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आधी सदी बाद भी आधी-अधूरी

पश्चिमी कोसी नहर परियोजना का दावा था कि 1981 में किसानों को इससे पानी मिलने लगेगा, मगर 1979 तक मुख्य नहर की 59 में से मात्र 17 संरचनाओं का काम पूरा हुआ था, सात पर काम चालू था, शेष 35 की तो सर्वे रिपोर्ट भी तैयार नहीं हुई थी.

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बस, यहीं तक!  दरभंगा जिले के धोई गांव में बन रही नहर के बीचोबीच गेहूं के खेत बस, यहीं तक!  दरभंगा जिले के धोई गांव में बन रही नहर के बीचोबीच गेहूं के खेत

नहर के काम की प्रगति देखकर इसी इलाके के नेता और तत्कालीन गृह राज्यमंत्री धनिक लाल मंडल ने कहा था कि जिस रफ्तार से पश्चिमी कोसी नहर परियोजना का काम चल रहा है, उसमें तो यह काम बीसवीं सदी में पूरा नहीं होगा. उनकी जबान पर सरस्वती का वास था, उन्होंने जो कहा, सच हो गया.
—दुई पाटन के बीच, दिनेश कुमार मिश्र की पुस्तक

भारत-नेपाल सीमा पर कोसी नदी पर बने भीमनगर बैराज के पश्चिमी छोर पर आज भी धूसरित सा वह शिलापट्ट दिखता है, जिस पर भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री और नेपाल के तत्कालीन राजा महेंद्र वीर विक्रमशाह देव के नाम दर्ज हैं. 24 अप्रैल, 1965 को लगे इस शिलापट्ट पर इन दोनों की मौजूदगी में पश्चिमी कोसी नहर प्रणाली का काम शुरू होने की सूचना है.

हालांकि उत्तर बिहार की नदियों के विशेषज्ञ दिनेश कुमार मिश्र के मुताबिक, 1954 में तत्कालीन केंद्रीय मंत्री जगजीवन राम और 1961 में बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह के हाथों इस परियोजना का पहले ही दो बार शिलान्यास हो चुका था.

लेकिन जिस काम को 1981 में पूरा होना था, वह इक्कीसवीं सदी के पहले इक्कीस वर्षों में भी पूरा नहीं हो पाया. अब तक इसके सात शिलान्यास हो चुके हैं, पांच बार डीपीआर का संशोधन किया जा चुका है और इसका बजट 13 करोड़ रुपए से बढ़कर लगभग 2,400 करोड़ रुपए तक पहुंच गया है. 

इस नहर परियोजना का उद्देश्य था कोसी नदी के पश्चिमी तट पर बसने वाले मुख्यत: मधुबनी और कुछ हद तक दरभंगा जिले के लाखों किसानों की दो लाख हेक्टेयर से अधिक जमीन की सिंचाई. मगर आज भी इस परियोजना के तहत बनी नहरों से सिर्फ 60 हजार हेक्टेयर जमीन तक ही पानी को पहुंचाया जा सका है, जो परियोजना के लक्ष्य का महज 30 फीसद है.

जानकार बताते हैं कि यह भी एक तरह की खानापूर्ति है. नहरों के जरिये खरीफ के मौसम में किसी तरह पानी पहुंचा दिया जाता है. लेकिन रबी के मौसम में जब किसानों को पानी की ज्यादा जरूरत होती है, तब नहर लगभग सूख चुकी होती है.

इस परियोजना के लिए ’80 और ’90 के दशक में इसके तहत ज्यादातर भू-अर्जन का काम हुआ था. दिनेश कुमार मिश्र बताते हैं, ''इस परियोजना का सात बार शिलान्यास हो चुका है. हर बार जब चुनाव का वक्त आता है, तो इसका शिलान्यास कर दिया जाता है.

शुरुआती कुछ वर्षों में तो इस परियोजना का काम नेपाल के असहयोग की वजह से अटका रहा, क्योंकि इस परियोजना के तहत नेपाल के इलाकों में भी 35 किमी से अधिक नहर बननी थी. मगर 1970-71 तक तो नेपाल ने भी सहमति दे दी. उसके बाद तो हमारी अपनी सरकार की वजह से काम अटका रहा. कभी फंड की कमी तो कभी दूसरे बहाने.’’

अप्रैल 2022 में इंडिया टुडे ने इस परियोजना का जायजा लिया और पाया कि दरअसल, जिस इलाके के लिए यह परियोजना शुरू की गई थी उसमें संभवत: उसकी इतनी उपयोगिता नहीं है. शायद इसी वजह से जमीन का अधिग्रहण करने से लेकर धन मुहैया कराने तक के मामले में लगातार देरी होती चली गई.

दरभंगा के धोई गांव में संतोष मंडल ने कहा कि उनके साढ़े सात कट्टा के प्लॉट का ज्यादातर हिस्सा पश्चिमी कोसी नहर परियोजना में आ गया है और बदले में सरकार की तरफ से उन्हें सिर्फ छह हजार रुपए प्रति कट्टा की दर से मुआवजा मिल रहा है. लिहाजा वे इस नहर की खुदाई नहीं होने दे रहे. उन्हीं की तरह उनके गांव के 22 दूसरे किसानों ने भी पश्चिमी कोसी नहर परियोजना की शाखा नहर बुरुआर उपवितरणी की खुदाई को रोक रखा है.

