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अब महाकाल स्मार्ट कॉरिडोर

कहा जाता रहा है कि उज्जैन का विकास 12 वर्षों में तब होता है जब सिंहस्थ आयोजित होता है. सिंहस्थ की तैयारी में शहर को नए भवन, नए पुल और नई सड़कों की स्थाई सौगात मिलती रही है. लेकिन अब उज्जैन में ये बुनियादी ढांचे चिर-स्थाई हो रहे हैं.

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कॉरिडोर का विहंगम दृश्य... नंदी द्वार, कमल कुण्ड और पीछे दिखाई दे रहा रुद्र सागर कॉरिडोर का विहंगम दृश्य... नंदी द्वार, कमल कुण्ड और पीछे दिखाई दे रहा रुद्र सागर

महेश शर्मा

महाकालेश्वर को केंद्र में रखकर बनाई गई ‘’महाकाल मंदिर परिसर विस्तार योजना” न सिर्फ मंदिर परिसर, बल्कि वहां तक पहुंचने वाले हर मार्ग और उससे लगे हर क्षेत्र को नई पहचान दे रही है. इस योजना के पहले चरण का काम लगभग पूरा हो गया है, जिसका लोकार्पण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जून के दूसरे सप्ताह में करेंगे.

करीब 750 करोड़ रु. से अधिक की इस योजना के प्रथम चरण में लगभग 316 करोड़ रु. लागत के काम किए गए हैं. दूसरे चरण का काम भी शुरू हो गया है, लक्ष्य है कि जून 2023 तक यह संपन्न हो जाए. मध्य प्रदेश की पर्यटन तथा संस्कृति मंत्री उषा ठाकुर कहती हैं, ''इनमें अधिकांश ऐसे स्थाई कार्य हैं जो कई सदियों तक नगर की पहचान बने रहेंगे और उज्जैन को पर्यटन के क्षेत्र में नया गंतव्य बनाएंगे.”

उज्जैन देश के प्राचीनतम नगरों में एक है, जिसका अत्यधिक धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व रहा है. समय-समय पर उत्खनन में अनेक पुरातात्विक सामग्री मिलने के बावजूद शहर में ऐसी ऐतिहासिक इमारतें या अवशेष नहीं हैं, जो पर्यटकों को आकर्षित कर सकें. धार्मिक पर्यटन के नाम पर महाकाल मंदिर ही आकर्षण का केंद्र रहा है, पर्यटकों को इसके अतिरिक्त मदिरा पान करने वाले कालभैरव के दर्शन की लालसा रहती है.

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान कहते हैं, ''महाकाल मंदिर परिसर विस्तार योजना के माध्यम से उज्जैन आने वाले श्रद्धालुओं को ऐसा नया उज्जैन को देखने को मिलेगा, जो देश की धार्मिक और आध्यात्मिक चेतना का प्रतीक होगा.’’ 

परिसर में वर्तमान सुविधा केंद्र 1,000 लोगों की क्षमता वाला है. यहां एक हजार जोड़ी जूते-चप्पल रखे जा सकते हैं. करीब 64 हजार वर्ग फुट क्षेत्र में बनाए जा रहे नए सुविधा केंद्र में 4,000 लोगों की क्षमता वाला हॉल होगा और 1,500 बैग की क्षमता वाला क्लॉक रूम, 6,000 मोबाइल रखे जा सकने वाले लॉकर और 6,000 जोड़ी जूते-चप्पल रखे जा सकने वाला जूता स्टैंड होगा. उज्जैन विकास प्राधिकरण के माध्यम से कराए जा रहे निर्माण कार्य के लिए करीब 21 करोड़ रु. का व्यय मंदिर समिति स्वयं कर रही है.

उज्जैन स्मार्ट सिटी लिमिटेड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी आशीष कुमार पाठक कहते हैं, ''महाकाल परिक्षेत्र जो पहले 2.2 हेक्टेयर में फैला था, इस योजना के पूर्ण होने के बाद लगभग 10 गुना बढ़कर करीब 23 हेक्टेयर हो जाएगा और 17 हेक्टेयर का रुद्रसागर भी शामिल करें तो यह परिसर 40 हेक्टेयर तक जा पहुंचेगा.’’ 
            
