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हिंदू धर्म बनाम हिंदुत्वः हिंदू मूल्यों की लड़ाई

हिंदू धर्म की विराट, जटिल और बौद्धिक विरासत को हिंदुत्व के कट्टर दुराग्रहियों ने उसके सबसे निचले मूल्य तक गिरा दिया है. असल हिंदुओं को खड़े होकर इस विभाजन से लड़ना चाहिए

हिंदू धर्म बनाम हिंदुत्व हिंदू धर्म बनाम हिंदुत्व

सभी का सार ग्रहण करने की हिंदू धर्म की विजयी क्षमता को सृष्टि की उत्पत्ति पर सबसे पहले लिखित चिंतन ऋग्वेद के 'नासदीय सूक्त' की इन पंक्तियों से बेहतर शायद कोई और बयां नहीं करता ''कौन वास्तविक रूप से जानता है? कौन यहां इसे बता सकता है? यह सृष्टि किस कारण से उत्पन्न हुई? देवता भी इस सृष्टि के उत्पन्न होने के बाद आए? इसलिए कौन जानता है कि किस कारण से यह सारा संसार उत्पन्न हुआ?'' 

यह ऋचा रूढ़ धर्मसिद्धांत की अनुपस्थिति की वजह से उल्लेखनीय है; न कोई निश्चितता है; न श्रृद्धा का आदेश है; न धार्मिक आज्ञा पालन, न अनुष्ठान का निर्देश है. इसमें विस्मय है, कुतूहल है, लेकिन सबसे बढ़कर इसमें पड़ताल है, पूछने की, जांच करने की, विचार के पारंपरिक खांचों से आगे परिकल्पना और अनुमान के क्षेत्र में जाने की जरूरत पर जोर है, विचार को आगे बढ़ाने का निमंत्रण है. 

हमारे ऋषि-मुनियों ने हिंदू धर्म का यही आत्म-आश्वस्त, अनिर्धारित स्वरूप बताया था. एकम सत विप्रा बहुधा वदंति (सत्य एक है, बुद्धिमान मनुष्य उसे अलग-अलग नामों से बुलाते हैं) हिंदू धर्म की लोचदार शक्ति की कुंजी रही है. आनो भद्रा कृत्वो यन्तु विश्वत: (अच्छे विचारों को सभी दिशाओं से मेरी ओर प्रवाहित होने दो) विचारों के खुलेपन के लिए उसका आह्वान था. उदार चरितम वसुधैव कुटुंबम (उदारमना व्यक्ति के लिए समूचा संसार उसका परिवार है) समावेशी भावना के लिए उसका ध्येयवाक्य था. यही कारण है कि हिंदू दर्शन में एक नहीं बल्कि छह विचार प्रणालियां हैं. प्रत्येक ने पारंपरिक दिव्यता पर कम और ब्रह्मांड की चकरा देने वाली बहुलता के पीछे जो परम सत्य हो सकता है, उस पर ज्यादा ध्यान केंद्रित किया. फिर आश्चर्य क्या कि चार्वाक, जिनके भौतिकवाद ने उन्हें वेदों को झूठा कहने के लिए विवश किया, हिंदू धर्म के अंग थे. महात्मा गांधी ने लिखा है, ''अगर मैं हिंदू धर्म को थोड़ा भी जानता हूं तो यह अनिवार्य रूप से समावेशी और सदैव वृद्धिशील, सदैव प्रतिक्रियाशील है. यह कल्पना, अनुमान और तर्क-वितर्क करने की सबसे स्वतंत्र गुंजाइश देता है.''

हिंदुत्व ऐसे सनातम धर्म को वहाबी शैली के धर्म में बदलना चाहता है और इस तरह हिंदू धर्म के सार के लिए खतरा उत्पन्न कर रहा है. हिंदुत्व के कट्टर दुराग्रहियों ने हिंदू धर्म की विराट, सूक्ष्म, जटिल और बौद्धिक विरासत को उसके सबसे निचले मूल्य तक गिरा दिया है. हिंदू धर्म के स्वयंभू रक्षकों के छद्मवेश में वे बीजेपी-आरएसएस के फौजी दस्ते हैं. उनकी विलक्षण खासियतें क्या हैं? पहली, हिंदू धर्म की उनकी जानकारी उथली, अत्यंत सतही और कर्मकांडी है. दूसरे—और ठीक इसी वजह से—वे संवाद, चर्चा और बहस-मुबाहिसे से कतराते हैं. तीसरा, अपने विचार थोपने के लिए हिंसा का सहारा लेने में उन्हें कोई संकोच नहीं होता. चौथा, वे अत्यंत संकीर्ण और रूढ़िवादी हैं और समाज में मौजूदा गैरबराबरी और ऊंच-नीच का समर्थन करते हैं.

पांचवां, वे गहराई से पितृसत्तात्मक हैं, जो मानते हैं कि महिलाओं को उनकी मातहत स्थिति स्वीकार करनी चाहिए और तथाकथित 'हिंदू' मूल्यों की घिसी-पिटी मान्यताओं का पालन करना चाहिए. छठा, उनकी प्रबलतम भावना 'दूसरे' के प्रति नफरत है, जिसमें दूसरे की परिभाषा में मुख्य रूप से मुसलमान आते हैं, लेकिन वे भी शामिल हैं जो मोटे तौर पर उनके समान-धर्मा सवर्ण भाइयों की आत्मतुष्ट मंडली का हिस्सा नहीं हैं. सातवां, वे भारत के हिंदू अतीत को महिमामंडित करना चाहते हैं, लेकिन उनका ज्ञान हास्यास्पद है, जो हवाई जहाजों और कारों की काल्पनिक दुनिया से बना है, और इस तरह प्राचीन भारत की वास्तविक उपलब्धियों और संस्कारों का अवमूल्यन करता है. आठवां, उनके मन में कानून के शासन के प्रति जरा सम्मान नहीं है, खासकर इसलिए कि वे मानते हैं कि उन्हें सत्ता का समर्थन हासिल है. नौवां, धर्म को देशभक्ति से मिलाने में उन्हें जरा भी गुरेज नहीं होता है; केवल उन्हीं की तरह के लोग हिंदू देशभक्त हो सकते हैं, जबकि अन्य दूसरों की देशभक्ति को वे संदिग्ध मानते हैं. और दसवां, वे झूठी जानकारियां खूब फैलाते हैं, जब तक कि यह उनकी पहले से बनी-बनाई विश्व दृष्टि को सहारा देती है.

