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मायावती का दलित-ब्राह्मण-मुस्लिम का गठजोड़

आजादी के बाद कांग्रेस को जिताने वाला यही सामाजिक समीकरण था. बीएसपी नेता मायावती दलितों के नेतृत्व में इसे दोहराना चाहती हैं.

अपने जन्मदिन 15 जनवरी को अब तक की सबसे बड़ी रैली करने के बाद बीएसपी की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती शांत नहीं बैठीं. दो दिन बाद 17 जनवरी को यूपी में पार्टी के संगठनात्मक ढांचे में खासा परिवर्तन कर उन्होंने यह संकेत दे दिया कि बीएसपी दिसंबर में चार राज्यों के विधानसभा चुनाव में खराब प्रदर्शन को पीछे छोड़कर आगामी लोकसभा चुनाव में धमक दिखाने को बेताब है.

पिछले चुनावों के खराब नतीजों से मायावती को यह आभास हो गया कि संगठन के ऊपरी पदों पर ज्यादा लोगों की नियुक्ति ने पार्टी के काडर और मतदाताओं के बीच भ्रम की स्थिति पैदा की है. इससे निबटने के लिए 2007 के बाद मायावती ने एक बड़ा बदलाव करते हुए जोनल कोऑर्डिनेटरों की संख्या आठ से घटाकर तीन कर दी. इनके नीचे अब हर जिले में छह प्रभारियों की टीम होगी. इसमें चार दलित, एक ब्राह्मण और एक मुसलमान होगा.

मायावती ने पार्टी में जिला उपाध्यक्ष का पद खत्म कर दिया, लेकिन जिन जिलों में मुसलमान या ब्राह्मण इन पदों पर थे, वे अपने पद पर बने रहेंगे. जाहिर है कि मायावती ने बीएसपी के संगठन को नया रूप देने में दलितों के बाद मुसलमानों और ब्राह्मणों को खास तवज्जो दी है. बीएसपी के प्रदेश अध्यक्ष राम अचल राजभर कहते हैं, ''बहुजन के साथ सर्वसमाज के लोग तेजी से बीएसपी से जुड़ रहे हैं. पार्टी में सभी के हितों के मद्देनजर संगठन में बदलाव किया गया है. ''

यूपी के विधानसभा चुनाव के बाद बीएसपी पहली पार्टी थी, जिसने पिछले साल फरवरी में ही सभी लोकसभा सीटों पर अपने उम्मीदवार घोषित कर कर दिए थे. मुजफ्फरनगर दंगों और नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित होने के बाद जिस आक्रामकता के साथ बीजेपी और सपा ने चुनाव प्रचार शुरू किया है, उससे निबटने के लिए बीएसपी ने लोकसभा क्षेत्रवार 'सोशल इंजीनियरिंग' का गणित लगाया है. यही वजह है कि पार्टी अब तक 80 लोकसभा प्रत्याशियों में 30 को बदल चुकी है. इनमें 9 मौजूदा सांसद हैं.

(प्रदेश में आयोजित बीएसपी की ब्राह्मण भाईचारा रैली का एक दृश्य)

मुसलमानों में सपा के प्रति नाराजगी को देखते हुए बीएसपी ने सबसे ज्यादा 18 मुस्लिम उम्मीदवारों को लोकसभा की जंग में उतारा है. इसमें 70 फीसदी पश्चिमी जिलों से हैं. मुजफ्फरनगर दंगे के बाद पार्टी ने पश्चिमी जिले से आने वाले मुनकाद अली का कद बढ़ाते हुए उन्हें पांच जिलों का जोनल कोऑर्डिनेटर बनाया है. हालांकि मुसलमानों में सपा के प्रति असंतोष को अपने पक्ष में भुनाने की जुगत में जुटी बीएसपी को मुजफ्फरनगर दंगे के बाद चार माह तक पीडि़त इलाके की  खबर न लेना नुकसान पहुंचा सकता है.

1 जनवरी को स्वामी प्रसाद मौर्य और नसीमुद्दीन सिद्दीकी के नेतृत्व में दंगा पीडि़त इलाकों का दौरा करने पहुंचे बीएसपी नेताओं को कई जगह विरोध का सामना करना पड़ा था. नेता प्रतिपक्ष और प्रदेश प्रवक्ता स्वामी प्रसाद मौर्य कहते हैं, ''बीएसपी नेता दंगा पीडि़त इलाके में पहले इसलिए नहीं गए क्योंकि इससे सपा हम पर ही माहौल बिगाडऩे का आरोप लगा सकती थी. '' लखनऊ विश्वविद्यालय में पर्शियन विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. खान आतिफ कहते हैं, ''पश्चिमी जिलों में सपा के प्रति मुसलमानों में नाराजगी और कांग्रेस की ओर से प्रदेश में किसी भी मुस्लिम नेता को आगे न किए जाने का फायदा बीएसपी को मिल सकता है. बशर्ते पार्टी मुसलमानों को यह समझने में कामयाब हो जाए कि चुनाव के बाद वह किसी भी सूरत में बीजेपी से हाथ नहीं मिलाएगी. ''

पिछले साल बीएसपी ने बड़े पैमाने पर प्रदेश में ब्राह्मण भाईचारा रैलियां की थीं. अभी तक मायावती 21 ब्राह्मणों को लोकसभा चुनाव का टिकट थमा चुकी हैं, जो पार्टी के भीतर किसी एक जाति के उम्मीदवारों की सबसे बड़ी संख्या है.
 
