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नया भारतः खुशियों की फसल

थेन्नला गांव के पुरुष यास्मीन के काम से कोई बहुत खुश नहीं थे. उन्होंने तो मजाक उड़ाते हुए उनका नाम बिगाड़कर थेन्नला की मदर टेरेसा रख दिया, जो प्रचार के लिए यह सब कर रही हैं. मगर गांव की औरतें उनकी तरफ थीं और उन्हें और ज्यादा काम करने को प्रोत्साहित कर रही थीं.

अन्नपूर्णा यास्मीन ने 126 समूह बनाकर धान की खेती को सहकारी रूप दिया अन्नपूर्णा यास्मीन ने 126 समूह बनाकर धान की खेती को सहकारी रूप दिया

35 वर्ष की यास्मीन अरीम्ब्रा केरल की तेन्नला एग्रो-प्रोड्यूसर्स कंपनी में एमडी हैं.

केरल में औरतों को ताकतवर बनाने और गरीबी मिटाने के कार्यक्रम कुदुंबश्री के साथ वे साल 2006 में महज एक आसान कर्ज की खातिर जुड़ी थीं. तब यास्मीन अरीम्ब्रा को पता नहीं था कि यह उनकी जिंदगी हमेशा के लिए बदल देगा. शुरुआत में वे कुदुंबश्री मिशन के प्रशिक्षण कार्यक्रमों में हिस्सा लेतीं और दूसरों की बातों को गौर से सुनतीं. 2011 में उन्हें थेन्नला की सामुदायिक विकास सोसाइटी का अध्यक्ष चुन लिया गया. जब यास्मीन ने छोटी महिला उद्यमियों के तजुर्बों के बारे में सुना, तो उन्होंने तय कर लिया कि वे अपने गांव की महिलाओं को जोडऩे की कोशिश करेंगी.

थेन्नला में ज्यादातर लोग धान उगाते हैं. भारत के ज्यादातर गांवों की तरह ही यहां भी गरीब खेतों में काम करते थे जबकि अमीर जमीन के मालिक थे. बहुत मेहनत की मांग करने वाली धान की खेती साल बीतने के साथ घाटा देने लगी जिससे ज्यादातर ने इससे तौबा कर ली. यास्मीन ने गांव की औरतों को एकजुट करने और लीज पर ली गई तथा परती जमीन पर उनसे धान की खेती करवाने का फैसला किया. यास्मीन कहती हैं, ''हमने 126 समूह बनाए, अपने पास से छोटी-छोटी रकमें इकट्ठा कीं और कर्ज लिया.''

इन औरतों ने 1,300 एकड़ खेतों में सब्जियों और धान की खेती की. मगर बेचने की खराब सुविधाओं और नेटवर्क की वजह से वे जल्द ही मुश्किलों में फंस गईं. ऐसे में यास्मीन ने 2015 में थेन्नला एग्रो प्रोड्यूसर्स कंपनी बनाई, जिसके 374 शेयरधारक थे और वे खुद इसकी मैनेजिंग डायरेक्टर थीं. वे कहती है, ''जब हम फायदेमंद कीमत में धान नहीं बेच सके, तब मैं यह कंपनी बनाने को मजबूर हो गई. अब हमें अच्छी कीमत मिलती है, क्योंकि हम धान को चावल में तब्दील करते हैं और इसे थेन्नला ऑर्गेनिक राइस के ब्रान्ड नाम से बेचते हैं.'' यह चावल 3, 5, 10 और 20 किलोग्राम के पैकेट में बेचा जाता है.

मगर काम अभी पूरा नहीं हुआ था. कुदुंबश्री के एक सर्वे से पता चला कि गांव में कोई 236 बच्चे विकलांग थे. यास्मीन उनके लिए एक खास स्कूल खोलना चाहती थीं. इसके लिए उसने वाइएएस या यास नाम से एक चैरिटेबल ट्रस्ट बनाया. आज कोडाकल्लू में उनके ब्लूम्स स्पेशल स्कूल में गरीब परिवारों के 36 बच्चे पढ़ते हैं. इस स्कूल के लिए यास्मीन ने पर्सनल लोन लिया है. उन्होंने शादी नहीं की, पर खुद को इन 36 बच्चों की मां मानती हैं. उन्होंने लोगों की बेहतर सेवा के लिए खुद बीए (समाजशास्त्र) में दाखिला लिया है.

—जीमॉन जैकब

''यास्मीन ने गरीब औरतों को कृषि से जुड़े छोटे-छोटे उद्यमों से जुड़ने के लिए प्रेरित किया, जिसने उनकी जिंदगी बदल दी है. विकलांग बच्चों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता और समर्पित सामाजिक काम ने गरीब मांओं की तकलीफों और मुश्किलों को कम किया है, जो उनकी देखभाल के लिए घर में बंधकर रह जाती थीं. वे हमारे समाज की रोल मॉडल हैं.''

                                                                                                                   हेमलता, डिस्ट्रिक्ट मिशन कोऑर्डिनेटर, कुदुंबश्री, मलाप्पुरम

दूसरा पहलूः थेन्नला गांव के पुरुष यास्मीन के काम से कोई बहुत खुश नहीं थे. उन्होंने तो मजाक उड़ाते हुए उनका नाम बिगाड़कर थेन्नला की मदर टेरेसा रख दिया, जो प्रचार के लिए यह सब कर रही हैं. मगर गांव की औरतें उनकी तरफ थीं और उन्हें और ज्यादा काम करने को प्रोत्साहित कर रही थीं

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