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कृषिः सुधारों की नई फसल पर जोर जरूरी

विवादास्पद कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों के आंदोलन ने भारतीय कृषि को जन चेतना के केंद्र में ला दिया. महत्वपूर्ण सुधारों की गति मंद नहीं पड़नी चाहिए

कृषि कानूनों के बाद कृषि कृषि कानूनों के बाद कृषि

सिराज हुसैन और श्वेता सैनी

प्रधानमंत्री की ओर से तीन केंद्रीय कृषि कानूनों को अचानक रद्द करने के ऐलान को कई लोग कृषि सुधारों की डगर के अंत के रूप में देख रहे हैं. लेकिन, निश्चित रूप से ऐसा नहीं है. किसानों के 15 महीनों तक चले आंदोलन से मिले कुछ सबक ये हैं:

परामर्श बेहद महत्वपूर्ण हैं और निष्पक्ष दिखना जरूरी है

आंदोलन ने सरकार को यह एहसास करा दिया कि कृषि में सुधार करने के लिए समावेशी और व्यापक परामर्श होना चाहिए. 2022 में कृषि में संरचनात्मक सुधारों के भविष्य के लिए विशेषज्ञों और किसानों के प्रतिनिधियों के साथ सीधी बातचीत जरूरी हो सकती है. आखिरकार, प्रोत्साहन, निवेश, आयात/निर्यात, कर-निर्धारण आदि पर नीतियां बनाते वक्त सीआइआइ, फिक्की और पीएचडी चैंबर ऑफ कॉमर्स ऐंड इंडस्ट्री की राय पर सरकार विचार करती ही है.

किसानों को पिछले कुछ वर्षों में दो सबसे महत्वपूर्ण प्रोत्साहन दिए गए हैं—पारिवारिक श्रम की लागत (एफएल) के साथ-साथ भुगतान की गई लागत (ए2) पर न्यूनतम 50 फीसद एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) तय करना, और सालाना 6,000 रुपए पीएम-किसान योजना के तहत दिए गए. लेकिन, ये प्रोत्साहन किसानों या राज्य सरकारों से परामर्श के बाद सामने नहीं आए हैं. ये केंद्र की ओर से एकतरफा घोषणाएं थीं. अब जब सरकार ने फसल पैटर्न, उर्वरक सब्सिडी और एमएसपी के भविष्य जैसे विवादास्पद मुद्दों पर विचार करने के लिए विशेषज्ञों की समिति की घोषणा की है, तो उम्मीद है कि विभिन्न कृषि-जलवायु क्षेत्रों के विशेषज्ञों और किसानों के प्रतिनिधियों को पैनल में नामित किया जाएगा.

राज्यों की वस्तुस्थिति के अनुसार सुधारों को तय करें

भारत के राज्य कृषि विकास के विभिन्न चरणों में हैं. उनमें संसाधन बंदोबस्ती और कृषि-पारिस्थितिकी समस्याओं से संबंधित विभिन्न बाधाएं हैं. इसलिए, उनकी जरूरतों को पूरा करने के लिए उनके हिसाब से नीतियों को तैयार करना होगा.

सुधारों के लिए स्थानीय जोर और व्यापक व्यावहारिकता की जरूरत

अन्य बड़े सबक में से एक यह है कि जहां सुधारों के नेतृत्व की जिम्मेदारी राज्यों को देने की जरूरत है, वहीं सुधारों को समग्र रूप से देश की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए व्यावहारिक और एकीकृत रूप से तैयार करने की जरूरत है. गेहूं, चावल और दलहन सरीखी अपनी मुख्य फसलों के अतिरिक्त बचत को नहीं रखना भारत गवारा नहीं कर सकता. 2022 में केंद्र को राज्यों की आकांक्षाओं/जरूरतों और देश की दीर्घकालिक जरूरतों के बीच मेल सुनिश्चित करने की जरूरत है. 

कृषि के इन प्रमुख क्षेत्रों में 2022 में सुधार की जरूरत है:

उर्वरक सब्सिडी

उर्वरक से संबंधित सब्सिडी सबसे मुश्किल सुधारों में से एक है. लंबे समय से यह बहस चल रही है कि प्रति हेक्टेयर भूमि जोत के आधार पर उर्वरक सब्सिडी का प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (डीबीटी) यूरिया के अत्यधिक उपयोग पर रोक लगा सकता है. वैश्विक कीमतों में भारी वृद्धि की वजह से केंद्र को उर्वरक सब्सिडी पर 1.55 लाख करोड़ रुपए खर्च करने पड़ सकते हैं जबकि 2021-22 के लिए अनुमानित बजट केवल 79,530 करोड़ रुपए है.

