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भविष्य की कल्पनाः भविष्य के युद्ध का नजारा

लड़ाई में प्रौद्योगिकी की भूमिका लगातार बढ़ती जाएगी मगर रणनीतिकारों को मानवीय, सामाजिक और राजनैतिक पहलुओं पर ज्यादा गौर करने की दरकार

इलस्ट्रेशनः सिद्धांत जुमडे इलस्ट्रेशनः सिद्धांत जुमडे

लेफ्टिनेंट जनरल डी.एस. हुड्डा

फरवरी 2011 में वेस्ट पॉइंट कैडेट के संबोधन में तत्कालीन अमेरिकी रक्षा मंत्री रॉबर्ट गेट्स ने कहा, ''वियतनाम के बाद से हमारी अगली सैन्य कार्रवाई के प्रकार और ठिकाने का अनुमान लगाने के मामले में हमारा रिकॉर्ड दुरुस्त रहा है. हम एक बार भी सही-सही नहीं जान पाए हैं, चाहे मायागुवेज हो या ग्रेनाडा, पनामा, सोमालिया, बाल्कन, हैती, कुवैत, इराक हो या और भी, इन अभियानों के साल भर पहले तक यह अंदाजा नहीं रहा है कि हम इस तरह उलझ जाएंगे.''

सैन्य इतिहास उन जनरलों और रणनीतिकारों की दागदार साख से अटा पड़ा है, जिन्होंने यह अनुमान लगाने की कोशिश की कि अगला युद्ध कहां और कैसा होगा. बावजूद इसके हमें इस पर गौर फरमाना होगा, बशर्ते हम इस झांसे में न फंस जाएं कि ''आखिरी युद्ध लडऩे'' की तैयारी कर रहे हैं.

भविष्य के इस आकलन में हमारा फोकस यह होगा कि टेक्नोलॉजी युद्ध का अहम औजार होगी. हम भविष्य के युद्ध के मैदान की कल्पना इस रूप में करें कि आसमान में झुंड के झुंड ड्रोन उड़ रहे हैं और जमीन पर हथियारबंद स्वचालित रोबो तहलका मचा रहे हैं. साइबर हमले सैन्य संचार व्यवस्था को ध्वस्त करेंगे, बिजलीघरों को ठप कर देंगे, आवागमन को अवरुद्ध कर देंगे और डिजिटल वित्तीय व्यवस्था को पंगु कर देंगे.

हाइपरसोनिक मिसाइलें मौजूदा हवाई रक्षा तंत्र को बेमानी बना देंगी और हमारे शहरों और लोगों को अचानक हमले से तबाह कर देंगी.

इसमें एक भी नजारा आज असंभव नहीं जान पड़ता, लेकिन भविष्य की युद्ध योजना पर विचार करते वक्त हमें यह भी कतई नहीं भूलना चाहिए कि युद्ध सिर्फ टेक्नोलॉजी से नहीं लड़े जाते बल्कि उनके मानवीय, सामाजिक और राजनैतिक दायरे भी व्यापक होते हैं. अगर हमें भविष्य के युद्धों को कामयाबी के साथ लडऩा है तो हमारी योजना में इन पहलुओं पर भी संजीदगी से विचार होना चाहिए.

युद्ध क्या स्वरूप ले सकता है, इसका जवाब भी भविष्य के लिए छोड़ देने की जरूरत नहीं है. मौजूदा रुझानों और उनकी अलग संभावनाओं के अध्ययन से यह संकेत मिल सकता है कि हम किस ओर बढ़ सकते हैं. आइए ऐसे चार रुझानों पर गौर करें.

सूचना का दबदबा

लिंडेल हार्ट ने कहा, ''युद्ध की सबसे गहरी सचाई यह है कि लड़ाई के मामले अमूमन विरोधी कमांडरों के दिमाग में तय होते हैं, न कि उनके सैनिकों की लाशों से.'' यह आज भी उतना ही सच है लेकिन इसके अर्थ एकदम नए हो गए हैं. कमांडर, राजनैतिक नेताओं सहित, दुश्मन की कार्रवाइयों से अधिक अपनी आबादी की धारणाओं से प्रभावित होंगे.

