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खास रपटः पुराने ढर्रे से हटकर

पहली बार मुख्यमंत्री बने एम.के. स्टालिन का जोर प्रशासन में सियासी नफे-नुक्सान के बजाए अच्छे और पारदर्शी ढंग से सरकार चलाने पर है

मुख्यमंत्री की नजर चेन्नै के एक स्कूल में 27 मई को कोविड टीकाकरण की शुरुआत के दौरान स्टालिन मुख्यमंत्री की नजर चेन्नै के एक स्कूल में 27 मई को कोविड टीकाकरण की शुरुआत के दौरान स्टालिन

तमिलनाडु में जहां सियासत और सिनेमा आसानी से एकमेक हो जाते हैं, किसी काम की शुरुआत का 100वां दिन खास मौका होता है. पहली बार मुख्यमंत्री बने एम.के. स्टालिन ने अपनी सत्ता का यह खास दिन आने से पहले यह दिखाने का पक्का इरादा कर लिया है कि उनकी सरकार राज्य में बीते पांच दशकों की द्रविड़ हुकूमत से अलग है. 68 वर्षीय स्टालिन अपने पिता एम. करुणानिधि और सी.एन. अन्नादुरै के बाद अपनी पार्टी डीएमके (द्रविड़ मुनेत्र कड़गम) की ओर से महज तीसरे मुख्यमंत्री हैं. सात बार के विधायक स्टालिन को राजनीति और प्रशासन का अच्छा तजुर्बा है. वे मंत्री और उपमुख्यमंत्री के अलावा प्रतिद्वंद्वी एआइएडीएमके (अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम) की सरकार के दौरान खासे सक्रिय नेता विपक्ष जो रह चुके हैं.

अप्रैल में हुए विधानसभा चुनाव में डीएमके गठबंधन की शानदार जीत (234 में से 159 सीट) के साथ स्टालिन स्थिर सरकार का नेतृत्व कर रहे हैं और उनके सामने तमिलनाडु में विकास की नई इबारत लिखने का मौका है. नई गठित मुख्यमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (सीएमईएसी) की पहली वर्चुअल बैठक में बोलते हुए 9 जुलाई को उन्होंने कहा, ''तमिलनाडु को दक्षिण एशिया की सबसे आकर्षक औद्योगिक मंजिल बनकर दुनिया को मानव पूंजी मुहैया करनी चाहिए.''

उन्होंने जोर देकर कहा कि तमिलनाडु समग्र और तेज बदलाव के लिए तैयार है और इसमें देश का मॉडल राज्य बनकर उभरने की क्षमता है. उन्होंने यह भी कहा कि ग्रोथ आर्थिक खुशहाली तक सीमित न हो बल्कि सामाजिक सुधार और शैक्षिक तरक्की का सूत्रपात भी करे. नोबल विजेता अर्थशास्त्री मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एमआइटी) की एस्थर डुफ्लो, आरबीआइ के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन, केंद्र सरकार के पूर्व प्रधान आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रह्मण्यम, विकास अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज और पूर्व केंद्रीय वित्त सचिव एस. नारायण सीएमईएसी के सदस्य हैं.

प्रशासनिक कायापलट

दोनों प्रमुख द्रविड़ पार्टियों के बीच तीखे टकराव की राजनीति से ऊपर उठते हुए स्टालिन ने ऐलान किया कि उन्हें वोट न देने वाले लोगों सहित वे पूरे राज्य के मुख्यमंत्री हैं. उनके पूर्ववर्ती जहां अपने राजनैतिक प्रतिद्वंदियों को दूर रखते थे, स्टालिन ने पिछली एआइएडीएमके सरकार के स्वास्थ्य मंत्री सी. विजयभास्कर को राज्य की कोविड सलाहकार समिति में शामिल किया. राज्य की शीर्ष अफसरशाही में फेरबदल करते वक्त उन्होंने योग्यता को तवज्जो देते हुए डॉ. जे. राधाकृष्णन को स्वास्थ्य सचिव बनाए रखा.

