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जनता का दुख-दर्द बांटने वाले मदद के मसीहा

विविधता, संस्कृतियों के प्रति संवेदनशीलता, शैक्षणिक नवाचार, फील्ड वर्क, लैंगिक संवेदनशीलता और इनसे भी ऊपर, छात्रों को बहस और सवाल करने के लिए भरपूर प्रोत्साहन देने की परंपरा टीआइएसएस को अन्य संस्थानों से अलग बनाती है

मिलिंद शेल्टे मिलिंद शेल्टे

टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (टीआइएसएस या टिस) ने हैदराबाद विश्वविद्यालय के शोध छात्र रोहिता वेमुला को भुलाया नहीं है. वेमुला ने 2016 में आत्महत्या की थी और फिर देशभर में प्रदर्शन हुए थे. यह डॉ.

बाबा साहेब अंबेडकर, आदिवासी कार्यकर्ता मारंग गोमके जयपाल सिंह मुंडा, संथाल विद्रोही लड़ाके संथाल फुलो और झानो मुर्मू, नागा नेता रानी गांदिल्यू आदि के योगदानों को भी गर्व के साथ याद करता है.

कैंपस के प्रवेश द्वार की दीवारों पर ही इनकी कुछ तस्वीरें टंगी दिख जाएंगी. साथ ही दिखेंगे श्सामाजिक न्याय का संघर्ष्य, ''शिक्षित, आंदोलित और संगठित करो'', 'नजीब को वापस लाओ' और 'कभी हार न मानो' जैसे कुछ नारे.

ये इस बात के संकेत हैं कि टीआइएसएस में विद्यार्थियों ने हड़ताल की थी. संस्थान के 72 साल के इतिहास में पहली बार इतनी लंबी हड़ताल हुई. इसकी शुरुआत 21 फरवरी, 2018 को हुई जब छात्रों ने मांग की कि दसवीं पास करने के बाद छात्रवृत्ति के पात्र हो जाने वाले अनुसूचित जाति-जनजाति वर्ग के विद्यार्थियों को संस्थान की ओर से दी जाने वाली आर्थिक सहायता बंद करने का जो निर्णय हुआ है, उसे वापस लिया जाए. यह टिस के लिहाज से हड़ताल के लिए मुनासिब कारण भी है, जहां 49.5 प्रतिशत सीटें सरकारी नीति के अनुरूप, एसटी/एससी/ओबीसी वर्ग के छात्रों के लिए आरक्षित हैं.

इसके साथ ही स्कूल ऑफ सोशल वर्क के प्रोफेसर और डीन मनीष के झा बताते हैं, ''जो सामान्य मेरिट लिस्ट में आते हैं उन्हें आरक्षित श्रेणी में नहीं रखा जाता.'' फिलहाल टिस के तकरीबन 55 फीसदी विद्यार्थी इन्हीं तीन श्रेणियों से आते हैं.

यही कारण है कि असम के एक लुप्तप्राय जनजाति से ताल्लुक रखने वाले ज्योति प्रसाद बोरी ग्रामीण विकास, शासन व्यवस्था और शिक्षा पर शोध के लिए सिलापाथर से मुंबई तक जा सकते हैं. झा कहते हैं, ''सवाल पूछने वाले दिमाग सरकारों को खटकते रहे हैं. यहां टिस में हम छात्रों को प्रचलित ज्ञान को चुनौती देने के लिए प्रोत्साहित करते हैं.''

ज्यादातर लोग टिस को जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की तरह वामपंथ का गढ़ समझ सकते हैं लेकिन झा का मानना है कि इस संस्थान का वातावरण गैर-राजनैतिक है. झा कहते हैं, ''हम स्वभावतः गरीबों के प्रति हमदर्दी रखने वाले हैं. हम वंचितों और हाशिए पर खड़े समाज का पक्ष लेते हैं. हम सरकार के सामने अपनी विभिन्न मांगें रखते रहते हैं, इसी कारण हमें सरकार विरोधी समझ लिया जाता है.''

टिस के छात्रों को फील्ड में जाने का अवसर मिलता है. टिस की 27 वर्षीया छात्रा अर्चिता शर्मा कहती हैं, ''मुझे नहीं लगता कि टिस में आपको कोई भी किसी खास राजनैतिक विचारधारा से जुड़ जाने को कहता या सिखाता है.

वे आपको क्वियर (समलैंगिक) समूह के मुद्दों, लिंग, जाति और वर्ग आधारित भेदभाव, वंचित समुदायों से हमदर्दी और नारीवादी बनने के बारे में सिखाएंगे. यह आपकी सोच को पूरी तरह से बदल देता है.''

अर्चिता यहां आने से पहले पुणे में एक्सेंचर में इंजीनियर के रूप में कार्यरत थीं. अपने ऐक्शन रिसर्च के सिलसिले में अर्चिता को वारली जनजाति की स्त्रियों के साथ काम करने का मौका मिला. उन्होंने उन जनजातीय महिलाओं को अपनी परंपरागत चित्रकारी कला को फिर से जीवित करके आजीविका का एक अतिरिक्त स्रोत खड़ा करने में सहायता की.

1936 में टिस की नींव रखी गई. उस समय से ही यहां सामाजिक कार्य से जुड़े कार्यक्रमों में बढ़-चढ़कर भागीदारी लेने की परंपरा विकसित हुई है. पोस्ट ग्रेजुएशन कार्यक्रम जिसमें 40 शिक्षक, 500 विद्यार्थी तथा 50-60 शोधार्थी हैं. कैंपस में सामाजिक कार्य को ही प्रमुखता दी जाती है.

