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विधानसभा चुनाव 2022ः पहाड़ में पार्टी बदलने का मौसम

उत्तराखंड की सियासी टूटफूट में बचे-उतराते लोगों में हरक रावत एक नाम भर है. वास्तव में भाजपा और कांग्रेस दोनों दलों में भरपूर बागी हैं

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बदलता रुख! हरक सिंह रावत (बाएं), सतपाल महाराज (ऊपर) और यशपाल आर्य बदलता रुख! हरक सिंह रावत (बाएं), सतपाल महाराज (ऊपर) और यशपाल आर्य

रविवार, 16 जनवरी को, जब भाजपा के उत्तराखंड कोर ग्रुप ने पार्टी प्रमुख जे.पी. नड्डा के साथ उनके दिल्ली आवास पर मुलाकात की तो कमरे में मौजूद सभी लोग एक व्यक्ति की अनुपस्थिति स्पष्ट महसूस कर रहे थे—वे थे राज्य के वन मंत्री हरक सिंह रावत. हर कोई जानता था कि पिछले एक या दो सप्ताह से उनकी वफादारी झूला झूल रही थी. बैठक में शामिल लोगों को यह भी पता था कि जब बैठक चल रही थी उस समय हरक भी दिल्ली में ही थे. यह सब हरक के काफी नखरे झेल चुके पार्टी नेतृत्व के लिए अत्यंत असहनीय था. वहीं निर्णय लिया गया कि उन्हें पुष्कर धामी कैबिनेट से बर्खास्त करते हुए लंबे समय के लिए पार्टी से भी निष्कासित कर दिया जाए.

उस रविवार हरक राजधानी में कांग्रेस के अपने पुराने आकाओं से मुलाकात करके उनसे अच्छी सौदेबाजी की कोशिश करते रहे. स्वाभाविक रूप से वे अपने लिए टिकट हासिल करने की जुगत में थे. और, यह कोशिश भी दक्षिण-पूर्वी उत्तराखंड की हरी-भरी तलहटी में उनकी मौजूदा सीट कोटद्वार से नहीं, बल्कि 10,000 फुट ऊंची और काफी प्रतिष्ठित समझी जाने वाली केदारनाथ सीट से थी. एक पैकेज डील के रूप में, हरक अपनी बहू और पूर्व मिस इंडिया अनुकृति गुसाईं के लिए भी कोटद्वार के बगल की सैन्य छावनी वाले शहर लैंसडाउन सीट से टिकट चाहते हैं.

इस चुनावी मौसम में राजनैतिक पर्यटन में शामिल होने वाले हरक अकेले नहीं हैं. उनसे पहले, राज्य के परिवहन मंत्री यशपाल आर्य ने भी कांग्रेस में लौटने के लिए धामी कैबिनेट छोड़ दी थी. 2016 में, इस जोड़ी ने पूर्व सीएम विजय बहुगुणा और अमृता रावत 'माता जी' की संगति में भाजपा खेमे का रुख किया था. 'माता जी' भी केवल अपने धर्मगुरु-सह-राजनेता पति सतपाल महाराज का अनुसरण कर रही थीं जो पहले ही भाजपा में जा चुके थे. 2017 में कांग्रेस की हार का एक प्रमुख कारण तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत के खिलाफ व्यापक असंतोष का उभरना था और हरीश उस प्रकरण में हरक की भूमिका भूले नहीं हैं.

यही वजह है कि हरक की चाल हर तरफ अफरा-तफरी फैला देती है. उनका पार्टी छोड़ना भी असंतोष ग्रस्त भाजपा के लिए कोई अच्छी बात नहीं है. लेकिन कांग्रेस के लिए भी मौसम का पूर्वानुमान उतना ही खराब है. हरक की संभावित एंट्री ने पार्टी को दो गहरे विभाजित खेमों में बदल दिया. हरीश उनका पुरजोर विरोध करते हैं; और उनके कट्टर विरोधी प्रीतम सिंह, हरीश को वीटो करने के लिए आलाकमान के सामने जोरदार पैरवी कर रहे हैं.

