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विधानसभा चुनाव 2022ः कितने अहम आप के मान?

आप ने एक कॉमेडियन को 'भावी राजा' के रूप में पंजाब के चुनावी मैदान में उतारा है, लेकिन नेतृत्व की आभा पैदा करने के लिए भगवंत मान को कुछ ठोस करके दिखाना होगा

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शांत और सौम्य मान की पारंपरिक छवि बनाम पुराना क्लीन शेव किया हुआ अवतार शांत और सौम्य मान की पारंपरिक छवि बनाम पुराना क्लीन शेव किया हुआ अवतार

असल में दुनिया भर पर नजर रखने वाले एक समझदार पंजाबी मतदाता को अपने यहां हो रही घटनाओं और कई किलोमीटर दूर इटली में महज एक दशक पहले हुई चीजों के बीच समानता नजर आ सकती है. अस्सी के दशक के मध्य से यह सब शुरू हुआ और लोकप्रिय कॉमेडियन बेप्पे ग्रिलो नेताओं के खिलाफ अपने आक्रामक आक्षेपों की वजह से काफी अनुयायी बटोर रहे थे. साल 2009 तक, वह सत्ता-विरोधी भावना एक राजनीतिक पार्टी—मूवीमेंटो 5 स्टेले (एम5एस) या फाइव स्टार मूवमेंट के रूप में तब्दील हो गई और उसने मुख्यधारा से असंतुष्ट मतदाताओं को आकर्षित करना शुरू कर दिया. नौ साल के भीतर उस पार्टी ने एक प्रधानमंत्री दे दिया. अगर प्रधानमंत्री देने की बात हटा दें, तो भारत की आम आदमी पार्टी (आप) में भी वैसी ही भावना देखी जा सकती है. वह संयोग इस सप्ताह और चौंकाने वाला हो गया जब पार्टी ने मुख्यमंत्री पद के अपने उम्मीदवार के तौर पर कॉमेडियन भगवंत मान के नाम का ऐलान किया. वे पंजाब के अपने खुद के तंदूरी (पके-पकाए) ग्रिलो होंगे!

पार्टी ने 13 जनवरी को जनता की राय जानने के लिए एक ऑनलाइन अभियान लॉन्च किया और जाहिर तौर पर 93 फीसद उत्तरदाताओं ने मान के पक्ष में वोट दिया. पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल वैसे भी उनके पक्ष में थे, लेकिन यह मान का विचार था कि इसके लिए वोट करवाए जाएं—यह आप की जानी-मानी रणनीति है जिसे आलोचक भीड़ को संतुष्ट करने का हथकंडा बताते हैं. मान को शायद इसके बारे में मालूम नहीं हो, लेकिन ग्रिलो भी अपने विचारों और विकल्पों को इटली में जनमत संग्रह के जरिये ही लोकप्रिय बनाते थे.

विधानसभा चुनाव 2022ः कितने अहम आप के मान?
विधानसभा चुनाव 2022ः कितने अहम आप के मान?

ग्रिलो की तरह मान ने भी व्यंग्यात्मक कॉमेडी के इर्द-गिर्द अपना करियर बनाया. उन दिनों वे क्लीन-शेव किए हुए सिख थे और उन्होंने 1997 के अपने एलबम कुल्फी गरमा गरम से प्रसिद्धि हासिल की थी. अगले कुछ साल उन्होंने राजनेताओं, नौकरशाहों, पुलिस और शिक्षा व्यवस्था पर तंज कसते हुए बिताए. मान बहुत बातूनी ढंग से सांस-फूलाते हुए उनकी मजाकिया नकल उतारते जो खासकर मालवा इलाके में काफी लोकप्रिय हो गई. अपने वामपंथी शिक्षक-पिता से उन्हें विचारधारा विरासत में मिली. उन्होंने सबसे पहले अकाली खेमे के आलोचक मनप्रीत बादल के साथ हाथ मिलाया. मगर पंजाब पीपल्स पार्टी का वह प्रयोग नाकाम रहा. मनप्रीत कांग्रेस के खेमे में चले गए और मान लोगों के बीच की अपनी आकर्षक मिलनसार छवि को आप तक ले गए. साल 2014 के चुनाव में उन्हें तुरत-फुरत संगरूर से उम्मीदवार बनाया गया और पंजाब ने पहली बार उन्हें पगड़ी में देखा, जिसका बसंती पीला रंग और कोई नहीं बल्कि भगत सिंह से प्रेरित था. 

