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शिवराज सिंह चौहान: खामोशी से उभरता भविष्य

दिल्ली की सुर्खियों से दूर एक शख्स खामोशी से पार्टी को सींच रहा है. ऐसा चेहरा जिससे मुसलमानों को डर नहीं लगता.

तारीख 23 मई, 2003 शिवराज सिंह चौहान को बीजेपी के वरिष्ठ नेता प्रमोद महाजन का फोन आया, ''कल आपको राज्यमंत्री पद की शपथ लेनी है, तैयारी करिए, सुबह गाड़ी आपके घर पहुंच जाएगी.” दिल्ली के 7 पंडित पंत मार्ग स्थित सरकारी आवास में खुशी का माहौल बन गया, लेकिन अगले दिन सुबह फिर महाजन का फोन आया, ''आपका नाम ड्रॉप कर दिया गया है और अब मध्य प्रदेश कोटे से प्रह्लाद पटेल कोयला राज्यमंत्री बनेंगे.” 24 मई की देर शाम शपथ समारोह संपन्न हो गया. लेकिन चौहान ने विरोध तो दूर, उफ तक नहीं की.

उनकी यही खासियत उन्हें राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं के लिए किसी भी हद तक जाने वाले नेताओं से अलग करती है. पिछले सात साल से मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज 53 वर्षीय शिवराज सिंह चौहान की शैली ऐसी है कि कोई उनसे नाराज नहीं होता. बीजेपी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी इंडिया टुडे से कहते हैं, ''एक सफल शासक में जिस प्रकार की विनम्रता जरुरी है, शिवराज का व्यक्तित्व उस पहलू को बहुत उजागर करता है. मैं मानता हूं कि उनकी विनम्रता उनकी लोकप्रियता और यश का बहुत बड़ा अंग हैं. उनमें अहंकार तनिक भर नहीं है”

चौहान को महत्वाकांक्षी नेता के तौर पर नहीं देखा जाता. क्या दबंग नजर न आना ही उनकी ताकत है? ऐसा मुमकिन है. वी.पी. सिंह के बाद देश में कोई भी उग्र तेवर वाला आक्रामक पीएम नहीं बना. राव, देवगौड़ा, वाजपेयी, मनमोहन की परंपरा में आगे भी शायद कोई आक्रामक तेवर वाला पीएम की कुर्सी तक न पहुंचे.BJP Loksabha

विकास ने बढ़ाई लोकप्रियता
बातों को मन में रखने और महत्वाकांक्षा न जताने की उनकी क्षमता प्रबल है. तमाम चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों में शिवराज की लोकप्रियता का ग्राफ लगातार बढ़ता दिख रहा है, लेकिन उन्हें शायद एहसास है कि 2014 में अगर बीजेपी सरकार बनाने की स्थिति में आती है, तो पार्टी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ही कमान संभालेंगे. इसलिए इस समय वे राष्ट्रीय राजनीति के लिए दावेदारी जताने से परहेज कर रहे हैं.

एनडीटीवी के पिछले महीने के सर्वेक्षणों ने जतला दिया है कि अगर मध्यावधि चुनाव होते हैं, तो मध्य प्रदेश में बीजेपी लोकसभा की मौजूदा 16 सीटों से बढ़कर 29 में से 25 सीटें हासिल कर सकती है. इस सर्वेक्षण में राज्य की 72 फीसदी जनता ने शिवराज सरकार के कामकाज को बेहतर बताया है, तो बतौर मुख्यमंत्री उनकी लोकप्रियता इस कदर है कि 66 फीसदी जनता ने शिवराज को सीएम के तौर पर अपनी पसंद बताया. जबकि कांग्रेस के ज्योतिरादित्य सिंधिया को 16 और दिग्विजय सिंह को 9 फीसदी लोगों ने पसंद किया.

2009 के लोकसभा चुनाव में भी मध्य प्रदेश से बीजेपी को गुजरात से अधिक सीटें मिली थीं. हालांकि दक्षिणी राज्य कर्नाटक ने बीजेपी को सर्वाधिक 18 सीटें दी थीं. कर्नाटक में बीजेपी अब दुर्गति की शिकार है और उसके लिए 2009 का प्रदर्शन दोहरा पाना मुश्किल होगा. ऐसे में बीजेपी के लिए मध्य प्रदेश के महत्व को समझा जा सकता है.

मध्य प्रदेश के विकास और खास तौर से कृषि व सामाजिक क्षेत्र के काम से केंद्र सरकार बेहद प्रभावित है. योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह आहलूवालिया कई बैठकों में राज्य की तारीफ कर चुके हैं. मुख्यमंत्री कार्यालय में जनता से जुड़ी अहम योजनाओं की सीधी निगरानी के लिए एक विशेष शाखा है.