विद्रोह के भूत ने दोनों पक्षों को काफी डरा रखा है. पिछले पांच वर्षों में तीन मुख्यमंत्रियों को सामने लाने वाली भाजपा पार्टी में एकजुटता की भावना पैदा करने में असफल रही है और उसने इस समय सत्ता में बैठे धामी का समर्थन करने का फैसला किया है. पूरे अभियान का ताना-बाना 46 वर्षीय धामी और उनके करीबी युवाओं के इर्द-गिर्द बुना जा रहा है. इसका मतलब है कि 70 सीटों वाले सदन में पार्टी के मौजूदा 57 विधायकों में से कई अनुभवी दिग्गजों को टिकट नहीं मिलेगा. एक शीर्ष नेता ने इंडिया टुडे को बताया कि कम से कम 26 मौजूदा विधायकों को बदलना पड़ सकता है. हवा का रुख भांपते हुए इनमें से कई कांग्रेस के संपर्क में हैं.

विपक्षी दल के नेता के लिए भी यह कोई सुखद स्थिति नहीं है. एन.डी. तिवारी और उनकी करीबी इंद्राणी हृदयेश के निधन के बाद, हरीश रावत विरोधी गुट का नेतृत्व प्रीतम सिंह कर रहे हैं. जनवरी के मध्य में राहुल गांधी के छुट्टी से लौटने तक दोनों खेमों के बीच अस्थायी समझौता हुआ था. राहुल ने हरक को पार्टी में लेने की बात मान ली है, लेकिन गुरुवार को पत्रिका छपाई के लिए जाने तक हरीश ने अपना रुख नरम नहीं किया था. 

पिछले छह महीनों में यहां कांग्रेस के सबसे बड़े नेता हरीश के खिलाफ कई फैसले हुए हैं. आलाकमान ने लगातार उनकी इस मांग को टाला है कि उन्हें फिर से मुख्यमंत्री उम्मीदवार घोषित किया जाए. उनके लोगों को जिला कांग्रेस अध्यक्षों के रूप में भी समायोजित नहीं किया गया है. दिसंबर समाप्त होते-होते हरीश ने सक्रिय राजनीति से संन्यास लेने की धमकी भी दी थी—और, इसका कारण हरक का आसन्न पुन: प्रवेश था. उन्हें ऐसा न करने के लिए किसी तरह मना लिया गया था, लेकिन उन्हें दूसरे नेताओं पर किसी तरह की स्पष्ट वरीयता नहीं दी गई थी. वे और प्रीतम मिलकर अभी भी दो घोड़ों वाले अस्थिर रथ का निर्माण करते हैं. 

दोनों खेमे ने सभी 70 सीटों के लिए अपने-अपने प्रत्याशियों की सूची तैयार कर ली है. दलबदलुओं के आने से इसमें बाधा पड़ती है. प्रीतम उन पूर्व कांग्रेसियों को मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं, जिन्होंने हरीश से मतभेदों के कारण इस्तीफा दिया था. उन्होंने ही बीते नवंबर में यशपाल आर्य और उनके विधायक पुत्र संजीव आर्य की पार्टी में वापसी की राह आसान की थी. अब सबकी निगाहें सतपाल महाराज पर हैं जो हरक के करीबी रिश्तेदार हैं. 70 वर्षीय महाराज, सभी फालतू बातों का खंडन करते हैं, लेकिन उनका कदम इस बात पर निर्भर करेगा कि उन्हें और उनकी पत्नी अमृता को टिकट मिलेगा या नहीं. भाजपा के एक परिवार-एक-टिकट के नियम को देखते हुए उनके भाजपा से नाराज होने की संभावना अधिक है. कांग्रेस के बागियों का भी उल्टा प्रवाह जारी है, लेकिन इसकी मुख्य दिशा अभी भी अनिश्चितता के भंवर में है.

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