हिंदुत्व के अलमबरदारों की अगर ये खासियतें हैं, तो भविष्य में हम उनसे क्या करने की उम्मीद कर सकते हैं? हमें स्वीकार करना होगा कि जब कई राज्य विधानसभाओं के चुनाव होने वाले हैं और 2024 में राष्ट्रीय चुनाव भी होने हैं, तो भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के चुनावी रणनीतिकार धार्मिक ध्रवीकरण को और हवा देंगे और हिंदू-मुस्लिम फूट को और तीव्र करेंगे. इसके लिए वे हिंदू निगरानी धड़ों को मुखर प्रोत्साहन देने और वक्त आने पर इनकार कर देने की नीति का इस्तेमाल करेंगे और इस तरह राजनैतिक फायदे की फसल काटने की उम्मीद करेंगे, जबकि इसी दौरान साथ ही साथ वे ज्यादा अराजक और उपद्रवी किस्म की घटनाओं से खुद को अलग कर लेंगे.

लिहाजा 2022 में हम मथुरा स्थित मस्जिद के हमले की जद में आने की उम्मीद कर सकते हैं, फिर ऐसी कार्रवाई के खिलाफ दोटूक कानूनी प्रावधान चाहे जो हों. नफरत भरे भाषणों के जरिये गढ़ी गई कुंद मानसिकता को जोर-शोर से हवा दी जाएगी और इसके मूल में होंगी 'आहत धार्मिक भावनाएं'. हिंदू धर्म की कथित अवमाननाओं के खिलाफ हमले होंगे, मसलन, जैसा कि आश्रम वेबसीरीज की शूटिंग पर निर्लज्ज गैरकानूनी तोड़-फोड़ में देखा गया था. सत्ता के सामने फटकारकर सच बोलने वाले स्टैंडअप कॉमेडियन को परेशान किया जाएगा. महिलाओं को उनके पहनावे, उनकी मेल-मुलाकातों, उनके खान-पान और उनके रिश्तों को लेकर निशाना बनाया जाएगा. नमाज की जगहें, जो गुड़गांव में प्रशासन की मंजूरी के बावजूद हिंदू निगरानी धड़ों के निशाने पर हैं और ज्यादा हमलों की जद में आएंगी. अनिवार्य शाकाहार के पक्ष में मनमाने फरमानों की बाढ़ आ सकती है, फिर चाहे ज्यादातर हिंदू मांस खाते हों. और भी ज्यादा जोर-शोर से दावे किए जाएंगे कि मुसलमानों की आबादी कई गुना अनियंत्रित बढ़ रही है, जबकि सारे सरकारी आंकड़े इसके उलट कहानी बताते हैं.

रुड़की में चर्च पर हुआ हालिया हमला ऐसी और भी गुंडागर्दी का सांचा बन सकती है. अल्पसंख्यकों और हिंदू धर्म की इस संकीर्ण, कट्टर और एकांगी व्याख्या को स्वीकार करने से इनकार करने वाले सारे लोगों को निशाना बनाने के लिए सोशल मीडिया पर उत्तेजना फैलाई जाएगी. उग्र देशभक्ति धर्म प्रचार का औजार बन जाएगी. सबसे बढ़कर सर्वव्यापी और वास्तविक खतरा यह होगा कि उनके फरमान के आगे सिर नहीं झुकाने वाले किसी भी व्यक्ति के खिलाफ संगठित गुंडा तत्व बलप्रयोग करेंगे. बदतर यह कि कानून लागू करने वाली एजेंसियां, खासकर भाजपा शासित राज्यों में, कम ही कुछ करेंगी और ऐसी अराजकता को छूट देने वाले बयान दिए जाएंगे, जैसा कि भाजपा के शासन वाले राज्य मध्य प्रदेश में गृह मंत्री नरोत्तम मिश्र ने आश्रम हमले के मामले में दिया था.

हिंदू धर्म सहस्त्राब्दियों से इसलिए बचा रहा क्योंकि यह विविधताओं को अपने में समाहित करता है और इसमें शास्त्रार्थ या सभ्य विमर्श की अंतनिर्हित क्षमता है. हमारे मूल ग्रंथ, उपनिषद, भगवद गीता, ब्राह्मण सूत्र, सभी संवाद के उदाहरण हैं. सभी जगह से सार ग्रहण करना और समावेशी होना हिंदू धर्म की कमजोरी नहीं बल्कि शक्ति है. भाजपा-आरएसएस के राजनैतिक हथियार के रूप में हिंदुत्व इस विलक्षण धर्म को अज्ञानी, निरक्षर और विकृत हुक्मनामों की शृंखला में बदल देना चाहता है. सारे सच्चे हिंदुओं को इस खतरे के सामने डटकर खड़ा होना चाहिए और इसे परास्त करना चाहिए.

पवन के. वर्मा लेखक-राजनयिक और पूर्व सांसद (राज्यसभा) हैं और फिलहाल वे टीएमसी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं

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