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हिंदू बनाम हिंदुत्वः गर्व और गुस्से के बीच संतुलन

भारत के राष्ट्रीय जीवन में हिंदू सांस्कृतिक और सभ्यतागत पहचान की केंद्रीयता को पुनर्स्थापित करने का आरएसएस का मुख्य मिशन वास्तविकता में बदल चुका है. 2022 में संघ को इससे पैदा हो रही भ्रांतियां दूर करने की जरूरत है

भविष्य के रुझान 2022: हिंदुत्व भविष्य के रुझान 2022: हिंदुत्व

राम माधव

नए साल के दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने बेंगलूरू में प्रतिष्ठित नागरिकों की एक सभा को संबोधित किया. वे वहां हिंदू राष्ट्र या हिंदू-मुस्लिम संबंधों के बारे में नहीं, बल्कि पर्यावरण के बारे में बात करने गए थे. लंबे समय से स्वयंसेवी संगठनों का काम समझे जाने वाले इस क्षेत्र में अब आरएसएस भी रुचि दिखा रहा है. हाल ही में आरएसएस की नियमित गतिविधियों में एक नया खंड पर्यावरण गतिविधि जोड़ा गया है.

सिर्फ पर्यावरण ही नहीं आरएसएस-प्रेरित सक्रियता अब स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा और सामाजिक कल्याण सहित कई अन्य क्षेत्रों में देखी जा सकती है. 'सक्षम' विकलांगों के बीच काम करने वाला एनजीओ है. विकलांगों के लिए 'दिव्यांग' शब्द का प्रयोग आरएसएस ने सरकार की ओर से इस्तेमाल किए जाने के बहुत पहले से शुरू कर दिया था. कोविड महामारी से उपजे संकट के दौरान आरएसएस ने चुपचाप देश भर में 100,000 से अधिक ग्राम स्वास्थ्य स्वयंसेवकों के लिए व्यापक प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए थे. इन स्वयंसेवकों को भविष्य में कोविड की लहर की स्थिति में आपात स्थिति से निपटने के लिए डॉक्टरों की तरफ से बुनियादी प्रशिक्षण दिया गया था. प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षण संस्थानों को चलाने से आगे बढ़ते हुए संघ के सदस्य अब विश्वविद्यालयों और उत्कृष्ट संस्थानों की स्थापना करने में लगे हैं.

इस तरह की 'एनजीओ शैली' वाली सक्रियता संघ की छवि और उसके प्रति व्याप्त धारणा को ठीक करने का लक्ष्य केंद्रित प्रयास है. पिछले लगभग एक दशक में आरएसएस ने चुपचाप एक नई गतिविधि, 'विशेष संपर्क' के माध्यम से विशिष्ट लक्षित समूहों तक अपनी पहुंच बढ़ाई है. भागवत सहित संघ के सभी वरिष्ठ पदाधिकारी आरएसएस के मुख्य मुद्दों को समझाने के लिए समाज पर 'प्रभाव' डाल सकने वाले लोगों से मिलते हैं. आरएसएस प्रमुख ने बीते दिनों में मुस्लिम, ईसाई और अन्य समुदायों के नेताओं से संपर्क करते हुए उन्हें पूर्वाग्रहों को दूर करने और संघ के बारे में ज्यादा जानने के लिए प्रोत्साहित किया है. इस क्रम और आगे बढ़ाते हुए, आरएसएस ने विश्व स्तर पर अपनी छवि परिवर्तन के प्रयासों पर प्रभाव डालने वाली दुष्प्रचार की चुनौती से निपटने के लिए दर्जनों देशों में राजनीतिक, शैक्षणिक, बौद्धिक, धार्मिक और सामाजिक नेताओं से संपर्क करने का काम शुरू किया है.

मितभाषी रहे इस संगठन में इन दिनों एक नया आत्मविश्वास दिखाई दे रहा है. यह आत्मविश्वास इस तथ्य से उपजा है कि एक सदी से भी अधिक समय से यह भारत के राष्ट्रीय जीवन में हिंदू सांस्कृतिक और सभ्यतागत पहचान की केंद्रीयता को पुनर्स्थापित करने के जिस मुख्य उद्देश्य के लिए सक्रिय रहा है, वह अब वास्तविकता बन चुका है. हिंदुत्व आज राष्ट्र का केंद्रीय विषय है. कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी खुद को हिंदू कहना चाहते हैं तो तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी भी ऐसा ही करती हैं. दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने तो वरिष्ठ नागरिकों को अयोध्या की मुफ्त तीर्थ यात्रा कराने के लिए बजट आवंटन भी किया है.