मायावती जानती हैं कि लोकसभा चुनाव में बेहतर प्रदर्शन के लिए यूपी की 17 सुरक्षित सीटों में से ज्यादातर जीतनी होंगी. सुरक्षित सीटों के लिए इस बार उन्होंने दलित-ओबीसी गठजोड़ पर दांव लगाया है. बीएसपी ने पश्चिम की सभी 10 सुरक्षित सीटों पर जाटव, मध्य और पूर्वी यूपी की छह सीटों पर पासी और एक सीट पर कश्यप बिरादरी का उम्मीदवार उतारा है.

बीजेपी, कांग्रेस और सपा में परिवारवाद का विरोध करने वाली मायावती ने अपने मिशन लोकसभा में इसी को अपना हथियार बना लिया है. मसलन, पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव और विधान परिषद में नेता विपक्ष नसीमुद्दीन सिद्दीकी के पुत्र अफजाल सिद्दीकी को फतेहपुर से तो प्रदेश प्रवक्ता और विधानसभा में विपक्ष के नेता स्वामी प्रसाद मौर्य की पुत्री डॉ. संघमित्रा मौर्य सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव के सामने मैनपुरी से लड़ेंगी. बीएसपी सरकार में मंत्री रहे और पार्टी का क्षत्रिय चेहरा माने जाने वाले ठाकुर जयवीर सिंह के बेटे डॉ. अरविंद कुमार सिंह अलीगढ़ से चुनाव मैदान में होंगे. पूर्व मंत्री रामवीर उपाध्याय की पत्नी सीमा उपाध्याय फिर सांसद बनने के लिए फतेहपुर सीकरी से चुनाव मैदान में उतरेंगी, वहीं दूसरी ओर रामवीर के एमएलसी भाई मुकुल उपाध्याय को गाजियाबाद से टिकट देकर पार्टी ने बीजेपी राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह के सामने चुनौती पेश की है.

 इस बार बूथ स्तर पर बनी बीएसपी की समितियों में अध्यक्ष एक बार फिर दलित को ही बनाया गया है, लेकिन इनके सदस्यों में अगड़े और पिछड़े वर्ग के लोगों को भी शामिल किया गया है. इतना ही नहीं, लोकसभा चुनाव की जंग के मद्देनजर बहुजन वॉलंटियर फोर्स (बीवीएफ) कार्यकर्ताओं की संख्या 16,000 से बढ़ाकर 28,000 कर दी गई है. फोर्स के प्रभारी और पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव नसीमुद्दीन सिद्दीकी बताते हैं, ''2012 के विधानसभा चुनाव के दौरान हर विधानसभा क्षेत्र में इस फोर्स के 40-40 कार्यकर्ताओं को तैनात किया गया था, लेकिन अब इनकी संख्या बढ़ाकर 70 कर दी गई है. ''

लोकसभा चुनाव की तैयारियों में लगी मायावती की राह इन तमाम कोशिशों के बावजूद इतनी आसान भी नहीं है. बड़ी संख्या में उम्मीदवारों को बदलने से बीएसपी के बागियों की सूची में लगातार इजाफा हो रहा है. अवध क्षेत्र के एक बीएसपी प्रत्याशी कहते हैं कि टिकट कटने के डर से बीएसपी उम्मीवार अपने इलाकों में फिलहाल धीमा प्रचार कर रहे हैं. सपा के प्रदेश प्रवक्ता और कैबिनेट मंत्री राजेंद्र चौधरी बताते हैं, ''पिछली बीएसपी सरकार में हुए भ्रष्टाचार के मामले सामने आने से जनता को मायावती की करतूत का पता चल चुका है. लोकसभा चुनाव में जनता उन्हें इसकी सजा देगी. ''

बहरहाल विपक्षियों के सभी आरोपों को नजरअंदाज करते हुए मायावती बड़े ही गुपचुप तरीके से अपनी चाल चल रही हैं. अलग-अलग मोर्चों पर सपा सरकार की विफलता को अपने अवसर के रूप में देख रहीं मायावती इसका कितना लाभ उठा पाती हैं, यही दलित की बेटी का दिल्ली में कद तय करेगा.   

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