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खुशी कुआं खोदने की

ऐसे बांटी खुशी: बेंगलूरू के भूजल स्तर को फिर से जीवित करने का अभियान मिलियन वेल्स कुआं खोदने वाले मन्नू वद्दार समुदाय को आजीविका प्रदान कर रहा है

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जीवनरेखा : बेंगलूरू के सोन्नापन्नाहल्ली में 50 साल पुराने कुएं की मुंडेर पर बैठे एस. विश्वनाथ
जीवनरेखा : बेंगलूरू के सोन्नापन्नाहल्ली में 50 साल पुराने कुएं की मुंडेर पर बैठे एस. विश्वनाथ

अजय सुकुमारन

मिलियन वेल्स फॉर बेंगलूरू, स्थापना : 2015, बेंगलूरू

चौदह साल पहले, एस. विश्वनाथ मोटरसाइकिल से दक्षिण बेंगलूरू में कहीं जा रहे थे, एक आदमी ने उनका कंधा थपथपाते हुए पूछा था कि क्या उन्हें एक कुआं चाहिए. जी हां, उसने पानी के कुएं के बारे में ही पूछा था. वर्षा जल संचयन के प्रति उत्साही, विश्वनाथ इससे चौंक गए थे. इसके बाद उनकी बातचीत शुरू हुई और उन्होंने 1980 के दशक के मध्य तक बेंगलूरू में मौजूद कई खुले कुओं के बारे में पूछना शुरू किया, जो बोरवेलों के आने से धीरे-धीरे खत्म हो रहे थे और इसके साथ ही कुएं खोदकर जीवनयापन करने वाले मन्नू वद्दार समुदाय का रोजगार भी धीरे-धीरे खत्म होता जा रहा था. यहीं से उनके दिमाग में बेंगलूरू के लिए दस लाख कुएं खोदने के अभियान का विचार आया.

शहरी योजनाकार विश्वनाथ, जो तेजी से फैलते शहर में वर्षा जल संचयन के लिए उपनियम बनाने वाली समिति में शामिल थे, कहते हैं, ''अगर हमारे पास दस लाख कुएं हों, तो बेंगलूरू में कभी भी पानी की किल्लत नहीं होगी.'' इसके पीछे एक सीधा-सा तर्क है. शहर में सालाना जितनी औसत बारिश होती है, उसे अगर 365 दिनों में बांट दिया जाए तो बेंगलूरू को प्रतिदिन 3,000 मिलियन लीटर के बराबर पानी मिलेगा.

यह मात्रा, 120 किमी दूर स्थित कावेरी नदी से हर दिन शहर में आने वाले पानी (1,450 एमएलडी) से दोगुनी है. विश्वनाथ कहते हैं, ''अगर हम शहर में होने वाली बारिश के आधे पानी को भी किसी प्रकार जमीन में वापस भेज पाएं, तो यह हमारे ठीक नीचे बहने वाली एक और कावेरी के बराबर होगा.'' यहीं पर पुनर्भरण कुएं-जो छतों और सड़कों से बारिश के पानी को जमीन की भीतर पहुंचाते हैं-और कुओं को खोदने वाले मन्नू वद्दार बड़े काम आते हैं.

बेंगलूरू में लगभग 750 कुएं खोदने वाले लोग हैं, जिनके लिए यह आजीविका का मुख्य स्रोत है. वे शहर में कुओं के बारे में जानकारियों के भंडार भी हैं. पिता के साथ बचपन से कुओं का काम देख बेंगलूरू के उपनगर रेसरजापुरा के 44 वर्षीय शंकरप्पा कहते हैं, ''यहां तक कि 15 साल पहले, छह आदमियों का समूह महीने में दो से तीन कुएं खोदता था.'' लेकिन वर्षों से काम कम हो गया है. मिलियन वेल्स अभियान एक आवश्यकता है. 

विश्वनाथ कहते हैं, ''लोगों के पास कुओं से जुड़ी अपनी निजी, अनोखी कहानियां हैं. हम कुओं को फिर से लोगों की कहानियों से वापस जीवन में लेकर आने के प्रयास कर रहे हैं.'' वर्तमान में, शहर भर में अनुमानित 250,000 कुएं हैं. यह अभियान 10 शहरों में अटल नवीनीकरण और शहरी परिवर्तन मिशन (अमृत) के लिए एक मॉडल बना है, बेंगलूरू उनमें से एक है. 

खुशी के सूत्र

''खुले कुएं ग्रामीण भारत के स्विमिंग पूल हैं. गर्मी की छुट्टी में जब पारा 45 डिग्री होता है तब ठंडे पानी में तैरते बच्चों को देख मुझे बहुत खुशी होती है''
—एस. विश्वनाथ
संस्थापक, मिलिन वेल्स कैंपेन

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