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बीकानेरवालाः भुजिया ने पहुंचाया दुनिया भर में

चटपटी-कुरकुरी भुजिया से शुरू हुए स्वाद के सफर में अब तक 150 से ज्यादा उत्पाद जुड़ चुके हैं. लेकिन कई और जायकों का जुडऩा अभी बाकी है. इस मकसद से बाकायदा 7-8 लोगों की टीम निरंतर नए स्वाद की तलाश में जुटी है

एम डी श्याम सुंदर अग्रवाल एम डी श्याम सुंदर अग्रवाल

अपनी खुशबू और स्वाद के दम पर बीकानेरवाला देश और फिर दुनिया भर में अपनी जगह बना चुका है. आखिर इसकी बुनियादी सफलता का राज क्या है? एमडी श्याम सुंदर अग्रवाल कहते हैं, "यह राज बड़ी बुनियादी-सी बात में समाया है और वह है गुणवत्ता की गारंटी. यही हमारा मूल मंत्र है.'' इसी मूल मंत्र को पकड़े रहने का नतीजा है कि उनके मेन्यू में आज 150 से ज्यादा फूड प्रोडक्ट आ जुड़े हैं. वैसे तो अग्रवाल परिवार स्वाद के इस कारोबार में एक सदी से है. लेकिन राजस्थान से निकलकर दिल्ली में अपने खांटी आंचलिक स्वाद की महक बिखेरने का सपना लिए अग्रवाल के पिता जुगल किशोर अग्रवाल अपने भाइयों के साथ 1950 में दिल्ली पधारे.

चांदनी चौक के मोती बाजार में उन्होंने एक छोटी-सी दुकान लेकर बिक्री शुरू की. आज देश भर में बीकानेरवाला के 90 स्टोर हैं. श्याम सुंदर इतने से ही संतुष्ट न थे. जब बर्गर और पित्जा बाजार में उतरकर मैक्डोनल्ड और डोमिनोज जैसे फूडब्रान्ड दुनियाभर के शौकीनों की जुबान पर चढ़ सकते हैं तो "खाने का खजाना'' लिए हम क्यों नहीं दुनिया को अपने स्वाद का दीवाना बना सकते. उनकी सोच स्पष्ट थी. सो अब बीकानेरवाला के दुबई में 11, नेपाल में 7, न्यूजीलैंड में 3, अमेरिका और सिंगापुर में 2-2 स्टोर हैं.

स्वाद की खासियत

बीकानेरवाला का दावा है कि राजस्थान से लेकर विदेश तक कहीं भी, कभी भी स्वाद और गुणवत्ता में कोई फर्क नहीं मिलेगा. इसके लिए हर वर्कर को खासतौर पर ट्रेनिंग दी जाती है. बीकारनेरवाला हर साल कम से कम 4-5 नए स्वाद, नए प्रोडक्ट अपने मेन्यू में जोड़ता आ रहा है. श्याम सुंदर बताते हैं, "पिछले साल हमने भुने बेसन की बर्फी बाजार में उतारी थी. इस सोंधे स्वाद को लोगों ने हाथोहाथ लिया.'' नए प्रयोगों के लिए बाकायदा 8-9 लोगों की टीम लगातार रिसर्च में जुटी रहती है.

इस ग्रुप ने नएप्रयोग दरअसल दिल्ली में आने के बाद ही शुरू किए. बीकानेर में भुजिया, बादाम कतली और पेठा खासे मशहूर थे. लेकिन यहां आकर काजू कतली को अपने मैन्यू में शामिल कर दिल्ली वालों को इसका चस्का लगा दिया. दिल्ली में गाय के दूध से बने स्पंज रसगुल्ले को लोकप्रिय बनाने का श्रेय बीकानेरवाला को ही जाता है. श्याम सुंदर काजू कतली के सूची में जुडऩे का दिलचस्प किस्सा बताते हैं, "बात 1968 की है, मैं बीकानेर से दसवीं पास कर आगे की पढ़ाई करने दिल्ली आया था.

साल भर कोशिश करने के बावजूद जब पढ़ाई में मेरा मन न टिक पाया तो पिताजी ने मुझे कारखाने में लगा दिया. मैंने काजू कतली बनाना शुरू किया. काजू को भिगोने से लेकर सिल पर पीसकर उसका पेस्ट तैयार करने तक की जिम्मेदारी मेरी थी.'' उनकी काजू कतली का स्वाद दिल्ली वालों की जीभ से अभी तक उतर नहीं पाया है.

लेकिन उनकी भुजिया के स्वाद का आखिर क्या राज है? श्याम सुंदर के ही शब्दों में, "हमने भुजिया तलने के लिए घी, डालडा की जगह मूंगफली के तेल का इस्तेमाल शुरू किया. भुजिया बनाने की हमारी बाकी प्रक्रिया तो खास है ही.'' वे खुद भी खाने के शौकीन हैं. "जलेबी, कचौड़ी, गरम भुजिया और दही के साथ सुबह की शुरुआत हो तो बस दिन बन जाता है.'' उनके दोनों बेटे मनीष और पंकज भी अब जायके के इस कारोबार का हिस्सा हैं. पंकज दुबई और मनीष भारत में बीकानेरवाला के पूरे ग्रुप के ऑपरेशन को संभालते हैं.