विभाग फिलहाल सामुदायिक संगठन और विकास की प्रक्रिया, दलित और जनजातीय सामाजिक कार्य, स्वास्थ्य और मानसिक स्वास्थ्य, अपराध विज्ञान और न्याय, स्त्री-आधारित कार्य, अपंगता और शिक्षा, बच्चे तथा परिवार और आजीविका और सामाजिक नवाचार जैसे नौ क्षेत्रों में दो साल की अवधि वाले मास्टर्स प्रोग्राम कराता है.

टिस का फील्ड ऐक्शन प्रोजेक्ट इसकी सबसे बड़ी पूंजी है, जिसे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिलती है. झा कहते हैं, ''किसी भी समय हमारे कम से कम 40 प्रोजेक्ट चल रहे होते हैं.'' इनमें से महाराष्ट्र के विचाराधीन कैदियों और उनके परिवारों के बीच चल रहा प्रोजेक्ट प्रयास; बेघरों को सहयोग देने वाला कार्यक्रम कोशिश; घरेलू हिंसा की शिकार महिलाओं के साथ और आठ राज्यों के पुलिसथानों में विशेष सेल स्थापित करने की दिशा में प्रयासरत कार्यक्रम विमेंस सेल; और अपंग लोगों के बीच काम करने वाला कार्यक्रम आइएक्सेस कुछ लोकप्रिय और चर्चित प्रोजेक्ट्स हैं.

संस्थान मुंबई के देवनार में स्थित है. देवनार भारत का सबसे बड़ा डंपिंग ग्राउंड है और पूर्वी मुंबई के इस इलाके के 78 फीसदी लोग गंदी बस्तियों में रहते हैं. संस्थान इस क्षेत्र में रहने वाले लोगों को स्वास्थ्य, शिक्षा और सफाई व्यवस्था को दुरुस्त करने में भी सहयोग करता है.

कुछ फील्ड प्रोजेक्ट्स को सरकार की भी सराहना मिली है. यहां की पूर्व प्रोफेसर जेरू बिलिमोरिया का 1996 में शुरू किया प्रोजेक्ट चाइल्डलाइन अब केंद्रीय महिला और बाल कल्याण मंत्रालय के अधीन आने वाला प्रोजेक्ट बन चुका है.

इसका हेल्पलाइन नंबर कमजोर पृष्ठभूमि के परिवारों से आने वाले बच्चों को सहायता प्रदान करता है. बिलिमोरिया ने टिस से सामाजिक कार्य की पढ़ाई की थी. उनकी मां भी यहां की छात्रा रही थीं. बिलिमोरिया टिस को अपने जीवन को नई दिशा देने वाली जगह मानती हैं. वे कहती हैं, ''मैं टिस के साथ ही बड़ी हुई हूं और यह मेरे साथ जीवनभर जुड़ा रहेगा.''

वे कहती हैं कि किसी काम की धुन सवार होना, दृढ़ संकल्प, सबको स्वीकारना और सबको सम्मान देना, आशावादी होना और जीवन के आनंद को प्राप्त करने की कला जैसे कुछ बड़े गुण हैं जो उन्होंने टिस में सीखे.

चिकित्सा और मनोवैज्ञानिक सामाजिक कार्य में विशेषज्ञता रखने वाली अनु आगा भी यहां की एक अन्य प्रसिद्ध पूर्व छात्रा हैं. अनु आगा भारी इंजीनियरिंग फर्म थरमैक्स की मुखिया रही हैं. आगा अपनी विभागाध्यक्ष की बातों को कुछ इस तरह याद करती हैं, ''वे हमें अक्सर बताया करती थीं कि जब हम किसी असुरक्षित स्थान पर जाते हैं तो हममें से किसी के भी साथ सबसे बुरा हादसा क्या हो सकता है. एक बार यदि हम सबसे बुरी से बुरी परिस्थिति को भी समझकर स्वीकार करने लगते हैं तो हमारे अंदर का भय मिट जाता है और हम किसी भी चुनौती का सामना करने में समर्थ हो जाते हैं.''

टिस को अपनी विविधता पर गर्व है. झा कहते हैं, ''हमारे यहां लड़कों से ज्यादा लड़कियां हैं. हालांकि यह अंतर पहले और ज्यादा था लेकिन अब भी लड़कियां ही ज्यादा हैं.'' महिला सुरक्षा पर विशेष जोर देते हुए 'जेंडर की बातें' नाम से एक ड्रॉपबॉक्स बनाया गया है जो विद्यार्थियों को किसी प्रकार की यौन हिंसा या उत्पीडऩ की तत्काल शिकायत के लिए प्रोत्साहित कहता है.

जून 2018 से टिस भारत के उन प्रथम विश्वविद्यालयों में शामिल होगा जिसके हॉस्टल में जेंडर न्यूट्रल फ्लोर होगी और जिसके शौचालयों में लैंगिक आधार पर भेदभाव नहीं रहेगा. विद्यार्थियों के सुझाव पर आवेदन पत्र में एमएन्न्स नाम से भी एक विकल्प शामिल किया जा रहा है जो उन छात्रों के लिए होगा जो नहीं चाहते कि उन्हें मिस्टर या मिस के नाम से पहचाना जाए. 

पूर्व छात्रों की प्रतिष्ठा, लोगों का प्रगतिशील दृष्टिकोण—ये टिस के कुछ पहलू हैं जो कृतिका कात्यायन जैसे छात्रों को आकर्षित करते हैं. बनारस के पास शक्तिनगर की कृतिका के अंतिम वर्ष की रिपोर्ट 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों के अंतरसमुदाय संबंधों पर प्रभाव और इसका महिलाओं की स्थिति पर असर पर आधारित थी. टिस में आपने पहली चीज क्या सीखी? वे कहती हैं, ''आप चीजों को भुला देना सीखते हैं.''

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