प्रशासन को जवाबदेह बनाने के लिए स्टालिन अहम पदों पर चुनिंदा आइएएस अफसरों को लाए. इनमें नए मुख्य सचिव वी. ईरानी अंबू और मुख्यमंत्री कार्यालय (सीएमओ) में तैनात कई अफसर शामिल हैं. सरकार डिप्टी कलेक्टरों की तैनाती में राज्य प्रशासनिक सेवा से पदोन्नत होकर आए अफसरों के बजाए सीधी भर्ती से आए आइएएस अफसरों को तवज्जो दे रही है. पूर्व सिविल सेवक एम.जी. देवसहायम कहते हैं, ''तमिलनाडु में अहम पदों के लिए प्रशासकों के चयन में ताजगी-भरा बदलाव आया है. यह अच्छी शुरुआत है.''

स्टालिन सामाजिक कल्याण की आड़ में पार्टी का ढोल पीटने के हक में नहीं हैं. सियासी पर्यवेक्षक 3 जून की मिसाल देते हैं जब करुणानिधि की 78वीं जन्मतिथि के मौके पर राज्य के 2 करोड़ राशन कार्डधारकों को खाने और घरेलू जरूरत की चीजें बांटी गईं. इन पैकेट पर करुणानिधि या स्टालिन की तस्वीर नहीं थी. पहले एआइएडीएमके की हुकूमत में खैरातों पर पार्टी सुप्रीमो जे. जयललिता के स्टिकर होते थे. स्टालिन ने ऐसे हथकंडों को तिलांजलि दे दी है. वहीं डीएमके के कार्यकर्ताओं को लगता है कि पार्टी की मोहर लगाए बगैर जनकल्याण की चीजें बांटने से पार्टी उनका पूरा श्रेय नहीं ले पाएगी.

मगर स्टालिन मानते हैं कि उनकी सरकार अच्छे काम करती है तो चुनावी फायदा तो खुद मिलेगा. उन्होंने बार-बार पारदर्शी सरकार की बात कही है जिसमें मंत्रियों-अफसरों को न सिर्फ अपने कर्तव्य बल्कि अधिकार भी पता हों. एआइएडीएमके की बीते 10 साल की हुकूमत में ऐसा कुछ भी नहीं दिखा. मद्रास विश्वविद्यालय में राजनीति और लोक प्रशासन विभाग के प्रमुख रामू मणिवन्नन कहते हैं, ''स्टालिन अच्छे राजकाज पर बाजी लगा रहे हैं. वे अफसरशाही को साथ लेकर चलना चाहते हैं, बजाए इसके कि उस पर प्रभुत्व जमाते दिखें.''

स्टालिन ने डीएमके कार्यकर्ताओं की जमात में नीचे तक यह संदेश दिया है कि पार्टी के सत्ता में होने का फायदा कोई न उठाएं, न ही राजकाज में दखल दें और न ही प्रतिद्वंद्वियों को परेशान करें. अहम बात यह है कि अहम महकमे संभाल रहे स्टालिन के कुछ मंत्रियों ने मीडिया से बातचीत की, जबकि करुणानिधि के जमाने में उनके मुंह सिले रहते थे. पर्यवेक्षकों का कहना है कि यह स्टालिन के मातहत न केवल सरकार बल्कि डीएमके के भीतर भी ज्यादा लोकतंत्र का संकेत है.

सरकार के शुरुआती दिनों में कुछ मंत्रियों ने सामूहिक जिम्मेदारी दिखाते हुए मीडिया के ऐसे सवालों के जवाब भी दिए, जो उनके मंत्रालयों के तहत नहीं आते थे. इनमें सबसे आगे वाक्पटु वित्त मंत्री पलानिवेल त्यागराजन (पीटीआर) थे. उन्होंने मंदिरों के प्रबंधन में सुधार की सरकार की योजनाओं पर खुलकर बात की, अलबत्ता उसमें यह भी जोड़ा कि फैसले लेना तो अंतत: उनके साथी तथा हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ दान मंत्री पी.के. शेखर बाबू के हाथ में है. सियासी टिप्पणीकार एन. सत्य मूर्ति कहते हैं, ''स्टालिन ने द्रविड़ विचारधारा में रचे-बसे टेक्नोक्रेट को वित्त मंत्री बनाया, सीएमईएसी का गठन किया और स्वीकार किया कि राज्य की अर्थव्यवस्था खराब हालत में है, पर वे इसे पटरी पर लाने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे, यह किसी भी क्षेत्रीय या राष्ट्रीय पार्टी के लिए जोखिम भरी अभूतपूर्व पहल है.''

