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तमिलनाडु में सब पर सवार है जयललिता का जादू

इंडिया-सिसेरो ओपिनियन पोल में तमिलनाडु का वोटर अपनी सीएम को पीएम की कुर्सी पर बिठाने के पक्ष में है. एआइएडीएमके और डीएमके सब पर भार.

तमिलनाडु में कांग्रेस को इस बार के चुनाव में काफी अकेलापन महसूस हो रहा होगा और उससे भी ज्यादा अकेलापन बीजेपी को लग रहा होगा. कांग्रेस 1999 से लोकसभा चुनाव किसी न किसी गठबंधन में लड़ती रही है. 1999 में वह एआइएडीएमके और 2004 तथा 2009 में डीएमके के साथ रही. 1998 में कांग्रेस अकेले 35 सीटों पर चुनावी समर में उतरी, लेकिन उसे सिर्फ 4.8 फीसदी वोट मिले और उसके सभी उम्मीदवारों की जमानतें जब्त हो गई थीं.

कांग्रेस इस बार फिर अकेली पड़ गई है. डीएमके ने यूपीए का साथ छोड़कर डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव अलायंस (डीपीए) बना लिया है. इंडिया टुडे ग्रुप और सिसेरो ने 4 से 12 अप्रैल के बीच तमिलनाडु में 1,358 लोगों से बात के आधार पर जो ओपिनियन पोल किया है, उसके मुताबिक कांग्रेस को एक भी सीट मिलती नहीं दिख रही.

इतना ही नहीं, उसका वोट प्रतिशत भी घटकर 8.4 फीसदी रह जाने वाला है. पिछले आम चुनाव में डीएमके गठबंधन में उसने 15 फीसदी वोटों के साथ 8 सीटें जीती थीं. सर्वेक्षण में शामिल 4 में से 3 लोग यूपीए शासन से असंतुष्ट दिखे जिससे लगता है कि कांग्रेस 1998 के अपने सबसे खराब प्रदर्शन को दोहराने वाली है.

तमिलनाडु में कांग्रेस 1996 में तेजी से पतन की ओर बढ़ी जब जी.के. मूपनार ने जे. जयललिता की एआइएडीएमके से गठबंधन का विरोध करते हुए अपनी तमिल मानिला कांग्रेस (मूपनार) यानी टीएमसी-एम बना ली. मूपनार ने 1996 में 20 सीटों पर उम्मीदवार उतारे और 27 फीसदी वोट के साथ सारे उम्मीदवार जिता ले गए. कांग्रेस के सभी 29 उम्मीदवार हार गए और वोट हिस्सेदारी 1991 के 42.6 से गिरकर 18.3 फीसदी रह गई. 2001 में मूपनार के निधन के बाद उनके बेटे जी.के.वासन टीएमसी-एम के अध्यक्ष बने और उन्होंने 2002 में पार्टी का विलय कांग्रेस में कर दिया. लेकिन टीएमसी-एम की ओर खिसका वोट कांग्रेस की ओर नहीं लौटा पाए.

बीजेपी का तमिलनाडु में कभी कोई जनाधार नहीं रहा. 1984 के बाद से 5 लोकसभा चुनावों में उसने एक से लेकर 6 सीटों पर चुनाव लड़ा. फिर 1996 में उसने 39 में से 36 सीटों पर उम्मीदवार उतारे जिनमें से 35 की जमानत जब्त हो गई. बीजेपी का सबसे उम्दा प्रदर्शन 1998 और 1999 में रहा.

पार्टी ने 1998 में 5 सीटों पर उम्मीदवार उतारकर तीन सीटें जीती, जबकि 1999 में 6 सीटों पर लड़ पांच सीटों पर कब्जा जमाया. दोनों चुनाव में उसे 7 फीसदी वोट हासिल हुए. दोनों चुनावों में उसने पट्टाली मक्कल काची (पीएमके) और मारुमलार्चि द्रविड़ मुन्नेत्र कडग़म (एमडीएमके) का हाथ थामा था. 1998 में उसने चुनाव से पहले ही एआइएडीएमके और 1999 में डीएमके से गठजोड़ कर लिया था.

अगली बार 2004 में बीजेपी ने एआइएडीएमके का दामन थामा पर दोनों को एक भी सीट नहीं मिली. तमिलनाडु में गठजोड़ जरूरी तो है पर जीत की गारंटी नहीं है. 2009 में एआइएडीएमके तीसरे मोर्चे के साथ गई और डीएमके ने यूपीए का साथ नहीं छोड़ा तो बीजेपी अकेली रह गई. उसने 16 सीटों पर चुनाव लड़ा पर एक भी नहीं जीत पाई, बल्कि 14 उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई. 2004 में उसकी जो वोट हिस्सेदारी 5.1 फीसदी थी वो 2009 में 2.3 फीसदी रह गई.

