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राजस्थानः परोपकार की शुरुआत घर से

एक डिजिटल लाभ हस्तांतरण योजना बदलाव का प्रतीक बन गई है. ई-गवर्नेंस ने ग्रामीण राजस्थान को बदल दिया है

पुरूषोत्तम दिवाकर पुरूषोत्तम दिवाकर

जब मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने साल 2007 में भामाशाह (जिन्होंने अकबर के खिलाफ लड़ाई में मदद देने के लिए राणा प्रताप को अपनी सारी संपदा सौंप दी थी) के नाम पर एक योजना का नाम रखा था, उस समय उन्हें खुद भी इस बात का गुमान न होगा कि एक दशक के भीतर यह योजना किस तरह से शासन में तब्दीली ला देगी. शुरुआत में यह महिलाओं के लिए प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण की एक योजना थी जिसमें सरकार शुरुआती राशि के तौर पर 1,500 रु. उनके खातों में जमा कराती थी. आज यह दान की योजना नहीं रही बल्कि एक महत्वपूर्ण डिजिटल सशक्तीकरण और गवर्नेंस कार्यक्रम में तब्दील हो गई है. जैसा कि खुद राजे कहती हैं, "यह लोगों की बेहतरी के लिए गेम चेंजर योजना है.''

आंकड़े खुद इस योजना की गवाही देते हैं. भामाशाह योजना के लाभार्थियों में 2018 में राज्य की कुल 7.7 करोड़ की आबादी में से 1.67 करोड़ परिवारों के कुल 6.15 करोड़ लोग शामिल हैं. अधिकारी इसके आंकड़ों में हेराफेरी नहीं कर सकते क्योंकि सिस्टम में हर लाभार्थी की पहचान उसके परिवार समेत फोटो व अन्य पहचानों के साथ अंकित है. कुल मिलाकर राज्य की 54 योजनाओं के लाभार्थियों के व्यक्तिगत खातों में 2,300 करोड़ रु. की राशि जमा कराई गई है.

सरकार ने बड़ी होशियारी के साथ इस वृहद कवायद को विशाल गवर्नेंस मॉडल में समाहित कर लिया है ताकि सरकारी अधिकारियों के साथ लाभार्थियों के प्रत्यक्ष संवाद को यथासंभव कम किया जा सके. ई-गवर्नेंस मॉडल के दायरे में दस हजार पंचायतें शामिल हैं जहां पर सरकार ने औसतन 4 करोड़ रु. खर्च किए हैं. इस आंकड़े में पिछले तीन वर्षों में ज्यादातर गांवों में बनाई गई नालियां व सड़कें शामिल नहीं हैं. कुछ सरपंचों और यहां तक कि विधायकों व मंत्रियों तक ने इसका विरोध किया था लेकिन राजे दो साल पहले इसे पूरी तरह लागू करवाने में कामयाब रहीं.

यह सफल रहा क्योंकि भाजपा सरकार ने पंचायत चुनावों में महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण के साथ-साथ एक तय स्तर की स्कूली शिक्षा को अनिवार्य कर दिया था. लिहाजा नए पंच शिक्षित हैं और उनमें से कई युवा हैं और महिलाओं का उनमें 58.29 फीसदी हिस्सा है. राजस्थान महिलाओं को ग्रामीण प्रतिनिधित्व देने वालों में देश का दूसरा राज्य है. ग्रामीण राजस्थान का डिजिटाइजेशन दरअसल 55,000 ईमित्र कियोस्क धीरे-धीरे खड़ा करने की प्रक्रिया का ही विस्तार है. करीब 550 सेवाएं प्रदान करने वाले ये तमाम कियोस्क मोटे तौर पर पहले बेरोजगार युवा ही संचालित कर रहे थे. आज ईमित्र रोजाना दस लाख से ज्यादा काम निबटाते हैं जिसमें ऑनलाइन फॉर्म भरने और ड्राइविंग लाइसेंस की फीस जमा करने से लेकर आरक्षित श्रेणी का प्रमाणपत्र हासिल करने तक, सब शामिल हैं.

इस कामयाबी ने दिसंबर 2015 में राज्य की स्वास्थ्य बीमा योजना के क्रियान्वयन में भी प्रोत्साहन दिया. तीन वर्षों में इस योजना के तहत 27 लाख मरीजों को अस्पतालों में मुक्रत भर्ती की सुविधा मिली है. राज्य ने व्यवसाय करने की सुहूलियत को लागू करने में नौकरशाही की अड़चनों को लेकर बनी आम छवि को भी तोड़ा है और अब वह सुधार साक्ष्य स्कोरकार्ड में 99.46 प्रतिशत के अनुपालन स्कोर के साथ भारत में तीसरे स्थान पर और कुल मिलाकर नौवें स्थान पर है.

डिजिटल गवर्नेंस

लाभार्थियों को ऑानलाइन प्रत्यक्ष हस्तांतरण को अधिकतर सरकारी कल्याण योजनाओं के साथ जोड़ दिया गया है. जिनमें पेंशन, पीडीएस, मनरेगा और किसानों के लिए बिजली सब्सिडी शामिल है.

महिलाओं व बच्चों के लिए कल्याण योजनाओं के तहत लाभार्थियों के खातों में 5,468 करोड़ रु. की राशि जमा कराई गई.

सभी अध्यापकों के लिए उनके उपस्थिति रिकॉर्ड समेत एक समूचा ऑानलाइन डिजिटल रजिस्टर लागू किया गया है.

स्कूल व कॉलेज छात्रों के लिए आधा दर्जन छात्रवृत्ति की राशि इलेक्ट्रॉनिकली हस्तांतरित की जाती है.

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