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खास रपटः चिराग का नया राग

लोजपा प्रमुख चिराग पासवान बिहार विधानसभा चुनाव से ठीक पहले नीतीश कुमार के खिलाफ मुखर हो गए हैं और इसको लेकर आर-पार के मूड में हैं

 युवा जोर पटना में लोजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष चिराग पासवान  युवा जोर पटना में लोजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष चिराग पासवान

भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा बिहार और वहां की सियासत से बखूबी वाकिफ हैं. सिर्फ इसलिए नहीं कि पार्टी अध्यक्ष होने के नाते उन्हें नियमित रूप से बिहार से फीडबैक मिलता है. बल्कि इसलिए भी कि उनके जीवन का एक बड़ा हिस्सा बिहार में बीता है. लिहाजा जब 4 सितंबर को ज्यादातर बड़े अखबारों में उन्होंने अपने सहयोगी दल लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) का पूरा एक पन्ने का विज्ञापन देखा तो उन्हें माजरा समझते देर न लगी.

इसके पीछे मंशा सिर्फ यह नहीं थी कि एनडीए के सीट बंटवारे में लोजपा ज्यादा सीट हासिल करने के लिए दबाव बना रही है बल्कि जद (यू) नेता और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व को लेकर एक अहम सहयोगी आर-पार की लड़ाई के मूड में है. नड्डा की इस समझ के मुताबिक ही लोजपा ने सात सितंबर को 143 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने की धमकी दे डाली.

ऐसा नहीं कि नीतीश को लेकर लोजपा ने अचानक आक्रामक रुख अपना लिया है. चिराग पासवान के नेतृत्व में लोजपा ने पिछले साल ही 'बिहार फर्स्ट, बिहारी फर्स्ट का अभियान शुरू कर दिया था. कोविड 19 और बाढ़ के दौरान चिराग पासवान लगातार नीतीश सरकार पर हमलावर रहे.

तल्खी कम करने के लिए भाजपा और जद (यू) जब तक चिराग के पिता और केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान से बातचीत करते, उन्होंने (रामविलास) पार्टी मामलों से खुद को अलग करते हुए दो टूक कर दिया कि 'लोजपा को चलाने की जिम्मेदारी चिराग की है और खुद वे केंद्रीय मंत्री के रूप में सिर्फ और सिर्फ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति उत्तरदायी हैं.’ उनके इस बयान के बाद चिराग से बातचीत कर मामले को विराम देने के लिए बचा एकमात्र विकल्प (राम विलास पासवान) भी बंद हो गया.

यहां एक बड़ा सवाल उठता है कि चुनाव जब सिर पर हैं, भाजपा इस पूरे मामले में खामोश क्यों है? केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह, भाजपा अध्यक्ष नड्डा सार्वजनिक रूप से यह घोषित कर चुके हंर कि एनडीए बिहार में नीतीश के नेतृत्व में चुनाव लड़ेगा. तो फिर क्या वजह है कि चिराग को नीतीश की आलोचना करने और उनके नेतृत्व पर सवाल उठाने से रोकने की कोशिश नहीं की जा रही है?

बिहार के राजनैतिक मामलों के जानकार मणिकांत ठाकुर कहते हैं, ''चिराग पासवान जो कुछ कर रहे हैं, परोक्ष रूप से उसमें कहीं न कहीं भाजपा की भी सहमति है. भाजपा का काडर लगातार कह रहा है कि नीतीश कुमार को लेकर अगड़ी जाति में काफी नाराजगी है. अगर चिराग यह मुद्दा उठा रहे हैं, और भाजपा चिराग को चुप कराने की कोशिश करती है तो अगड़ी जाति की नाराजगी भाजपा को भी झेलनी पड़ सकती है.’’ 

तो क्या चुनाव से ठीक पहले भाजपा, जद (यू) को छोड़कर लोजपा के साथ चुनाव में जाना चाहती है और कुछ अन्य छोटे दलों मसलन वीआइपी पार्टी, उपेंद्र कुशवाहा की लोक समता पार्टी से गठजोड़ करेगी? जद (यू) के महासचिव के.सी. त्यागी कहते हैं, ''इसका सवाल ही नहीं है.