शिवराज इंडिया टुडे से कहते हैं, ''इन्फ्रास्ट्रक्चर और सामाजिक क्षेत्र में हमारी पहल को योजना आयोग ने हमेशा सराहा है.” पेशे से किसान शिवराज आज राज्य में किसानों के हीरो बन चुके हैं. कृषि क्षेत्र में पिछले वित्तीय वर्ष में राज्य का विकास 18 फीसदी रहा है. मध्य प्रदेश का वित्तीय प्रबंधन भी अच्छा है. पिछले साल केंद्र का वित्तीय घाटा 5.7 था जबकि मध्य प्रदेश में सिर्फ 3 फीसदी था.

किसान से 'नायक’ का सफर
किसान परिवार में जन्मे और ओबीसी श्रेणी की किरार जाति से संबंध रखने वाले शिवराज नपे-तुले अंदाज में अपनी बात कहते हैं, इसलिए उन्होंने बिना किसी विवाद के राजनीति में एबीवीपी से जुड़कर केंद्रीय स्तर पर पार्टी के महासचिव और संसदीय बोर्ड में सचिव तक की जिम्मेदारी संभाली. शिवराज 1990 में पहली बार विधायक बने थे और 1991 में ही वाजपेयी की खाली सीट विदिशा से लोकसभा जाने का मौका मिला और लगातार पांच बार सांसद रहे. अब उसी सीट का प्रतिनिधित्व लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज कर रही हैं.

बतौर सांसद शिवराज लोकसभा की आवास और एथिक्स कमेटी की कमान संभाल चुके हैं, तो कृषि, लाभ के पद संबंधी ज्वाइंट कमेटी, श्रम और रोजगार आदि कमेटियों के सदस्य रह चुके हैं. 2003 के विधानसभा चुनाव में पार्र्टी ने उन्हें तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के खिलाफ राघोगढ़ सीट से मैदान में उतारा था. शिवराज चुनाव हार गए थे, लेकिन पहली बार दिग्विजय के पूरे परिवार को साख बचाने के लिए प्रचार में उतरना पड़ा था.

पार्टी ने 2005 में उन्हें राज्य बीजेपी का अध्यक्ष बनाया था. राजनीति में अहम पदों को संभाल चुके चौहान की हसरत कभी जुबां पर नहीं आती. हालांकि एक बार उन्होंने अपने दिल की बात अपने एक बेहद करीबी निजी सहायक आदित्य झा से तब साझा की थी, जब वे वृंदावन में दीनदयाल उपाध्याय स्मारक समिति की ओर से आयोजित मेले में परिवार समेत बतौर मुख्य अतिथि शिरकत करने जा रहे थे.Shivraj

उन्होंने कहा था, ''अगर मैं सीएम बनूं तो नायक फिल्म के अनिल कपूर की तरह बनूं. उसी तरह समस्या को समझ सकूं, कहीं भी उपलब्ध हो जाऊं और भेष बदलकर निरीक्षण करूं.”  25 सितंबर, 2005 को उन्होंने वृंदावन जाते हुए यह बात कही और 29 नवंबर, 2005 को उन्होंने मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली. झा कहते हैं, ''उन्होंने जो सपना देखा था, सीएम के तौर पर उसे साकार कर मिसाल पेश की है.”

जनता है जनार्दन
महीने भर में शिवराज कम से कम 10 जिलों और 30 से 50 विधानसभा क्षेत्रों का दौरा कर लेते हैं. सीएम हाउस पर जन पंचायत की योजना कारगर साबित हो रही है, जहां वे युवाओं, महिलाओं, आदिवासियों, दलितों, मजदूरों, कामगारों, कलाकारों, खिलाडिय़ों आदि को अलग-अलग समूहों में बुलाकर उनकी समस्या सुनते हैं और उससे सरकार की कई नीतियां तय होती हैं. वे तकनीक से बहुत ज्यादा नहीं जुड़े, मोबाइल नहीं रखते. लेकिन उन्होंने http://www.ideasforcm/ नाम से वेबसाइट बना रखी है, जिस पर शासन के लिए सीधे जनता से विचार मांगे जाते हैं. उनके बारे में राज्य के एक वरिष्ठ अधिकारी बताते हैं, ''सीएम 16-18 घंटे काम करते हैं. सात साल से सीएम होने के बावजूद पद का अहंकार नहीं झलकता. जन पंचायत ने उन्हें और भी लोकप्रिय बना दिया है. भाषण शैली अच्छी है और मेहनती स्वभाव के है.”