योजना के तहत त्रिवेणी संग्रहालय के पास 400 कार खड़ी करने की पार्किंग का निर्माण हो रहा है. 16.13 करोड़ रु. की लागत वाली पार्किंग में वाहन चालकों के लिए आराम कक्ष और श्रद्धालुओं के लिए सुविधा घर भी होंगे. खास बात यह है कि पार्किंग स्थल पर 400 किलोवाट प्रति घंटा क्षमता की सौर ऊर्जा प्रणाली स्थापित की जा रही है जिससे संपूर्ण परिक्षेत्र की विद्युत मांग की 70 फीसद पूर्ति की जा सकेगी.

स्मार्ट सिटी लि. के चेयरमैन और जिले के कलेक्टर आशीष सिंह कहते हैं, ''परियोजना में उल्लेखनीय जन सहयोग भी प्राप्त हो रहा है. पार्किंग के पास ही 60 लोगों की क्षमता वाली एक धर्मशाला जेके सीमेंट कंपनी बना रही है, जिसकी लागत करीब 5 करोड़ रु. है. करीब 8 करोड़ रु. की लागत से विनोद अग्रवाल समूह 1,500 लोगों की क्षमता वाला एक अन्न क्षेत्र बनवा रहा है. यह सब मंदिर समिति को सौंप दिया जाएगा.’’    
  
परियोजना का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा महाकाल मंदिर परिक्षेत्र का 224.42 करोड़ रु. की लागत से हो रहा निर्माण है. योजना के अंतर्गत महाकाल मंदिर के पीछे की ओर कलात्मक महाकाल पथ, मूर्ति कला के नए आयाम प्रदर्शित करती शिव अवतार वाटिका और आकर्षक शिव स्तंभ बनाए गए हैं. दक्षिण की ओर 26 फुट ऊंचा नंदी द्वार बनाया गया है, जहां से ऐसा कॉरिडोर शुरू होता है जो स्थाई और खुली आर्ट गैलरी की तरह है.

यहां 108 शिव स्तंभ बनाए गए हैं, जिनमें शिव की विभिन्न मुद्राएं अंकित की गई हैं. करीब आधा किलोमीटर लंबी और 25 फुट ऊंची ऐसी दीवार बनाई गई है जिन पर शिवपुराण पर आधारित भित्ती चित्र उकेरे गए हैं. रात में सोने-सी दमकती दीवार पर उकेरे गए ये भित्ति चित्र त्रिआयामी दिखाई देते हैं. 

पौराणिक कथाओं के प्रसंगों से प्रेरित ऐसी अनके मूर्तियां स्थापित की गई हैं. यहां 54 फुट ऊंचा पंचमुखी शिवस्तंभ स्थापित किया गया है, जो 20-20 फुट ऊंची सप्तऋषियों की प्रतिमाओं से घिरा है. इसके पास ही 50 मीटर व्यास का कमलकुंड बनाया गया है और 500 व्यक्तियों की क्षमता वाला मुक्ताकाशी रंगमंच भी तैयार किया गया है.

नवग्रह वाटिका का निर्माण किया गया है, जिसके केंद्र में सात घोड़ों वाले रथ पर सवार सूर्य की 11 फुट ऊंची प्रतिमा है जबकि चारों ओर अन्य ग्रहों की प्रतीक मूर्तियां छह फुट ऊंची हैं. मूर्तियों पर क्यूआर कोड होंगे जिन्हें स्कैन करते ही संदर्भ सहित संपूर्ण जानकारी प्राप्त हो जाएगी. श्रव्य मार्गदर्शक ऑडियो गाइड की व्यवस्था भी की गई है और साथ ही इतने विशाल परिसर में भ्रमण के लिए 6 करोड़ रु. से 20 इलेक्ट्रॉनिक वाहन ई-कार्ट भी खरीदे जाएंगे.

आकर्षक विद्युत सज्जा सिर्फ परिसर में ही नहीं की गई है, बल्कि शहर के मध्य में स्थित घंटाघर, शहर के बाहर स्थित कालभैरव मंदिर और इंदौर मार्ग स्थित महामृत्युंजय द्वार पर भी की गई है. इसके लिए ढाई करोड़ रु. से अधिक की राशि उपलब्ध कराई गई है. परियोजना के लिए राज्य शासन ने 421 करोड़ रु. का अंशदान दिया है, जबकि केंद्र से करीब 271 करोड़ रु. प्राप्त हुए हैं. 

