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इंडिया टुडे अंग्रेजी की 40वीं वर्षगांठ: यौन व्यवहार और नैतिकता में बदलाव की कहानी

उदारीकरण के बाद के दौर में सामाजिक बदलावों, खासकर यौन व्यवहार और नैतिकता में आए बदलावों को पकडऩे का एक अहम जरिया है सिनेमा

वह 1989 में सर्दियों की एक सुकूनदेह दोपहर थी. हरी मखमली घास पर मेजें लगी हुई थीं और खाने-पीने का दौर चल रहा था. चालीस साल के एक मेहमान अचानक मुझसे मुखातिब हुए. वे वाइन के कई प्याले गटक चुके थे. उन्होंने कहा, “क्या आपने इस बात की ओर ध्यान दिया है कि भारत में कितने पुरुष अपने जीवन के बीच पड़ाव (मध्यवय) में संकट से गुजर रहे हैं... तकरीबन संक्रामक तरीके से.” वे खुद कुछ वर्षों में पचास के होने वाले थे, इसलिए मेरा ख्याल है कि वे अपनी और अपने दोस्तों की बात कर रहे थे. अगली सुबह संपादकीय बैठक में मैंने इस अनौपचारिक टिप्पणी का जिक्र कर डाला. संपादक अरुण पुरी कुछ पढ़ रहे थे. यह सुनते ही उनकी नजर उठी. चश्मे के पीछे उनकी आंखों में एक चमक थी. उन्होंने मुझे इस पर काम करने को कहा.

इस तरह एक टिप्पणी स्टोरी बन गई और बाद में आवरण कथा में तब्दील हो गई जिसका शीर्षक था, मिडलाइफ  ब्लूज (31 मार्च, 1989). उन दिनों हमें स्टोरी की तलाश में दूर-दूर भेजा जाता था, जिन्हें हम फिशिंग ट्रिप कहते थे. मालिकान को अपनी खबर पर राजी करने के लिए बहुत समझाने की जरूरत नहीं होती थी. बस हल्का-सा इशारा ही काफी होता था.

तकरीबन यही कहानी हिंदी फिल्मों में अश्लील नृत्यों पर केंद्रित एक स्टोरी से भी जुड़ी हैः उन दिनों गीतों में यौनिकता का असर बढ़ता जा रहा था. पहले जो गीत कभी हल्की रूमानियत से भरे होते थे, उनमें अब कहीं ज्यादा तीव्र तरीके से सेक्स की अभिव्यक्ति हो रही थी. इस स्टोरी पर बंबई में कुछ नृत्य निर्देशकों के साक्षात्कार करने के बाद (उनके नृत्य निर्देशन में शरीर के अगले हिस्से का झटका अब तकरीबन नियमित हो चला था) मुझे एहसास हुआ कि यह स्टोरी कहीं ज्यादा बड़ी है. मामला सिर्फ नाच-गाने का नहीं था बल्कि फिल्में खुद अश्लील होती जा रही थीं.

मुझसे कहा गया कि स्टोरी पूरी होने तक मैं बंबई में ही रहूं. इस तरह हुआ यह कि जिसे दो पन्ने की स्टोरी होना था, वह भारतीय सिनेमा में बढ़ती यौनिकता पर आवरण कथा बन गई. फिल्म निर्देशक शशिलाल नायर ने इस बारे में बहुत सारगर्भित बात कही थी, “हुनर अब कंधों से नीचे पहुंच चुका है.” उस वक्त अपने अभिनय के शिखर पर चल रहीं माधुरी दीक्षित ने भी इसकी पुष्टि कुछ ऐसे की थी, “अब हम अपने नितंबों से भावनाओं का प्रदर्शन करते हैं.” पहले यह काम आंखों से ही हो जाता था. अरुणा राजे की मानें तो अब कैमरा “स्तन और नितंबों पर जूम होने लगा था.” “अब फोकस व्यक्ति पर नहीं, उसके अंगों पर था.”

