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अदालत ने दिखाई कलह निबटारे की राह

30 सितंबर, 2020 को वाद यह कहकर अदालत ने खारिज कर दिया था कि मात्र भक्त होने के आधार पर प्रार्थीगण को वाद दायर करने की अनुमति देना न्यायोचित नहीं है.

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साथ-साथ हैं मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर और बगल में ईदगाह मस्जिद साथ-साथ हैं मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर और बगल में ईदगाह मस्जिद

मथुरा में कृष्ण जन्मभूमि विवाद के निबटारे की राह इलाहाबाद हाइकोर्ट ने दिखाई है. हाइकोर्ट ने 12 मई को भगवान श्रीकृष्ण के वादमित्र और हिंदू आर्मी के चीफ मनीष यादव की अर्जी पर सुनवाई करते हुए श्रीकृष्ण जन्मभूमि विवाद से जुड़ीं सभी अर्जियों को अधिकतम चार महीने के भीतर निबटारे का निर्देश मथुरा कोर्ट को दिया है.

हाइकोर्ट के जस्टिस सलिल कुमार राय की एकल पीठ ने अपने आदेश में सुन्नी वक्फ बोर्ड और अन्य पक्षकारों के सुनवाई में शामिल न होने पर एक पक्षीय आदेश जारी करने को कहा है. मथुरा की अदालत में कृष्ण जन्मभूमि विवाद से जुड़े सभी मुकदमों की सुनवाई और जल्द से जल्द पूरी करने और उनका निस्तारण किए जाने की मांग को लेकर मनीष यादव ने याचिका दाखिल की थी.

असल में मथुरा में कृष्ण जन्म स्थान परिसर में जो मंदिर बना है उसके बगल में ईदगाह मस्जिद है. हिंदू पक्षकारों का मानना है कि ईदगाह मस्जि‍द जिस स्थान पर बना है वहां कंस का कारागार था और यह कृष्ण जन्मस्थान मंदिर का ही हिस्सा है. इससे पहले भगवान श्रीकृष्ण विराजमान और लखनऊ की वकील रंजना अग्निहोत्री समेत आठ लोगों ने 25 सितंबर, 2020 के सिविल जज (सीनियर डिविजन), मथुरा की अदालत में वाद दायर किया था.

इसमें श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संघ और शाही मस्जिद ईदगाह कमेटी के बीच 1968 में हुए समझौते को रद कर मस्जिद हटाने और जमीन श्री कृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट को देने की मांग की थी. 30 सितंबर, 2020 को वाद यह कहकर अदालत ने खारिज कर दिया था कि मात्र भक्त होने के आधार पर प्रार्थीगण को वाद दायर करने की अनुमति देना न्यायोचित नहीं है. इस पर 12 अक्तूबर, 2020 को जिला जज, मथुरा की अदालत में अपील दायर की गई. जिला जज ने अपील स्वीकार की और और मुकदमा शुरू हुआ.

इसके बाद हिंदू आर्मी चीफ मनीष यादव और ठाकुर केशवदेव महाराज ने सिविल जज (सीनियर डिविजन), मथुरा की अदालत में एक वाद दायर की कृष्ण जन्मभूमि पर मालिकाना हक की मांग की. हाइकोर्ट के आदेश के बाद अब इन सभी मामलों पर एक साथ सुनवाई की राह खुल गई है. हालां‍कि मुस्लिम पक्ष की ओर से अदालत में एक दलील प्रमुखता से पेश की जा रही है कि वह है 1991 का प्लेसेज ऑफ वरशि‍प ऐक्ट

 मुस्लिम पक्ष के मुताबिक इस ऐक्ट में साफ तौर पर कहा गया है कि देश में 1947 से पहले धार्मिक स्थलों को लेकर जो स्थिति थी वह उसी तरह बरकरार रखी जाएगी और उसमें कोई छेड़छाड़ नहीं की जाएगी. वहीं हिंदू पक्षकार यह दलील रहे हैं कि ऐसा नहीं है कि कृष्णजन्म भूमि मामला अचानक दायर हुआ. वरशिप ऐक्ट में भी कहा गया है कि अगर किसी मामले में लगातार अदालतों में मामले दायर होते रहे हैं या लंबित हैं तो वह मामला 1991 के वर्कशिप ऐक्ट के तहत नहीं आएगा.