सर्वधर्म समभाव ही मूलमंत्र
मुख्यमंत्री की सबसे बड़ी ताकत यह है कि उनसे किसी को डर नहीं लगता. बीजेपी के एक नेता कहते हैं, ''उनकी नीति की वजह से संघ परिवार भी खुश है और अल्पसंख्यक समाज में भी अच्छी छवि है.” शिवराज खुद कहते हैं, ''हमारी नजर में सभी नागरिक समान हैं. इसमें अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक का भेद नहीं हो सकता.” हाल ही में उन्होंने अजमेर शरीफ के लिए विशेष तीर्थ ट्रेन भेजकर सर्वधर्म समभाव का संदेश दिया है. अगर केंद्र सरकार ओबीसी कोटे से अल्पसंख्यकों को 4.5 फीसदी आरक्षण के फैसले पर आगे बढ़ती है तो निश्चित तौर पर शिवराज बीजेपी के पोस्टर ब्वॉय हो सकते हैं. हालांकि वे अल्पसंख्यक आरक्षण पर टिप्पणी से बचते हैं.

वे कहते हैं, ''मैं इस पर टिप्पणी नहीं करना चाहता. लेकिन मौजूदा योजनाओं में अगर बेहतर प्रबंधन करके दिया जाए तो मुस्लिम समाज को आगे बढ़ाया जा सकता है.” ओबीसी के बड़े जनाधार वाले नेता होने के बावजूद वे मुलायम सिंह यादव और लालू यादव की तरह ओबीसी राजनीति नहीं करते. हाल ही में उन्होंने सामान्य निर्धन वर्ग आयोग बनाकर सबको साधने की कोशिश की है. इस वजह से सभी समुदायों में उनकी स्वीकार्यता है.

बीजेपी में रहे एक संघ नेता की दलील है, ''जिस दिन मोदी का नाम पीएम के तौर पर आया, उस दिन चुनाव का पूरा परिदृश्य ही बदल जाएगा क्योंकि एक बड़े वर्ग विशेष में मोदी के प्रति घृणा का भाव है, जबकि शिवराज की छवि उनसे बिल्कुल उलट है.” राज्य बीजेपी के एक अन्य नेता तो यहां तक दावा करते हैं, ''अगर भविष्य में सुषमा-जेटली-मोदी-गडकरी-राजनाथ सरीखे दावेदारों के बीच दिक्कतें आईं तो ओबीसी होने और विकास पुरुष की छवि से शिवराज खांचे में फिट बैठेंगे.”

संगठन ही सर्वोपरि
शिवराज सरकार से ज्यादा संगठन को तरजीह देते हैं. उन्हें मुख्यमंत्री बनाए जाने वक्त बीजेपी के संगठन महामंत्री रहे संजय जोशी कहते हैं, ''उन्होंने संगठन-सरकार में कभी टकराव की स्थिति नहीं बनने दी. जब कभी ऐसी स्थिति आई, उन्होंने संगठन को तरजीह दी.” प्रदेश के एक नेता कहते हैं, ''आज की स्थिति में शिवराज सरकार के विरोध में जाने वाला कोई नेता नहीं है, क्योंकि शिवराज ने सबको किसी न किसी काम में लगा रखा है. कोई बोर्ड में है तो कोई संगठन में काम कर रहा है.” छवि पर कोई दाग न लगे, इसलिए वे व्यापारिक कामों से बचते हैं. उनके एक करीबी कहते हैं, ''वे आर्थिक से ज्यादा सामाजिक स्टेट्स को महत्व देते हैं.”

वैसे सरल स्वभाव वाले शिवराज राजनैतिक दांवपेच में भी कम नहीं हैं. जब हुबली तिरंगा प्रकरण में उमा भारती मुख्यमंत्री पद से हटीं, तब केंद्रीय नेतृत्व ने शिवराज को मुख्यमंत्री बनाने का मन बनाया, लेकिन उमा उनके पक्ष में नहीं थीं. पार्टी के संसदीय बोर्ड की मीटिंग में सहमति नहीं बन रही थी तो शिवराज बीच में ही बाहर निकले और बाबूलाल गौर को फोन किया, ''मैं आपका नाम प्रस्तावित कर रहा हूं, विधायकों की संख्या आप देखो.” इस बातचीत के बाद वे मीटिंग में गए और गौर के नाम का प्रस्ताव कर दिया. चौहान ने अपनी कोई कोर टीम नहीं बनाई है और न ही कोई किचेन कैबिनेट.