इंडिया टुडे में मधु जैन की आवरण कथामैं 1986 से 2000 के बीच जब इंडिया टुडे में थी, उस दौरान बदलाव सबसे अहम शब्द था. लगातार फैलता मध्यवर्ग अब अपनी अलग पहचान बनाना शुरू कर चुका था. पुरानी मर्यादाएं टूट रही थीं, नया पैसा आ रहा था. संयुक्त परिवार या तो टूट रहे थे या फिर बदल रहे थे. कॉर्पोरेट जगत अचानक अहम हो गया था. समाज का परिदृश्य लगातार बदल रहा था. महत्वाकांक्षाओं ने सतह पर जगह बना ली थी और उन्हें उसे महत्व दिया जा रहा था. 

समाज में मनोविश्लेषक और मनोचिकित्सक कुकुरमुत्ते की तरह उग आए थे. लोगों में बदलाव आ रहा था. आसान शब्दों में कहें तो व्यक्ति की पहचान अब अपने परिवार से अलग बननी शुरू हो गई थी. सारा मामला अब खुद से प्रेम करने और अपने लिए ही सब कुछ करने तक सिमटता जा रहा था. धीरे-धीरे असहज वर्जनाओं को दरकिनार कर दिया गया. इस बदलाव का एक अहम हिस्सा यौनिकता थी. मिडलाइफ ब्लूज और सिनेमा गोज सेक्सी (15 नवंबर, 1991) समेत तमाम लेख मैंने लिखे, जो इस बदलाव की पड़ताल कर रहे थे.

समाज में हो रहे बदलाव, खासकर बदलते यौन व्यवहार और नैतिकताओं की एक समझ बनाने में सिनेमा एक कारगर चश्मे की भूमिका निभा रहा था. कुछ दशक पहले की ही तो बात है जब हीरोइनों का कुंआरी होना जरूरी होता था. अच्छी लड़कियां स्कर्ट या पश्चिमी परिधान नहीं पहनती थीं. आज सनी लियोनी पर्याप्त लोकप्रिय हैं. वे इंडो-कनाडियन पोर्न स्टार रह चुकी हैं, ऐसा भी नहीं है कि उन्हें सी-ग्रेड की फिल्मों, ब्लू फिल्मों या छिपकर देखे जाने वाले घटिया वीडियो के दायरे में सीमित कर दिया गया हो. वे कई हिंदी फिल्मों में और टीवी के रियलिटी शो बिग बॉस में भी आ चुकी हैं.  

कामुकता का रुझान
यह अस्सी के दशक के उत्तरार्ध की बात है जब बड़े परदे पर यौनिकता की अभिव्यक्ति का बुनियादी मुहावरा ही बदल गया. जाहिर है, यह समाज में बाहर आ रहे बदलाव का ही असर रहा होगा. हमने देखा कि रोमांस अब पुरानी बात हो चली थी और उसकी जगह कामुकता ने ले ली थी. मैं जिस वक्त सिनेमा में यौनिकता पर काम कर रही थी, उस दौरान अभिनेता-निर्देशक शेखर कपूर ने मुझसे कहा था कि “अब मौके की तात्कालिकता और उसकी तीव्रता ज्यादा अहम हो गई है.” उन्होंने कहा था, “पहली नजर में हुए प्यार को चुंबन तक पहुंचने में पहले एक रील लग जाती थी. अब यह कुछ सेकंड में हो जाता है... अस्सी के दशक में तो नायक और नायिका को स्पर्श करने में ही कई रील खत्म हो जाती थीं.”

हकीकत की जिंदगी में भी रक्रतार ऐसे ही बढ़ी, हालांकि सबसे मार्के का अनुभव मरहूम रंग-निर्देशक सत्यदेव दुबे का था जब वे एक टीवी धारावाहिक के लिए अभिनेत्रियों को प्रशिक्षण दे रहे थे. मैंने जब उनसे युवा अभिनेत्रियों पर अपनी एक स्टोरी इनवेजन ऑफ  स्टारलिंग्स (30 जून, 1986) के सिलसिले में एक सवाल पूछा, तो वे शिकायती लहजे में बोले, “इन “मॉडर्न” लड़कियों को मैं शर्माना नहीं सिखा पा रहा हूं. इन्हें पता ही नहीं कि कैसे शर्माया जाए, न ही इन्हें इसका कोई मतलब समझ में आ रहा है.” परदा हो या वास्तविक जिंदगी, प्रेम संबंधों के पनपने में शर्म-लिहाज की भूमिका बड़ी ताकतवर रही है. शर्म अब स्त्रियों की मुखाकृति का हिस्सा नहीं रह गई थी. 