चाहे जिसका जोर होगा, अफसाने की ही जीत होगी. आज, सोशल मीडिया जैसे हथियारों से लैस है, इको चैंबर (समान विचार के सोशल मीडिया अड्डे) तैयार कर लिए गए हैं, और फिल्टर बबल्स (वेबसाइट पर आपकी सर्च हिस्ट्री के अनुकूल कंटेट दिखाने वाला एल्गोरिद्म) हमें वैकल्पिक विचारों से दूर कर रहे हैं. ऐसे में आबादी का बड़ा हिस्सा दुश्मन के फैलाए झूठे अफसानों से प्रभावित हो सकता है. सोशल मीडिया के हो-हल्ले में अपना फायदा देखने वाला राजनैतिक नेतृत्व रणनीतिक आकलनों के बदले लोकप्रिय नजरियों से नीतियां तैयार कर सकता है. देश में सामाजिक और राजनैतिक माहौल जितना विषैला होगा, इस धारा में बह जाने के खतरे उतने ही ज्यादा होंगे.

मोर्चों का टूटना

पहले मोर्चे साफ-साफ तय होते थे, जहां सैनिक एक-दूसरे के बंकरों पर हमले किया करते थे. द्वितीय विश्व युद्ध में आम आबादी पर भारी बम बरसाए गए, लेकिन तब भी जीत दुश्मन की रक्षा-पंक्ति तोड़कर कब्जाए क्षेत्रों से ही तय हुई थी. भारत में हमने चार बड़ी लड़ाइयां लड़ीं, जिनमें आम आबादी मोटे तौर पर अनछुई रही. अब यह सूरत बदल सकती है.

लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल देश के धुर भीतर रणनीतिक ठिकानों पर हमले करके युद्ध की शुरुआत कर सकती हैं. साइबर हमले मोर्चे से दूर लोगों के रोजमर्रा के कामकाज और चैन को तबाह कर सकते हैं. अगर बेहद फुर्ती से दुश्मन पर निर्णायक जीत हासिल कर ली जाए, तब भी अमन-चैन कायम कर पाना काफी मुश्किल हो सकता है. बकौल जनरल रूपर्ट स्मिथ 'लोगों के बीच युद्ध' जारी रह सकते हैं, जैसा कि अफगानिस्तान, पश्चिम एशिया और यहां तक कि जम्मू-कश्मीर में देखा गया और जा रहा है.

शांति और युद्ध के फर्क का धुंधला होना

परंपरागत तौर पर युद्ध दो देशों के बीच खुली और घोषित हिंसक लड़ाई रही है लेकिन यह परिभाषा अब पूरी तरह से सही नहीं हो सकती है. देश आपस में 'ग्रे जोन' युद्ध में मशगूल हो सकते हैं जो पूरी तौर पर युद्ध तो नहीं होगा मगर गुपचुप और छद्म तरीके से हमले जारी रह सकते हैं. पारंपरिक सैन्य कमजोरियां कोई अड़चन नहीं बनेंगी क्योंकि अत्याधुनिक टेक्नोलॉजी सरकारी और गैर-सरकारी दोनों तरह के कारकुनों के पास उपलब्ध है. जैसा एंड्रयू क्रेपिनेविच कहते हैं, 'तबाही का लोकतांत्रीकरण' हो गया है. साइबर हमले, दुष्प्रचार अभियान, चुनावी नतीजों को प्रभावित करने की कोशिशें और सऊदी अरब के ऑयल ठिकाने पर हमला जैसी घटनाओं ने युद्ध और शांति की सीमा-रेखा को बेहद धुंधला कर दिया है.

आदमी फैसले के दायरे से बाहर

यह बहस काफी तेज है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के नए-नए आयाम क्या इनसान को फैसले करने के दायरे से बाहर कर देंगे और मशीन खुद ही फैसले करने लगेगी. कुछ लोगों का कहना है कि ऐसा संभव नहीं है. लेकिन संकट काल में फौरन फैसले के मामले में इसका कोई आसान-सा जवाब नहीं है.