लाडली लक्ष्मी योजना के जरिए वे राज्य में मामा के नाम से मशहूर हो चुके हैं, तो हाल ही में किसानों के लिए उन्होंने जीरो फीसदी पर कर्ज मुहैया कराने की योजना शुरू करते हुए ''ब्याज जीरो, किसान हीरो” का नारा दिया. अब तीर्थदर्शन योजना काफी सफल हो रही है. गांव में जाकर साइकिल से दौरा करना, कहीं भी अपना काफिला रुकवा कर चौक-चौराहे बैठे लोगों से गपशप करना उनकी आदत में है. गांवों में उन्हें 'पांव-पांव वाले भैया’ के नाम से पुकारा जाता है.

संघ-बीजेपी नेताओं से रिश्ते
संघ परिवार हो या बीजेपी, शिवराज के संबंध हर जगह मधुर हैं. उनके बारे में कहा भी जाता है कि वे दोस्त किसी के हों या न हों, लेकिन दुश्मन किसी के नहीं हैं. नहीं तो क्या वजह थी कि वे यूपी विधानसभा चुनाव 2012 में उमा भारती का प्रचार करने चरखारी पहुंच गए, जबकि उमा यह कभी नहीं भुला पाईं कि शिवराज उनकी जीती कुर्सी पर काबिज हों. लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज की संसदीय सीट विदिशा इसी राज्य में होने की वजह से सीधा राजनैतिक समीकरण है, तो राजनाथ सिंह के अध्यक्ष रहते वे मुख्यमंत्री बने थे, इसलिए उनके वफादार माने जाते हैं.

शिवराज ने पार्टी के पूर्व अध्यक्षों को एयरपोर्ट या स्टेशन पर रिसीव करने की अघोषित नीति ही बना ली है. आडवाणी का आशीर्वाद उन्हें हमेशा रहा है, लेकिन वे वाजपेयी के लाडले सांसद रहे हैं. हालांकि एक समय में पार्टी में प्रमोद महाजन उनके संरक्षक थे.

संघ में सह सरकार्यवाह सुरेश सोनी का वरदहस्त उन्हें हासिल है, तो दूसरे सह सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले एबीवीपी के दिनों के दोस्त रहे हैं. संघ के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, ''परिवार में व्यक्ति विशेष की बात नहीं की जाती, लेकिन शिवराज अच्छे स्वयंसेवक हैं. राजनैतिक क्षेत्र में भी अच्छा काम किया है. परिवार के मूल मंत्र पर चलते हुए समाज के सभी वर्गों को साथ लेकर आगे बढ़ रहे हैं.”

उद्योग को लुभाने की कोशिश
संघ के प्रति निष्ठा रखते हुए उदारवादी छवि बनाकर आगे बढ़ रहे शिवराज को उद्योग जगत में उतनी तवज्जो नहीं मिल रही, जितनी नरेंद्र मोदी को मिल रही है. बीजेपी के एक नेता इस सवाल पर कहते हैं, ''मध्य प्रदेश में रिलायंस और जेपी ग्रुप को छोड़कर कोई बड़ा उद्योग नहीं है.” हालांकि शिवराज भी मानते हैं, ''मध्य प्रदेश सबसे शांत राज्य है, लेकिन इन खासियतों की कभी मार्केंटिंग नहीं हुई थी. इसलिए हमने 2007 से इनवेस्टर समिट शुरू किया.” दर्शनशास्त्र में पोस्टग्रेजुएट शिवराज का राजनैतिक दर्शन स्पष्ट है: जनता सरकार से डरे तो समझिए निरंकुशता है, सरकार जनता से डरे तो लोकतंत्र है, आजादी है.

हालांकि उनकी सबसे बड़ी कमजोरी है सख्त और कड़े निर्णयों को तब तक टालना जब तक कि वह बेहद जरूरी न बन जाए. सरलता और सादगी के कारण वे जल्दी किसी को ना नहीं कह पाते. सूचना-क्रांति के जमाने में भी शिवराज टेक्नोसेवी नहीं हैं. पारिवारिक प्रभाव की वजह से कई बार उन्हें विवादों में भी रहना पड़ा है. विपक्ष के नेता अजय सिंह उनके व्यक्तित्व पर कहते हैं, ''वे जैसे दिखते हैं, वैसे हैं नहीं.”

चौहान भारतीय राजनीति के उभरते हुए उदारवादी चेहरे हैं, लेकिन उनकी फौरी चुनौतियां विधानसभा चुनाव में बीजेपी को तीसरी बार सत्ता में लाना है.

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