निर्देशक अरुणा राजे की मानें तो कैमरा भी अब दृश्यों में रति की तलाश करने लगा था. वे कहती हैं, “अब यह स्तन और नितंबों पर जूम होता है, पूरी देह की बजाए अंगों पर फोकस करता है.” राज कपूर के कैमरामैन राधू करमाकर की मानें तो कैमरा धूर्त भी हो गया था.  
पुरुषों को भी नहीं बक्चशा गया. नायक अब जींस पहनने लगे. उनकी देह पर बिल्कुल उपयुक्त जगहों पर वांछित उभार को देखकर ऐसा लगता था कि शरीर पर कोई रंग छिड़क दिया गया हो. यह नजारा परदे से लेकर सड़कों तक आम हो चला था. इसके बाद शर्ट की बलि चढ़ी. इसकी शुरुआत पॉपाई जैसी उभरी हुई मांसपेशियों के धनी सलमान खान ने की. उन्हीं के पदचिह्नों पर चलते हुए बाद में हिृतिक रोशन और उनके जैसे जिम में तराशे गए कुछ महाबली परदे पर आए. इनकी तरह सिक्स-पैक या एट-पैक मांसपेशियां बनाना उतना आसान नहीं था, उसके बावजूद महानगरों और छोटे शहरों के लड़के अपने नायकों की नकल करने लगे.
बेशक, महिलाओं के लिए भी ये नायक दर्शनीय थे.
यहां तक कि शाहरुख खान जैसे हीरो को भी चाहत की वस्तु बना दिया गया, जिनके मामले में एट पैक तो दूर की कौड़ी नजर आते थे लेकिन उसकी भरपाई करने के लिए कभी खुशी कभी गम में उन्हें जालीदार शर्ट पहना दी गई (जैसे पहले हीरोइनों को गीली साड़ी पहनाई जाती थी). महाबली जैसी देह बनाने में उन्हें करीब एक दशक का वक्त लगा. 2007 में आई ओम शांति ओम में वे “दर्द-ए-डिस्को” वाले गीत पर ही-मैन में बदले हुए दिखे. इस दौरान स्त्रियों का वस्तुकरण और बढ़ चुका था. सदी का अंत आते-आते स्थिति यह थी कि नायिकाएं उतना ही बदन उघाड़ती थीं जितने के उन्हें पैसे मिलते थे. अब मांसल यौनिकता दस्तक दे रही थी. आने वाला दौर आइटम गर्ल्स का था.

जवान बच्चे
अस्सी के दशक में समाज और यौनिकता को जकड़ी हुई वर्जनाएं भरभरा कर गिरना शुरू हो चुकी थीं. उदारीकरण ने जब घरों में दस्तक दी, तो यह प्रक्रिया और तेज हो गई. अब छोटे परदे और कंप्यूटरों पर बदलाव की आंधी चल रही थी और बच्चे उससे अछूते नहीं थे. बच्चों की दुनिया पर सेक्स और हिंसा की छवियों का कब्जा हो चला थाः इनमें यौन केंद्रित फिल्में, एमटीवी और अमेरिकी टीवी धारावाहिक और उनके घटिया भारतीय संस्करण शामिल थे.  