भाजपा के शीर्ष नेतृत्व में से प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और भाजपा अध्यक्ष तक कह चुके हैं कि एनडीए बिहार में नीतीश कुमार के नेतृत्व में चुनाव लड़ेगी.’’ त्यागी के शब्दों में, ''जद (यू) का गठबंधन भाजपा के साथ है. और दल इसमें रहें तो अच्छा है, नहीं रहें तो भी जद (यू) और भाजपा मिल कर नीतीश कुमार के नेतृत्व में चुनाव लड़ेंगे और जीत हासिल करेंगे.’’

लेकिन चिराग पासवास के बयान, विज्ञापन और 143 सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारने की धमकी पर भाजपा की चुप्पी को जद (यू) कैसे देखती है? त्यागी कहते हैं, ‘‘यह भाजपा के स्वविवेक पर निर्भर है कि वह इस मसले पर लोजपा से बात करे या नहीं. इतना जरूर है कि जिस तरह के बयान लोजपा की तरफ से आ रहे हैं, वह न सिर्फ बिहार में एनडीए को कमजोर करने की कोशिश है बल्कि प्रधानमंत्री पर भी परोक्ष रूप से हमला है.’’

जदयू के एक अन्य वरिष्ठ नेता कहते हैं, ''क्या भाजपा, चिराग को तब जाकर रोकेगी जब वे प्रधानमंत्री पर हमला करना शुरू करेंगे? क्या भाजपा को यह नहीं दिखता कि राष्ट्रीय जनता दल चिराग पासवान के बयानों को सोशल मीडिया के जरिए वायरल करा रहा है, क्या इससे विरोधी दलों को लाभ नहीं होगा?’’

जद (यू) की यह पीड़ा और भाजपा की चुप्पी अनायास नहीं है. दरअसल, बिहार विधानसभा के पिछले चुनाव (2015) में भाजपा और जद (यू) अलग-अलग लड़ रहे थे. नीतीश कुमार उस वक्त भाजपा पर इस हद तक हमलावर हो गए थे कि उन्होंने रैलियों में भाजपा का फुलफार्म बताते हुए इसे बड़का झूठा पार्टी तक कह दिया था. भाजपा ने भी जद (यू) को जनता दमन और उत्पीडऩ पार्टी कहा था.

बाद में लालू प्रसाद यादव को गच्चा देकर नीतीश कुमार ने भाजपा के साथ मिलकर सरकार बना ली थी. नीतीश के इस कदम की आलोचना खुद उनकी पार्टी की तरफ से होने लगी थी. पार्टी के तत्कालीन उपाध्यक्ष प्रशांत किशोर ने यह बयान दे दिया था कि नीतीश कुमार को भाजपा के साथ मिल कर सरकार बनाने से पहले नया जनादेश लेना चाहिए था.

जद (यू) खेमे में मची रार के बीच भाजपा चुप्पी साधे रही तो सिर्फ इसलिए क्योंकि लोकसभा चुनाव में बड़ी जीत के लिए भाजपा को नीतीश की जरूरत थी. लोकसभा चुनाव जीतने के लिए नीतीश की जरूरत के बीच भाजपा ने 17-17 सीटों पर चुनाव लडऩे का फैसला लिया और 6 सीटें लोजपा को दीं. भाजपा सभी 17 और जदयू 16 तथा लोजपा 6 सीट जीतने में सफल रही.

नीतीश और भाजपा की तल्खी लोकसभा चुनाव के बाद खुलकर सामने आई. मोदी-2 मंत्रिमंडल गठन में भाजपा ने जद (यू) को एक कैबिनेट मंत्रालय देने का प्रस्ताव दिया, लेकिन नीतीश आनुपातिक प्रतिनिधित्व की बात पर अड़ गए. यानि जिस पार्टी ने बिहार में जितनी सीटें जीती हैं उसी के अनुपात में मंत्री बनाए जाएं. चूंकि लोजपा को अगर 6 सीट पर एक मंत्री पद दिया जा रहा है तो जद (यू) ने 16 सीटें जीतने का हवाला देकर कम से कम दो मंत्री पद की मांग की.

