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प्रवासी भारतीयः सबके चहेते हिंदुस्तानी

भारत के लोग दुनिया को क्यों और कैसे आकार देंगे. भारतीयों की आत्मसात होने की क्षमता इसमें बड़ी भूमिका निभाएगी

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पराग खन्ना

दुनिया में भारतीय प्रवासियों की अगली लहर कहीं अधिक बड़ी हो सकती है. भारत में 25 साल से कम उम्र के 600 मिलियन युवा हैं. ओईसीडी यानी आर्थिक सहयोग और विकास संगठन देशों में अत्याधिक कुशल विदेशी श्रमिकों में से 3.1 मिलियन भारतीय पहले से हैं जबकि चीन के कुशल विदेशी श्रमिकों की गिनती 2.2 मिलियन है. कोविड के बाद के आर्थिक संकट और देश में बढ़ते प्रदूषण के भयावह स्तर को देखते हुए भारतीय पहले के  मुकाबले अब कहीं अधिक देश छोड़ने को प्रेरित हो रहे हैं.

नावाचार को आत्मसात करने की भारतीय क्षमता की कई वजहें हैं. भारत कभी अंग्रेजी बोलने वाला, ब्रिटिश उपनिवेश रहा है. जबकि चीनी उस देश का नागरिक है जो भी ब्रिटिश उपनिवेश का हिस्सा नहीं रहा और जिसकी अपनी एकांत संस्कृति रही है. जब मैं बड़ा ही हो रहा था और अमेरिका चला गया, तब मैं केवल हिंदी बोलता था. जब मैं अंग्रेजी पहली भाषा के रूप में सीख रहा था, न्यूयॉर्क के जापानी, कोरियाई, वियतनामी बच्चे दूसरी भाषा के रूप में अंग्रेजी की कक्षा में थे. मैंने झटपट अंग्रेजी सीखी और उसे आत्मसात कर लिया. तो आत्मसात की शक्ति ही भारतीय प्रवासी समुदाय को चीनी प्रवासी समुदाय के मुकाबले अधिक विशाल बनाती है. यह शक्ति ही हर जगह उन्हें सांस्कृतिक स्वीकृति दिलवाती है.

दस साल पहले हम ऐसे देश के रूप में चीन की बात नहीं करते थे जिसे सारी दुनिया दुश्मन मानती है. दस साल पहले हम परोपकारी, बुनियादी ढांचे पर केंद्रित, व्यापार से जुड़े महाशक्ति देश के रूप में चीन की बात करते थे. हम यह नहीं कह रहे थे कि चीन कुटिल, शोषक, लगभग व्यापारिक और वैश्विक दबदबा कायम करने को आमादा देश है. अब चीन को लगभग हर जगह मूलत: दुष्ट माना जाता है.

तो हम यह बातचीत ऐसे समय कर रहे हैं जब अगर आपके यहां ढेरों चीनी लोग हैं, तो आप चाहेंगे कि वे न हों. देखिए अमेरिका में, ब्रिटेन में क्या हो रहा है—चीनी वैज्ञानिकों के प्रति समन्वित संदेह जनमा है, भयवश चीनी वैज्ञानिकों, चीनी छात्रों को भगाया जा रहा है. अब यह बातचीत एक दूसरी बातचीत को काटती है. कामगारों की कमी बदतर होती जा रही है जबकि एशियाई आबादी बढ़ रही है. लेकिन अगर आप भूराजनैतिक आधार पर, शक और जासूसी के आधार पर चीनियों को खारिज कर रहे हैं, तो भी वह कमी तो आपको पूरी करनी ही है. तो भारतीय युवाओं के लिए बूम ठीक उस वक्त आया है जब आप कामगारों की कमी पूरी करने को बेताब हैं. मैं फ्रैंकफर्ट में सबसे बड़ी यूरोपीय सॉफ्टवेयर कंपनी एसएपी या सैप के मुख्यालय गया. मैंने क्या देखा? बहुत सारे भारतीय. मुझे याद नहीं आता कि अपने हाइ स्कूल के सालों में मैंने जर्मनी में इतने भारतीय देखे हों. अब भारतीयों का पूरा शहर है जो पूरे यूरोपीय इलाके को ताकत दे रहा है.

अमेरिका में तो हम इसके आदी हैं. हम जानते हैं कि भारतीय बड़ी टेक्नोलॉजी कंपनियां चला रहे हैं. इस पर हैरानी भी नहीं होती. क्या कभी कोई चीनी सत्या नडेला या पराग अग्रवाल होगा? ऐसा नहीं कि बस भारतीय ही अंग्रेजी बोलते हैं. बात यह है कि भारत जरूरत से कहीं ज्यादा आइटी या मेडिसिन पढ़ने वाले लोग उत्पन्न कर रहा है. पूरी दुनिया में कामगारों की कमी वाले यही दो सबसे बड़े क्षेत्र हैं. विकसित देशों को इसी की जरूरत है—उन्हें मेडिकल और आइटी पेशेवरों की जरूरत है.