तब से, मान की वाक्-पटुता और भाषण कला ने लोकसभा में अपनी अलग पहचान बनाई है. वहीं राज्य में, उनके अनवरत हमलों ने पंजाब के दो दिग्गजों, प्रकाश सिंह बादल और अमरिंदर सिंह तथा उनकी पार्टियों के प्रति मतदाताओं के मन में शंका बढ़ाने में मदद की है. अगर उन्होंने ताकतवर सुखबीर बादल और उनकी पत्नी हरसिमरत कौर का मजाक उड़ाने की हिम्मत की है तो कांग्रेस हलकान है कि उसके खिलाफ मान के शाब्दिक व्यंग्य अब सभी दल इस्तेमाल कर रहे हैं. कांग्रेस की अंदरूनी लड़ाई पर ठेठ मान कुछ इस तरह हमला करते हैं: ''बिट्टू दी रंधावा नाल नहीं बनदी, रंधावा दी बाजवा नाल नहीं बनदी, उस बाजवा दी तृप्त बाजवा नाल नहीं बनदी, बाजवा दी सिद्धू नाल नहीं बनदी, अते सिद्धू दी किसी नाल नहीं बनदी.'' (कांग्रेस का चाहे कोई भी क्षत्रप हो किसी की भी एक-दूसरे से नहीं बनती है और सिद्धू की तो किसी से भी नहीं बनती!) 

इस तरह के अनवरत चुनावी अभियान से आप के लिए माहौल बनाया जा रहा है. समय भी अनुकूल है. आपसी कलह से हलकान कांग्रेस पर कृषि कर्ज माफी, ड्रग तस्करी या बेअदबी के मामलों में पर्याप्त काम नहीं करने के आरोप हैं. बादल परिवार पर भी बाद के दो मामलों को प्रश्रय देने और परिवार के नियंत्रण वाले गुरुद्वारों में भ्रष्टाचार के आरोप हैं. और, भाजपा को अब भी प्रभावशाली जट सिख समुदाय के विरोध का सामना करना पड़ रहा है.

संक्षेप में कहा जा सकता है कि मतदाता मुख्यधारा की पार्टियों से असंतुष्ट है और वह भी ऐसे वक्त में जब सामान्य तौर पर वित्तीय संकट का आलम है. इस पर केजरीवाल के लोकलुभावन वादों के असर की कल्पना करें—99 लाख महिलाओं को 1,000 रुपए, 300 यूनिट तक मुफ्त बिजली आदि. अर्थशास्त्री चरण सिंह इसे ''खतरनाक लोकलुभावनाद'' करार देते हैं—अगर आप सरकार आती है तो उसे केवल इन लोकलुभावन वादों को पूरा करने के लिए हर साल 12,000 करोड़ रुपए की जरूरत होगी. पंजाब का मासिक जीएसटी संग्रह केवल तकरीबन 1,800 करोड़ रुपए है, जो वेतन, पेंशन आदि के बाद प्रति महिला हजार रुपये देने के लिए भी पर्याप्त नहीं है. लेकिन आप इसकी जरूरत को समझ रही है और कोई भी मौका गंवाना नहीं चाहती.