व्यापक काश्तकारी और भूमि को पट्टे पर देने के बावजूद, इसका केवल दसवां हिस्सा ही रिकॉर्ड में है (कृषि जनगणना के अनुसार). ऐसे में उर्वरक सब्सिडी का कोई भी डीबीटी केवल भूमिधारक तक पहुंचेगा, वास्तविक किसान तक नहीं. इसके अलावा, प्रति हेक्टेयर उर्वरक की खपत में भारी अंतर होता है. 2019-20 में, केरल में प्रति हेक्टेयर 36.5 किलोग्राम नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश की खपत हुई, जबकि बिहार में प्रति हेक्टेयर 245.3 किलोग्राम—देश में सबसे अधिक, यहां तक कि पंजाब के (243 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर) से भी अधिक—की खपत हुई. ऐसे में उर्वरक सब्सिडी का एक समान डीबीटी आसान नहीं है. 

खाद्य सुरक्षा

भारत के शहरी मध्य वर्ग का एक बड़ा हिस्सा मानता है कि देश में खाद्य सुरक्षा काफी है. उन्हें इसका एहसास नहीं है कि कृषि उत्पादन का देश का अधिकांश अधिशेष (अतिरिक्त बचत) बहुत कम है. इसके अलावा, खाद्य सुरक्षा पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव अनिश्चित बना हुआ है. अगर अर्थव्यवस्था वास्तव में हर साल 7-8 फीसद की दर से बढ़ती है और उनका लाभ जनता को मिलता है तो कृषि उत्पादों, खासकर प्रोटीन, फल और सब्जियों की मांग में इजाफा होगा और कुछ वस्तुओं की वर्तमान बचत खत्म हो जाएगी. इसलिए पैदावार में सुधार और नुक्सान को कम करने के लिए संयुक्त प्रयास बेहद जरूरी है.

कृषि पर जलवायु का प्रभाव

इस साल एक अन्य महत्वपूर्ण मुद्दे पर तत्काल सहमति की जरूरत है, और वह है भारत के मूल हरित क्रांति क्षेत्रों, मसलन पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कृषि-पारिस्थितिकीय स्थिरता. इसी तरह से महाराष्ट्र, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश आदि के पानी की कमी वाले क्षेत्रों में गन्ने की खेती टिकाऊ नहीं है.

गन्ने का क्षेत्र 1990-91 में 36.8 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 2018-19 में 50.6 लाख हेक्टेयर हो गया है. मोटे तौर पर इस वृद्धि की मुख्य वजह नई किस्मों की आमद के साथ-साथ गन्ने की गारंटीकृत कीमतों की नीति है. नतीजतन, भारत सालाना 3.2 से 3.3 करोड़ टन चीनी का उत्पादन करता है जबकि इसकी घरेलू मांग केवल 25.5 लाख टन की है. किसानों को गन्ना मूल्य का भुगतान करने में चीनी मिलों को सक्षम बनाने के लिए केंद्र और राज्य सरकारें कई तरह के प्रोत्साहन दे रही हैं. फसल पैटर्न को लेकर बनने वाली विशेषज्ञ समिति न केवल पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में धान की खेती, बल्कि विभिन्न राज्यों में गन्ने पर भी ध्यान देगी.

एपीएमसी को मजबूत करना और बुनियादी ढांचे में निवेश

साल 2020 में तीन कृषि कानूनों के लागू होने से पहले ही इस बात पर आम सहमति बन गई थी कि एपीएमसी (कृषि उपज बाजार समितियों) समेत कृषि विपणन में गंभीर सुधारों की जरूरत है. इन सुधारों में व्यापार लाइसेंस का उदार मुद्दा, सभी राज्यों में अधिकतम दो फीसद का एक समान बाजार शुल्क, एक राज्य में सभी एपीएमसी के लिए एकीकृत लाइसेंस और राज्यों के भीतर और बाहर कृषि उपज की आवाजाही पर कोई प्रतिबंध नहीं, शामिल है.  
किसानों के आंदोलन ने भारतीय कृषि के वर्तमान और भविष्य में लोगों की बहुत ज्यादा जागरूकता और रूचि पैदा की है. ऐसे में सुधारों की गति मंद नहीं पड़नी चाहिए. 

सिराज हुसैन और श्वेता सैनी इंडियन काउंसिल फॉर रिसर्च ऑन इंटरनेशनल इकोनॉमिक रिलेशन्स (आइसीआरआइईआर), नई दिल्ली में सीनियर फेलो (विजिटिंग) हैं. हुसैन पूर्व केंद्रीय कृषि सचिव भी हैं

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