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भू-राजनीतिः वक्त एक्ट ईस्ट नीति पुनर्जीवित करने का

वैश्विक अर्थव्यवस्था को ओमिक्रॉन की चुनौती, अफगानिस्तान पर तालिबान के काबिज होने से आतंकी समूहों की हिम्मत में बढ़ोतरी और चीन की भू-राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं भारत के लिए अप्रत्याशित चुनौतियां पेश करती हैं

भू-राजनीतिक परिदृश्य भू-राजनीतिक परिदृश्य

श्याम सरन

नया सामान्य जो भी है, बस 'सामान्य'  नहीं है. हम जिस साल को पीछे छोड़ आए हैं, 2022 उससे भी ज्यादा अप्रत्याशित होने वाला है. कोविड-19 वायरस लगातार रूप बदल रहा है और दुनिया उसका मुकाबला नहीं कर पा रही है. जब हम सोच रहे थे कि हमारा सबसे बुरा समय निकल गया, उसी समय और तेजी से फैलने वाला ओमिक्रॉन संस्करण दुनिया भर में फैल रहा है. हिचकते-हिचकते खोली जा रही सीमाएं फिर एक झटके में पूरी ताकत से बंद की जा रही हैं. धीरे-धीरे पटरी पर लौट रहे एयरलाइन व्यवसाय को एक बार फिर भारी मुसीबत का सामना करना पड़ सकता है और अधिकांश सेवा उद्योगों जैसे कि होटल, रेस्तरां, यात्रा और खुदरा विक्रय को फिर से गंभीर नुकसान होगा. प्रमुख विश्व अर्थव्यवस्थाओं ने पिछले दो वर्षों में अनुमानत: 11 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर (लगभग 819 लाख करोड़ रुपये) खर्च करके महामारी से उपजे स्वास्थ्य संकट और विकट आर्थिक-सामाजिक व्यवधानों का सामना किया है. एक और वर्ष तक इतना बड़ा परिव्यय बनाए रखने का गोला-बारूद इन अर्थव्यवस्थाओं के आर्थिक शस्त्रागार में नहीं बचा है.

हम तेज मुद्रास्फीति की शुरुआत देख रहे हैं. वर्ष 2022 में इसके और धारदार होने की संभावना है. इसकी प्रतिक्रिया में यदि उन्नत अर्थव्यवस्थाओं के केंद्रीय बैंक ब्याज दरें बढ़ाने और हाल के दिनों में निर्मित अतिरिक्त तरलता घटाने का निर्णय करते हैं, तो भारत सहित सभी विकासशील देशों से बड़ी मात्रा में बाहर की ओर वित्तीय प्रवाह होने की संभावना होगी. उनके लिए विदेशी कर्ज की लागत बढ़ जाएगी. विकसित और विकासशील दोनों श्रेणी की अर्थव्यवस्थाओं के लिए 2022 अधिक चुनौतीपूर्ण वर्ष होगा लेकिन जैसा कि हमेशा होता है, इसमें विकासशील देशों को ही सबसे अधिक नुकसान होगा. हाल ही में भारत ने आर्थिक स्थिति के सामान्य की ओर वापसी के कुछ स्वागत योग्य संकेत देखे हैं, लेकिन इन्हें जारी रखना मुश्किल होगा.

चीन ने ही सबसे पहले कठोर लॉकडाउन लागू किया था और हाल ही में उसने फिर से इसे शुरू किया है. चीन पर इनके आर्थिक प्रभाव काफी हद तक स्वास्थ्य उपकरणों और दवा सामग्री के निर्यात में वृद्धि से समाप्त हुए थे. अत्यधिक अस्त-व्यस्त वैश्विक अर्थव्यवस्था में चीन अपेक्षाकृत आर्थिक स्थिरता का द्वीप बन गया था जिससे इसका भू-राजनीतिक व्यक्तित्व मजबूत हुआ था. लेकिन नए साल की ओर बढ़ते हुए चीनी अर्थव्यवस्था की कमजोरियां दिखने लगी हैं. चीन की 2022 में संभावित 5 प्रतिशत की धीमी वृद्धि दर वाली अर्थव्यवस्था में 280% से अधिक का ऋण और जीडीपी रेश्यो अवहनीय लगता है. एक और कमजोरी संपत्ति व निर्माण क्षेत्रों से संबंधित है, जिसका चीन के विकास में लगभग 30 प्रतिशत योगदान है.

सबसे बड़ी रियल एस्टेट फर्म, एवरग्रांडे, दिवालियापन का सामना कर रही है और अन्य कंपनियां भी गंभीर संकट में हैं. यह स्थिति आर्थिक और वित्तीय संकट ला सकती है जिसे चीन की सरकारी नियंत्रण वाली अर्थव्यवस्था में भी संभालना मुश्किल हो सकता है. महामारी ने देश की महत्वाकांक्षी बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) परियोजनाओं पर प्रतिकूल प्रभाव डाला है और कई साझेदार देशों में ऋण जोखिम और राजनीतिक विरोध संबंधी चिंताएं सामने आई हैं. धीमी पड़ती चीनी अर्थव्यवस्था लगातार आगे बढ़ती अर्थव्यवस्था की तुलना में बड़ी समस्या पैदा कर सकती है क्योंकि वैश्विक स्तर पर विकास को संचालित करने वाला चीन जितना बड़ा दूसरा कारक नहीं है.