मंडल बताते हैं कि यह जमीन सरकार ने 30 साल पहले अधिग्रहीत की थी. तब भी मुआवजा कम मिलने की वजह से उनके पिता अपनी जमीन नहीं देना चाहते थे. इतने लंबे अरसे तक काम शुरू नहीं हुआ तो वे निश्चिंत हो गए कि उनकी जमीन नहीं ली जाएगी. वे कहते हैं, ''हमें नहर से कोई दिक्कत नहीं है.

नहर के आने का तो हमारे गांव के लोग 50 साल से इंतजार कर रहे हैं. मगर सरकार जमीन का मुआवजा तो ठीक से दे दे.’’ मंडल की तरह उनके पड़ोस के गांव लक्ष्मीपुर के भी 14 किसान नहर के काम को बाधित कर रहे हैं.

इस नहर परियोजना में साल 2020 तक 1,804 ऐसी जगहें थीं, जहां ग्रामीणों ने नहर खुदाई का काम रोक रखा था. वजह: समुचित मुआवजे की मांग. इस परियोजना में 3,193 नई संरचनाओं का निर्माण होना है और 750 पुरानी संरचनाओं की मरम्मत की जानी है. यह किसी लिहाज से आसान काम नहीं है.

दरभंगा स्थित पश्चिमी कोसी नहर परियोजना कार्यालय के मुताबिक, अब तक इस परियोजना पर 1,738 करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं, हालांकि काम अब भी अधूरा ही है. बिहार सरकार ने इस परियोजना के लिए 2,372.52 करोड़ रुपए की राशि खर्च करने की स्वीकृति दी. इसके तहत पहले से बनी मुख्य नहर और शाखा नहरों में गाद की सफाई का काम होना है.

इसके साथ ही जिन बिंदुओं पर अलग-अलग वजहों से शाखा नहर और उपशाखाओं की खुदाई का काम नहीं हो पाया है, उसे पूरा करना है. मुख्य नहर और झंझारपुर की शाखा नहर में खुदाई का काम पूरा हो चुका है. मगर इसके अलावा इस नहर की सात सौ से अधिक शाखाएं ऐसी हैं, जहां काम जगह-जगह अधूरा पड़ा है. 

वैसे, इस परियोजना पर अब कुछ काम होता दिख रहा है. इससे सर्वाधिक लाभान्वित होने वाले इलाके मधुबनी के संजय कुमार झा इस वक्त बिहार के जल संसाधन मंत्री हैं. कुछ दिनों पहले झा ने जानकारी दी थी कि मार्च, 2023 तक इस परियोजना को हर हाल में पूरा कर लिया जाएगा और इलाके में दूसरी हरित क्रांति आ जाएगी. लेकिन अब उन्हें संदेह है कि 2020 में तैयार इस परियोजना की पांचवीं डीपीआर के हिसाब से तय समय में यह परियोजना पूरी हो पाएगी. (देखें: बातचीत).

बहरहाल, इस वक्त परियोजना के आगे न बढ़ पाने की सबसे बड़ी वजह भूमि अधिग्रहण की समस्या है. आखिर, इस नहर के लिए हाल के वर्षों में बड़े आंदोलन क्यों नहीं हुए? इस परियोजना में किसानों की दिलचस्पी क्यों नहीं है? बिहार के जल संसाधन विभाग के पूर्व सचिव गजानन मिश्र बताते हैं, ''मिथिला के इस इलाके में हर आधे से एक किमी के बीच किसी न किसी नदी की धारा बहती है.

इसके अलावा यह इलाका पग-पग पोखर के लिए प्रसिद्ध रहा है. फिर यहां चौर (प्राकृतिक वाटर रिजर्वायर) खूब होते थे. इसलिए यहां के किसानों को सिंचाई के लिए कभी नहरों की जरूरत हुई ही नहीं.

संभवत: यही वजह रही कि पश्चिमी कोसी नहर परियोजना के इतना विलंबित होने पर भी आज किसानों की तरफ से इसे लेकर बहुत डिमांड नहीं है.’’  वे बताते हैं कि इस इलाके में हमेशा से अच्छी खेती होती रही है. हर साल बाढ़ आती रही है. अकाल का वर्णन काफी कम मिलता है. इसलिए नहर को लोग गैरजरूरी मानते हैं.

गजानन मिश्र का कहना है कि खरीफ के मौसम में दो बार पानी की जरूरत होती है. जुलाई में रोपणी के वक्त. मगर अमूमन उस वक्त बारिश होने की वजह से पानी उपलब्ध ही रहता है. दूसरी बार 15 सितंबर के बाद कटाई से पहले, मगर तब कोसी में ही पानी नहीं रहता. ऐसे में भला किसान इसके लिए कम मुआवजे पर जमीन देने को राजी क्यों होंगे? अन्य कई सरकारी योजनाओं की तरह इसके नियोजन में सूझबूझ की कमी नजर आती है.

—पुष्यमित्र.

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