उज्जैन को स्मार्ट सिटी बनाने के लिए अनेक मार्गों को चौड़ा किया जा रहा है, जो अब तक सिर्फ सिंहस्थ के लिए ही होता था. हालांकि इसको लेकर कुछ विवाद भी है क्योंकि अमूमन सड़कों को चौड़ा करने में अनेक मकान-दुकान स्वाहा कर दिए जाते हैं, और रहने वाले विस्थापित कर दिए जाते हैं. महाकाल मंदिर के सामने 70 मीटर तक अनेक मकान-दुकान इसके दायरे में हैं. कुछ को तोड़ा जा चुका है और बाकी के लिए दुकानदारों का विरोध जारी है. मुख्यमंत्री चौहान कहते हैं, ''सभी का पुनर्वास किए जाने के निर्देश दे दिए गए हैं.’’

जिला कलेक्टर आशीष सिंह बताते हैं कि परियोजना में 150 करोड़ रु. तो संपत्ति अधिग्रहण के लिए ही रखे गए हैं और संपूर्ण परियोजना में करीब 500 दुकानें फूल, प्रसाद और अल्पाहार के लिए बनाई जाएंगी जो प्राथमिकता के आधार पर पीड़ितों को आवंटित की जाएंगी. वैसे, सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद मंदिर से 500 मीटर के दायरे में किए गए अतिक्रमण को जिला प्रशासन सख्ती से हटा चुका है.

हालांकि महाकाल मंदिर से हरसिद्धि जाने वाले मार्ग के कुछ लोगों ने सड़क को चौड़ा करने और संपत्ति अधिग्रहण के विरुद्ध जबलपुर हाइकोर्ट से स्थगन भी ले लिया है.

विवादों के घेरे में दूसरा है रुद्र सागर का जीर्णोद्धार. रुद्र सागर महाकाल मंदिर के ठीक पीछे है जिसमें वर्षा का जल तो आता ही है, सीवर का पानी भी गिरता था. इसलिए अमृत मिशन के अंतर्गत 20 करोड़ रु. लागत से सीवर लाइन डाली गई है जिससे गंदा पानी इसमें न गिरे. अल्प वर्षा की स्थिति में क्षिप्रा नदी से जल छोड़े जाने की व्यवस्था भी की जा रही है.
 
रुद्र सागर में ही सिंहस्थ के समय पानी निकालकर भूमि अखिल भारतीय धर्म संघ को आवंटित की जाती रही है. अखिल भारतीय धर्मसंघ के संस्थापक स्वामी करपात्रीजी ने ही इस भूमि में से अपने शिष्यों द्वारिका की शारदापीठ एवं बद्रीनाथ के ज्योतिर्मठ पीठ के शंकराचार्य स्वरूपानंदजी सरस्वती तथा पुरी की गोवर्धन पीठ के शंकराचार्य निश्चलानंद जी सरस्वती को भूमि आवंटित कराई थी. वर्तमान में अखिल भारतीय धर्म संघ के साथ ही दोनों शंकराचार्यों के शिविर रुद्र सागर में लगते हैं. विवाद स्थाई निर्माण को लेकर है. 

महाकाल परिसर विस्तार योजना के कॉरिडोर से रुद्र सागर को निहारने के लिए डेकनुमा निर्माण किया गया है. रुद्र सागर पर करीब 16 करोड़ रु. की लागत से एक नया पुल बनाया जाना भी प्रस्तावित है जो 210 मीटर लंबा और 6 मीटर चौड़ा होगा. ज्योतिषाचार्य पं. आनंद शंकर व्यास कहते हैं, ''सिंहस्थ 2016 में रुद्र सागर के आसपास चारदिवारी बनाए जाने से ही शंकराचार्य स्वरूपानंदजी सरस्वती ने सिंहस्थ के बहिष्कार की धमकी दे दी थी और प्रशासन को दीवार तोड़नी पड़ी थी. इसलिए रुद्र सागर में छेड़छाड़ नहीं की जानी चाहिए.’’ 

स्थानीय विधायक तथा प्रदेश के उच्च शिक्षा मंत्री मोहन यादव कहते हैं, ''सिंहस्थ के समय रुद्र सागर का पानी निकालकर भूमि यथावत शिविरों के लिए आवंटित कर दी जाएगी.’’ अखिल भारतीय धर्मसंघ वाराणसी के अध्यक्ष स्वामी शंकरदेव चैतन्य ब्रह्मचारीजी महाराज कहते हैं, ''विकास और विस्तार होना चाहिए लेकिन परंपरा नष्ट न हो, यह भी ध्यान में रखा जाना चाहिए. कुछ ऐसा किया जाए कि परंपरानुसार सिंहस्थ में शिविर भी लगें और अन्य समय में सौंदर्यीकरण भी हो.’’ 