चिंताजनक कर्ज

स्टालिन की बड़ी चुनौती राज्य की अर्थव्यवस्था होगी. महामारी की मार के चलते राज्य का कर्ज 2021-22 में 5 लाख करोड़ रुपए से ऊपर पहुंचने के आसार हैं. राज्य के सार्वजनिक उपक्रमों पर करीब 2 लाख करोड़ रुपए का कर्ज है. राजस्व कुछेक विभागों के जरिए ही बढ़ पा रहा है. जीएसटी व्यवस्था ने राज्य से कर वसूलने का हक छीन लिया, लिहाजा उसे अपनी संपत्तियों और संसाधनों को मुद्रा में बदलने के लिए मजबूत होना होगा. पीटीआर कहते हैं, ''हमारी सरकार की प्राथमिकता कोविड-19 महामारी के चलते तमिलनाडु की खराब माली हालत को दुरुस्त करना, राष्ट्रीय जीडीपी में राज्य का योगदान बढ़ाकर मौजूदा 10 फीसद से 14-15 फीसद पर ले जाना और राज्य के ब्याज भुगतानों में कमी लाना है.'' निवेश और नौकरियों के सृजन के लिए एमएसएमई को खतरों से बचाना और कारोबार करने की आसानी में सुधार लाना नए उपायों में शामिल हैं.

स्टालिन ने डीएमके की संशयवादी और ब्राह्मण-विरोधी विचारधारा कुछ हद तक छोड़ दी है. यह 1991 जयललिता के मुख्यमंत्री बनने के साथ शुरू हुई थी, जो खुद ब्राह्मण थीं. सीएमईएसी के तीन सदस्य ब्राह्मण हैं. स्टालिन ने पहले दिन से ही धर्मार्थ दान मंत्री शेखर बाबू को राज्य सरकार के हाथों संचालित मंदिरों की यात्रा के काम में लगा दिया, इस मकसद से कि बीते दशकों के दौरान पट्टेधारियों और उप-पट्टेधारियों के हाथों गंवाई गई उनकी विशाल संपत्तियों के हिस्से वापस मिल सकें. उन्होंने मंदिरों की संपत्तियों की सूची ऑनलाइन अपलोड करवाई और मंदिर प्रबंधन को आसान और कारगर बनाने के लिए विभिन्न उपायों की घोषणा भी की.

द्रविड़ सरकारें, चाहे डीएमके की हों या एआइएडीएमके की, दशकों से भ्रष्टाचार के लिए बदनाम रही हैं. लिहाजा साफ-सुथरी शुरुआत करना स्टालिन के लिए बड़ा काम था. राज्य के भ्रष्टाचार-विरोधी वाचडॉग अरप्पोर इयक्कम के संस्थापक-संयोजक जयराम वेंकटेशन कहते हैं, ''सीएमओ सहित कुछ चुनिंदा पदों के लिए अफसरों के चयन इशारा हैं कि उन्होंने कुछ बेहद ईमानदार लोगों को लिया है, लेकिन सभी मंत्रियों के बारे में यह नहीं कहा जा सकता. कुछ मंत्री म्युनिसिपल प्रशासन, राजमार्ग और लोक कार्य सरीखे आम तौर पर भ्रष्टाचार से जुड़े महकमों में मामलों और पुरानी शिकायतों से घिरे हैं.'' इयक्कम ने पिछली एआइएडीएमके सरकार के मंत्रियों के खिलाफ कई मामले दर्ज करवाए थे, जो या तो राज्य के सतर्कता और भ्रष्टाचार-रोधी निदेशालय में लटके हैं या अदालतों में सुनवाई चल रही है. डीएमके ने भी चुनाव अभियान के दौरान एआइएडीएमके के मंत्रियों पर आरोप लगाए थे और पिछली सरकार के 'भ्रष्टाचारों की सूची' राज्यपाल को सौंपी थी.