एक सहज जिज्ञासा उठती है कि इस बिजनेस में परिवार की स्त्रियों का भला क्या रोल होगा? पता चलता है कि यह भूमिका खासी दिलचस्प है. दरअसल, ग्रुप के प्रोडक्ट्स के जायके और उनकी गुणवत्ता पर नजर रखने का काम परिवार की सारी स्त्रीशक्ति ही करती है. श्याम सुंदर की पत्नी समेत घर की दूसरी महिलाएं खाने के उत्पादों को ऑडिट करने का काम करती हैं. यह महिला ब्रिगेड जब-तब बिना बताए अपने किसी भी रेस्तरां में जाकर वहां के उत्पादों को चखकर उनका औचक निरीक्षण करती है. स्वाद और गुणवत्ता में जरा भी ऊंच-नीच होने पर वे फौरन हमें इत्तला करती हैं. और ग्रुप के ई-बिजनेस की पूरी कमान तो परिवार की बहू प्रियंका के ही हाथों में है.

अपने खास स्वाद के बूते ही इस ब्रान्ड ने अपने प्रतिबद्ध ग्राहक तैयार किए हैं. दिल्ली के कीर्तिनगर आउटलेट पर जलपान के लिए आए बुजुर्ग दंपती उमेश सिन्हा और शिवानी राज कचौड़ी का ऑर्डर करने के बाद इस बात पर सलाह कर रहे थे कि मीठे में क्या लिया जाए. शिवानी अड़ी थीं कि काजू कतली लिया जाए तो उमेश जलेबियों की जिद पकड़े हुए थे. आखिरकार तय हुआ कि 200-200 ग्राम दोनों ही चीजें ली जाएं. उमेश स्पष्ट करते हैं, "पिछले 30 साल से इसके स्वाद का दीवाना हूं. काजू कतली तो खैर इनके जैसी कोई बना ही नहीं सकता, लेकिन इनकी जलेबियों का चस्का भी एक बार लग जाए तो छूटना मुश्किल होता है.'' बीच में ही हंसते हुए शिवानी कहती हैं, "देखा नहीं, जलेबियों के लिए कैसी जिद पकड़कर बैठ गए थे!''

अभी तो शुरुआत है...

बीकानेरवाला के नमकीन-मिठाइयां अभी दिल्ली-एनसीआर में चार जगहों पर बनती हैं. जल्द ही बनारस और हैदराबाद में भी ये बनने लगेंगे. अग्रवाल परिवार बनारस से पूरब और हैदराबाद से दक्षिण भारत के बाजार में छाने की तैयारी कर चुका है. जल्द ही बीकानेरवाला एक ऐप भी लॉन्च करने वाला है. इस ऐप में 150 से ज्यादा प्रोडक्ट मौजूद रहेंगे. इधर आपने किसी भी प्रोडक्ट पर उंगली रखी नहीं कि उधर डिलिवरी बॉय दरवाजे पर पहुंचा नहीं. इतना ही नहीं, वेबसाइट को यूजर फ्रेंड्ली और बीकानेरवाला के जायके की तरह ही ललचाने वाला बनाने का काम चल रहा है.

मशहूर हुए दूसरे ब्रान्ड्स भी

बीकानो, बीकानो चाट कैफे और आंगन भी इसी ग्रुप के ब्रान्ड हैं. श्याम सुंदर बताते हैं कि वे दरअसल बीकानेरवाला का नाम बदलना चाहते थे. एक शहर पर आधारित नाम होने की वजह से उन्हें इसके दुरुपयोग का डर था. लेकिन यह नाम इतना मशूहर था कि ऐसा करना मुमकिन न था. इसलिए उन्होंने दूसरे नाम से अपने कई ब्रान्ड शुरू किए. 1981 में दिल्ली के करोल बाग से "आंगन'' की शुरुआत की तो पैकेज्ड फूड के लिए 1988 में बीकानो शुरू हुआ. 2003 में बीकानो चाट कैफे को लॉन्च किया गया. आंगन खासतौर पर नेपाल में मशहूर है जबकि दिल्ली में इस नाम से केवल दो ही स्टोर हैं. लॉरेंस रोड ए-28 के बीकानेरवाला के कारखाने में बैठे 66 वर्षीय श्याम सुंदर कहते हैं, "करीब सौ साल पहले हमारे परदादा लालजी अग्रवाल ने बीकानेर में जिस जायके की नींव डाली थी, हमने उसे आज तक कायम रखा है. परदादा ने पूरे बीकानेर को अपने स्वाद का दीवाना बनाया था और हमारी नजर अब पूरी दुनिया पर है.'' वह तो इस ग्रुप की आक्रामक मार्केटिंग में दिख भी रहा है. ठ्ठ

सफरनामा

दिल्ली प्रवेश

1950 में चांदनी चौक में पहली बार बीकानेरवाला भुजिया भंडार खोला

विदेश में देसी स्वाद

दुबई में 11 स्टोर, अमेरिका और सिंगापुर में 2-2, न्यूजीलैंड में 3 और नेपाल में 7 स्टोर हैं

देश भर में

कुल 90 स्टोर और 4 माल बनाने के कारखाने

स्वाद की कसौटी

लोकल से लेकर ग्लोबल तक गुणवत्ता और जायका एक समान

पसंदीदा खानपान

भुजिया, काजू कतली, स्पंज रसगुल्ला, राजकचौड़ी और जलेबी

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