महिलाएं दूसरा बड़ा कारक हैं. मेरी किताब में यह एक पंक्ति है—''दुनिया में महिला भारतीय आइटी पेशेवर सबसे कम आततायी प्रवासी है.'' उसमें आपको भला ऐसी क्या बुराई मिल सकती है जिससे आप उसे अपने देश में न रखना चाहें? वह मूल्य बढ़ाएगी ही. वह आपका जीडीपी बढ़ाएगी, अपार्टमेंट किराये पर लेगी, दोस्त बनाएगी, कभी गुनहगार नहीं होगी. यह सांस्कृतिक तौर पर असंवेदनशील भले लगे, पर यह सच है. तथ्य यह है कि दुनिया भारतीय महिलाओं को गले लगाएगी.

दूसरा है जलवायु परिवर्तन. देखिए जलवायु परिवर्तन भारत और चीन में क्या कर रहा है. तथ्य यह है कि जलवायु परिवर्तन कई भारतीयों को नई जगह जाकर बसने को मजबूर करेगा. पहले भारत के भीतर और फिर उनके विदेश जाकर बसने का एक और कारण बन जाएगा. मध्यमवर्गीय भारतीय यूएई में संपत्ति खरीद रहे हैं. हाल में छह लाख भारतीयों ने दूसरों देशों में जाकर बसने के लिए अपनी नागरिकता छोड़ दी. जब भारतीय मध्यवर्ग में शामिल होता है और वह दूसरे देश जाना गवारा कर सकता है, तो पूरी संभावना है कि वह जा सकता है.

इसी से जुड़ी एक बात यह है कि भारत में अवसर तलाश रहे लोगों की संख्या के मुकाबले अवसरों की कमी है. अगर आप भारत में प्रतिभाशाली हैं और भारत में ही रहना चाहते हैं, तो टेक्नोलॉजी कंपनियों में आपके लिए नौकरियां होंगी. माइक्रोसॉफ्ट सिएटल में किसी औसत दर्जे के आदमी को 2,50,000 लाख डॉलर देकर उसकी सेवाएं भला क्यों ले जबकि वही काम कोई टेक्नोलॉजी पेशेवर भारत में 50,000 डॉलर में कर सकता है? अगर आप भारत में प्रतिभाशाली हैं, तो भारत न केवल अवसरों की धरती है बल्कि वैश्विक अवसरों का भौगोलिक संधिस्थल भी है.

लोग 'मूव' की मेरी थीसिस के बारे में पूछते हैं, कि हमारे यहां तो हर जगह इंटरनेट है. मैं उनसे कहता हूं कि आपके यहां इंटरनेट भले हो, पर अगर पानी न हो तो क्या आप केन्या में अपने खेत पर रुकेंगे? पढ़े-लिखे भारतीय भारत में रुक सकते हैं, पर अवसर के मुकाबले कामगारों की बहुतायत होगी, भले ही अवसर बढ़ रहे हों.

मध्य एशियाई चीनियों से बुरी तरह आतंकित रहते हैं, पर उन्हें बॉलीवुड का संगीत बहुत अच्छा लगता है, वे भारतीयों से बहुत प्यार करते हैं. क्योंकि सोवियत भारतीयों से प्यार करते हैं. इन देशों के साथ हमारा बंधुत्व हमारे भूराजनैतिक इतिहास का अंग है. मध्य एशिया एक हुआ—वे दिन दूने रात चौगुने फल-फूल रहे हैं, आइटी, मेडिसिन, कृषि से लोग ला रहे हैं. रूस भारतीय किसान आयात करेगा.

फिर यूरोप तो बड़ा है ही. एशियाई यूरोपीयों की पूरी नई पीढ़ी होगी, क्योंकि वे वहां जन्मे होंगे—लाखों भारतीय जो यूरोप में बड़े होंगे क्योंकि वे वहीं जन्मे होंगे. यह दुनिया का सबसे बड़ा बढ़ता प्रवासी समुदाय होगा. यूरोप में दुनिया में किसी भी दूसरी जगह के मुकाबले कामगारों की ज्यादा जरूरत है. और यूरोपीय अरबों या अफ्रीकियों को पसंद नहीं करता इसलिए भारतीयों को फलने-फूलने का मौका मिलेगा. नस्लवाद के बारे में हम इतना कुछ पढ़ते हैं, उसके बावजूद यह हो रहा है

(श्वेता पुंज से बातचीत पर आधारित)

पराग खन्ना फ्यूचरमैप के संस्थापक और मूव: हाउ मास माइग्रेशन विल रिशेप द वर्ल्ड के लेखक हैं

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