इससे बचपन संकुचित हो गया. मैंने इस विषय पर कुछेक आलेख लिखे, जिनमें एक द एडल्ट चाइल्ड (15 अप्रैल, 1996) था. बच्चे अब वयस्कों की तरह दिखने लगे थे. हालत यह हो गई कि छोटी बच्चियों के लिए बिना हील वाले जूते तक मिलना बंद हो गए. एक दुकानदार ने मेरी ओर ऐसे देखा जैसे कि मैं किसी दूसरे ग्रह से आई हूं. छह साल की छोटी बच्चियों के कपड़े भी अश्लील तरीके से बनाए जाने लगे. कुछ वक्त तक स्पगेटी स्ट्रैप चलन में रहे. इन्हें मां और बेटी, दोनों पहनते थे. बच्चों में कामुकता का प्रवेश करवाया जा रहा था.

हकीकत में भी बच्चे जल्दी बड़े होने लगे. लड़कियां छोटी उम्र में रजस्वला होने लगीं. लड़के और लड़कियों में यौनेच्छा का उभार छोटी उम्र में ही शुरू हो गया. किशोरावस्था की यौनिकता जहां फंतासी से दैहिकता की ओर मुडऩे लगी, वहीं युवाओं में इसका भय खत्म होता चला गया. जहां कहीं, थोड़ी भी जगह मिलती, प्रेमी युगल लिपट जाते. लगातार कामकाजी महिलाओं की बढ़ती हुई संख्या ने भी सामाजिक परंपराओं के पहले से ढहते हुए किले को और कमजोर करने का काम किया. विवाह नाम की संस्था में भी बदलाव आने लगा. जाहिर है, इस बदलाव की संचालक शक्ति बदलती हुई स्त्री थी. कामकाजी पत्नियां परिभाषाओं को नए सिरे से गढ़ रही थीं. शादियों में तनाव पैदा करने का काम महिलाओं की यौनेच्छाओं ने भी किया. मैं 1996 में जब शादियों से संबंधित एक आलेख के सिलसिले में शोध कर रही थी (इंटिमेसी इन मैरिज, 31 दिसंबर, 1996), तब सेक्स उपचारक डॉ. नारायण रेड्डी ने मुझे बताया था कि स्त्रियां अब “संकोची” नहीं रह गई हैं. उन्होंने कहा था, “पचास फीसदी से ज्यादा औरतें सेक्स की पहल करती हैं और सिर्फ परंपरागत मुद्रा में ही नहीं&मेरी केस स्टडी में शामिल 25 फीसदी औरतें विमन ऑन टॉप में यकीन करती थीं.” 

यौन जगत में आए इस ऐतिहासिक बदलाव ने छोटे शहरों-कस्बों को भी नहीं बख्शा. हाइवे के किनारे जिस्मफरोशी के अड्डों के रूप में होटल खुल गए. बोरियत दूर करने के लिए पत्नियों का आदान-प्रदान चल निकला. हरिंदर बवेजा और अमित अग्रवाल ने अपने आलेख प्लेइंग मिक्स्ड डबल्स (15 जून, 1994) में छोटे शहरों में पत्नियों की अदला-बदली की पड़ताल की थी. कई सेक्स पत्रिकाओं ने (फैंटेसी, फन, प्लेवे) घर से दूर विवाहित युगलों को दूसरों से यौनाचार को प्रोत्साहन का काम किया.

आजकल तो इस किस्म के रिश्ते आभासी दुनिया में बन रहे हैं. इसके लिए मोबाइल ऐप्लिकेशन भी बाजार में आ गए हैं. मसलन, स्नैपचैट आपको तुरंत किसी के संपर्क में ला देता है. इससे आप तस्वीरें और वीडियो भेज सकते हैं जो कुछ सेकंड बाद अपने आप नष्ट हो जाते हैं.  
सेल्फी और आत्मरति के इस दौर में सेक्स की परिभाषा एक बार फिर बदल रही है. ऐसा लगता है कि इस परिभाषा के दायरे में अब मनुष्य बचे नहीं रह गए हैं. हो सकता है कि एक पुरुष के लिए सेक्स की वस्तु एक सेक्सी कार हो. महंगे बाथरूम उपकरणों का एक विज्ञापन भी आजकल चला है जिसमें एक अभिनेत्री अपने चमकते हुए शावर के साथ ही लिपटी पड़ी दिखती है.

मधु जैन(मधु जैन द इंडियन क्वार्टरली की संपादक हैं)

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