इस परियोजना की तुलना काशी विश्वनाथ कॉरिडोर से होने लगी है. भारतीय जनता पार्टी को उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में काशी विश्वनाथ कॉरिडोर योजना का लाभ मिला इसलिए महाकाल परियोजना का दूसरा चरण नवंबर 2023 में होने वाले मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव के पहले समाप्त करने का दबाव बनाया जा रहा है. 

हालांकि कांग्रेस के प्रदेश सचिव रवि शुक्ला कहते हैं, ''कमलनाथ के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार के समय ही इस परियोजना का काम शुरू हुआ. कांग्रेस सरकार ने ही इसे स्वीकृत कराया और केंद्र से प्राप्त राशि के साथ प्रदेश का अंशदान भी दिया, फिर प्रदेश की वर्तमान भाजपा सरकार इसका श्रेय कैसे ले सकती है.’’ 

चुनाव में किसी सियासी पार्टी को इसका लाभ मिलेगा, यह तो भविष्य के गर्भ है लेकिन इतना तय है कि श्रद्धालुओं को सुविधाजनक तरीके से महाकाल के दर्शन सुलभ होंगे और परिसर का सौंदर्य देशभर के लोगों को उज्जैन यात्रा के लिए आमंत्रण देगा.

उपेक्षित अवशेष
महाकाल मंदिर परिसर के विस्तार के लिए हो रही खुदाई के दौरान दिसंबर, 2020 में मंदिर के आगे के हिस्से में, प्रवेश द्वार के समीप एक अन्य मंदिर के भग्नावशेष मिले. पुरातत्वविदों ने इसे दसवीं शताब्दी का निर्माण बताया. उस हिस्से की शेष खुदाई पुरातत्वविदों के मार्गदर्शन में की गई तो नंदी के साथ गणेश और चामुंडा की मूर्ति भी निकली.

मालवा के निकटवर्ती राजस्थान के उदयपुर संभाग में पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग के संभागीय अधीक्षक नीरज त्रिपाठी कहते हैं, ''महाकाल का वर्तमान मंदिर और खुदाई में निकला मंदिर एक तल पर और एक अक्ष पर ही हैं. यह भी संभव है कि सिंधियाकाल में पुनर्निर्माण के पूर्व यही मूल मंदिर हो जिसे इल्तुतमिश ने जमींदोज कर दिया हो लेकिन गर्भगृह तक खुदाई की ही नहीं गई.’’

मध्य प्रदेश राज्य पुरातत्व विभाग की ओर कहा गया कि प्राप्त अवशेषों का उपयोग कर उक्त मंदिर का ढांचा खड़ा किया जा सकता है लेकिन बीते डेढ़ वर्ष में कोई काम नहीं हुआ. नतीजा यह है कि उक्त अवशेष उपेक्षित पड़े हैं. उपेक्षा का एक कारण यह भी है कि इसे भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग को नहीं सौंपा गया.

प्रदेश के पुरातत्व विभाग में बदहाली का यह आलम है कि पुरातत्वविदों के लगभग सभी पद खाली पड़े हैं. सीधे-सीधे पुरातत्व विभाग के अधीन न आने से उत्खनन में प्राप्त ढांचे के आसपास निर्माण कार्य जारी है. पुरातत्व विभाग के मार्गदर्शक ध्रुवेंद्र जोधा और पुरातत्व अधिकारी 
डॉ. रमेश यादव को उज्जैन भेजा गया लेकिन वे केवल तकनीकी मार्गदर्शन के लिए ही हैं.

डॉ. यादव कहते हैं, ''उक्त क्षेत्र मंदिर समिति की संपत्तिड है, इसलिए इस पर पुरातत्व ऐक्ट लागू नहीं होता. हम तकनीकी मार्गदर्शन के लिए उपलब्ध हैं.’’ पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित क्षेत्र घोषित होने पर संबंधित ढांचे से 300 मीटर के दायरे में कोई निर्माण कार्य नहीं हो सकता इसलिए यह संरक्षित घोषित नहीं हुआ और पुरातत्व विभाग ने इससे दूरी बनाए रखी. राज्य पुरातत्व विभाग ने गेंद प्रशासन के पाले में डाल दी है.
 

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