एक दशक पहले इस सब की कल्पना नहीं की जा सकती थी. आजादी के बाद के दशकों में भारत का मुख्य राजनीतिक विमर्श धर्मनिरपेक्षता के इर्द-गिर्द केंद्रित था. हिंदू, हिंदुत्व और हिंदूवाद को किनारे करते हुए उसे सांप्रदायिक घोषित कर दिया गया था. हिंदू महासभा के नेता एन.बी. खरे का जवाहरलाल नेहरू को ''दुर्घटना से हिंदू'' के रूप में उल्लेख करना बीते वर्षों में मुख्यधारा की राजनीति की पहचान हिस्सा बन गया था. स्वतंत्रता के बाद के मुख्य राजनीतिक विमर्श में हिंदू पहचान की बहुसंख्यकवाद के रूप में अस्वीकृति तथा उसी सांस में अल्पसंख्यकवाद की पैरोकारी करने को ही मिथ्या धर्मनिरपेक्षता मान लिया गया था. 
धर्मनिरपेक्षता की उस विकृत धारणा, जिसे बहुत से हिंदुत्व समर्थक छद्म धर्मनिरपेक्षता कहते थे, को अब बहुसंख्यक भारतीयों ने खारिज कर दिया है. खुद को हिंदू कहना अब किसी झिझक या शर्म की बात नहीं है. यहां तक कि प्रमुख कांग्रेसी नेता भी हिंदू इतिहास और सभ्यता के बारे में किताबें लिख रहे हैं. इसका श्रेय आरएसएस को मिलना चाहिए.

कहते हैं कि हर आंदोलन चार चरणों से गुजरता है, ''पहले लोग आपकी अनदेखी करते हैं, फिर वे आप पर हंसते हैं. फिर वे आप पर हमला करते हैं, और फिर आप जीत जाते हैं.'' बहुत से आंदोलन पहले तीन चरणों के दौरान ही दम तोड़ देते हैं. आरएसएस इन सभी को सफलतापूर्वक पार कर गया है और उपहास तथा अस्वीकृति से पार पाकर राष्ट्रीय मुख्यधारा के हिस्से के रूप में उभरा है. एक सदी तक जिंदा बचे संगठन कम ही हैं. आरएसएस न केवल बचा है बल्कि तेजी से विकसित हुआ है.
आज, इसकी 50,000 से अधिक शाखाएं हैं और आरएसएस की गतिविधियां देश के लाखों गांवों तक फैली हुई हैं. हाल ही में अयोध्या में राम जन्मभूमि मंदिर के लिए वित्तीय मदद जुटाने के अभियान से इसके प्रसार और प्रभाव का आकलन किया जा सकता है. बीते साल के आरंभ में शुरू किए गए इस अभियान में संघ के हजारों कार्यकर्ताओं ने घर-घर पहुंच कर 13 करोड़ से अधिक भारतीयों से समर्थन हासिल किया. इसमें सभी दलों, सामाजिक समूहों और यहां तक कि मुस्लिम और ईसाई जैसे अन्य धर्मों के लोग भी शामिल थे. कोई अन्य सामाजिक संगठन ऐसी व्यापक पहुंच और आम जनता से जुड़ाव का दावा नहीं कर सकता.

अपने शताब्दी वर्ष के करीब पहुंचते हुए यह जैसे-जैसे अपनी ताकत के साथ ही बदलते समय की आवश्यकता के अनुरूप कार्यक्रमों की शुरूआत कर रहा है, संगठन को कुछ महत्वपूर्ण चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है. यद्यपि यह हिंदू सभ्यता की पुनरोक्ति के आधार के रूप में उभरा है, फिर भी इसकी परख और आलोचना का क्रम जारी है. इसकी तेज वृद्धि न केवल संगठनात्मक प्रसार के रूप में हुई है, बल्कि इसकी विचार प्रक्रिया के प्रभाव में भी हुई है. और वैचारिक प्रभाव में वृद्धि सांगठनिक प्रसार की तुलना में कई गुना अधिक है. वास्तव में, शाखाओं के बाहर के आरएसएस का आकार उसके अंदर के आरएसएस से बहुत बड़ा है. और, यह आवश्यक नहीं कि जो अनुशासन संगठन के भीतर है, वह बाहर भी हो.

यह स्थिति संघ नेतृत्व पर अधिक भार डालती है. मोहन भागवत इसे समझते हैं. कुछ समय पहले जब उन्होंने 'सभी भारतीयों का डीएनए एक सा' होने की बात की तो उन्हें एक वर्ग की तीखी आलोचना का सामना करना पड़ा था. मूलत: उनका जोर मुसलमानों को यह बताने पर था कि वे इस प्राचीन राष्ट्र के सांस्कृतिक तथा सभ्यतागत जीवन से अलग नहीं हैं. लेकिन जब उन्होंने हाल ही में दोहराया कि ''40,000 साल पहले के भारत के सभी लोगों का डीएनए आज के लोगों के समान है'', तो शायद यह उन नाराज वर्गों के प्रति उनकी प्रतिक्रिया होने के साथ ही आगामी वर्षों में संगठन के लिए संभावित विषय भी था. 

भारत में आज हिंदू गौरव की व्यापक अभिव्यक्ति है जो आवश्यक नहीं कि किसी अन्य समुदाय या धर्म के खिलाफ ही हो. धर्मोंतरण और इस्लामी कट्टरपंथ जैसे कृत्यों से कुछ हिंदू वर्गों में आक्रोश भी है-वास्तविक या अन्यथा रूप से उत्पीड़न का शिकार होने का भाव है. अपने शताब्दी वर्ष के एजेंडे को आगे बढ़ाते हुए आरएसएस के लिए चुनौती यह होगी कि वह गर्व और क्रोध के बीच संतुलन बनाए रखे और यह सुनिश्चित करे कि दोनों में से कोई भी सीमा से बाहर न छलकें. 

राम माधव राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य हैं. 

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