मुख्यमंत्री होने के नाते स्टालिन से उम्मीद होगी कि वे पार्टी के उठाए इन मामलों पर कार्रवाई करें. फिलहाल वे मेहरबान दिखाई देते हैं. अंतत: क्या होगा, यह इस पर निर्भर करेगा कि जब वे पूर्व मंत्रियों के विरुद्ध भ्रष्टाचार के आरोपों पर कार्रवाई की मंजूरी देंगे, तब दूसरों और खासकर एआइएडीएमके के लोग कैसी प्रतिक्रिया देते हैं. मणिवन्नन को लगता है, ''स्टालिन परिपक्ता दिखा रहे हैं. वे सराहना और आलोचना से संतुलन के साथ निपट सकते हैं क्योंकि उन्होंने सत्ता की कगार पर और फिर भी उसके शीर्ष पद से दूर रहकर इतने सारे साल बिताए हैं.''

केंद्र से तकरार

नरेंद्र मोदी सरकार के साथ रिश्ते स्टालिन के लिए एक और बड़ी चुनौती है. सत्ता संभालने के बाद से ही डीएमके केंद्र सरकार को महज संघ सरकार (तमिल में ओंड्रिया अरासू) कहती रही है. उसका कहना है कि इसमें 'संघवाद का फलसफा' समाहित है. विश्लेषकों के अनुसार, पूरे आसार हैं कि स्टालिन सरकार तमिलनाडु की कई मांगों को लेकर केंद्र पर दबाव बनाएगी. इनमें मेडिकल प्रवेश परीक्षा नीट को खत्म करने की मांग भी है, ताकि राज्य बड़ी तादाद में खोले गए उन मेडिकल कॉलेजों का फायदा उठा सके जिनका बुनियादी ढांचा तमिलनाडु के भीतर से आए निवेशों से खड़ा किया गया है.

राज्य का कहना है कि एमबीबीएस में जाने के इच्छुक राज्य के युवा नीट की वजह से इन कॉलेजों में दाखिले से वंचित हो जाते हैं. आने वाले महीनों में स्टालिन राज्यों की स्वायत्तता को लेकर ज्यादा मुखर हो सकते हैं. जून में उन्होंने ज्यादातर गैर-भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों को लिखा कि वे मसौदा भारतीय बंदरगाह विधेयक 2021 का विरोध करें. आलोचकों का कहना है कि यह विधेयक राज्य सरकारों से छोटे बंदरगाहों के विकास या नियमन की शक्तियां छीन लेगा.

स्टालिन ने मसौदा सिनेमेटोग्राफ (संशोधन) विधेयक 2021 को वापस लेने की मांग भी की है. यह सेंसर बोर्ड से फिल्मों को मिले प्रमाणपत्र को उलटने का हक केंद्र सरकार को देने की पेशकश करता है. मणिवन्नन कहते हैं, ''स्टालिन खासकर नीट और जीएसटी और कुल मिलाकर राज्यों के प्रति संघ सरकार के रवैये के खिलाफ हैं. राज्यों को ज्यादा हक की मांग के मामले में तमिलनाडु की आवाज की अहमियत है. सो, देश की असरदार आवाजों के बीच अपनी अनूठी भूमिका का स्टालिन को एहसास है.''

स्टालिन ने मुख्यमंत्री की पारी संभावनाओं के साथ शुरू की. उन्होंने दिखाया कि राजकाज को बदलने का इरादा और विचार दोनों उनके पास हैं. उनकी सरकार ने पूरे तमिलनाडु में साधारण किराए वाली बसों में महिलाओं के लिए मुफ्त यात्रा और सरकारी डेयरी से मिलने वाले 'आविन' दूध की कीमत घटाने सरीखे कुछ चुनावी वादे पूरे कर दिए.

यह दिखाने के लिए कि वे जो कहते हैं वह करते भी हैं, सत्ता संभालने के पहले ही दिन (7 मई) उन्होंने एक आइएएस अफसर को चुनाव अभियान के दौरान मिली शिकायतों के निवारण का काम सौंपा. पर कई चुनौतियां उनका इंतजार कर रही हैं. इनमें सबसे पहले कोविड की संभावित तीसरी लहर है. मूर्ति कहते हैं, ''स्टालिन सरकार की नीतियों और कार्यक्रमों और उनके राजकाज के मॉडल का बेहतर पता तभी चलेगा जब महामारी राज्य से पीठ फेर लेगी.'' आने वाले महीनों में स्टालिन पर कड़ी नजर रखी जाएगी, यह देखने के लिए कि वे कैसे प्रशासक हैं.

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