फारस की खाड़ी में गश्त के दौरान यूएसएस विनसेन्स पोत ने 3 जुलाई, 1988 को ईरान एयर के एयरबस ए-300 को मार गिराया, जिसमें सभी 290 यात्री मारे गए. विमान अपने सामान्य मार्ग पर था और गैर-सैनिक एयरलाइन होने का सिग्नल भी दे रहा था मगर विनसेन्स पर लगे अत्याधुनिक एजिस कॉम्बैट सिस्टम ने गलत समझ लिया कि वह ईरान का एफ-14 युद्धक विमान है. जो हुआ, उसका जिक्र पी. डब्ल्यू. सिंगर की किताब वायर्ड फॉर वार में मिलता है. ''हार्ड डेटा या वास्तविक हालात पोत के क्रू को बता रहे थे कि वह जंगी जहाज नहीं था लेकिन उन्होंने कंप्यूटर की बात पर ज्यादा भरोसा किया... और मार गिराने का आदेश दे दिया.''

यह सब दुनिया के सुरक्षा माहौल को कैसे प्रभावित करेगा? असैन्य टेक्नोलॉजी में विकास की रफ्तार तेज है और कुछ मामलों में तो सैन्य टेक्नोलॉजी से काफी आगे बढ़ गई है. इन हथियारों से कमजोर देशों के लिए भी ताकतवर दुश्मनों के खिलाफ जंग छेडऩा आसान हो सकता है. यानी ऐसा युद्ध जो वर्चुअल डोमेन या लंबी दूरी की मिसाइलों से अपनी सेना, जंगी जहाजों और पोतों को जोखिम में डाले बगैर लड़ा जाए (उत्तर कोरिया इसका एक उदाहरण है).

हम नेताओं में अधिक जोखिम उठाने के तेवर देख सकते हैं. साइबर हमले एक हद तक किसी अपराध-बोध के बिना इसलिए किए जा सकते हैं क्योंकि उसे किसी देश पर हमले जैसा बताना बेहद मुश्किल है. मसलन, 2014 में अमेरिकी कैसिनो कंपनी की ईरान से हैकिंग या सोनी पिक्चर्स पर उत्तर कोरिया के हमले से कोई कड़ी प्रतिक्रिया नहीं उभरी.

यह रुझान व्यापक भू-राजनैतिक अस्थिरता का संकेत देता है और युद्ध से बचना और अधिक मुश्किल हो सकता है. अंतरराष्ट्रीय स्तर या द्विपक्षीय समझौतों में ऐसे कोई स्पष्ट नियम-कायदे नहीं हैं कि भविष्य की टेक्नोलॉजी, खासकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को कैसे संचालित किया जाएगा. हकीकत तो इसके विपरीत ही हैं क्योंकि हर देश टेक्नोलॉजी की उस दौड़ में है कि कैसे युद्ध में बढ़त हासिल की जा सकती है.

युद्ध के प्रतिरोध के लिए हमारे पारंपरिक तरीके अब काम के नहीं रहे. अगर युद्ध और शांति का फर्क मिट जाएगा, व्यक्ति का दिमाग ही युद्ध-क्षेत्र में बदल जाएगा और समाज में बंटवारे सोशल मीडिया के जरिए किए जा सकते हैं तो परमाणु मिसाइलें और विशाल सेना भला कैसे प्रतिरोध के काबिल रह जाएंगी.

दक्षिण एशिया में दुनिया की एक-चौथाई आबादी है और यह आंतरिक टकरावों और बाहरी दुश्मनियों से अंटा पड़ा है. चीन महाशक्ति बनने की महती महत्वाकांक्षा से एशिया में अपना दबदबा कायम करना चाहेगा और दक्षिण एशिया में भारत का प्रभुत्व कम करना चाहेगा. इस क्षेत्र में चीन का सरपरस्त पाकिस्तान है जो पहले ही भारत के साथ 'ग्रे जोन' जंग में उलझा हुआ है. सो, हमारी आंतरिक दरारों को तेजी से नहीं भरा गया तो वे भविष्य के किसी टकराव में हमारी गंभीर कमजोरी साबित हो सकती हैं.

लिहाजा, हम इन खतरों से निपटने को कितने तैयार हैं? सेना का फोकस तो निश्चित ही नई टेक्नोलॉजी हासिल करने पर होगा लेकिन सबसे अधिक महत्व की बात यह है कि हमारा समाज खासकर उन दुष्प्रचार के हमलों को लेकर अधिक सहज और समझदार होना चाहिए जिसका मकसद बांटना हो. भविष्य के युद्ध किसी को अछूता नहीं छोड़ेंगे और हमें सामूहिक तौर पर उनसे लडऩा होगा.

लेफ्टिनेंट जनरल डी.एस. हुड्डा थल सेना के उत्तरी कमान प्रमुख रहे हैं

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