भाजपा ने इस प्रस्ताव को नहीं माना जिससे जद (यू) काफी नाराज हुआ. नतीजतन जब बिहार में नीतीश ने अपने मंत्रिमंडल का विस्तार किया तो उसमें भाजपा के कोटे से किसी को मंत्री नहीं बनाया गया. बिहार के वरिष्ठ पत्रकार अरुण अशेष कहते हैं, ''नीतीश और भाजपा भले ही साथ हों पर दोनों के बीच विश्वास की घोर कमी है. भाजपा का आकलन यह हो सकता है कि नीतीश का यह आखिरी चुनाव है, इसके बाद अगले चुनाव तक जद (यू) विधायकों का एक बड़ा हिस्सा भाजपा के साथ जुड़ सकता है.’’

अशेष कहते हैं, ''नीतीश के बाद जद (यू) के पास कोई बड़ा नेता नहीं है, भाजपा के पास भी नई पीढ़ी का कोई ऐसा बड़ा नेता नहीं है और यही हाल राजद और लोजपा के लिए भी है. लिहाजा चिराग पासवान अपनी अलग पहचान बनाने के लिए ऐसी रणनीति अपना रहे हैं ताकि लोगों का ध्यान खींच सकें. बिहार की कुल आबादी में दलित और ओबीसी मिलाकर 50 फीसद से ज्यादा हैं. वहीं, 67 फीसद युवा वोटर हैं.

चूंकि चिराग खुद दलित समुदाय से हैं, इसलिए दलित और ओबीसी की राजनीति में वे फिट बैठ सकते हैं. खुद युवा भी हैं.’’ वहीं, प्रदेश लोजपा के एक नेता कहते हैं, ''लोगों में यह आम धारणा है कि सभी दल किसी न किसी रूप से सत्ता हासिल करने के लिए चुनाव लड़ते हैं, राज्य के लिए कोई नहीं सोचता. लोगों की इसी भावना को देखते हुए चिराग ने विज्ञापनों के जरिए कहा है कि वे लड़ रहे हैं हम पर राज करने के लिए, और हम लड़ रहे हैं बिहार पर नाज करने के लिए.’’

यहां चिराग का तंज भाजपा-जद (यू) पर है या राजद पर? लोजपा के एक नेता कहते हैं कि राज तो सीएम का ही होता है. वे पूछते हैं कि आखिर क्या वजह है कि कोविड-19 और बाढ़ के बीच जब ज्यादातर पार्टियां चुनाव टालने के पक्ष में हैं तब भी जद (यू) चुनाव कराने पर तुला रहा.

चिराग के आक्रामक रुख को देखते हुए क्या इस बात की संभावना है कि लोजपा भाजपा से अलग हो जाए? बिहार भाजपा के महासचिव देवेश कुमार कहते हैं, ‘‘तीनों दल एकजुट हैं और नीतीश कुमार के नेतृत्व में एनडीए चुनाव लड़ेगा और बड़ी जीत हासिल करेगा. लोजपा और जद (यू) भरोसेमंद साथी हैं और लंबे समय से हम साथ हैं.’’

अगर ऐसा है तो फिर चिराग के रुख को लेकर भाजपा खामोश क्यों है? देवेश बताते हैं, ''सहयोगी दलों में कुछ मसले होते हैं. यह लोकतंत्र में स्वभाविक है पर हम साथ हैं और साथ मिलकर चुनाव लड़ेंगे, इसमें दो राय नहीं.’’

बहरहाल, नड्डा भाजपा के युवा मोर्चे के अध्यक्ष भी रहे हैं, लिहाजा वे युवा चिराग की भावनाओं को भी भांप रहे हैं और यह तथ्य भी जानते हैं कि राज्य के पिछले चुनाव में नीतीश ने जब भाजपा का साथ छोड़ दिया था तब भी लोजपा उसकेसाथ मजबूती से खड़ी थी. वहीं, नीतीश की सुशासन बाबू की छवि पर चुनाव लडऩे का जोखिम उठाने से बचने की भाजपा की परोक्ष कवायद शायद इसलिए है क्योंकि अगड़ी जातियों के साथ ही सहयोगी चिराग को भी यह रास नहीं आ रहा.

नीतीश की सुशासन की छवि पर चुनाव लडऩे का जोखिम उठाने से बचने की भाजपा की परोक्ष कवायद इसलिए है क्योंकि अगड़ी जातियों के साथ चिराग को भी यह रास नहीं आ रहा.

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