इस बार बीजेपी ने विजयकांत की डीएमडीके पार्टी के साथ पीएमके और एमडीएमके को एनडीए में शामिल कर नया गठजोड़ बनाया है. लेकिन दोनों बड़ी पार्टियों— एआइएडीएमके और डीएमके का साथ नदारद है. जयललिता और नरेंद्र मोदी के कथित मधुर रिश्तों की बदौलत चुनाव के बाद एआइएडीएमके के एनडीए में शामिल होने की अटकलें निराधार साबित हो चुकी हैं.

सर्वेक्षणों के मुताबिक, कथित मोदी लहर तमिलनाडु में बेअसर  लगती है. प्रधानमंत्री पद के दावेदारों में मोदी (25 फीसदी) राहुल गांधी (19 फीसदी) पर भारी हैं पर एआइएडीएमके की जयललिता (29 फीसदी) मोदी पर भारी दिखती हैं.

पोल से लगता है कि असल में एआइएडीएमके की लोकप्रियता की वजह से एनडीए की वोट हिस्सेदारी 2009 में उसके घटकों की हिस्सदारी की तुलना में करीब 6 प्रतिशत गिरेगी. इसके बावजूद विभिन्न चुनाव क्षेत्रों में वोटों के बिखराव और जुड़ाव के कारण एनडीए को 5 (±1) सीटें मिलने का अनुमान है जो 2009 में 3 (±1) से बेहतर प्रदर्शन होगा.

पीएमके नेता एस. रामदास की लोकप्रियता वन्नियार समुदाय में अच्छी है, तो वाइको और विजयकांत की अपील कुछ सीटों पर एनडीए का लाभ दिला सकती है.

1969 तक तमिलनाडु मद्रास राज्य कहलाता था और उस पर अधिकतर कांग्रेस का शासन रहा. 1967 के विधानसभा चुनाव में डीएमके के सी. अन्नादुरै ने कांग्रेस के एम. भक्तवत्सलम से मुख्यमंत्री की कुर्सी छीन ली थी. तब से राज्य की राजनीति में डीएमके और उससे निकली एआइएडीएमके का ही दबदबा है. 1984 से दोनों पार्टियां बारी-बारी से राज्य में शासन कर रही हैं.

1998 से लोकसभा चुनाव में डीएमके और एआइएडीएमके दोनों ने 46 और 54 फीसदी के बीच वोट हासिल किया है और 11 से 27 के बीच सीटें जीती हैं. उनकी वोट हिस्सेदारी में तो ज्यादा उतार-चढ़ाव नहीं हुआ लेकिन सीटों के मामले में अकसर ऐसा हुआ है कि एक को दावत तो दूसरे को करीब-करीब खाली पत्तल मिली है.

एआइएडीएमके और डीएमके का वर्चस्व इस चुनाव में भी साफ जाहिर हो रहा है. एआइएडीएमके ने सभी 39 सीटों पर उम्मीदवार उतारे हैं तो डीएमके ने सिर्फ 5 सीटें अपने सहयोगियों के लिए छोड़कर बाकी 34 सीटों पर ताल ठोक दी है.

ओपिनियन पोल के मुताबिक, एआइएडीएमके और डीएमके 2014 के चुनाव में भी हावी रहेगी. एआइएडीएमके की वोट हिस्सेदारी 2009 के 13 फीसदी से बढ़कर 36 फीसदी तक पहुंचती दिख रही है तो डीएमके के नेतृत्व में डीपीए भी अपनी हिस्सेदारी डेढ़ फीसदी बढ़ाकर 29 फीसदी तक करता दिख रहा है. एआइएडीएमके को 22 (±2 ) और डीएमके को 11 (±2 ) सीटें मिलने का अनुमान है. इस तरह 33 (±1) का आंकड़ा छूकर वे 2009 के सामूहिक श्रेष्ठ प्रदर्शन को पार कर लेंगी.

लोकप्रियता के हिसाब से देखें तो डीएमके पर एआइएडीएमके भारी है. डीएमके तीन बड़ी समस्याओं में घिरी है. पूर्व मंत्री ए.राजा पर 2 जी घोटाले का आरोप है तो एम. करुणानिधि के बेटों एम. अलागिरी और एम.के. स्टालिन के बीच उत्तराधिकार की कलह चरम पर है. ऐसी ही कलह 1987 में एम.जी. रामचंद्रन की मौत के बाद एआइएडीएमके में उनकी पत्नी जानकी रामचंद्रन और जयललिता के बीच हुई थी.

तीसरी समस्या यह है कि उम्र में बहुत छोटी जयललिता करुणानिधि से अधिक लोकप्रिय हैं—वे मुख्यमंत्री पद के लिए 45 फीसदी वोटरों की पसंद हैं जबकि करुणानिधि को पसंद करने वाले सिर्फ 33 फीसदी हैं. सर्वेक्षण से सीपीआइ और सीपीएम की हालत खस्ता नजर आती है. तमिलनाडु में वैसे भी वामदलों की वजूद कोई खास नहीं रहा है.

अशोक के. लाहिड़ी अर्थशास्त्री और चुनाव विश्लेषक हैं.

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