इन स्थितियों के बीच भू-राजनीति भंवर में है और इसके और भी अस्थिर होने की संभावना है. इसका महत्वपूर्ण समीकरण चीन और अमेरिका के बीच है. वैश्विक आर्थिक संकट 2008 के बाद से चीन जान चुका है कि वैश्विक शक्ति संतुलन को उसने मौलिक रूप से अपने पक्ष में झुकाते हुए महत्वपूर्ण रणनीतिक अवसर के दौर में प्रवेश कर लिया है. उसकी मुखर और आक्रामक विदेश नीति भी इसी धारणा पर टिकी हुई है. क्या चीन 2022 में अपने चरम को पार कर लेगा और क्या इसका परिणाम उसकी ''भेड़िया योद्धा कूटनीति'' को सीमित करने के रूप में हो सकता है? या, वह अपने हितों की लगातार बढ़ती उत्पीड़नकारी तथा एकपक्षीय दावेदारी पर दोगुनी ताकत लगाएगा—उसके ये हित हैं जो उसकी शक्ति बढ़ने के साथ-साथ बड़े हुए हैं? दोनों में से कोई भी प्रवृत्ति ताइवान के खिलाफ कार्रवाइयों और भारत-चीन सीमा पर उसके रुख में स्पष्ट रूप से दिख सकती है.

चीन शक्ति को सापेक्ष दृष्टि से देखता है. भले ही वह नीची वृद्धिदर और अति-विस्तार के चरण में प्रवेश कर रहा हो, फिर भी अफगानिस्तान से तेजी से और अराजक तरीके से अमेरिकी वापसी के कारण अमेरिका की विश्वसनीयता के बारे में इसकी धारणा और भी कमजोर हुई है. यह आश्वस्त होने के कारण कि अमेरिका के पास लड़ाई का माद्दा नहीं होगा, वह ताइवान मुद्दे का हल अपने पक्ष में करने के लिए उसकी कठोर नाकेबंदी या सैन्य कार्रवाई से कब्जा हासिल करने के लालच में पड़ सकता है. नया साल चीनी गणनाओं के संबंध में पहले से अधिक ठोस सुराग दे सकता है, लेकिन इसमें ताइवान जलडमरूमध्य में तनाव का बढऩा तय हैं. इसके अतिरिक्त, यदि क्वाड के सहयोगी देश, जिनकी ताइवान मुद्दे में नई दिल्ली की तुलना में अधिक भागीदारी है, इस संगठन की अधिक औपचारिक और अधिक स्पष्ट सैन्य भूमिका के लिए दबाव डालते हैं, तो भारत को कठिन विकल्पों का सामना करना पड़ सकता है. इससे भारत को चीन से जमीनी सीमा पर अधिक दबाव का सामना करना पड़ सकता है.

अफगानिस्तान पर तालिबान का कब्जा भारत के लिए झटका है. इससे पाकिस्तान को भू-राजनीतिक लाभ मिला है, भले ही वह अल्पकालिक हो. पाकिस्तान ने सुनिश्चित किया है कि काबुल में सत्ताधारी दल में प्रमुख गुट हक्कानी समूह हो, जिसे पेंटागन के पूर्व प्रमुख माइक मुलेन ने ''आईएसआई की वास्तविक शाखा'' के रूप में वर्णित किया था. यह हक्कानी समूह ही है जिसने आईएसआई की ओर से अफगानिस्तान में भारतीय दूतावास और भारतीय नागरिकों को निशाना बनाया था. इस देश में भारत की ओर से किसी भी रूप में अपनी उपस्थिति पुनर्जीवित करने का कोई भी प्रयास हमेशा जोखिम भरा होगा. जब देश अकाल और आर्थिक पतन का सामना कर रहा होगा तब भारतीय मानवीय और आर्थिक सहायता का स्वागत किया जाएगा, लेकिन इससे भारत को कोई सार्थक लाभ नहीं मिलेगा.

अफगानिस्तान पर तालिबान का कब्जा उन जिहादी गुटों का मनोबल काफी बढ़ाने वाला रहा है, जिनका ध्यान पहले से जम्मू-कश्मीर और भारत के अन्य हिस्सों पर है. चीन अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान के लिए अधिक शक्तिशाली ढाल बनेगा, जिससे सीमापार आतंकवाद के मुद्दे पर पाकिस्तान को कूटनीतिक रूप से अलग-थलग करने के भारतीय प्रयासों को निराशा होगी. काबुल में राजनीतिक परिवर्तन से उत्पन्न सुरक्षा चुनौती से निपटने के लिए भारत ने क्षेत्रीय देशों के साथ समन्वय की दिशा में अच्छा काम किया है. गणतंत्र दिवस पर मध्य एशियाई देशों को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित करना एक कल्पनाशील कदम है, लेकिन इसके वास्तविक प्रभाव को बढ़ा कर नहीं आंका जाना चाहिए.

उम्मीद की जानी चाहिए कि 2022 ऐक्ट ईस्ट नीति को पुनर्जीवित किए जाने का वर्ष होगा. इसकी कुंजी क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी (आरसीईपी) समझौते पर लौटने में है. भारत ऐक्ट ईस्ट के आर्थिक और वाणिज्यिक पक्षों से दूर नहीं रह सकता. इसे एशिया-प्रशांत आर्थिक सहयोग (एपीईसी) का सदस्य बनने का आवेदन भी नए सिरे से करना चाहिए, जिसमें व्यापार रियायतें भले नहीं मिलतीं तथापि भारतीय व्यापार और उद्योग के लिए नेटवर्किंग और सीखने का मंच मिलता है. भारत एकमात्र क्वाड सदस्य है जो एपीईसी का सदस्य नहीं है. इसे सदस्यता पाने के लिए क्वाड में अपनी उपस्थिति का लाभ उठाना चाहिए. ये कुछ ऐसी पहलें हैं जो भारत को अप्रत्याशित और नई चुनौतियों से भरे एक और वर्ष से पार पाने में मदद कर सकती हैं. 

श्याम सरन पूर्व विदेश सचिव और सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च, नई दिल्ली में सीनियर फेलो हैं

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