यूं सामने आया श्रीकृष्ण जन्मभूमि विवाद

 मथुरा में आज जिस जगह पर श्रीकृष्ण जन्मस्थान है, वहां पांच हजार साल पहले मल्लपुरा क्षेत्र के कटरा केशव देव में राजा कंस का कारागार हुआ करता था. मान्यता है कि इसी कारागार में रोहिणी नक्षत्र में भगवान श्रीकृष्ण ने जन्म लिया था. कटरा केशव देव को कृष्ण जन्मभूमि माना जाता है 

 इतिहासकारों के मुताबिक, सम्राट विक्रमादित्य के शासनकाल 400 ई. में कृष्ण जन्मभूमि पर भव्य मंदिर बनवाया गया था. महमूद गजनवी ने 1017 ई. में आक्रमण कर उस मंदिर तो लूटने के बाद तोड़ दिया 

 खोदाई में मिले एक अभि‍लेख के मुताबिक, 1150 ई. में राजा विजय पाल के शासनकाल के दौरान जज्ज नाम के एक व्यक्ति ने मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मभूमि पर एक नया विशाल मंदिर बनवाया था. 16वीं शताब्दी की शुरुआत में सिकंदर लोदी के शासनकाल में उसे नष्ट कर दिया गया  

 इतिहासकारों के मुताबिक, 1618 ई. में जहांगीर के शासनकाल के दौरान ओरछा के राजा वीर सिंह देव बुंदेला ने इसी स्थान पर एक नया मंदिर बनवाया. 1670 ई. को औरंगजेब ने मंदिर को ध्वस्त कराकर इसके एक हिस्से पर ईदगाह का निर्माण कराया था जो आज भी मौजूद है
 
 5 अप्रैल, 1770 की गोवर्धन की जंग में मुगलों से जीत के बाद मराठाओं ने कृष्ण जन्मस्थान पर पुन: मंदिर का निर्माण करवाया. 1803 में अंग्रेज मथुरा आए. अंग्रेजों ने 1815 में कटरा केशव देव मंदिर की 13.37 एकड़ जमीन नीलाम की, जिसे बनारस के राजा पटनीमल ने खरीदा

 ईदगाह से जुड़े अताउल्ला खान ने 15 मार्च, 1832 में मथुरा कलेक्टर के दफ्तर में 1815 में हुई नीलामी को निरस्त करने करने और ईदगाह की मरम्मत की अनुमति का प्रार्थनापत्र दिया. 29 अक्तूबर, 1832 को कलेक्टर डब्ल्यू. एच. टेलर ने नीलामी का उचित ठहराया 

 1897 में अहमदशाह नाम के व्यक्ति ने कटरा केशव देव में चौकीदार गोपीनाथ के खि‍लाफ मथुरा थाने में मस्जिद की जमीन पर सड़क बनाने और रोकने पर मारपीट की रिपोर्ट दर्ज कराई. कोर्ट ने इस मुकदमे को गलत मानते हुए निरस्त कर दिया और यह माना कि ईदगाह भी राजा पटनीमल की संपत्ति है 

 पंडित मदनमोहन मालवीय की पहल पर 7 फरवरी, 1944 को उद्योगपति जुगल किशोर बिड़ला ने कटरा केशव देव की जमीन को राजा पटनीमल के तत्कालीन उत्तराधि‍कारियों से खरीद लिया. बिड़ला ने 21 फरवरी, 1951 को श्रीकृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट की स्थापना की 

 1946 में कटरा केशव देव में मौजूद मस्जि‍द से जुड़े लोगों ने जमीन की खरीद को इलाहाबाद हाइकोर्ट में याचिका दायर कर चुनौती थी. कोर्ट ने 1953 में जमीन की खरीद को सही ठहराया. इसके मंदिर का जीर्णोद्धार शुरू हुआ जो फरवरी 1982 में पूरा हुआ
 
 श्रीकृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट ने 1 मई, 1958 को श्रीकृष्ण जन्म स्थान सेवा संघ का गठन किया. 1977 में श्रीकृष्ण जन्म स्थान सेवा संघ का नाम बदलकर श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संस्थान कर दिया गया. ट्रस्ट के अध्यक्ष और सचिव सेवा संस्थान के भी अध्यक्ष और सचिव होते हैं. वर्तमान में दोनों के अध्यक्ष नृत्य गोपाल दास और सचिव कपिल शर्मा हैं. ट्रस्ट में 21 और संस्थान में 15 सदस्य होते हैं 

 12 अक्तूबर, 1968 को श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संघ एवं शाही मस्जिद ईदगाह के प्रतिनिधियों के बीच एक समझौता किया गया कि 13.37 एकड़ जमीन पर कृष्ण मंदिर और मस्जिद दोनों बने रहेंगे. 17 अक्तूबर, 1968 को यह समझौता पेश किया गया और 22 नवंबर,1968 को सब रजिस्ट्रार मथुरा के यहां इसे पंजीकृत किया गया

 श्री कृष्ण जन्मभूमि विवाद कुल मिलाकर 13.37 एकड़ जमीन के मालिकाना हक का है, जिसमें से 10.9 एकड़ जमीन श्रीकृष्ण जन्मस्थान के पास और 2.5 एकड़ जमीन शाही ईदगाह मस्जिद के पास है. कोर्ट में विभि‍न्न याचिकाएं दायर कर 1968 के समझौते को रद करने के साथ 13.37 एकड़ जमीन पर मालिकाना हक की मांग की गई है.

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