साल 2017 में राज्य के चुनावों में पदार्पण करते हुए, आप 20 सीटें और 23.8 फीसद वोट हासिल करने में कामयाब रही थी. (आप ने ज्यादा सीटें जीती होतीं अगर इसने कट्टरपंथी सिखों की भीड़ के साथ मिलकर हिंदू मतदाताओं को आशंकित नहीं कर दिया होता.) लेकिन, वह इस लाभ को बरकरार नहीं रख सकी. उसके आठ विधायकों ने पार्टी छोड़ दी. साल 2019 में, मान एकमात्र विजेता थे; अन्य 12 लोकसभा सीटों पर आप उम्मीदवार यहां तक कि डाले गए वैध मतों का छठा हिस्सा भी हासिल करने में नाकाम रहे.

मुख्य दावेदार की अपनी स्थिति को फिर से हासिल करने के लिए पार्टी को एहसास हुआ कि उसे एक चेहरे की दरकार है—जिसका उसकी विरोधी पार्टियों में भी फिलहाल अभाव है. यह उसके अभियान को आकार देगा और उसकी छवि को बरकरार तथा पार्टी को एकजुट रखने में मदद करेगा. आप नेताओं पर पहले ही टिकट बंटवारे में भ्रष्टाचार के आरोप लग चुके हैं. अरविंद केजरीवाल ने भले ही किसान नेता बलबीर राजेवाल के ऑडियो सबूतों को खारिज किया है, लेकिन भ्रष्टाचार के आरोप उस समय सार्वजनिक रूप से सामने आ गए जब इसी तरह के आरोप लगाते हुए पार्टी कार्यकर्ताओं ने आप के सह-राज्य प्रभावी राघव चड्ढा की प्रेस कॉन्फ्रेंस में तोड़फोड़ की. फिरोजपुर ग्रामीण से उम्मीदवार अमनदीप बांगर ने चड्ढा पर ऊंगली उठाते हुए कहा कि आप 'बहुराष्ट्रीय कंपनी' की तरह चलाई जा रही है और दिल्ली के नेता ही फैसला ले रहे हैं. मान के हाथ में नेतृत्व आने से ऐसी बातों पर विराम लग जाएगा. 

अन्य तरीकों से भी लगता है कि आप ने 2017 की अपनी नाकामयाबी से कुछ सबक सीखे हैं—पंजाब के विभिन्न धार्मिक और सामाजिक वर्गों तक पहुंच बनाने के लिए वह कोशिश कर रही है और 'वार करके पीछे हट जाने' की अपनी पुरानी प्रवृत्ति को कम कर रही है. (2018 में, ड्रग तस्करी के 'निराधार' आरोप लगाने के लिए केजरीवाल को एसएडी के बिक्रमजीत मजीठिया से माफी मांगनी पड़ी थी.) इस बार, केजरीवाल बार-बार हिंदू मंदिरों में जा रहे हैं, और अयोध्या, वाराणसी तथा राजस्थान में झुंझुनू के सालासर धाम स्थित हनुमान मंदिर के लिए तीर्थयात्री बसें चलाने का वादा कर रहे हैं. पार्टी कट्टरपंथी नेताओं और उनके विचारों से भी दूरी बरत रही है. 

शहरी पंजाब में एक विपरीत-लामबंदी हो रही है, लेकिन हिंदू व्यापारी वर्ग से अपने रिश्ते बढ़ाने की कोशिश के बावजूद वहां आप के लिए किसी तरह का फायदा हासिल करना मुश्किल होगा. भाजपा उनकी स्वाभाविक पसंद है और उनमें मान का तकरीबन कोई असर नहीं है. उनका महत्व कहीं और है, मान का चेहरा चन्नी की जन-हितैषी छवि का जवाब देने में, या सभी 117 सीटों पर कृषि संगठनों के चुनाव लड़ने से उत्पन्न चुनौती का सामना करने में पार्टी की मदद कर सकता है. आप ने 109 सीटों पर अपने उम्मीदवारों का ऐलान किया है, लेकिन अभियान को असल मायने में आगे बढ़ाने के लिए मिट्टी के लाल को मोर्चा संभालना होगा. अमरिंदर ने भी अपना अभियान हमेशा स्थानीय नेता के तौर पर चलाया. तो, इस बार गरमागरम ग्रिलो की बारी है. 

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