तरह देखें. हमें इस पर ध्यान देना चाहिए कि हम क्या कर सकते हैं और हमारे बस में क्या है.'' इसका मतलब होगा कि टेक्नोलॉजी को कामचलाऊ माध्यम की बजाए निरंतर उभरते, सहायक साधन के रूप में देखना होगा. आज के संदर्भ में टेक्नोलॉजी जूम क्लासेज तक सीमित लगती है, लेकिन हमेशा ऐसा नहीं रहना है. आगे बढ़ने की इकलौती राह सिंक्रोनस लर्निंग और असिंक्रोनस लर्निंग के बीच संतुलन के साथ लचीलापन और अनुकूलन स्थापित करना है, पठन-पाठन के हाइब्रिड मॉडल के साथ इन-पर्सन क्लासेज शुरू करना है. हां, कोई एक मॉडल सबके लिए कारगर नहीं हो सकता.
—साथ में सोनाली आचार्जी

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